बस घुटी सी राग है ।।

बट रहे मानव यहाँ पर
हठधर्मिता पर अड़े है
आज होली आ गयी पर
रंग में छींटे पड़े है ।
फागुनी गीत दिनभर
अधरों पर छाते रहे
गुनगुनाती वाणी का अब
हो गया परित्याग है ।
बस घुटी सी राग है ।।1।।

पीले सरसों की कली पर
न वह मकरन्द अब है
महुओं के आक्रमण से
हो गये बदरंग सब है
गेरुई बढ़ने लगा है
गेहुओं के खेत में
उन सोंहाती मिट्टियों से
उठ रही अब झाग है ।।
बस घुटी सी राग है ।।2।।

आम की इस मंजरी में
लसियाते लासा दिखेंगे
अलसायी आलसियों में
दीमकों के पग उगेंगे
कौन किसको क्या कहेगा
छठपटाती आस में
हर सवारों हर निगाहों में
दिख रहा अब दाग़ है ।।
बस घुटी सी राग है ।।3।।

सरपतों के झुरमुटों से
अब नही बनते झरोखें
धूमिल हो रहे स्नेह को
अब कौन रोके कौन टोके
धूप का दुःख उठा है
मिट रही नजदीकियों से
हरपल हृदय की ठोठिओ से
झर रहा अनुराग है ।।
बस घुटी सी राग है ।।4।।

लोभ रूपी ये लतायें
फैली है केवड़ों पर
लोलुपता की काइयाँ
जम गयी हैं फेफड़ो पँर
कूप के मंडूक से भी
केकड़े बचते नही
जो जहा जिस हाल में था
बन गया अब घाघ है ।।
बस घुटी सी राग है ।।5।।

                         ©©राम केश मिश्र

आज धोखा पल रहा है ।।

         आज धोखा पल रहा है ।।

चिलचिलाती धूप से
सौन्दर्य से बच गया तो
शाम का ये धुँधलापन
स्नेह झोंका भर रहा है ।
आज धोखा पल रहा है ।।1

प्रेम को नापा गया है
आज कैसी नाप से
आँकना मुश्किल हुआ है
आज वार्तालाप से
रूप में भर शीलता
उभारते परिधान पर
भाव की हर भंगिमा मे
हो अनोखा झर रहा है ।
आज धोखा पल रहा है ।।2

आश्वाशन के लिये हम
क्या कहे हम क्या सहे
उम्रभर पाते नही मिट
विश्वासों के कहकहे
हैं दृगों के पंख चंचल
लड़खड़ाती वात से
वासना की कामना मे
अब भरोसा डर रहा है ।
आज धोखा पल रहा है ।।3

उद्विग्नता की हदों पर
आस जब खोती रही
जिंदगी मे प्रेम की
हार तब होती रही
है यहाँ चिंता किसे
अवसरों मे झुक गये
जो यादों के हर मोड़ पर
दुःख परोसा कर रहा है ।
आज धोखा पल रहा है ।।4

गर्व औ गरिमा हमारी
कब तलक घुट घुट जिये
प्यार का झांसा है फैला
लूट जाने के लिये
रास्ते है और भी
पर विवादों से घिरे
सम्मान की प्रतिद्वंद्विता मे
हृदय रोका कर रहा है ।
आज धोखा पल रहा है ।।5

                    🌾🌾🌾

आज क्यों आँशू बहाती ।।

          आज क्यों आँसू बहाती ?
                                    01/05/09

कर रही संघर्ष जो अब
उम्र के अंतिम पहर से
फिर भी अपने हृदय पुष्पों
के लिये सपने सजोंती ।
आज क्यों आँसू बहाती ?

माँ वही अंजुलि से जिसने
अम्बु की दो बूद डाली
लालयित सुष्क मुख मे
अमृत सा दूध डाली
आंचलों की हवा से
गोद मे सोने लगे जब
लोरियों की गुनगुनाहट
रुक रही धीमी न होती ।
आज क्यों आँसू बहाती ?1

खिलखिलाहट की हँसी मे
दुःख भरी धुँधली कहानी
भूल जाती नेह के हित
पोछती आँखों का पानी
सुदृड़ डगों की सेज पर
उबटनों से है सँवारा
अपने कम्पित उन डगों पर
चाहकर भी टिक न पाती ।
आज क्यों आँसू बहाती ?2

भौतिकता के सुखों का
कोना कोना छान लायी
कोमल अँगुली को पकड़कर
हो न हो चलना सिखायी
जो खिलौना बन गयी थी
मरमरी मुस्कान पर
उस लता की मुस्कराहट
लू लगी सी सूख जाती ।
आज क्यों आँसू बहाती ?3

प्यार का संगम था उमड़ा
ममता के तो पर लगे थे
तोतली बोली से जिसने
ये सुरीले स्वर भरे थे
कम्पित अधरों पर सजाये
दृग सुबह से शाम तक
बेटा कहने से अभी है
जिसकी वाणी लड़खड़ाती ।
आज क्यों आँसू बहाती ?4

उम्र के दो चार दस
वर्ष वो विस्मृत हुये ना
तौल दी ममता सुखों से
अपनत्व भी अर्जित हुए ना
देखते ही जी रही है
बन्धनों का ढीलापन
और भी रिस्तों की गाँठें
कस रहीँ हैं दूर जाती ।
आज क्यों आँसू बहाती ?5

                 
                        🌾🌾🌾

रोशनी लाना पड़ेगा ।।

             रोशनी लाना पड़ेगा ।।
                                 02/06/09

उग नही सकती कहो क्यों
बंजरों मे पौधशाला
कान्ति जिसकी छिप गयी है
खोज के जाना पड़ेगा ।
रोशनी लाना पड़ेगा ।।1

शुष्क घासों की जड़ें
गुथ गयीं प्रक्षिप्त होकर
फूटते अंकुर परन्तु
छिप गये संक्षिप्त होकर
कंटकों की झाड़ियों मे
उर्बरता वह दब गयी है
सरपतों के ठूठ मे अब
दुःख तो उठाना पड़ेगा
रोशनी लाना पड़ेगा ।।2

कान्ति की सँध्या सजग है
मस्तिष्क की गहराइयों मे
अनगिनत है पंथ खुलते
अनुमान की अगडाइयों मे
मूकता की जाल से जो
बध गये असहाय हैं
सानिध्य उनका प्राप्त कर ।
शीश झुकाना पड़ेगा ।
रोशनी लाना पड़ेगा ।।3

नवयुवको की मानसिकता
कल्पना के नभ बनें है
इंद्रधनुषी रास्तों पर
अनमने ही चल पड़े है
पर सफलता एक ही
रास्ते पर मिल सकेगी
स्वप्न की दुनियां तो उनको
छोड़ के जाना पड़ेगा ।
रोशनी लाना पड़ेगा ।।4

                        🌾🌾🌾

क्या कहूं अफ़सोश होता ।

           क्या कहूँ अफ़सोश होता ।।
                               06/08/09

रूप धूमिल हो चुका है
दुःख के गलियारों मे तेरा
मिटटी के ढेलों से उठकर
चमकता रजकोष होता ।
क्या कहूँ अफ़सोश होता ?1

भाग्य की इस कामना मे
धीरता को खो न देना
छा रहें पलकों पे आँशू
बादलों सा रो न देना
काट लेंगे मिलकर दोनों
दुःख भरे दुर्दिन दिनों को
अंकुरित इन अंकुरों को
देखकर सन्तोष होता ।
क्या कहूँ अफ़सोश होता ?2

हे प्रिये दुःख है मुझे भी
न हो सका पूरा मनोरथ
छिन्न वस्त्रों के झरोखें
कर रहे अंगों को आहत
परिश्रम की अधिकता से
व्यकुल मुझको देखकर
संकोची ये अधर कुछ
कह सके न होश होता ।
क्या कहूँ अफ़सोश होता ?3 

इन किशोरों से छिपा लो
रेट सा आँखों का पानी
रजकणो से लिपटकर
तोड़ दी हमने जवानी
पुष्प से अधरों पे देखो
घाव की है धारियां
जिसमे कभी पुष्पित कली का
झर रहा मधुकोष होता ।
क्या कहूँ अफ़सोश होता ?4 

रख दो थाली डाल पर
क्यों किया उपवास तमने
छिप सकेगी यह व्यथा न
पा लिया बिस्वास हमने
प्रकृति की इच्छा यही है
आ मेरे हृदय से लग जा
और यह भी मान ले तू
भाग्य का न दोष होता ।
क्या कहूँ अफ़सोश होता ?5  

                       
                      🌾🌾🌾

बात उर की कह न जाते ।।

           बात उर की कह न जाते ।।
                                   13/08/09

आशाओं की सतह पर
धुंध औ कुहरा रुका है
संकेतों के स्पंदन से
दूर रहकर झिलमिलाते ।
बात उर की कह न जाते ।।1

संकेतों से भला क्या
शांति मुझको मिल सकेगी
बादलों की ओट से क्या
चाँदनी वो खिल सकेगी
क्या समर्पित कर दू तुमको
स्नेहगृह की रिक्तता को
पास आने के लिये है
पैर मेरे डगमगाते । 
बात उर की कह न जाते ।।2

और इक रंगीन तितली
की तरह तुम आ ही जाती
फिर मेरे स्नेह रस को
इस हृदय से चूस जाती
ढूढ़ता हूं फिर तुम्हे मै
सरसों के हर फूल पर
झिलमिलाती कान्ति की
ओझलता को सह न पाते ।
बात उर की कह न जाते ।।3

हो रहा विस्वास यह कि ।
शांति तुमसे ही मिलेगी
पर हमारी भावना ये
वेदना तो न बनेगी
चल रहा हूं बन्द आँखों
मे लिये तस्वीर तेरी
और छाया फूल कलियों
की जरा सी टिक न पाते।
बात उर की कह न जाते ।।4

प्रेमरूपी ज्योति का ।
वाग्मय सुरुआत होता
निशापूर्ण इस हृदय मे
इक नया प्रभात होता
भावना बढ़ती ही जाती
कल्पनाओं से परे
हृदयतंत्र बनकर खगों सा
गूँजते है गुनगुनाते ।
बात उर की कह न जाते ।।5

                       🌾🌾🌾

अब मुझे विश्वास है ।

              अब मुझे विश्वास है ।।
                                17/09/12

कौन किसकी फ़िक्र मे
स्वार्थ अपना छोड़ता है
रिस्वतों का बढ़ गया अब
लालची मलमास है ।।
अब मुझे विश्वास है ।।1।।

यह तुम्हारे साथ जो
उठ रही आवाज है
मूक थी या फुसफुसाहट
मधुरिम वाणी आज है
अब उन्हें चिन्ता न होगी
न्याय या अन्याय की
जी हुजूरी का जिन्हें
हो गया अभ्यास है ।।
अब मुझे विश्वास है ।।2।।

बात उनकी क्या करूँ मै
जो बने अंजान है
अब नाज़ायज कोशिशों से
बन रहे इंसान है
कर नही सकते किसी का
हित किसी भी रूप मे
जबकि अपने कर्मफल का
हो रहा एहसास है ।।
अब मुझे विश्वास है ।।3।।

आश्वासन की सृंखला का
जाल बुनते जा रहे जो
शोषितों की आह का
विस्तार करते जा रहे जो
भयभीत हैं अपने ही पन से
दूसरों की बात ही क्या
निज दुःखो की औषधि
तो उन्ही के पास है ।।
अब मुझे विश्वास है ।।4।।

वह समर्पण कर्म का
हृदय मे जिसके बस गया था
आ ख़ुसी का एक मौका
जिंदगी मे हँस गया था
आश्रम मे पल्लवित
अंकुरित होते रहे वो
आज सब झूठा हुआ
बन गया इतिहास है ।।
अब मुझे विश्वास है ।।5।।

क्या वही नाजुक सुमन
उर प्रहारक बन सकेगा
कंटकों सा चुभ हृदय मे
नाश का कारण बनेगा
है या किसको कहाँ
कब कौन धोखा दे रहा
हर किसी के दुःख का साधन
तो उसी के पास है ।।
अब मुझे विश्वास है ।।6।।

                                राम केश मिश्र

धुँआ बनकर रह गयी है ।

                धुँआ बनकर रह गयी है ।।
                               26/01/10

उम्र भर जलती रही जो
दीमकों की ज्योति सी
विचारों की वह सृंखला
धुँआ बनकर रह गयी है ।।1।।

असहायों पर दया की
प्रेरणा से आँखे गड़े न
देखकर दुःखियों के दुःख को
अब रोंगटें होते खड़े न
स्वार्थी के रंग के हर
फूल कुछ ऐसे खिले है
टहनियां ही शेष है
पंखुड़ी सब ढह गयी है ।2।।

उन्नति की इन आंधियो मे
आचरण गिरने लगा है
परोपकार की जड़ो पर ।
घुनो का पहरा लगा है
अंधो की लाठियां भी
ढूढ़कर हम थक गये है
व्यवहारों के वनों मे
अधिक जर्जर हो गयी है ।।3।।

फर्क दिखता है कहाँ अब
न्याय व अन्याय मे
न्याय का है उद्वरण न
अब किसी अध्याय मे
सत्य रूपी पंक्तिया है
धूमिल धूमिल अक्षरों मे
पर बहुत गहराइयों मे
जीवाश्म सी दब गयीं है ।।4।।

प्रगल्भ के आगे यह पर
सत्य की चलती कहाँ है
अब किसी की बात पर
किसको भरोसा हो रहा है
अविश्वास रूपी भित्तिका 
बढ़ रही सन्देह जल से
ईर्ष्या भी मस्तिष्क रूपी
खाइयों मे जम गयी है ।।5।।

                     

आज लिखना ही पड़ेगा ।

               आज लिखना ही पड़ेगा ।।
                                    19/01/10

दौड़ती इस जिंदगी मे
वक्त तो बिल्कुल नही है
वास्तविकता के लिये पर
वक्त को झुकना पड़ेगा ।
आज लिखना ही पड़ेगा ।।1।।

अंधानुकरण की पहल यो
तीब्र गति से हो रही है
सामाजिकता बैठी कही
गांवों मे अब रो रही है
सभ्यता की आंधियां
बह चलीं है इस तरह
जो खड़े है पैर से
औंधे मुँह गिरना पड़ेगा ।
आज लिखना ही पड़ेगा ।।2।।

परिधानों के शॉर्टकट भी
चल पड़े कितने अनोखे
एक तो है पारदर्शी
दूसरे उन पर झरोंखे
क्या उरोजों की कहें हम
टापुओं से बन गये है
हाबड़ा के पुल सा उनको
कम्पन करना ही पड़ेगा ।।
आज लिखना ही पड़ेगा ।।3।।

संकीर्ण वर्स्त्रो से जहाँ तक
हो सके मॉडल दिखाती
आज की ये उर्वसी
परम्पराएं है बनाती
पाठशाला थी एक मंदिर
सभ्यता औ संस्कृत की
अंधो की आंधी मे उसको
पार्क सा दिखना पड़ेगा ।।
आज लिखना ही पड़ेगा ।।4।।

कोमल अंगों पर उभर कर
सुंदरता अब है रुआँसी
शालीनता मुँह छिपाकर
कब्र मे आँशू बहाती
सादगी आहत गिरी है
चंचलता की खड्ग से
सौम्यता मरती रहेगी
आवरण जितना घटेगा ।।
आज लिखना ही पड़ेगा ।।5।।

कौन किसके आचरण की
क्या करे अवलेहना अब
है सुनामी पश्चिमी ये
धीरे धीरे ढल रहे सब
भविष्य की आँखों से हमने
क्या कभी देखा है इसको
अपने घरों में भी हमे
छुप छुप के रहना पड़ेगा ।।
आज लिखना ही पड़ेगा ।।6 ।।

और उनके प्रेम की
क्या अजब गाथा बनी है
आज देखा मुस्कराये
कल कमर मे कामिनी है
अब कोई कवि क्या लिखेगा
झुरमुटों वाली कहानी
उक्ति झूठी है नही अब
प्रेम को बिकना पड़ेगा ।।
आज लिखना ही पड़ेगा ।।7।।

उद्यानों मे ले जाकर
क्यों नही उनको दिखाते
पर्ण हीन वे आम के फल
किरण दृगों से सूख जाते
सुंदरता उनकी खो जाती
पड़ जाती है झाइयां
पर अचानक मंदबुद्धि का
ग्रास तो बनना पड़ेगा ।।
आज लिखना ही पड़ेगा ।।8।।

इस प्रदर्शन के लिये यदि
चुप रहें कुछ भी कहे न
आदिमानव बन रहेंगे
एक दिन तुम देख लेना
तब सभ्यता कुछ और होगी
भारतीयों की अलग
मानसिकता की विबसता
तब हमें पड़ना पड़ेगा ।।
आज लिखना ही पड़ेगा ।।9।।

                               राम केश मिश्र

मानसिकता सड़ गयी है ।

              मानसिकता सड़ गयी है ।
                                  27/09/09

मानवता का बिखण्डन
देखकरके यह निराशा
कद्दुओ की वेल सी
छप्परों पर चढ़ गयी है ।1

व्यंगों के परिताप से
जीवन बोझिल हो चुका है
आचरण भी लड़खड़ाकर
अस्तित्व अपना खो चुका है
धर्म के अंधियारों मे देखो
बुझता दीपक सा पड़ा है 
वट से लंबे हाथ सी
दुष्टता भी बढ़ गयी है ।2

नैतिकता की जड़ो मे
दीमकों का है बसेरा
उत्कोची हाथों से हमने
खुद सजा रखा अंधेरा
भीड़ मे सच्चाई की
छाया मे छिपता रहा
प्रलोभनों की जटिलता
व्यक्तित्व पर अड़ गयी है । 3

न किसी से पूछना तुम
प्रलोभनों के कहकहे
हर किसी की आँख से
दुःख भरे आँशू बहे
तृप्ति हृदय को मिली न
खोजने से उम्र भर
सूक्ष्म धागों मे दरारें
गांठ सी पड़ गयीं है ।4

असहायों का भरोसा
सामाजिकता से उठ चला है
बलसाली हाथो की कृपा
का वहाँ पर सिलसिला है
स्वर्ग है जिनके लिये
कागजों की छांव मे
भौतिकता मे लिपटकर
मानसिकता सड़ गयी है । 5

                     

रूप तेरा ढल सकेगा ।

             रूप तेरा ढल सकेगा ।।
                                 23/09/09

खिल उठे थे मौसमो मे    
ये गुलाबी रंग पाकर       
क्या कभी सोचा था तुमने
रूप तेरा ढल सकेगा ?1

कलियों की उन पंखुड़ी से
अधरों की तुलना न होती
चन्द्रमा की चांदनी भी
रूप को तेरे थी धोती
हास्य अंकुर उग चुके थे
सुन्दर सुशोभित पंखुड़ी पर
लालिमामय उन कपोंलो
पर संकुचन मे पल सकेगा ?2 

थी कली तूम एक सुंदर
प्रकृति के उद्यान मे
सरपतोँ सी लचकती
चाल मे अभिमान मे
और स्नेहीजन के लिये
दर्द का कारण बनी थी
क्या धूमिलता मे तुम्हारे
सैनो का बस चल सकेगा ?3

पारदर्शी वस्त्रों पर
ललचायी आंखे तरसती
हर दिशाओं से हृदय पर
नेह की बूदें बरसती
तृप्ति तुमको न मिली जब
उपेक्षा की अवलेहना की
क्या वही स्नेह वाणी
सम्भवतः अब पल सकेगी ?4

रूपता की हदों पर
कर लिया तुमने भरोसा
वास्तविक जीवन में आकर
निज हृदय को आज कोसा
जब कभी तुम देखते हो
अपने पथों का अनुकरण
क्या कभी रोक है तुमने
दर्द उनका बन सकेगा ?5

चाहते तुम रोकना पर
हारते अधिकार से 
सान्त्वना उनको मिलेगी
पंथ के व्यवहार से
बहती सरिता कब रुकी है
सागर का संसर्ग पाकर
हर कोई अपने लिये
खुद दुःखों को गढ़ सकेगा? 6

            

मै जहाँ तक जानता हूं ।

                मै जहाँ तक जानता हूं ।।
                                  18/09/09

भौतिकता के बंधनों से 
सूनेपन मे निकलकर
प्रकृति की उस मुस्कराहट 
से स्वयं को बांधता हूं ।
मै जहाँ तक जानता हूं ।।1

बंजरों के किनारे
ऊँची ऊँची खाइयां है
घास के पत्तो की जिनपर
चढ़ चुकी अंगड़ाइयां है
बस उन्ही खेतों मे क्षणभर
घूमता हूं शाम को
और हलकी सी हवा मे
दृश्य को निहारता हूं ।
मै जहाँ तक जानता हूं ।।2

हरियाली से लद चुके है
खेतों की पगडंडियों पर
फेरता हूं कर सघन
उन आसमानी झंडियों पर
कोमलता में कोमलता के
आश्वासन के लिये
अंतर्मन मे सजोकर
हृदय से पहचानता हूं ।
मै जहाँ तक जानता हूं ।।3।।

लघुसरिता की लहर पर
नृत्य करती चांदनी है
जैसे कीड़ी नवयौवना की
कान्ति की वह रागिनी है
जिसपर सन्ध्या की सजगता ।
लेटकर विश्राम करती
के दृश्यों के दृगों को
कल्पना से तारता हूं ।4
मै जहाँ तक जानता हूं ।।

ये नयन अलि चूसते है
अरहरों के फूल के रस
अधरों से फिर गुनगुनाहट
मे झूमते है भावबस
जीर्ण पत्तों के स्खलन से
पंक्ति अगली है सुशोभित
सत्यता जीवन की जिसमे
मै सही अनुमानता हूं ।
मै जहाँ तक जानता हूं ।।5।।

                          🌷🌷🌷

डाल का ले ली सहारा ।

             डाल का ले लो सहारा ।
                                            01/09/09

उद्यानों मे है छायी
शाम की परछाईया है
अनवरत बरसात मे
आशाओं का सबेरा
डाल का ले लो सहारा ।1

तेज है वर्षा की बूदें
बहती पवन भी है शयानी
बौछारों से तुम्हारे
रूप पर टिकता न पानी
झाड़ियों की पत्तियां भी
आकर्षण मे तुम्हारे
संसर्ग पाने के लिये
त्यागती जीवन हैं सारा ।
डाल का ले लो सहारा ।2।।

नम करती नम हवाएँ
उष्णता को धूप को
रसभरे आमों को देखू
या तुम्हारे रूप को
अधखिली मुस्कान पर
तैरती है इंद्रधनु
पारदर्शी वस्त्रों पर
है छिटकती तीब्र धारा ।
डाल का ले लो सहारा ।3

आ चले आओ यहाँ पर
छांव है आगोश है ।
सन्निकट होकर परस्पर
मेघ दो शीतोष्ण हैं
पक्षी भी अब छिप गये है
अपने ही पँखो मे मिलकर
आम के फल कर रहे है
शांत शब्दो मे इशारा ।
डाल का ले लो सहारा ।4

पास आ जाने से तेरे
सान्त्वना मुझको मिलेगी
संकेतों के संकुचन से
बात उर की हो सकेगी
झांककर आँखों मे तेरे
देख लें कितना मनोरथ
स्नेह भरने के लिये
बादलों ने है उकेरा ।
डाल का ले लो सहारा ।5

                        🌷🌷🌷

हे प्रिये यह वेदना क्यों ?

             हे प्रिये ! यह वेदना क्यों ?
                                   28/01/09

स्वर्ग से जीवन मे जब हम
डूबे थे सुख के जलद मे
आज दुर्दिन मे दुखों के
रूप से अवलेहना क्यों ?
हे प्रिये ! यह वेदना क्यों ?1

आज अपने ही घरों मे
बाढ़ का पानी नही है
गाँव घर हर झोपडी में
विवस सरिता वह चली है
सूख जाते है क्षणों मे
बूद के दो चार कण
धारा के बहते जलो मे
असफलता से रोकना क्यों ?
हे प्रिये ! यह वेदना क्यों ?2

हो रहे बेघर यहाँ
लाखो हज़ारों लोग है
क्षुधातृप्ति के लिये बस
दैव हैं संयोग है
शान्त हैं ख़ामोश राहें
कोलाहल से भरी
दूर स्थित स्वजनों की
याद मे संवेदना क्यों ?
हे प्रिये ! यह वेदना क्यों ?3

स्नेह का सूरज तुम्हारी
आँखों मे जब आ टिका था
आभास था कल्पित परन्तु
भावना पर मर मिटा था
अब भी है सम्पति हमारी
वह रूपता यह शीलता
अब सुखद स्वप्नों मे तुमको
सोचता हूं भेजना क्यों ?
हे प्रिये ! यह वेदना क्यों ? 4

मानवता का सुआशय
हो गया संकीर्ण देखो
प्रकृति की इस गोद मे
बह रहे कुछ नीड़ देखो
जो कि चिंता बन चुकी है
आज पूरे विश्व की
केवल अपने स्वार्थ के हित
भाग्य को ही कोसना क्यों ?
हे प्रिये ! यह वेदना क्यों ?5

                        🌷🌷🌷

एक दिन


                               एक दिन

एक दिन
मेरी साँसों के शब्द
व्यथित कर देंगे
इंद्रधनुषी भावों को
कुछ पल

एक दिन
झूठी बन जायेंगी
आशाये
या पुष्पित हो जायेगी आँखे
कुछ पल

एक दिन
मिट जायेगी दूरी
छा जयेगी
खामोशियाँ
कुछ पल

                     राम केश मिश्र