कविता।धरती है निष्प्राण।
धरती है निष्प्राण,प्राण सजोये कैसे ।
पथ्थर सी मिट्टी में दाना बोये कैसे ।
न बदली बरसी, बरसों से रिमझिम ।
घटा नही छायी अम्बर में ,दुर्दिन ।
तरसे अब बरसे सावन ,जिज्ञाषा ।
नही हो सकी बौछारों से तृप्त पिपासा ।
निराशा भरी निशा भर सोये कैसे ।
धरती है निष्प्राण ,प्राण सजोये कैसे ।
कृषक समूह कहकहे 'यह हवा का झोंका' ।
बरसे अब ,शायद बरसे ,कुछ नही भरोशा ।
सुलझ गयी है फसल, हैं अंकुर फूटे ।
सूरज की किरणे भी रचती खेल अनूठे ।
वशुन्धरा आँचल में धान्य छिपाये कैसे ।
धरती है निष्प्राण ,प्राण सजोये कैसे ।
व्याकुल है खगवृंद शरोवर सूखे ।
धूमिल है हरियाली ,तरुवर, ठूठे ।
उठ रही धूल धूसरित पर पंछी के होते ।
दुखित मन मूर्छित चातक ,हारिल, तोते ।
न हुई हर्ष ध्वनि, पंख भिगोएँ कैसे ।
धरती है निष्प्राण ,प्राण सजोये कैसे ।
अश्रु ढरे दो बूँद ,नदियां सिमट गयीं ।
भरी आह फिर फसल स्वयं में लिपट गयी ।
प्रचण्ड सूर्य में जले फसल भी ज्वाला सी ।
तपी दुपहरी लगे सेवारें पाला सी ।
जलधर को यह बात कोई बतलाये कैसे ।
धरती है निष्प्राण ,प्राण सजोये कैसे ।
चली हवा इक रोज सोच बादल से मिलने ।
पग पग पर पल्लव लगे पहलू में गिरने ।
हुआ कष्टमय तप्त हवा का चलना ।
हवा रुकी खामोश, पड़ेगा सहना ।
पीले ,इन पीले पत्तो को ,झुठलायें कैसे ।
धरती है निष्प्राण ,प्राण सजोये कैसे ।
कुसुम ,फूल, प्रसून खिले पर खिले अधूरे ।
अर्धहरित पंखुड़ियां धरा पर रहे बिखेरे ।
क्यारी क्यारी में कलियाँ है चिराग लिए ।
कुछ सुलझी कुछ अर्धहरित ही त्याग दिए ।
बागवान, उद्यान सदा मुस्काये कैसे ।
धरती है निष्प्राण ,प्राण सजोये कैसे ।
पथ्थर सी मिटटी में दाना बोये कैसे ।
धरती है निष्प्राण ,प्राण सजोये कैसे ।
©राम केश मिश्र