सच का डोज
1.
वक़्त मिले तो लाभ उठाना ।
वक़्त गए फिर क्या पछताना ?
ख़ैर ! लगा रहता है दिनभर ,
झूठ सही का आना- जाना ।
सच को सच में सच होने तक ,
लग जाता है एक ज़माना ।
इंसा है इंसाँ का दुश्मन ,
ऐ इंसानों ! मत झुठलाना ।
झूठ तुम्हें जब सच लगता है ,
तो इस सच का क्या पैमाना ?
फ़ेर नही सकते मुँह सच से ,
पण्डित जी हों या मौलाना ।
कैसे आता तुमको 'रकमिश ,
अफवाहों को आग लगाना ?
-रकमिश सुल्तानपुरी
2.
सच का स्वाँग रचाते क्यों हो ?
सच से तुम घबराते क्यों हो ?
रिश्ते झूठे या सच्चे हों ,
रिश्तों को अजमाते क्यों हो ?
जी भर रो लो ,रोना अच्छा ,
दर्द छिपा मुस्काते क्यों हो ?
तुम सच्चे हो मान रहा हूँ,
पर सच से कतराते क्यों हो ?
सच होगा दुनिया समझेगी ,
सच इतना समझाते क्यों हो ?
मेरा भी तो दिल टूटा है ,
मुझको दर्द सुनाते क्यों हो ?
क़द्र नही है जब रिश्तों की,
रिश्ते आप बनाते क्यों हो ?
सच खुद ही बोलेगा ,रकमिश,
सच की ढोल बजाते क्यों हो ?
- रकमिश सुल्तानपुरी
3. & पापा &
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सच की राह दिखाते पापा ।
हम सबको समझाते पापा ।
गलती पाकर डाँट लगाते ।
रोने पर दुलराते पापा ।
देते अच्छी सीख सदा ही ।
मिलकर पर्व मनाते पापा ।
त्योहारों पर जन्मदिवस पे ।
गिफ़्ट हमेशा लाते पापा ।
अच्छे नंबर के ख़ातिर ही ।
होमवर्क करवाते पापा ।
बच्चों के सँग खेल खेल में ।
ख़ुद बच्चा बन जाते पापा ।
दूर गए हो जबसे "रकमिश ।
याद बहुत तुम आते पापा ।
---रकमिश सुल्तानपुरी
4. गीतिका
मातृ भक्ति पितृभक्ति भावना अपार हो ,
पुत्र पुत्रवत रहे कि भाइयों में प्यार हो ।
शांतिप्रिय आचरण सहेजती हो वल्लभा ।
सौम्यता खिले मिले स्वभाव में शुमार हो ।
हौसला मिले नया पड़ोसियों के मेल से ,
मित्र का मिलाप हास खुशनुमा बहार हो ।
ऊँच नीचता मिटे समान भाव पल्लवित ,
नेक कर्म का सदा समाज कर्जदार हो ।
गाँव -देश जाति -पति रंग -रूप से रहित ,
एक देश एक वेश एक ही विचार हो ।
नागरिक निरोग योग भक्ति में निरत रहें ,
देशभक्ति एक फ़र्ज सा लगे उधार हो ।
प्रेम पूर्ण प्रेरणा परोसती प्रबुद्धता ,
पुण्यवान पात्र प्राप्त प्रेम की पुकार हो ।
-रकमिश सुल्तानपुरी
5.
हमें पाठ सच का पढ़ाता पिता है ।
कि हर एक रिश्ता निभाता पिता है ।
वो देता है हर एक प्रश्नों का उत्तर ।
जो दुनिया का परिचय कराता पिता है ।
सजाता है रोचक खिलौनों से घर को ।
जो अँगुली पकड़कर चलाता पिता है ।
दुखों या गरीबी से लड़कर हमेसा ।
जो भूखा रहे पर खिलाता पिता है ।
रहा यार चुप वो मेरी जिद के आगे ।
जो ख़ुद हार हमको जिताता पिता है ।
वफ़ादार सेवक है साथी सदा का ।
सिखाता पढ़ाता विधाता पिता है ।
महज़ प्यार रकमिश है फटकार उसकी ।
तेरे दर्द से छटपटाता पिता है ।
- रकमिश सुल्तानपुरी
6.
साहस है तो सब मुमकिन है ।
वरना कायरता दुर्दिन है ।
झूठ बोलना सच में आसां ।
सच कहना पर बहुत कठिन है ।
अवसर मिलते डस लेगी यह ।
माया जीवन की नागिन है ।
मन के ऊपर है ईर्ष्या ज्यों ।
जल के ऊपर यार तुहिन है ।
उसके तन की क्या प्रशंसा ।
जिसका मन ही खूब मलिन है ।
मानवता की ओर रहे वह ।
पण्डित है अथवा मोमिन है ।
रोये 'रकमिश" और सुने ख़ुद ।
यह जीवन तो एक विपिन है ।
✍रकमिश सुल्तानपुरी
7.
परहितकारी यार मनी हो ।
फूल रहे या नागफ़नी हो ।
उपजाना मत मन में संशय ।
आपस में जब खूब बनी हो ।
इतने ख़ंजर तुम अजमाना ।
ताकि दिल भी न छलनी हो ।
स्वच्छ मिले जल वायु तो रहना ।
बस्ती चाहे बहुत घनी हो ।
घी का काम कभी मत करना ।
जब रिश्तो में तना--तनी हो ।
ज्ञान तभी है सफ़ल सुरक्षित ।
जब थोड़ी पर आमदनी हो ।
धन से धनी, धनी क्या रकमिश ?
तन -मन का व्यवहार धनी हो ।
✍रकमिश सुल्तानपुरी
8.सच
पाप मुझसे सहा नही जाता ।
पुण्य तुमसे किया नही जाता ।
साथ कैसे चलें जरा सोचो ।
झूठ लेकर चला नही जाता ।
बोल देता हूँ गलतियों पर मैं ।
अब यूँ चुप तो रहा नही जाता ।
सच कहूँ तो गुनाह करता हूँ ।
झूठ मुझसे कहा नही जाता ।
वक़्त पर ही टिका रहा फ्यूचर ।
वक़्त का आसरा नही जाता ।
झूठ पर है ग़ुरूर तो सुन लो ।
ख़ैर ! इतना गिरा नही जाता ।
झूठ कब बेनक़ाब हैं "रकमिश"।
सच किसी से छुपा नही जाता ।
✍रकमिश सुल्तानपुरी
9.लोग
दर्द छुपा मुस्काते लोग ।
छुपकर घात लगाते लोग ।
दिल के चौखट पे अंधियारा ।
घर में दीप जलाते लोग ।
मन्दिर मस्जिद पूजा करते ।
मानव से घिन खाते लोग ।
शाम - दाम से दण्ड - भेद से ।
झूठी अकड़ दिखाते लोग ।
निजी स्वार्थ बस सारे रिश्ते ।
वरना सिर खुजलाते लोग ।
सच में झूठ ,झूठ में सच को ।
अक़्सर खूब मिलाते लोग ।
रकमिश ख़ुद फ़ँस जाते लेकिन ।
भरसक जाल बिछाते लोग ।
✍रकमिश सुल्तानपुरी
समस्त कविताएं Rakmish Sultanpuri द्वारा रचित एवं प्रकाशित है
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