तीन कविताएं
कविता–1
आज बता दे माँ मुझको तुम
दूर कहा तक जाती
मंसूर ,गेहुओँ के छोटे कण
चुनकर के तुम लाती
मैं चलती हूँ
साथ तुम्हारे
कल जैसे होगा प्रभात ।
तुमको है मेरी सौगात ।।1
सुंदर होंगे नदी ,नहर वे
खेत और खलिहान
झरने सुंदर दृश्य मनोरम
फूल भरे उद्यान
जैसा कि तुम
रोज बताती
आकर सारी रात ।
तुमको है मेरी सौगात ।। 2ल
माँ मुझको तुम लेकर चलना
नदियों के उस पार
जहाँ गाँव के बाद शहर है
सुंदर है संसार
निज नयनों से
मैं देखूगीं
खुशियों के सारे हालात ।
तुमको है मेरी सौगात ।।
सुनकर बात चिरंगुन की तब
भरती है गौरैया आह
ममता की निधि की आँखों में
हुआ अश्रु प्रवाह
उस अबोध के
कल्पित चित्रण
कर ही जाते है आघात ।
तुमको है मेरी सौगात ।।
नही ,नही है पंख तुम्हारे
अभी बहुत कमजोर
हठ मतकर तू सूखी नदियां
बंजर है चहुँओर
विपदायें कुछ
और निरंकुश
होती मानव जात ।
तुमको है मेरी सौगात ।।
सिमट रहे वन, बढ़ा प्रदूषण
शहरों का फैलाव
भौतिकता है ,सुंदरता का
बिल्कुल वहाँ आभाव
लोलुपता में
भूल गया है
मानव नही अघात ।
तुमको है मेरी सौगात ।।
तू भी सुन ले जाति -धर्म में
वहाँ है मारामारी
क्षणभर रहते दीनबन्धु पर
क्षण में बने शिकारी
ढोंगी बन वें
दान करेंगे
लहूलुहान हैं जिनके हाथ ।
तुमको है मेरी सौगात ।।
अब झुरमुट कुछ शेष नही हैं
सब लगे महल बनवाने
दूर- दूर तक जाना होगा
दानें मुझको लाने
उड़ते- उड़ते
थक जाओगी
कोमल है यह तेरी गात ।
तुमको है मेरी सौगात ।।
वह देखो जो दूर शहर में
टिम- टिम जला प्रकाश
बस ऊपर से दिव्य सतह पर
अंधकार का वास
जन ही जन पर
टूट पड़ा है
हम सब रहते है भय खात ।
तुमको है मेरी सौगात ।।
लो यह दाना मुँह में डालो
चल के करो आराम
होंगे दृढ़ जब पंख तुम्हारे
कभी सुबह या शाम
तब उड़ जाना
दूर गगन में
सुन लो मेरी बात ।
तुमको है मेरी सौगात ।।
कविता–2
एक गाँव मे काली बिल्ली
रहती थी दिन रात
मिला नही कोई भी चूहा
बीत गयी बरसात
होती खटपट
लेती करवट
नींद उसे न आती ।
अपनेपन का न कर पाती ।
पूरी रात विचार किया तब
मन ही मन अनुमानी
गांव के बाहर एक वृक्ष पर
ही रुकने की ठानी
भूख के खातिर
गिरती फिर फिर
खुद ही खुद बगदाती ।
अपनेपन का न कर पाती ।
उसी पेड़ की जड़ के नीचे
उस बिल्ली से डरकर
दूर दूर तक बिलों मे रहते
सब चूहें मिल जुलकर
छिपे बेचारे
डर के मारे
बिल्ली समझ न पाती ।
अपनेपन का न कर पाती ।
एक रात बिल्ली ने देखा
चूहों का सरदार
कान खड़े थे चौकन्ना था
चंचल पहरेदार
झट से आयी
पकड़ न पायी
गिरती मुँह की खाती ।
अपनेपन का न कर पाती ।
तब बिल्ली भी बड़े ध्यान से ।
होकर के तैयार
पहरा देती रात रात भर
सुनती चीख़ पुकार
चूहे मिलके
अंदर बिल के
पीट रहे थे छाती ।
अपनेपन का न कर पाती ।
चूहों के सरदार सयाना
बोला भर खर्राटे
जाओ छुपकर बड़े दूर से
लाओ सब मिल काटें
हर्षित चलते
आहे भरते
खुर खुराकर पाती ।
अपनेपन का न कर पाती ।
पंक्ति बनाकर धीरे धीरे
ज्यो चींटी की धारी
गहन अंधेरे चलते जाते
जड़ के आरी आरी
होकर हकबक
लखती इकटक
बड़ी तेज अकुलाती ।
अपनेपन का न कर पाती ।
बड़े नुकीले काटें लाकर
काटों का मूस बनाया
सरपत की इक पूँछ बनाकर
बिल तक है पहुँचाया
बिल के ऊपर
उसको रखकर
खींच रहे सब पाती ।
अपनेपन का न कर पाती ।
हिलता डुलता देख रही फिर
सरपट उतर के आई
बिन देखे औ बिना बिचारे
जैसे ही वह खाई
जितने कांटे
सब गढ़ जाते
भाग गई चिल्लाती ।
अपनेपन का न कर पाती ।
सब चूहों ने सूझ बूझ से
लिया चैन की सांस
इसीलिए डरकर भी करना
लड़ने का प्रयास
बिना बिचारे
निज अनुसारे
बिल्ली आफ़त लाती ।
अपनेपन का न कर पाती ।।
कविता–3
एक बार धुधले कुहरे में
इक तोता अंजाना
आसमान मे भटक गया था
बहुत पड़ा पछाताना
जब से भटका
लगा है झटका
ढूंढ रहा था पानी ।।
अनुभव ही हैं ज्ञानी ।।1।।
बहुत देर से सोच रहा था
कहा करुँ विश्राम
एक वॄक्ष पर आकर रुकता
हो जाती हैं शाम
था इक कोटर
लगता था डर
हो सकती थी हानी ।।
अनुभव ही है ज्ञानी।।2।।
बहुत पुराना वह खोढ़र था
आकर वह छिप जाता
कालिख मे काला हो जाता
पता नहीं वह पाता
डर के मारे
बिना सहारे
पर रुकने की ठानी ।।
अनुभव ही है ज्ञानी ।।3।।
रहता था इक काला कौआ
उस खोढ़र के अन्दर
चला आ रहा दाने चुनकर
गाँवों से अपने घर
जैसे आया
कुछ घबडाया
पाया अलग निशानी ।।
अनुभव ही हैं ज्ञानी ।।4।।
आहट पाकर असमंजस मे
दरवाजे तक आया
थोड़ा सा भयभीत हुआ पर
काँव काँव चिल्लाया
उड़के झट से
इक झुरमट से
किया एक नादानी ।।
अनुभव ही हैं ज्ञानी ।।5।।
चोच मे भरकर वह इक कंकड़
उस कोटर के पास
आता और डालने का फिर
करने लगा प्रयास
इक दो कंकड़
छोड़ा बढक़र
हुई नहीं आसानी ।।
अनुभव ही है ज्ञानी ।।6।।
फिर कौऐ ने काँव काँव कर
ज्यों ही चोंच बढाया
अवसर पाकर उस तोते ने
चोंच पकड़ मकनाया
टोट मे टोटा
खुब खरबोटा
मची थी खींचातानी ।।
अनुभव ही हैं ज्ञानी ।।7।।
छुटा छुटी मे भागमभागी
कौआ डर के मारे
भाग रहा था उसके पीछे
तोता पाँव पसारे
इक था आगे
सरपट भागे
हुई बहुत परेशानी ।।
अनुभव ही है ज्ञानी।।8।।
और अचानक इक झाड़ी मे
फँस जाते घबड़ाकर
दिख जाता है झुन्ड वहाँ पर
तोतों का नियराकर
आहे भरके सब मिलकर के
मदद किये हर्षानी ।।
अनुभव ही हैं ज्ञानी ।।9।।
तब कौऐ ने कहीं सभी से
एक राज की बात
उस कोटर मे रहते थे
कटफोड़वा के तात
गये वे घर से
उन्हीं के डर
थी यह राज कहानी ।।
अनुभव ही हैं ज्ञानी ।।।10।।
🌱🌱🌱
By– Rakmish Sultanpuri
लँगड़े लँगड़े चल रहा,,नाम रहा अवशेष ।
ढोंग समेटे मन रहा, हिंदी दिवस विशेष ।।5
हिंदी ठिठुरी रह गई, ज्यो सर्दी मे धूप ।
अंग्रेजी व्यापक हुई, प्रकृति के अनुरूप ।।6
भाषाओं की धात्री , समरसता की खान ।
आओ मिलकर हम करे, हिंदी का सम्मान ।।7
शब्द शब्द की नाप से, भावों पर अनुबंध ।
दिन दिन यों बढ़ता गया, महक रही न गन्ध ।।8
शब्द कुसुम को गूंथता, शब्दो पर नव छन्द ।
भाव ठिठुरने यो लगे ,ज्यो कँकरीली कन्द ।।9
कुंठित भाव प्रवाह गति, तनिक हो रही मन्द ।
'राम' विकारी ,काम का , छंद नही वह छंद ।।10
राजनीति के पाठ मे, जाति जाति मे पात ।
पढ़े पहाड़ा पांच का पचपन पे रुकि जात ।।11
राम, सभी समझाइये, घर निज पास पड़ोस ।
अफ़वाहों को त्याग दें, बिना किये अफ़सोस ।।12
रक्षाबंधन प्रेम का, जीवन मे उपहार ।
भाई बहनों के लिये, खुशियों का त्योहार ।।13
वर्षा आकर रुक गयी , हरियाली के द्वार ।
धरती से मिलने लगी, रिमझिम पड़े फुहार ।।14
छाया चुन चुन कर रही, पत्तो का श्रृंगार ।
घूप खड़ी हो देखती, रिमझिम पड़े फुहार ।।15
कुंठित भाव प्रवाह गति, तनिक हो रही मन्द ।
'राम' विकारी , काम का , छंद नही वह छंद ।।16
चोटीकटवा भूत से , नारि हुई सब मौन ।
हेल्मेट पहने जागती, सोते पुरुष अलोन ।।17
चोटी की अदभुत कथा, अफ़वाहों की बात ।
चोटी कटवा भूत कम,, शंका अधिक सुझात ।।18
राम, सभी समझाइये, घर निज पास पड़ोस ।
अफ़वाहों को त्याग दें, बिना किये अफ़सोस ।।19
सावन की अठखेलियां, देतीं हैं उपहार ।
छायी है काली घटा,,रिमझिम पड़े फुहार ।।20
वर्षा आकर रुक गयी, हरियाली के द्वार ।
धरती से मिलने लगी, रिमझिम पड़े फुहार ।।21
छाया चुन चुन कर रही, पत्तो का श्रृंगार ।
घूप खड़ी हो देखती, रिमझिम पड़े फुहार ।।22
जितने नीच कुकर्म से, मानव हुआ उघार ।
उतनी ऊँची हो गयी ,,मज़हब की दीवार ।।23
मानवता निज धर्म है , मानव का परिवार ।
खींच लिया है नर अधम, मज़हब की दीवार ।।24
आग लगाते देश मे , रहते निरा अलोन ।
मज़हब की दीवार के, पार खड़े है मौन ।।25
मज़हब की दीवार पर, बैठ लिये बंदूक ।
देख तमाशा वो रहे ,ख़ुद अपना घर फ़ूक ।।26
भाईचारा अस्त्र हो, सस्त्र रहे बस प्यार ।
चलो ढ़हायें आज मिल, मज़हब की दीवार ।।27
बादल बरसे झूम के,आकर धरा करीब ।
छप्पर का आंशू गिरा, रोया राम गरीब ।।28
हरियाली पलने लगी , पा कुदरत की गोद ।
रिमझिम रिमझिम कर रही, वर्षा मनोविनोद ।।29
रतियन अँखियाँ रो रही ,दिनभर करत जुगाड़ ।
राम मिलन प्रिय आस मे ,छन छन लगे पहाड़ ।।30
आतुर हृदय है व्यथित, सुने प्रेम की बोल ।
टूटेगा हरहाल दिल, मत कर टाल मटोल ।।31
आंखें प्यासी है अभी, दिल रखता उपवास ।
राम नयन भर देख लू, बुझ जायेंगी प्यास ।।32
शब्द छोड़कर भाव का, लेना तुम आधार ।
नेह निमन्त्रण राम का, कर लेना स्वीकार ।।33
दुखी नही मन हे सखे, सुन व्यंग्यों के वाण ।
प्रेम भरे अपमान पर,,न्योछावर यह प्राण ।।34
सूरज डूबा था नही, बादल मद मे चूर ।
भिगो रहे थे धूप को, दोनों निष्ठुर क्रूर ।35
बादल पंछी बन चुने, तारे सारी रात ।
आसमान की डाल पर,, बैठ करे बरसात ।36
व्यथा धरा की देखकर, घन बरसे घनघोर ।
बिजली नेह बिछोह से, तड़प रही चहुँओर ।।37
ओढ़ कपासी मेघ नभ, सूरज करे शिकार ।
इंद्रधनुष को देखकर, भावुक हुआ बिमार ।।38
हरियाली हँसने लगी , पुष्पित जीवन जीव ।
तृप्त हुये वन,बाग़ सब, नदियां हुई सजीव ।।39
अन्न प्रदाता है कृषक, धरा भक्त इंसान ।
धूप छाँव सहता रहे, ,करे अन्न का दान ।।40
कृषी यंत्र से हो रहा , नये- नये सन्धान ।
पर किसान बिन सून है,, कृषि का नया विहान ।।41
माता धरती को मिला,,नेक उपज वरदान ।
और कृषक के रूम में ,रक्षा करे भगवान ।।42
मनुज सदा मांगे यहां ,मान और सम्मान ।
खेतों को भी चाहिए, ,प्यारा एक किसान ।।43
यह किसान तो रीढ़ है ,भारत का प्राचीन ।
लोहा इसका मानता , पाक रहा या चीन ।।44
दुख दुर्दिन को काटता , कल तक रहा किसान ।
अब भी हालत है बुरी , कर लेते विषपान ।45
दो टुकड़ों मे बट गयी,कृषि की एक दुकान ।
एक मांन का है धनी, दूजा बस अपमान ।46
वही बॉस की झोपडी,वही खेत खलिहान ।
वही रँकिता आज भी,भरती है मुस्कान ।।47
नीलगाय वन सुअर से , खेतों को नुकसान ।
भरता पेट गरीब कस ,जीवन नही असान ।।48
वर्षा धोखा दे गयी , नहरों मे व्यवधान ।
शहरों मे दिन काटता , भूखा फिरे किसान ।।49
राम योजना देश की ,कागज तक ही मान ।
अधिकारी को बाट कुछ ,लील गये प्रधान ।।50
निज जननी या देश की , माता गाय समान ।
राम रखो नियमित सदा, गो सेवा का ध्यान ।।51
राम प्रार्थना एक है , हे ईश्वर भगवान ।
गाय राष्ट्रीय पशु बने,बढ़े देश की शान ।।52
पापी नर से त्याग दो ,अब से मेल मिलाप ।
जिस नर के माथे लगा ,गौहत्या का पाप ।53
तिल तिल गर्मी बढ़ रही , पल पल लगे थकान ।
उमस सताये रात दिन , आफ़त मे है जान ।।54
भौतिकता से है सजी , जीवन एक दुकान ।
लोभ मोह की छूट से , आफ़त मे है जान ।।55
भौतिकता मे भक्तिमय, भक्तों का नुकसान ।
भक्ति करे संग्राम या , आफ़त मे है जान ।।56
दानशीलता से मिले, ,सब लोगों का प्यार ।
राम ख़ुशी मन की बढ़े ,सदा करो उपकार ।।57
सारे बगुले चल रहे , आज हंस की चाल ।
तोते सभी निराश हैं ,उल्लू मालामाल ।।58
बात कही क्या आपने, सुंदर सरल सटीक ।
अपनी गलती आपसे, कर लेना ही ठीक ।।59
शीतलता सहमी बढ़े ,देख सूर्य का ताप ।
धूप और गर्मी बढ़ी , देने को सन्ताप ।।60
गाँव नगर को छोड़कर ,शीतल मन्द समीर ।
नीरवता चुगने लगा , बैठ नदी के तीर ।।61
जलधि मिलन की प्यास मे ,बदल गया वर्ताव ।
नदियां दुर्बल हो गयीं , धीमा पड़ा बहाव ।।62
धन कन्या गोदान से, बढ़े मान सम्मान ।
दानो मे सबसे बड़ा , रक्तदान का दान ।।63
सफ़ल सार्थक प्रेम पर , दोहे रचे सुजान ।
और भक्ति पर रच दिये, अतुलनीय श्रीमान ।।64
प्रिय मिलन की बेक़सी , घूँघट पड़ी निकाल ।
देख नयन की टकटकी,ल , हुई शर्म से लाल ।।65
अर्थहीन कवि कर्म मे, नीरसता की होड़ ।
शब्द शब्द सँग पंक्ति की, करते है गठजोड़ ।।66
भाव ठिठुरता जो रहे, कांप रहे अशआर ।
छंद बिना तुक ताल बिन , कविता है बेकार ।।67
शुरू दिखाई दिव्यता, अंत कर दिया खोड़ ।
जैसे दूध गिलास पर, नींबू दिया निचोड़ ।।68
कविता दिल से जो लिखो, नही हो सके व्यर्थ ।
भाव बरसते शब्द हों, लदा हुआ हो अर्थ ।।69
राम'निरर्थक लेखनी , कवि बादल की हार ।
बिन शिक्षा मरुभूमि मे , करता जो बौछार ।।70
पावनता की नींव है, सज्जनता का द्वार ।
निश्छल मन सप्रेम से, करो सत्य स्वीकार ।।71
सत्य एक परकास है, सत्य अनूठी शक्ति ।
सत्य करो स्वीकार नित, सच मे हो अनुरक्ति ।।72
सच का दीपक न बुझे,बना रहे उजियार ।
जीवन स्वर्ग बनाइये, सत्य करो स्वीकार ।।73
राम कमाई प्रेम की ,सच्चाई का बाट ।
पलड़े एक समान है , बाट सके तो बाट ।।74
भक्ति ,प्रेम ,सच एक वट, शाखाएँ है तीन ।
राम विरत हो एक से, जीवन जीव विहीन ।।75
राम तराजू प्रेम का, बाट भक्ति का आन ।
त्रुटियों का पसगां बना, बाक़ी एक समान ।।76
आँख करकती आपकी, दर्पण का क्या दोष ।
सुनो बुराई आपनी , रख दिल मे सन्तोष ।।77
त्याग क्रोध की भावना , रे मूरख इंसान ।
क्षमाशील नर जगत मे ,,है सबसे बलवान ।।78
राम छोड़कर स्वार्थ को, करो ईश की भक्ति ।
परमारथ परस्वार्थ से, मिलती सच्ची शक्ति ।।79
सज्जनता के तीन बल,वाणी, विनय, विवेक ।
दुर्जनता का एक बस, धन धन धन प्रत्येक ।।80
राम राम मुश्लिम कहे ,हिन्दू कह अल्लाह ।
सिक्ख इसाई परस्पर, मिट जाहे सब दाह ।।81
धर्म विषैला बीज है ,कट्टरता है खाद ।
पूरी दुनियां बो रही , होने को बर्बाद ।।82
मानवता इक धर्म है , सब धर्मों का मूल ।
उलझा क्यो इंसान है, निजता के प्रतिकूल ।।83
सज्जन,सत,सुविचार सँग, शुद्ध सरस व्यवहार ।
सदाचार को मान दो , इनसे है संसार ।।84
पिता एक जगदीश है , माँ इक देवि समान ।
इनसे है संसार यह , जो समझे इंसान ।।85
इस हृदय की है व्यथा, या है मन मे खोट ।
परछायी पर प्रेम की,झलक रही ले ओट ।।86
जीवन साथी मानकर ,हृदय निःसन्देह ।
अनदेखा है रूप पर ,कर बैठा है नेह ।।87
भाई चारा बढ़ रहा,ल,रखकर मन मे वैर ।
काट रहा मानव स्वयं, मानवता के पैर ।।88
नारेबाजी से करे , भारत को बदनाम ।
राम' भरे है देश मे , ऐसे नमक हराम ।।89
महँगाई के दौर मे , कैसे पले समाज ।
बुद्धिमान करने लगा,बुद्धिहीन के काज ।।90
भाई चारा बढ़ रहा,, ,,रखकर मन मे वैर ।
काट रहा मानव स्वयं, मानवता के पैर ।।91
नारेबाजी से करे , भारत को बदनाम ।
राम' भरे है देश मे , ऐसे नमक हराम ।।92
महँगाई के दौर मे , कैसे पले समाज ।
बुद्धिमान करने लगा,,बुद्धिहीन के काज ।।93
हवा बसन्ती सी सरस, झरने सी आवाज ।
इंद्रधनुष सी है अदा, सन्ध्या जैसी लाज ।।94
मृगनयनी चलने लगी, जैसे बढ़े उमंग ।
सँगमरमर सी देह पर, खिला गुलाबी रंग ।।95
निर्मल मन का तन धनी, निर्मल मन का ज्ञान ।
निर्मल भक्ति सुजान की, मिलते है भगवान ।।96
बरपा क्या संसार मे,क्यो अकड़े है लोग ।
सुख के साधन ढूढते,क्योंकर नये प्रयोग ।।97
चलत घुटुरुवन डगमगे, बिहँसत करे किलोर ।
माँ की ममता जागती, मन मे उठे हिलोर ।।98
नेह नियंत्रित घोषले,माँ ममता की डोर ।
चोंच चिरंगुन अधखुले ,मन मे उठे हिलोर ।।99
चढ़ी दुपहरी नीम पर, छूती रही अनन्त ।
लगा टकटकी देखते, अम्बर और दिगन्त ।।100
हवा बसन्ती सी सरस, झरने सी आवाज ।
इंद्रधनुष सी है अदा, सन्ध्या जैसी लाज ।।101
मृगनयनी चलने लगी, जैसे बढ़े उमंग ।
सँगमरमर सी देह पर, खिला गुलाबी रंग ।।102
राम गरीबी कब मिटे, कब तक हो उपवास ।
निर्बल दीन मलीन मुख , सुख की करता आस ।।103
सबल राम को जानिये, निर्बल यह संसार ।
लिये राम का नाम जो ,भवसागर हो पार ।।104
चढ़ी दुपहरी नीम पर, छूती रही अनन्त ।
लगा टकटकी देखते, अम्बर और दिगन्त ।।105
तपता सूरज देखकर, गर्मी मांगे बवारि ।
दौड़ धूप करने लगी, धूप सयानी नारि ।।106
मन को पावन राखिये, दिल में सच्ची प्रीति ।
होगी अत्याचार पर , मानवता की जीत ।।107
सूखी रोटी रह गयी , बासी पड़ा था भात ।
भूखा पेट गरीब का, कस अबोध ना खात ।।108
माचिस की तीली गली, पा अंसुवन की झाग ।
आग गली मे लग गयी , देख गरीबी भाग ।।109
देख वृद्ध की रंकिता , हँसे खेत के मेड़ ।
खपटैले चप्पल मलिन,बिन बध्धी के टेढ़ ।।110
लोग सही है या गलत,या मैं झूठा यार ।
उम्र ढल गयी द्वंद्व में ,मिला न सच का द्वार ।।111
प्रेम बढ़े नित गेह में ,सुखी रहे परिवार ।
राम मुबारक हो तुम्हे ,होली का त्यौहार ।।112
भाईचारे से मिलो ,बढ़ती रहे उमंग ।
सम्बन्धो में नेह का ,मचा रहे हुड़दंग ।।113
भाव गुलाल उड़ाइये , पियो खुसी की भंग ।
जीवन भर छूटे नही , एक प्रेम का रंग ।।114
होली के इस पर्व पर,जले हृदय के क्लेश ।
पावनता के रंग में , प्रेम रहे उर शेष ।।115
रंग खिले उल्लास का,मधुरिम हो सम्बन्ध ।
फैले इस संसार में , मानवता की गन्ध ।।116
राम मिले सुख सादगी ,और बढ़ेगा मान ।
मात पिता गुरु साधु का, सदा करो सम्मान ।।117
फूक फूक चलना सदा, भूल एक पर्याप्त ।
राम मॄत्यु का कटघरा, चौतरफा है व्याप्त ।।118
विनय नम्रता सादगी ,सत्य सरस व्यवहार ।
सदाचार सदभाव का, ऋणी रहा संसार ।।119
मन की खायीं विषभरी, झांझर झरती बूंद ।
निज तन भींगे दुख सहे, तड़पे आँखे मूँद ।।120
धन्य वही नर नागरिक, ज्ञानी या मतिमन्द ।
देख पड़ोसी की ख़ुशी , मिले जिसे आनंद ।।121
सुख के दो दिन बाद में, दुख का है परिवेश ।
पुनः सुखों की चाह में ,देह रह गयी शेष ।।122
एक अवस्था वृद्ध की, माया बढ़ती जात ।
मायारूपी मृत्यु के , सम्मुख है भय खात ।।123
घाव मिले यदि शत्रु से , छोड़ सभी अपवाद ।
बदला है तो लीजिये, चाहे दो दिन के बाद ।।124
मन की कालिख़ न गयी , तृषा रह गयी शेष ।
वही दे रहे ढूढ़कर , बिन मांगे उपदेश ।।125
कोरा कागज़ मन मनुज, शिशु को दो सद्ज्ञान ।
पुण्य मिले सन्तोष निज, बालक बने महान ।।126
ज्ञान, मान, धन धर्म की ,नही जगत में भीख ।
कर्म किये बिन न मिले ,है जीवन की सीख ।।127
नेता नेता न रहे, रहा न वो जज्बात ।
राजनीति मे ढह गयी, कुर्सी सँग औकात ।।128
नेता के भावुक वचन, लगे छुड़ाने दाग़ ।
भरे हौसला व्यर्थ में ,बिन पंखों सा काग ।।129
जनता के संज्ञान में ,है नेतन की लोच ।
पेट स्वयँ का भर गया ,मुँह खाये या चोंच ।।130
सरसों उमड़ी खेत में, ,खिले बसन्ती फूल ।
तेरे मेरे प्यार का, मौसम है अनुकूल ।।131
परसो पनपे पात संग, पावन पुष्प प्रसून ।
पुलकित हो प्रभात में , कम हो गया जुनून ।।132
सुख दुख कांटे फूल है ,कभी धूप सा छाव ।
बनी रहे समरूपता, मरहम हो या घाव ।।133
मन को पावन राखिये, तन सा निर्मल आप ।
धन का सदुपयोग कर, दूर रहे संताप ।।134
निर्धन धन का लालची, भले कृपण कंजूस ।
धनी न सोहत धर्म से , क्यों लेता है घूस ।।135
रिस्तों में जब स्वार्थ हो, तो कैसा अफ़सोस ।
राम मिलेगा प्रेम से, ही निज को सन्तोष ।।136
रहे सजगता कर्म में , भाव रहे निष्काम ।
रिस्तो में खुशियाँ रहे, जीवन के आयाम ।।137
लोभ क्षोभ मद मोह को, करने दो बिश्राम ।
मानवता का पाठ पढ़, जीवन के आयाम ।।138
यश अपयश समरूपता, हार जीत परिणाम ।
सुख दुख का कर सामना,जीवन के आयाम ।।139
जग में सच्चे मित्र से , मिलिए बारम्बार ।
हृदय निहित हर भाव का,,करे सफल उपचार ।।140
सच्चे उर से मित्रता , उपजाती नित नेह ।
मिटे हृदय के सूल सँग ,मन के सब सन्देह ।।141
जीवन की औषधि सरल, मित्र हास परिहास ।
'राम' मिले प्रसन्नता , सदा करो परयास ।।142
कोमल वाणी नेह की उपजाती नित हर्ष ।
वाक्य वाक्य संजीवनी , मानव के आदर्श ।।143
नेता निर्छल कर्मठी, योगी सरस सुजान ।
देश गांव छवि देखकर,करें सभी मतदान ।।144
लालच धन डर धौस का,दान नही है दान ।
प्रलोभन से हो तटस्थ, करें सभी मतदान ।।145
छोड़ पुरानी दुश्मनी ,मान और अपमान ।
जाति धर्म से हो परे , करें सभी मतदान ।।146
ईर्ष्या दुख की बावली, जो उर रखो सजोय ।
मान हानि धन धर्म की ,तन की दुर्गति होय ।।147
ईर्ष्या मन का रोग है, करो त्वरित उपचार ।
देख विरोधी का भला, खुद पर करे प्रहार ।।148
ईर्ष्या की औषधि अमिट, मन में रही जो व्याप्त ।
'राम" तोष संयोग से , दैनिक ध्यान प्रयाप्त ।149
प्रेम समर्पित व्यक्ति का ,न्योछावर है प्राण ।
भाव हृदय में संघनित ,दृग देता प्रमाण ।।150
प्रेम समर्पण भाव का , प्रेम एक एहसास ।
प्रेम द्वार है स्वर्ग का, प्रेम पथिक बिस्वास ।।151
प्रेम दया, करुणा नही, क्रोध नही मद ,लोभ ।
राम मिले बस प्रेम, से, बढ़े व्यर्थ में क्षोभ ।152
चली योजना सालभर,हुआ अथक प्रयास ।
देख गरीबों की दशा , रोता रहा विकास ।।153
आँख मिचौली खेलते , झोंक रहे है धूल ।
हुआ असर हर गाँव में ,उन्नति के प्रतिकूल ।।154
दुर्दिन दुःख दारुण यथा, खास एक मलमास ।
जीवन ही उम्मीद है , होना नही उदास ।।155
वाणी में जिनके गरल , उर में पर सन्ताप ।
क्रोधी, तुनकमिजाज, हम ,दुर्जन अपनेआप ।।156
दम्भ, कुकर्मी , नीचता, , दुर्जन की पहचान ।
मुख है विष की पोटली,अरि भुजंग सम जान ।।157
सरसो बिहँसी खेत में, हरियाली के अंत ।
गेहूँ में किलकारियाँ ,,लाया नया बसन्त ।।158
दिन है सच का आवरण , रजनी झूठ प्रतीक ।
सुबह शाम है दोगले , लगते सबको नीक ।।159
तिनका तिनका झूठ का, ढेर लगाकर पाप ।
आग लगा सच से हृदय, तोड़ दिये हो आप ।।160
जीवन नौका जग जलधि, आशा की पतवार ।
भांप भवँर में डगमगी, ,चुप है खेवनहार ।।161
प्रेम गगन में ढूढ़ती, आशाओं के रंग ।
जीवन डोर समेटती , उड़ती रहे पतंग ।।162
मुँह की खाये या गिरे, राजनीति हुड़दंग ।
किसको क्या परवाह है,उड़ती रहे पतंग ।।163
हाड़ कपाउँ ठंड में, जैसे चली बयार ।
राम बढ़ी है थरथरी, निर्धन हुआ उघार ।।164
ठंडी मन में रह गयी , गया न झूठा ताव ।
रही कपकपी उम्रभर, जलता रहा अलाव ।।165
गोली देती फिर रही , जनता को सरकार ।
जमा निकासी में हुआ, घाटे का व्यापार ।।166
कोयल कुहके भोर मे, कौवा बोले काँव ।
मिठऊ महुआ याद है,प्यारा अपना गाँव ।।167
दूषित जल बिन व्याकुले ,लगे शहर में घाव ।
शीतल मन्द समीर मय, प्यारा अपना गांव ।।168
चिड़ियों की चहकारिया, है बरगद की छांव ।
आज भी हमको लग रहा,प्यारा अपना गाँव ।।169
चार चरण दो पंक्ति है, चौबिस लघु गुरु आय ।
तेरह ग्यारह अर्द्धसम, वह दोहा कहलाय ।।170
धुंध बढ़ी है रात से , कुहरा हो गया पागल ।
मित्र किनारा कर रहा, मौज ले रहे बादल ।।171
शिक्षक वित्त विहीन के, उठ जागो तैयार ।
राजनीति सरकार पर, सीधे कर प्रहार ।।172
बेटी इक वरदान है , मानवता का मूल ।
कोमल सहज सुभाव है स्थिति के अनुकूल ।।173
प्रकृति इक उपहार है, इस जीवन के संग ।
भावों के विस्तार का, खिले अनेको रंग ।।174
नदी झील वन खण्डहर ,झुरमुट तट मैदान ।
महापुरुष पर्वत बने , प्रकृति की है शान ।।175
सूर्य चन्द्र नभ चांदनी , धरती सृजनहार ।
निशा रूपसी तारो सँग,आती करे सिंगार ।।176
प्रकृति ही सब देत है , सब कुछ हर भी लेत ।
व्यथित करे छ्णभर त्वरित, आकर्षण भर देत ।।177
राम करो सम्मान अब, मत कर वृक्ष प्रहार ।
प्रकृति की उपयोगिता , जीवन के उस पार ।।178
प्रेम पियासा है जगत, पशु पंछी नर देह ।
राम मिले पुनि लौटि के ,नेह देहे से नेह ।।179
निज मन स्थिर प्रेमधन, नयनो से प्रवाह ।
राम नयन में यों बसे, ज्यो सांसो में आह ।।180
निज नेहो के बोध का, चेहरा है प्रतिरूप ।
राम उतरकर हृदय छवि ,फैली जैसी धूप ।।181
आत्मसमर्पण प्रेम का, विश्वासो के संग ।
राम बढे समरूप में ,ज्यो शरीर के अंग ।।182
मातृभूम निज देश हित ,भक्ति सखा परिवार ।
राम अतिथि को दीजिये , शुद्ध हृदय से प्यार ।।183
राजनीति में राष्ट्रहित, मिले प्रेम संवर्ग ।
देश हमारा एक दिन, बन जायेगा स्वर्ग ।।184
राजनीति को धर्म से, जोड़ रहे चहुँओर ।
आपस में अवलेहना ,करते सन्मुख चोर।।185
प्यासी आँखों से मिलो, सुन जनता के मर्म ।
समाधान प्रधान है , राजनीति का धर्म ।।186
डगमग नैया देश की ,सुन लो खेवनहार ।
आप चढ़े पुष्पक चले, हम डूबे मझधार ।।187
दागी ,लंपट देश को , नही चाहिये घाघ ।
राम" देश दीवार पर, दीमक जस हैं लाग ।।188
दिनकर से पहले उठत, होय न देत अंजोर ।
राम कृषक जन जात है,निज खेतोँ की ओर ।।189
चना चबैना चल दिये,गमछा अउर कुदाल ।
राम लिये गुड़ पोटली,चलते मधुरिम चाल ।।190
आलू बोये होत हैं , आलू के ही पेड़ ।
राम कभी निज श्रम बिनु,जामि सके न रेड़ ।।191
पौधों की अति दुर्दशा, मेड़ी दियो बिगाड़ ।
राम सूअर वन रात में, पौधे दिये उखाड़ ।।192
राम दुःखी अति दीन उर, वाणी गयी सुखाय ।
मेहनत का फल न मिले, मन ही मन पछताय ।।193
निरखि निरखि निज खेत को ,लगी धूप अकुलात ।
राम' चबेना मेड़ पर , पड़ा रहत बसियात ।।194
चूंटों की लश्कर चली, कौआ बोले काँव ।
राम गुड़ै पर माति गै, करते रहत खिंचाव ।।195
कबहू सूखा बाढ़ तो, कबहु ओला वृष्ट ।
राम किसानी भाग्य के, होतै रहत अनिष्ट ।।196
जिह किसान उपजात है, फसल अनेक प्रकार ।
'राम' वही भुखमरी के, होते यहा शिकार ।।197
जो किसान सम्मान बन , थे भारत की शान ।
"राम' बने मजदूर है,छोड़ खेत खलिहान ।।198
रंक भले दुर्जन भले , गुणग्राही मानिन्द ।
कीचड़ भरे तलाब से, मे बिकसे ज्यों अरविन्द ।।199
हिंदी भाषा की नदी , गंगा पावन नाम ।
आओ मिलकर हम करें ,इसको आज प्रणाम ।।200
जीवन के तालाब मे, मानवता का फूल ।
सींचो नित नव प्यार से, अवसादों को भूल ।।201
भौतिकता की भूमि पर,,जीवन का तालाब ।
सूख रहा सँग , नेह दल, पुष्पों का बर्बाद ।।202
माँ का दर्शन मात्र है , स्वर्णिम दिव्य अनूप ।
देती छाया नित सुखद , ममता की प्रतिरूप ।203
नेह लगाकर कर दिया, सादी से इनकार ।
देता कैसे रंकिता , का उसको उपहार ।।204
लम्पटता को छोड़ दे, योगी बनो सुजान ।
तू ऊर्जा का स्रोत है,,,अपने को पहचान ।205
राम समाई जगत मे, ज्यो वर्षा सँग धूप ।
घनीभूत है प्रेम मे, स्वतः भक्ति का रूप ।।206
✍ रकमिश सुल्तानपुरी