कविता।बादल और धूप

                   बादल और धूप

नभ घटाओं का बढ़ा घमण्ड देखो ।
हो रहा है सूर्य का प्रचण्ड देखो । 
लालिमामय हो रहा सुंदर सबेरा ।
बादलों को धूप ने आकर है घेरा ।

रुक गयी चंचल हवा बेबस खड़ी है ।
लग गयी हाथों में उसके हथकड़ी है ।
और वृक्षों के रुआंसे रोंगटे है ।
नवखिलित पुष्पों पंखें अटपटे है ।

आ चलें हम बाँध लाये जलधरों को ।
चल बता दें आज हम भी रहबरों को ।
कि नदी ,तालाब खुद प्यासे चिरंगुन ।
है व्यथा छायी उभरती एक धुन ।

जा रहे हैं मेघ आँखे मूँदकर क्यों ?
आज मेरे आंगनों से कूदकर क्यों ?
भाव की रस्सी बनाते क्यों नही हम ?
कामना दिल की सुनाते क्यों नही हम?

एक अर्से की तपिस हम झुक गया क्या?
इंद्र का वो तेज शायद चुक गया क्या?
आह है ,इन आह का आभार तो कर दो ?
हे देव दर्शन दो न दो उपकार तो कर दो ?

                               ©राम केश मिश्र

गीत।बस अपनेपन के नाते ।

         गीत।बस अपनेपन के नाते  ।

धूप चढ़ी भट्ठों के ऊपर
दहक रहे अंगारें
कटी अगुंलिया ईंट उठाती
भूख प्यास के मारे 
हाथ पैर में
फ़टी बिवाई
धूमिल अधर सुखाते ।
बस अपने पन के नाते ।।

सड़क किनारे गिट्टी ढोती
दुःख से तपे शरीर
साथ दुधमुँहा सिर पर तसले
बहे नयन से नीर
अर्धनग्न
धोती के पहलू
दहते रहे छिपाते ।
बस अपनेपन के नाते ।। 

छोटी चींटी सम्हल रही है
ले अनाज का दाना
गिरती रही उलझती क्योंकि
दूर अभी है जाना 
लड़ती और
झगड़ती रहती
चलती पता लगाते ।
बस अपनेपन के नाते ।।

स्नेहो में बढ़ी दूरिया
सन्नाटों के ताने
यादों की धुँधली परछायी
आँखे कहा न माने
आहे तपकर
अश्रुकणो में
पलकों पर छा जाते ।
बस अपनेपन के नाते ।।

जंगल में पशु पंछी सारे
सम्बन्धों की नाप
सहते कीड़े और मकोड़े
जीवन का परिताप
दुःख में भी
सुख का अनुभव कर
रहे गीत है गाते ।
बस अपनेपन के नाते ।।  

                       ----©राम केश मिश्र