बट रहे मानव यहाँ पर
हठधर्मिता पर अड़े है
आज होली आ गयी पर
रंग में छींटे पड़े है ।
फागुनी गीत दिनभर
अधरों पर छाते रहे
गुनगुनाती वाणी का अब
हो गया परित्याग है ।
बस घुटी सी राग है ।।1।।
पीले सरसों की कली पर
न वह मकरन्द अब है
महुओं के आक्रमण से
हो गये बदरंग सब है
गेरुई बढ़ने लगा है
गेहुओं के खेत में
उन सोंहाती मिट्टियों से
उठ रही अब झाग है ।।
बस घुटी सी राग है ।।2।।
आम की इस मंजरी में
लसियाते लासा दिखेंगे
अलसायी आलसियों में
दीमकों के पग उगेंगे
कौन किसको क्या कहेगा
छठपटाती आस में
हर सवारों हर निगाहों में
दिख रहा अब दाग़ है ।।
बस घुटी सी राग है ।।3।।
सरपतों के झुरमुटों से
अब नही बनते झरोखें
धूमिल हो रहे स्नेह को
अब कौन रोके कौन टोके
धूप का दुःख उठा है
मिट रही नजदीकियों से
हरपल हृदय की ठोठिओ से
झर रहा अनुराग है ।।
बस घुटी सी राग है ।।4।।
लोभ रूपी ये लतायें
फैली है केवड़ों पर
लोलुपता की काइयाँ
जम गयी हैं फेफड़ो पँर
कूप के मंडूक से भी
केकड़े बचते नही
जो जहा जिस हाल में था
बन गया अब घाघ है ।।
बस घुटी सी राग है ।।5।।
©©राम केश मिश्र