संगीता के गीत
निरख गुलाबों के फूलों से स्नेह महकते ।
स्पंदित अधरों सी पंखुड़ियां रहे परखते ।
जब बढे रुके आदि विविध सन्देह खटकते ।
संगीता के गीत हृदय में गुंजन करते ।1
आमों की शाखाओँ के तन तान के फलते ।
रिमझिम के दो बूँद पवन में बहने लगते ।
स्नेही मन मार टहनियों में जब छिपते ।
संगीता के गीत हृदय में गुंजन करते ।2
सरिता की लहरों में रह रह भँवर पनपते ।
नावों में अजनबियों का मन उठा उमड़ते ।
दूर तटों की आशा से पतवार मसकते ।
संगीता के गीत हृदय में गुंजन करते ।3
ठहर गया चौराहों पर दिन रात भटकते ।
शहरों के फुलवारी के हर फूल मटकते ।
निज पुष्पों की स्मृतियों में अश्रु टपकते ।
संगीता के गीत हृदय में गुंजन करते ।।4
देशपुत्र भारत की सीमा पर विचरण करते ।
वन,गिरि,सरिता,खण्डहरों के सहचर बनते ।
सन्नाटों में बन आहट गन गान उगलते ।
संगीता के गीत हृदय में गुंजन करते ।5
कृषि कार्य कर खेतों में भूपुत्र उमड़ते ।
झोपड़ियों में अर्धनग्न शिशु बाह पकड़ते ।
हाथों में पकड़े थाली प्रिय नयन सुबकते ।
संगीता के गीत हृदय में गुंजन करते ।6
नयी लताएँ,नयी क्यारियां नवहर्ष छिटकते ।
कुछ खुशिओं में ख़ुशी क्षुब्ध कुछ और बिछड़ते ।
छिपकर घूँघट में संकोची अधर संवरते ।
संगीता के गीत हृदय में गुंजन करते ।7
डगमगाते डग धरती पर बहुभाँति सम्हलते ।
लाठी है आधार नयन छबि नही समझते ।
युवाकाल के सुखद स्वप्न नयनों में बसते ।
संगीता के गीत हृदय में गुंजन करते ।8
मनभावन सावन में पंछी चीं चीं करते ।
उमड़ उमड़ घन नभ में घनघोर गरजते ।
मन्द मन्द तरु झुके पवन से पत्ते लड़ते ।
संगीता के गीत हृदय में गुंजन करते ।9
जैसे नभ में मेघ नयन सा अंजन भरते ।
जैसे भूपति मुकुट छत्र में कंचन तरते ।
जैसे ही नवयुवकों के मन क्षोभ उभरते ।
संगीता के गीत हृदय में गुंजन करते ।10
2– तुमको इक दिन आना है ।।
विश्वासों की पृष्टिभूमि पर
प्रेम का महल बनाया हूँ
भावों की नक्कासी करके
दुनियां को झुठलाया हूँ
फिर भी ख़ाली
ख़ाली सा यह
नीरस ताना बाना है ।
तुमको इक दिन आना है ।1।।
आश्वाशन की राह चला मैं
मिली जीत न मुझको हार
अवसर पाकर करे बुराई
बेबस हृदय पर प्रहार
सह लूँगा हर
घाव हृदय पर
फिर भी मंजिल पाना है ।
तुमको इक दिन आना है ।।2।।
मन मन्दिर में बनी सीढ़ियां
सुखमय यादों तक जाती
बाट जोहती प्यासी आँखे
रह रह जब तब थक जाती
पलको से
ढरते है आँसू
कुछ दिन और बहाना है ।
तुमको इक दिन आना है ।।3।।
जिस दिन निकले चाँद गगन में
मेरी हँसी उड़ाता है
उगता सूरज आग बबूला
होकर मुझे जलाता है
पथ्थर तो मैं नही
परन्तु
पथ्थर ही बन जाना है ।
तुमको इक दिन पाना है ।। 4।।
अंधकार की नदी मोहिनी
उफनाती ले जल की धार
मैं तटबन्धों से प्रयासरत
तुम तो बसते हो उस पार
डरा नही
पर रुका रहूँगा
हठ की नाव चलाना है ।।
तुमको इक दिन आना है । 5।।
मेघ कपासी ठहर गये है
नयनो के भर आने से
मुस्काती है इंद्रधनुष भी
वर्षा के रुक जाने से
सन्नाटों के
कर्कश तानों
का भी दर्द उठाना है ।
तुमको इक दिन आना है ।। 6।।
ये मत सोचो रहे फ़ासला
तो हो जाऊंगा भयभीत
है अटूट अनवरत निरन्तर
तेरे मेरे मन की प्रीत
प्रतिबिम्बों के
एक सहारे
सचमुच दिल हर्षाना है ।।
तुमको इक दिन आना है ।।7।।
इस समाज के थोथे बन्धन
झूठी परम्पराओं से
बधा हुआ यह गात अचेतन
तुम हृदय तक भावों से
भाव शून्य हो
शिखर बिंदु को
पाकर गले लगाना है ।
तुमको इक दिन आना है ।।8।।
धुँधली है काया तेरी
पर तुमसे है हर कोना
मेरे सपनो की दुनियां में
सजता रूप सलोना
दो इक दिन की
दूरी है फिर
तो तुममे मिल जाना है ।।
तुमको इक दिन आना है।।9।।
हे ईश्वर नित आशाओं का
उर में हो निर्माण
ताकि जीवन के अनुभव का
मिले मुझे प्रमाण
कृपा नेह से
अवनत सर को
चरणों में सदा झुकना है ।।
तुमको इक दिन आना है ।।10।।
3– आग लगती जा रही है ।
चल मनायें फिर वही फ़ीकी दीवाली ।
बस रही है आज मन में रात काली ।
झूठी-मूठी
लौ जलाकर
बात बनती जा रही है ।
आग लगती जा रही है ।।1
रंग गिरगिटी हो रहा इंसान का अब ।
है नही चिंता इन्हें अपमान का अब ।
कन्ठ में
इनके गरल की
झांग बढ़ती जा रही है ।
आग लगती जा रही है ।।2
तम भरे इस विश्व को है जगमगाना ।
एक दीपक निज हृदय का भी जलाना ।
अब बुराई
बेबसी की
रात बढ़ती जा रही है ।
आग लगती जा रही है ।।3
कौन खुलकर अब चिरागों सा जलेगा ?
ज्योति बनकर विश्व को रोशन करेगा ।
अब कमी
उस शक़्स की
आज खलती जा रही है ।
आग लगती जा रही है ।।4
बन उजाला ,सत्य का प्रमाण कैसा ?
हृदय अंकुर बन सको तो त्राण कैसा ?
आ बुझा दे
लोभ अग्नि
आश चलती जा रही है ।
आग लगती जा रही है ।।5
देश के सब रहनुमा होश खो बेसुध पड़े है ।
आम जनता क्या करे रोंगटे उनके खड़े है ।
देश में अब
अभ्युदय की
शाम ढलती जा रही है ।
आग लगती जा रही है ।।1
कर्णधारों की नसों में फैलता मदमोह है ।
देश की जनता में फैला द्रोह है विद्रोह है ।
सभ्यता की
शाख़ अपनी
आज गिरती जा रही है ।
आग लगती जा रही है ।।2
है नही चिंता उन्हें मान का अपमान का ।
छीन लेते आबरू तक यहाँ नादान का ।
देखकर
पनपी वहसियत
आँख भरती जा रही है ।
आग लगती जा रही है ।।3
सत्यवादी बन रहा वो दोगला इंसान है ।
लालची, निज स्वार्थ में बेचता ईमान है ।
आये दिन
अब रिश्वतों की
दाल गलती जा रही है ।
आग लगती जा रही है ।।4
व्यक्ति का सरकार में विस्वास खोने है लगा ।
अब हर युवा जनतंत्र का गुमराह होने है लगा ।
योजना की
हर पहल
कमजोर पड़ती जा रही है ।
आग लगती जा रही है ।।5
4–त्याग तुम्हे तो करना होगा ।
यह जीवन जो तुम्हें मिला है
निश्चित है वरदान
कर्तव्यों के सजग प्रहरी !
पाना है सम्मान
सतपथ चाहे
दूर, जटिल हो
पर तुमको तो चलना होगा ।
त्याग तुम्हे तो करना होगा ।1
देख ख़ुशी के धूमिल क्षण को
कभी न कर ठहराव
तू लायेगा एक रोशनी
भर देगा हर घाव
हर्ष और
खुशियों के खातिर
बनकर दीपक जलना होगा ।।
त्याग तुम्हे तो करना होगा ।2
देख रोंगटें खड़े हो रहे
आँखों का परवाह
निर्झर सी दुःख उत्प्रेरक हैं
बन हृदय की आह
उन आँखों में
आशाओं के
स्वप्न नये कुछ भरना होगा ।
त्याग तुम्हे तो करना होगा ।।3
नही सार्थकता जीवन की
होगी अपने आप
चलो सपथ लें बन्द करे अब
झूठे ये प्रलाप
अन्धो को अब
अंधकार से
आखिर कब तक डरना होगा ।
त्याग तुम्हे तो करना होगा ।।4
हर सिक्के के दो पहलू है
मगर न हों कमजोर
ज्ञान और सतपथ की राहें
ही फैलें चहुँओर
कुछ तो पावन
कर लो काया
न्यौछावर कर तरना होगा ।
त्याग तुम्हे तो करना होगा ।।5
साहस रखना बड़ी बात पर
करना है प्रयोग
सिर्फ कहकहे झूठे वादे
करते बेबस लोग
मानवता की
लहर सुनामी
फैलाकर दुःख हरना होगा ।
त्याग तुम्हे तो करना होगा ।।6
कुछ दुःख के अवसर जीवन में
लायेंगे बौछार
परन्तु हौसलें न टूटें
न होगी तेरी हार
हर दिल को तुम
जीत चुकोगे
भले तुम्हारा घर न होगा ।
त्याग तुम्हे तो करना होगा ।।7
जैसे खिलते है प्रसून खुद
बागों में मुस्काते
ख़ुशबू देते जन जीवन को
तब जाकर मुर्झाते
भूमण्डल है
एक बगीचा
बनकर फूल बिखरना होगा ।
त्याग तुम्हे तो करना होगा ।।8
सच है जीवन का वह पहलू
जिसे है सब को जीना
भौतिकता के अंधकार में
दुर्दिन के दुःख पीना
आक्षेपों के
सफल निवारण
के प्रति तुम्हे ठहरना होगा ।
त्याग तुम्हे तो करना होगा ।।9
यह मत सोचो सच्चाई की
बन्द पड़ी है राहें
बढ़ते जाना नवनिर्माण कर
छोड़ सभी अफवाहें
अंतिम साँसे
रहें प्राण में
तब तक तुमको लड़ना होगा ।
त्याग तुम्हे तो करना होगा ।।10
🌱
5–किसी मनुज सी आएगी ।।
बहुत कल्पना करके देखा
है कोई है कोई उपचार नही ।
थोडा सा भी मुरझाने को भी
है कोई तैयार नही ।
हृदय में खुशिओं का अंकुर
उभर उभर क्र फूट रहा ।
पर ईर्ष्या के मध्दिम प्रवाह में
पीलेपन में टूट रहा ।
जब सत्कर्मों की सत्यकथायें
प्रचलन में आ जायेगीं ।
तब सज्जनता रूप पकड़कर
किसी मनुज सी आयेगी।1
अट्टहास की हँसी किसी को
अगर कभी आ जाती है ।
सम्मुख बैठे मुस्काते की
हृदय व्यथा बन जाती है ।
अवसर पाकर ब्यंग्यो के
जो बाण चलाये जाते है ।
कर्णपटल पर घाव किये बिन
हर्षित हृदय जलाते है ।
जब मुस्काने हरियाली सी
अधरों पर छा जायेगीं ।
तब सज्जनता रूप पकड़कर
किसी मनुज सी आयेगी ।2
फ़ैल रही है आज निरासा
अँधेरा छाया मुखपर ।
सहानुभूति रखते कितने है
बढ़ते औरों के दुःख पर ।
लोलुपता की एक परत
अब आँखों पर चढ़ती जाती ।
उत्कोची हाथों का साहस
निर्भयता बढ़ती जाती ।
जब लहू बहाकर अर्जित धन की
कीमत समझी जायेगी ।
तब सज्जनता रूप पकड़कर
किसी मनुज सी आयेगी ।3
यहाँ पंक्तियां लगी हुई हैं
स्वार्थपरक्ताओ की ।
पतवारें है यहाँ सबल सब
टूटी फूटी नावों की ।
किसी तरह से उद्द्येश्यों की
पूर्ति यहाँ की जाती है ।
शोषण की अब सबल लालशा
मनोन्मुख हो जाती है ।
जब निर्बलता और किसी
निर्बल को नही सतायेगी ।
तब सज्जनता रूप पकड़कर
किसी मनुज सी आयेगी ।4
भ्रष्ट हुये है इस समाज के
संचालन कर्ता धर्ता ।
त्रस्त हो रहे धनाभाव में
धनहीनों के धनहर्ता ।
उच्चपदों की अभिलाषा
शिखरों तक बढ़ती जाती ।
कुपंथो पर सतपथ पर बस
एक दृष्टि डाली जाती ।
जब कुमार्ग गामी के यश की
विजय नही हो पायेगी ।
तब सज्जनता रूप पकड़कर
किसी मनुज सी आयेगी ।5
सुविचारों पर समय व्यतीत अब
नही कर रहा है कोई ।
सुपन्थों पर धीरे धीरे
नही चल रहा अब कोई ।
बस सुधारों के नये नये
नक्शे बन जाते कागज पर ।
निज लाभों को देख देख
सन्तुष्टि मिल जाती जिनपर ।
जब सभी योजनाएँ गांवों तक
भौरों सी मंडरायेंगी ।
तब सज्जनता रूप पकड़कर
किसी मनुज सी आयेगी ।6
बात बहुत अच्छी लगती है
हा में हा मिल जाने से ।
डरते है क्यों लोग सोंच में
सुदृष्टिकोण अपनाने से ।
इच्छाओ का दमन हो रहा
सत्य नही कह पाते है ।
कहते ही क्यों इस समाज की
अपनति में धँस जाते है ।
जब हृदय की सघन धूप
निज वाणी पर लहरायेगी ।
तब सज्जनता रूप पकड़कर
किसी मनुज सी आयेगी ।7
कौन चाहता अपनी अवनति
दो टूकों की वाणी से ।
धो लेगा है कौन हाथ इस
अपनी कार्यप्रणाली से ।
सरस बोलने की न जाने
कितनी पड़ते गाथायें सब ।
फिर कैसे हो जाती है
ढुलमुल रीति प्रथाएँ सब ।
जब वाणी ही अन्तःकरण की
परछायी दिखलायेगी ।
तब सज्जनता रूप पकड़कर
किसी मनुज सी आयेगी ।8
परिवर्तन की उम्र कोई क्या
निर्धारित कर पाया है ।
सभी युगों में सभी जीव में
अपना रूप दिखाया है ।
आधुनिकता की लहरों पर
भौतिक महल बनाने को ।
पूर्वजों के संस्कार भी
तत्पर है मिट जाने को ।
जब मन की आँखे हृदय की
सही परख कर पाएंगी ।
तब सज्जनता रूप पकड़कर
किसी मनुज सी आयेगी ।9
परम्पराएँ भी धीरे धीरे
अपना अस्तित्व संजोती है ।
फिर नयी शभ्यता के दबाव में
दबी कहीँ पर रोती है ।
देख व्यवस्था जन जीवन की
उत्पीड़ित होता है मन ।
और निरन्तर घटता जाता
अनुरागों का अभिनन्दन ।
जब आँखों को देख देख
आँखे पुष्पित हो जाएंगी ।
तब सज्जनता रूप पकड़कर
किसी मनुज सी आयेगी ।10
समस्त रचनाएं Rakmish Sultanpuri द्वारा रचित एवं प्रकाशित है ।
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