समस्त रचनाएं Rakmish Sultanpuri द्वारा रचित एवं प्रकाशित है।
6–कविता।।क्योकि आज है रक्षाबन्धन।।
भैया यह रेशम का धागा एक मात्र है साधन ।।
जबकि सही रूप में है यह ,स्नेहो का बन्धन ।।
रुको मैं आती
थाल सजाती
करना है अभिनन्दन ।।
क्योकि आज है रक्षाबन्धन ।।1
आज कलाई पर जो तेरे, बाँध रही मैं धाँगा ।।
सिर्फ तुम्हारे लिये दुआ की ,और नही कुछ माँगा ।।
खुश तुम रहना
कहती बहना
लगा के कुंकुम चन्दन ।।
क्योकि आज है रक्षाबन्धन ।।2
वो बचपन का झूठ बोलना माँ से वो डटवाना ।।
चल भैया तू आज छोड़ दे करना ,कोई बहाना ।।
मैं तेरे घर
एक धरोहर
अब कभी न करना अनबन ।।
क्योकि आज है रक्षाबन्धन ।।3
कर्तब्यो से विमुख न होना वादा कर तू आज ।।
आश्वासन मुझको दे दे रखेगा राखी की लाज़ ।।
अपना यह कर
सिर पर रखकर
पर तनिक न हो स्पंदन ।।
क्योकि आज है रक्षाबन्धन ।।4
भैया यह पावन रिश्ता है बिल्कुल ही अनमोल ।।
तू भाई उन हिंदुस्तानी बहनो का कुछ बोल ।।
जिसने बाँधा
तुमको धाँगा
करना ही होगा अभिनन्दन ।।
क्योकि आज है रक्षाबन्धन ।।5
न कोई बहना रहे अकेली न रहे कलाई सूनी ।।
हे ईश्वर ! इस रक्षासूत्र से टल जाये अनहोनी ।।
पूरे विश्व में
गूँजेगा अब
भातृ-प्रेम का गुंजन ।।
क्योकि आज है रक्षाबन्धन ।।6
7–।।कविता।।मैं भी कवितायेँ लिखता हूँ।।
भावों की बिख़री छाया से
इस हृदय को सींचे ।
स्थिर होकर बैठ गया मैं
कल्पवृक्ष के नीचे ।।
बहते झरने
सूखी नदिया
दुःख में दुविधाये लिखता हूँ ।
मैं भी कविताएँ लिखता हूँ ।।1
तपते उन मिटटी के ढेलों
में किसान जलते है ।
जिनके बच्चे घास उठाते
नर्म आह भरते है ।।
बासी रोटी
लाल मिर्च की
खलती सुविधाएँ लिखता हूँ ।।
मैं भी कवितायेँ लिखता हूँ ।।2
अर्धनग्न खपटैले चप्पल
मटमैली वो छाया
निर्धनता की सिर्फ लकीरे
पता नही क्या खाया
भूखे बच्चे
क्या सोचेगे
उनकी विपदायें लिखता हूँ ।।
मैं भी कवितायेँ लिखता हूँ ।।3
बचपन की वे किल्लोले
जो गूँज रही है आती
माँ की ममता की परछायी
कितना सुख दे जाती
उन स्मृतियों
के आहट की
सारी विविधाये लिखता हूँ ।।
मैं भी कवितायेँ लिखता हूँ ।।4
अफ़सर बाबू सेठ महाजन
दफ़्तर के चपरासी ।।
न जाने क्यों बने हुये है
घूंसों के अभिलाषी
दबे पाँव वे
जो भी करते
उनकी छमताये लिखता हूँ ।।
मैं भी कवितायेँ लिखता हूँ ।।5
स्नेहो में आत्मसमर्पण
जाति पाति के आगे
सिखलाते सब निजवाचक हो
तो समाज क्यों त्यागे
प्रेम अनूठा
करना झूठा
लटकी प्रतिमाये लिखता हूँ ।।
मैं भी कवितायेँ लिखता हूँ ।।6
धरना देते वही लोग जो
नौकरियां है पाये
फिर भी करते हाय हाय
बैठे है मुह बाये
सोच रहा हूँ
देख देखकर
घटती समताये लिखता हूँ ।।
मैं भी कवितायेँ लिखता हूँ ।।7
और योजनाये सारी जो
चला रही सरकार
रुकी ही रहती जब चलती है
मचता हाहाकार
आक्रोषित जनता
के मन में
उपजी शंकाये लिखता हूँ ।।
मैं भी कवितायेँ लिखता हूँ ।।8
मैंने देखे दर्द भरे कुछ
चेहरे बहुत रुआंसे
जिनमे नही शेष इच्छाये
बस चलती है साँसे
सूखे मुँह पर
आश्वासन की
झूठी ममताये लिखता हूँ ।।
मैं भी कवितायेँ लिखता हूँ ।।9
आम और महुए में देखा
फलने लगे टमाटर
और लताएँ सूख रही सब
बेल रही है पापड़
रंग बदलने
की तरकीबे
ढोंगी रचनाएँ लिखता हूँ ।।
मैं भी कवितायेँ लिखता हूँ ।।10
***
8– क्योकि मैंने प्यार किया है।।
निरख हृदय को इस आशा से
सींच रहा हूँ मैं दिन रात
निश्चित ही इक दिन होनी है
स्नेहो की वह बरसात
तृप्त तभी
हो पायेगा उर
इसे जला अंगार किया है ।।
क्योकि मैंने प्यार किया है।।1
तस्वीरें है तस्वीरों पर
एक कल्पना मन की
रहूँ निरखता मैं जीवन भर
आभा तेरे तन की
रही करकती
इन आँखों के
सपनो को साकार किया है ।।
क्योकि मैंने प्यार किया है।।2
इन आँखों को दर्पण सा मैं
समझ रहा मुस्काता
उन आँखों में बसे नेह की
झलक मात्र मैं पाता
तुम्हे पता क्या
इस हृदय ने
हृदय पर अधिकार किया है ।।
क्योकि मैंने प्यार किया है।।3
स्मृतियां तो पंख लगाकर
तितली सी उड़ जाती
खुशबू पाकर रूप सलोने
की जब तब मंडराती
स्नेहो के
नव परागकण
तन मन में प्रसार किया हैं ।।
क्योकि मैंने प्यार किया है।।4
जब आहट आती है तेरे
होने या न होने की
तब खोजू मैं दिवास्वप्न में
सुन्दर रूप सलोने की
विह्वलता की
हदतक मैंने
जाकर के जयकार किया हैं ।।
क्योकि मैंने प्यार किया है।।5
बूंदाबांदी कभी उमस थी
सिहरन थी भरपूर
पर आता था तुमसे मिलने
हो करके मजबूर
अमिट भाव
तेरे रूपो का
दुर्दिन में तैयार किया है ।।
क्योकि मैंने प्यार किया है।।6
तुमको पाने की कोशिस में
अब लगी हुई है होड़
मैं भी ताना बाना बुनकर
करता हूँ गठजोड़
जब से देखा
रूप तुम्हारा
उर अर्पित साभार किया है ।।
क्योकि मैंने प्यार किया है।।7
लोग लगाकर काट रहे है
जाति धर्म की फसलें
और बीज बोते है कड़वे
मानवता को डस ले
नही मानता
पाखण्डों को
घाटे का व्यापार किया है ।।
क्योकि मैंने प्यार किया है।।8
ज्यो माँ अपने निज सपूत से
चिड़ियां करे चिरंगुन से
नेह करे धन से लोभी ज्यो
करू चाह मैं उस धुन से
सुख में दुःख में
इन आहो ने
समता का व्यवहार किया है ।।
क्योकि मैंने प्यार किया है।।9
इस समाज को क्या समझाना
यह समाज है अंधा
जीती मक्खी निगल रहे है
मचा है गोरखधंधा
प्यार के नाम पर
करे दिखावा
हठकर अत्याचार किया है ।।
क्योकि मैंने प्यार किया है।।10
×××
9–मैं भी अनुसन्धान करूँगा।।
विश्वासो की डोर पकड़कर
चलता हूँ मनमारे
अंधकार यह ढह जायेगा
शायद धीरे धीरे
ज्ञान के दीपक
जल जायेंगे
तब सच का आह्वान करूँगा ।।
मैं भी अनुसन्धान करूँगा।।1
भावो के पुल के ऊपर रख
हृदय का प्रकाश
सम्बन्धो के दृढ़ बन्धन से
रच दूँगा इतिहास
आहो से उभरे
गीतों का
मधुरिम स्वर हर गान करूँगा ।।
मैं भी अनुसन्धान करूँगा।।2
किस कारण से भ्रस्ट हो रहे
मानवता के नागर
किस कारण से नही झलकती
सच की मोटी चादर
जिनके अंदर
झूठे मुखड़े
छिपे हुये व्यवधान करूँगा ।।
मैं भी अनुसन्धान करूँगा।।3
दीनो की निर्मम आहो पर
जब पिघलेगा हृदय
असहायों का हाथ पकड़कर
पायेगे सुख निर्भय
पावन होगा
मन मन्दिर तब
विश्व भवन निर्माण करूँगा ।।
मैं भी अनुसन्धान करूँगा।।4
इतने कच्चे जीर्ण न होंगे
सम्बन्धो के धागे
तब लालच की परत न होगी
नयन ज्योति के आगे
धन का धनी
धनी न होगा
चूर सभी अभिमान करूँगा ।।
मैं भी अनुसन्धान करूँगा।।5
नही बह सकेंगे आँखों से
स्नेहो के पानी
नही गढ़ सकेगा फिर कोई
दुख़ की नयी कहानी
विकलता का
लेस न होगा
हृदय विचार प्रधान करूँगा ।।
मैं भी अनुसन्धान करूँगा।।6
दया धर्म में नही रहेगी
तब कोई कृपणता
अभिमानो की झलक न होगी
जाति पांति में समता
मानवता के
एक ही बन्धन
में सबका अवधान करूँगा ।।
मैं भी अनुसन्धान करूँगा।।7
मानव प्रेम मात्र पर निर्भर
इक संसार बनाऊगा
कठिन रास्ते दुख़ के झिलमिल
पर परचम लहराउगा
स्नेहो की
नदी बहकर
जन जन को इंसान करूँगा ।।
मैं भी अनुसन्धान करूँगा।।8
उस दिन जब मैं कह पाउगा
इस जग की सच्चाई
तब जीवन का त्याग करूँगा
चुका के पाई पाई
जो भी मेरे
साथ रहेगे
उन सबका सम्मान करूँगा ।।
मैं भी अनुसन्धान करूँगा।।9
सच्चाई की गूँज उठेगी
और बजेगा बाजा
नही बन सकेगा तब कोई
अन्धा कनवा राजा
नौ सौ बिल्ली
खायेगा जो
उसको तो बदनाम करूँगा ।।
मैं भी अनुसन्धान करूँगा।।10
10–जय हो हो मेर वीर जवान ।
भारत माता की सेवा में
जिसने सब कुछ त्यागा ।।
ताकि देश हमारा सोये
रात रात भर जागा ।।
इक ही धन ही
सिर्फ अमन ही
उनका एक ईमान ।।
जय ही मेरे वीर जवान ।।1
वन बंज़र कानन कुंजो में
सहे धूप बरसात
विकशित करते हर जीवन में
सुख का नया प्रभात
जल हो थल हो
नभ् अंचल हो
रहते एक समान ।।
जय हो मेरे वीर जवान ।।2
अस्त्र और शस्त्रो से सज्जित
युद्ध भूमि में रण में
हुये नही न होंगे विचलित
लिये हुये उस प्रण में
अरि की आशा
हुई निराशा
बन जाते हो एक तूफ़ान ।।
जय हो मेरे वीर जवान ।।3
मातृभूमि तो सिर्फ तुम्हारी
सेवा का प्रतिफल है
त्याग तुम्हारा भक्ति तुम्हारी
हम सब का सम्बल है
रहकर निर्भर
जिस गौरव पर
हम सब को है अभिमान ।।
जय ही मेरे वीर जवान ।।4
देशभक्ति ही एक धर्म है
मानवता की रक्षा
एक साधना और उसी की
करते रहे सुरक्षा
अनुशासन से
अपने तन से
रखते देश की शान ।।
जय ही मेरे वीर जवान ।।5
तुम हो अमर कहानी लिखते
तुम रचते इतिहास
और तुम्ही ने पूर्ण कर लिया
जीवन पर अभ्यास
अरि के हन्तक
युगों युगों तक
बने रहोगे तुम्ही महान ।।
जय हो मेरे वीर जवान ।।6
भारत की इस भारतीयता
का तुम हो आधार
ऋणी रहेगा देश तुम्हारा
जानेगा संसार
पाकर अवसर
याद तुम्हे कर
गायेगा जय गान ।।
जय हो मेरे वीर जवान ।।7
धन्य हमारी जन्मभूमि है
धन्य है भारतमाता
धन्य हो गया निज जीवन भी
पता वही है पता
जिसने निर्भय
सीख़ लिया है
बनकर रहना अब इंसान ।।
जय हो मेरे वीर जवान ।।8
जाति धर्म का भेद मिटाकर
जल थल और पवन में बेसक
जिसने लहराया है परचम
आसमान में दूर गगन तक
मैं क्या पूरा
देश उन्ही को
करता रहता है प्रणाम ।।
जय हो मेरे वीर जवान ।।9
जय तेरे जीवन की गाथा
जय तेरा प्रयास
जय जय जय तेरी प्रतिज्ञा
जय हो जय विश्वास
प्रीति की जय हो
जीत की जय हो
जय पर जय अभिमान ।।
जय हो मेरे वीर जवान ।।10
11–तुमको है मेरी सौगात ।
आज बता दे माँ मुझको तुम
दूर कहा तक जाती
मंसूर गेहुओँ के छोटे कण
चुनकर के तुम लाती
मैं चलती हूँ
साथ तुम्हारे
कल जैसे होगा प्रभात ।
तुमको है मेरी सौगात ।।1
सुंदर होंगे नदी नहर वे
खेत और खलिहान
झरने सुंदर दृश्य मनोरम
फूल भरे उद्यान
जैसा कि तुम
रोज बताती
आकर सारी रात ।
तुमको है मेरी सौगात ।। 2
माँ मुझको तुम लेकर चलना
नदियों के उस पार
जहाँ गाँव के बाद शहर है
सुंदर है संसार
निज नयनों से
मैं देखूगीं
खुशियों के सारे हालात ।।3
तुमको है मेरी सौगात ।।
सुनकर बात चिरंगुन की तब
चिड़िया भरती आह
ममता की निधि की आँखों में
हुआ अश्रु प्रवाह
उस अबोध के
कल्पित चित्रण
कर ही जाते है आघात ।
तुमको है मेरी सौगात ।।4
नही ,नही ,है पंख तुम्हारे
अभी बहुत कमजोर
हठ मतकर तू सूखी नदियां
बंजर है चहुँओर
विपदायें कुछ
और निरंकुश
होती मानव जात ।
तुमको है मेरी सौगात ।।5
सिमट रहे वन, बढ़ा प्रदूषण
शहरों का फैलाव
भौतिकता है ,सुंदरता का
बिल्कुल वहाँ आभाव
लोलुपता में
भूल गया है
मानव नही अघात ।
तुमको है मेरी सौगात ।।6
तू भी सुन ले जाति धर्म में
वहाँ है मारामारी
क्षणभर रहते दीनबन्धु पर
क्षण में बने शिकारी
ढोंगी बन वें
दान करेंगे
लहूलुहान हैं जिनके हाथ ।
तुमको है मेरी सौगात ।।7
अब झुरमुट कुछ शेष नही हैं
सब लगे महल बनवाने
दूर दूर तक जाना होगा
दानें मुझको लाने
उड़ते उड़ते
थक जाओगी
कोमल है यह तेरी गात ।
तुमको है मेरी सौगात ।।8
वह देखो जो दूर शहर में
टिम टिम जलतें है प्रकाश
बस ऊपर से दिव्य मनोरम
अंदर अंधकार का वास
जन ही जन पर
टूट पड़ा है
हम सब रहते है भय खात ।
तुमको है मेरी सौगात ।।9
लो यह दाना मुँह में डालो
चल के करो आराम
होंगे दृढ़ जब पंख तुम्हारे
कभी सुबह या शाम
तब उड़ जाना
दूर गगन में
सुन लो मेरी बात ।
तुमको है मेरी सौगात ।।10
12–यह पहली तस्वीर तुम्हारी।।
इन पलकों को छावों में
उत्प्रेरित मन भावों में
उभरते गये फूल पर फूल
पर सबको जाता हूँ भूल
जो लगती है दिल को प्यारी ।
यह पहली तस्वीर तुम्हारी ।। 1।।
सिहर गया अंतर्मन मेरा
जब नयनों को तुम पर फेरा
जहां कही टिकती है पलकें
बस तेरी तस्वीर ही झलके
जिससे जुडी है आशा सारी ।
यह पहली तस्वीर तुम्हारी ।। 2।।
कितने कोमल भाव उभरते
निर्मल निर्मित भाव सवरते
उर विदीर्ण कर जाते चोट
अहसनीय तब हुई कचोट
प्रबल हुआ भाव संचारी।
यह पहली तस्वीर तुम्हारी ।। 3।।
यही सोच उर मिले सफलता
मिल जाये अतिसीघ्र निकटता
विफल न हो यह विकल वेदना
खुल जाये यह कही भेद न
जिसकी करता पहरेदारी ।
यह पहली तस्वीर तुम्हारी ।। 4।।
चाहा हूं जब परिचय पाना
तेरा बिल्कुल चुप हो जाना
अपनी पसंद में बना सयाना
बाहों में लेकर सो जाना
कितनी ऐसी रात गुजारी ।
यह पहली तस्वीर तुम्हारी ।। 5।।
पुष्पो सा तुम खिल जाते हो
साँसों में तुम मिल जाते हो
आँखों से न ओझल होना
न हृदय की आस भिगोना
हमने सबकी आस बिसारी ।
यह पहली तस्वीर तुम्हारी ।। 6।।
अंधकार जब होने लगता
सूरज भी जब सोकर जगता
मैं भी हो जाता तैयार
जगकर देता रात गुजार
सो जाती है दुनिया सारी ।
यह पहली तस्वीर तुम्हारी ।। 7।।
जिसे निरख मैं समय बिताता
छणभर भी अब नही गवाता
जब से नजर पड़ी रंगों पर
तब से दृग उलझे अंगों पर
क्या माया की जाल पसारी ।
यह पहली तस्वीर तुम्हारी ।। 8।।
अंगरहित है बना शरीर
मन व्याकुल उर हुआ अधीर
कर दूँ तुमको हृदय अर्पित
तुम अभाओं से नवनिर्मित
ईश्वर ने की नही बेगारी ।
यह पहली तस्वीर तुम्हारी ।। 9।।
जब हूं अपनी पलक झपाता
हलचल में धीरज खो जाता
जब हूं अपनी पलक उठाता
दुनिया भर से धोखा पाता
अब धोखे की अंतिम बारी ।
यह पहली तस्वीर तुम्हारी ।। 10।।
तुम हो एक अनोखी रचना
मेरे मन मंदिर में बसना
फैला उर सन्ताप हरूँ मैं
निशिदिन वार्तालाप करू मैं
तुम पर रखूं पहरेदारी ।
यह पहली तस्वीर तुम्हारी ।। 11।।
जल बिन सूना यह संसार
पथिक बिना ज्यो पंथ बेकार
तर्क बिना नीरस ज्यो बात
तुम बिन सूनी वैसी गात
मै ही हूं तेरा अधिकारी ।
यह पहली तस्वीर तुम्हारी ।।12
13–कर्म है भाग्य विधाता
एक पथिक था थका हुआ सा
टहल रहा अलसाया
धूप खिली थी गर्म वायु मे
ढूंढ रहा था छाया
जो कानन था
बहुत सघन था
दूर दूर तक धाता ।।
कर्म है भाग्य विधाता।।1।।
और मध्य मे उस जंगल के
इक वटवॄक्ष पुराना
ललचाता है भ्रमित पथिक को
उसे पड़ा हैं आना
बड़े अमन से
अपने मन से
बैठ रहा सुस्ताता ।।
कर्म है भाग्य विधाता ।।2।।
कल्पवृक्ष वह मनवांछित फल
का था एक सहायक
मनोवृत्तियों की आहट से
स्वयं सिध्द फलदायक
थोड़ा हट के
बिन करवट के
गीत एक हैं गाता ।।
कर्म हैं भाग्य विधाता ।।3।।
कोमल पत्ते सरस वायु थी
खिले थे फूल अनोखे
और तितलियां उड़ जाती थी
निश्चित ही खुश होके
वह सोया था
पर खोया था
दिवास्वप्न भरमाता ।।
कर्म है भाग्य विधाता ।।4।।
हृदयक्षुधा से व्यथित पथिक वह
आस किया भोजन का
कल्प वॄक्ष ले पहुँच गया फिर
ब्यंजन उसके मन का
उठा किया तय
होकर निर्भय
खुशी खुशी हैं खाता ।।
कर्म हैं भाग्य विधाता ।।5।।
बड़े चाव से करके भोजन
चाह किया बिस्तर की
प्रकट हो गया दृश्य मनोरम
बनी व्यवस्था घर की
चादर हलकी
रख मखमल की
थोड़ा सा अलसाता ।।
कर्म हैं भाग्य विधाता।।6।।
थका हुआ था सोच लिया कि
इक उर्वशी शयानी
आ जाती ,प्रकट हुई फिर
लेकर ठण्डा पानी
धीरे धीरे
वही शरीरे
एक हुई हर्षाता ।।
कर्म हैं भाग्य विधात।।7।।
सभी कल्पना घटित हो रही
जो भी मन मे आया
कल्प वॄक्ष था मन का सोचा
सब कुछ तुरन्त हैं पाया
था वह बहका
बस क्षण भर का
जैसे ही भय खाता ।।
कर्म हैं भाग्य विधाता ।।8।।
थोड़ा सा भयभीत हुआ हैं
फिर एक सिंह की काया
उभरी मन मे प्रकट हुआ झट
खड़ा हुआ गुर्राया
मनोवेग से
बड़ी तेज से
झपट पड़ा निकियाता ।।
कर्म हैं भाग्य विधाता ।।9।।
कर्म किये बिन जो पाता हैं
खाता हैं वह धोखा
जैसे पथिक नहीं सका पा
जीवन का एक झरोखा
जीवन का पथ
सिर्फ लिये सत
मानव को यही सिखाता ।।
कर्म हैं भाग्य विधाता ।।10।।
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