कुंडलियां–1
कुण्डलिया है अर्धसम ,मात्रिक छंद विशेष .
प्रथम शब्द प्रारम्भ का, अन्त बचे पुनि शेष .
अन्त बचे पुनि शेष पुनः दोहा के चरणा .
निज निज चौबिश चार लिये रोला के वर्णा .
"राम" चरण कुल चार प्रथम दो दोहावलिया .
ग्यारह तेरह उलट पुलट रचते कुण्डलिया .
कुंडलियां–2
प्रभु की कृपा से मिले, शुद्ध सुपाचक अन्न ।
भोग लगा भगवान को, खाओ मन प्रसन्न ।
खाओ मन प्रसन्न, दूध के सँग ले रोटी ।
भोजन सभी समान, सोच रखना मत छोटी ।
'राम 'जला के आग ,तवे के ऊपर सरका ।
मिलती अति शौभाग्य, बरसती प्रभु की कृपा ।
कुंडलियां–3
जीवन का आधार है मात्र एक विश्वास ।
बना रहे समभाव से सदा करो परयास ।
सदा करो परयास ह्रास न होने देना ।
रिस्तों की है डोर इसे न खोने देना ।
राम अडिग विश्वास न टूटे अपने मन का ।
आभूषण है यार सभी के ही जीवन का ।
कुंडलियां–4
भरिये उर मे नेह नित मन मे रखो यकीन ।
वाणी मे माधुर्य रख कौन कहेगा दीन ।
कौन कहेगा दीन हीनता इसमे कैसी ।
इल्म बने जिस ध्येय भावना बनती वैसी ।
राम रखो विश्वास लक्ष्य से कभी न डरिये ।
है उर्जा का स्रोत भरोसा ख़ुद मे भरिये ।
कुंडलियां–5
कविता कवि की भक्ति है कृपा मात्र जगदीश ।
भाव भाव है भारती शब्द शब्द है ईश ।
शब्द शब्द है ईश अर्थ प्रभु पावन मन्दिर ।
दर्शन से आह्लाद मिटे शंशय मन के चिर ।
'राम ' रसों सँग छंद बहे आभूषित सरिता ।
हो समाज कल्याण लिखें हम ऐसी कविता ।
कुंडलियां–6
कविता करना है सरल, कठिन भाव के अंग ।
अनुभव ज्ञान प्रकाश से, भरें प्रेम के रंग ।
भरें प्रेम के रंग सरस हो उसकी भाषा ।
आम नागरिक करें शांत मन की अभिलाषा ।
राम श्रेष्ठ कवि दर्प कृति विष व्यंग्य न भरना ।
रख उपकारी भाव गुणीजन कविता करना ।
कुंडलियां–7
पढ़ना इनका व्यर्थ सब निर्धनता के पेड़ ।
तन का हुआ विकास पर रहे भेड़ के भेड़ ।
रहे भेड़ के भेड़ सुअर की करें हुजूरी ।
सुनें गधों की बाग ख़्वाब मे खाते पूरी ।
राम 'गाँव के युवा लपेटे मे मत पड़ना ।
करते है उपदेश छोड़कर लिखना पड़ना ।
कुंडलियां–8
राहुल तेरी क्या कहूं, योगी का यह देश ।
माया मूर्छित हो गयी, हार गए अखिलेश ।
हार गए अखिलेश,गमों को लगे भुलाने ।
हुए मुलायम चित्त, लगे झुनझुना बजाने ।
राम सियासी खेल खेलते बेरी बेरी ।
कहाँ गयी हुंकार बताओ राहुल तेरी ।
कुंडलियां–9
भाषा हिंदी पावनी , धोती मन सन्देह ।
भरती जन जन मे सदा,कल्याणी सी नेह ।
कण्यानी सी नेह , प्रेम का रस बरसाती ।
वक्ता मे भर ज़ोश, मोह स्रोता को भाती ।
राम' करो उपयोग,कि मन का मिटे कुहासा ।
हिंदी है पहचान,, देश की अपनी भाषा ।
कुंडलियां–10
सेवा करिये देश की , जाति धर्म को त्याग ।
समता का संदेश दे , फैलाओ अनुराग ।
फैलाओ अनुराग , करो सत कर्म अनोखे ।
जन मानस से प्यार मिटाओ मन के धोखे ।
राम। रहे न लोग , निर्बल और बिनेवा ।
ईश्वर का अवतार , मान कर करिये सेवा ।
कुंडलियां–11
आग लगी थी खेत मे,,,,,,,,,धुँआ हो गयी साख़ ।
जलता रहा किसान वो,,,,फ़सल हो गयी ख़ाख ।
फ़सल हो गयी राख़,,,,,,,,,खड़ा था लेकर पानी ।
आँखों से बरसात ,,,,,,,,,,,, हुई थी खुब मनमानी ।
राम ढरे जो नीर ,,,,,,,,,,,,,,,,गरीबी जाग उठी थी ।
बरस गये दो नयन ,कि जिस दिन आग लगी थी ।
कुंडलियां–12
नेता हमको चाहिए,,,,,,,कर्मठ सुधी समूल ।
जनता की दुविधा सुने, न्याय करे अनुकूल।
न्याय करे अनुकूल,,,,,भूल से करे न चोरी ।
रंग गिरगिटी छोड़,,,,,रहे जनता की ओरी ।
राम करो शुभ कर्म, बनो तुम विश्व विजेता ।
तभी मिलेगा ओट ,,,,,,,बनोगे सच्चे नेता ।
कुंडलियां–13
पावन हृदय हो खरा, मानवता की माप ।
कर्म भरे सदभाव जो, योगी अपने आप ।
योगी अपने आप ,पाप की करता निंदा ।
थोथा नही सुभाव ,देव सज्जन में जिन्दा ।
राम"मिले आराम, मिले जो इनका दर्शन ।
भस्म, गेरुआ वस्त्र, नही, हो तन मन पावन ।
कुंडलियां–14
करे निवेदन आज माँ, सारा हिंदुस्तान ।
दुशमन का मर्दन करे , दो ऐसा वरदान ।
दो ऐसा वरदान, मिटे आघात हृदय का ।
हो सच का जयगान ,भरे हुंकार अभय का ।
राम कहे कर जोर, गूंजती सिंह की गर्जन ।
मुदित जगत मन मोर, भोर तक करे निवेदन ।
कुंडलियां–15
योगी नित नव योग से , करे ध्यान व्यायाम ।
ईश भक्त निज ब्रह्म का, ज्ञान रखे निष्काम ।
ज्ञान रखे निष्काम , न बेचे दूध मलाई ।
करता फिरे उद्योग अनोखी ये सधुआई ।
राम,करे व्यायाम , बनेँ न ढुलमुल ढोंगी ।
करें योग गुन दान, बनाना सच्चे योगी ।।
कुंडलियां–16
भाई एक हजार की,सरमायेगी नोट ।
वो कैसे भर पायेगी वित्त विहीन की चोट ।
वित्त विहीन की चोट वोट का खेल निराला ।
टालम टाला मचा पहनते मालप माला ।
राम' कटे उस और डेट पर चिकन मलाई ।
बेबस वित्त विहीन हजारी अपने भाई ।
कुंडलियां–17
वित्त विहीनी आह का ,एक नया अध्याय ।
रुपया एक हजार में , यह कैसा अन्याय ।
यह कैसा अन्याय, चुकेगा पाई पाई
मखमुल है आवाक, हज़ारी अपने भाई ।
राम'बने मज़दूर ,दर्द है भीनी भीनी ।
रुकी हुई ख़ामोश ,हवा क्यों वित्त विहीनी ।।
कुंडलियां–18
भाई अपने देश की, यह कैसी सरकार ।
वित्त विहीनी नाव अब ,कैसे होगी पार ।
कैसे होगी पार, खेवैया करे तमाशा ।
खाते नेनुआ नून ,उधर है दूध बताशा ।
फंसी नाव मझधार ,देख करके महँगाई
माँग रहे है न्याय, हजारी अपने भाई ।।
कुंडलियां–19
नैया वित्त विहीन की , चलती ढुलमुल चाल ।
दिन दिन बढ़ता जा रहा, इनका टालम टाल ।
इनका टालम टाल, बढ़ेगी अब चिनगारी ।
वोटों की रणनीति, पड़ेगी इनको भारी ।
राम'हुये बदनाम , हजारी अपने भैया ।
भवँर बीच भरमाय, बेचारी इनकी नैया ।
कुंडलियां–20
आग बबूले हो रहे ,शिक्षक वित्त बेकार ।
भड़केगी चिंगारी तो ,अबकी होगा वार ।
अबकी होगा वार, हार को पड़ेगा सहना ।
राजनीति का दांव, पड़ेगा अबकी महँगा ।
राम' करे आह्वान ,सभी जो भटके भूले ।
भरे रुके हुंकार ,सभी है आग बबूले ।
कुंडलियां–21
ठंडे बस्ते में गये, भैया वित्त विहीन ।
पांच वर्ष का माजरा, मास बचे है तीन ।
मास बचे है तीन ,चुनावी रंग बहेगा ।
रंक करेंगे शोर, कि राजा कौन बनेगा ।
राम' करें हड़ताल ,मिलेगे लाठी डंडे ।
रुपया एक हजार ,पड़ोगे कब तक ठंडे ।
कुंडलियां–22
लाठी पुलिस विभाग की ,खाते वित्त विहीन ।
बर्बर अत्याचार को, सहते बेबस दीन ।
सहते बेबस दीन ,जानवर सा है पीटे ।
दिल में गहरा घाव ,लगेंगे कैसे ठीके ।
राम, पढ़े दिन रात, मुसीबत कितनी काटी ।
अध्यापक बन खाय ,डटकर पुलिश की लाठी ।।
कुंडलियां–23
भाई वित्त विहीन से ,सौतेला व्यवहार ।
लेट लतीफी दोअखी ,अगर करे सरकार ।
अगर करे सरकार ,बिभीषण धरना होगा ।
राजनीति का दांव ,बहुत ही महँगा होगा ।
राम' करे आह्वान ,कि जैसे लगे जुलाई ।
टूटेंगे हरहाल , हजारी अपने भाई ।
कुंडलियां–24
मिले बधाई आपको, जगत करे यशगान ।
साहित्यिक निर्माण से ,मिले मान सम्मान ।
मिले मान सम्मान, व्यस्तता करे ठिठोली ।
सरस्वती वरदान, भाव से भर दे झोली ।
'राम,करे प्रणाम, नाम की करो कमाई ।
हर्षित भरो उड़ान, निरन्तर मिले बधाई ।
कुंडलियां–25
रिस्ता जन्म विधान है , सामाजिक आधार ।
भाव समर्पित जो मिले ,ईश्वर का उपहार ।
ईश्वर का उपहार , प्रेम, विश्वास सजोना ।
मुस्काये हरहाल, हृदय का कोना कोना ।
राम, करे प्रणाम ,बने जो आज फ़रिश्ता ।
न्योछावर कर प्राण, निभाते अपना रिस्ता ।
कुंडलियां–26
माँ है नित्य निवेशिका , ममता समता नेह ।
कल्पवृक्ष की छाँव है ,तनिक नही सन्देह ।
तनिक नही सन्देह ,गेह को स्वर्ग बनाती ।
करके दुःख प्रतिकार ,सुखों की सेज सजाती ।
राम'करे प्रणाम, चरण बिच स्वर्ग क्षमा है ।
करे जगत निर्माण ,निराली ऐसी माँ है ।
कुंडलियां–27
भाई वित्त विहीन से ,सौतेला व्यवहार ।
लेट लतीफी दोअखी ,अगर करे सरकार ।
अगर करे सरकार ,बिभीषण धरना होगा ।
राजनीति का दांव ,बहुत ही महँगा होगा ।
राम' करे आह्वान ,कि जैसे लगे जुलाई ।
टूटेंगे हरहाल , हजारी अपने भाई ।
कुंडलियां–28
डेरा घेरा डाल कर , ले चमचों को संग ।
नेता होली खेलते, सत्ता में हुड़दंग ।।
सत्ता में हुड़दंग, अंग फ़बते धन काले ।
छिपते लिये अबीर, करके घोर घोटाले ।
"राम"दिखे बदरंग, हुआ जो तनिक सबेरा ।
भागे देश विदेश, ढहा जब उनका डेरा ।।
कुंडलियां–29
माँ की ममता छाँव तन ,मिले पिता का प्यार ।
गुरु उपदेशक ज्ञान पथ, खुले स्वर्ग का द्वार ।
खुले स्वर्ग का द्वार ,मिले वनिता अनुगामी ।
तनया मिले सुशील ,पुत्र कर्मठ शुभनामी ।
राम'स्वर्ग का भान ,करो हो उर में समता ।
धन्य निकेतन डोर ,बधी हो माँ की ममता ।
कुंडलियां–30
घोर विरोधी शत्रु का, एक सफल उपचार ।
करो प्रशंसा हो विमुख , रख हृदय में प्यार ।
रख हृदय में प्यार,करो खुद ही अगुआई ।
जले नेह के दीप, बने हम भाई-भाई ।
'राम, मिटे उर शूल ,भाव भागे अवरोधी ।
गले लगा दो प्यार, मिले जो घोर विरोधी ।
कुंडलियां–31
रचूँ सोरठा ,गीत नव, कुण्डलिया प्रधान ।
ग़ज़ल,गीतिका,तेवरी, दोहा छंद विधान ।
दोहा छंद विधान ,पिरामिड गागर भर दे ।
सजे हाइकू विम्ब, सजल आँखों को कर दे ।
"राम" करूँ प्रयास ,हास की सफल हो घटा
हृदय के धर भाव, चाव से रचूँ सोरठा ।
कुंडलियां–32
पाखण्डी कुछ लोग बन ,करते दुष्प्रचार ।
अमृत रूपी झील तन, विष रूपी उद्गार ।
विष रूपी उद्गार, बनी अब मेघ कपासी ।
जनता है मजबूर, पिये वर्षा धन प्यासी ।
करते"राम" विकास बढ़ाते गुड़ की मण्डी ।
खाओ नेनुआ नून , भरोसे रह पाखण्डी ।
कुंडलियां–33
बहुरुपिया बन लूटते ,पाखण्डी है लोग ।
मन में कपटी हौंस रख ,सत्य करे प्रयोग ।
सत्य करें प्रयोग ,ढोंग नव नित अपनाते ।
बोते बिष पर भाव, घाव उर पर कर जाते ।
"राम"रहो संचेत, दिखावै जब यें रूपिया ।
सीधे करो संहार ,काल रूपी बहुरूपिया ।।
कुंडलियां–34
आतंकी ये संगठन दिये हृदय पर चोट ।
दुशमन के घुसपैठ से दहला पाटनकोट ।
दहला पाटनकोट मग़र वो धन्य सिपाही ।
हो गये अमर शहीद चुका के पाई पाई ।
'राम' करे प्रणाम बनाना इनको डंकी ।
कैद करो या मार भगावो है आतंकी ।
कुंडलियां–35
छोटे ,बड़े समाज में बने है आज अपंग ।
बैसाखी है झूठ की सच होता बदरंग ।
सच होता बदरंग अंग पर फबता कैसे ।
बदल रहे मुख रंग दुबकते गिरगिट जैसे ।
राम' करे ऐलान यहा सिक्के कुछ खोटे ।
चले हंस की चाल बड़े पिछलग्गू छोटे ।
कुंडलियां–36
सच्चे कवि हृदय मिले चलें अवध की ओर ।
जनमत की आवाज़ का शोर करें चहुओर ।
शोर करे चहुँओर घोर निंदा भी करना ।
जीवन का परिहास आश मन में है भरना ।।
"राम" सुखद हो अवध हँसे नर नारी बच्चे ।।
करना है निर्माण भवन बिच मानव सच्चे ।।
कुंडलियां–37
महँगाई की आँच है भौतिकता की ठण्ड ।
ताप रहें निर्मम दुखी कुछ तो बस पाखण्ड ।
कुछ तो बस पाखण्ड ठिठुरते पहन लबादा ।
ठण्ड भरे हुँकार कि कुहरा हुआ अमादा ।
राम ठण्ड की धूप हँसे लेती अंगड़ाई ।
होता कंक गरीब गात तापै महँगाई ।
कुंडलियां–38
भारी लपटें उठ रही भीषण जले अलाव ।
महँगाई की आंच से कैसे करें वचाव ।
कैसे करें बचाव गरीबता रूपी ठण्डी ।
धुँआ उठे चहुँओर सुलगती वेबस कण्डी ।
राम" भरें हैं नयन धुंध कुहरा अंधियारी ।
एहि भौतिक सन्ताप उधर लपटें है भारी ।।
कुंडलियां–39
अंडे की करतूत से बिल्ली में बदलाव ।
नेता उठकर बाग़ दे कुत्ता बोले म्याव ।
कुत्ता बोले म्याव खा गया गिरगिट धोखा ।
आया देख चुनाव बदलता रंग अनोखा ।
राम बने प्रधान बनाते सब हथकण्डे ।
खुला करें बदनाम भैंस भी देती अंडे ।
कुंडलियां–40
भारतमाता का चरण, मम हृदय निष्काम .
दीन मलीन नवीन कर, कैसे करूँ प्रणाम .
कैसे करूँ प्रणाम शाम दुर्गुण की छाती .
सन्नाटे की गूँज व्यथा मन की बढ़ जाती .
राम" करूँ कर जोर भोर की आस लगाता .
अंधकार छट जाय करो कुछ भारतमाता .
कुंडलियां–41
भारतमाता के चरण, करू निवेदन आज .
पावन मन मन्दिर बने, मेरा देश समाज .
मेरा देश समाज बने फिर विश्व निधाना .
हर्षित हों हर लोग मिले सबको सम्माना .
राम" बने मजबूत धनी निर्धन से नाता .
दो ऐसा वरदान समर्थित भारतमाता .
कुंडलियां–42
जनमत की इस होड़ में प्रत्यासी अकुलाय ।
पैसे की बरसात से तन मन देत लगाय ।
तन मन देत लगाय गड़ेगी विजय पताका ।
हाथ जोड़ मिलि जाय गली घर नाका नाका ।
राम करो कुछ ख्याल जीत होती है सत की ।
जाते कही लुकाय छाँव पाते जनमत की ।
कुंडलियां–43
बहस चुनावी हो रही जीतेगा अब कौन .
सुनकर नारे रात दिन जनता है सब मौन .
जनता है सब मौन ओट किसको है देना .
प्रत्यासी घर जाय लिये अपनी सब सेना .
राम करै जयराम एक से एक मेधावी .
मिलता नही अराम किये बिन बहस चुनावी .
कुंडलियां–44
मित्र मिले सौभाग्य से ,शत्रु स्वयं के कर्म .
अन्य मिले निज जन्म से, सम्बन्धो का मर्म .
सम्बन्धो का मर्म धर्म कहता है भाई .
मित्र ह्रदय का द्वार चुकाना पाई पाई .
राम हृदय तस्वीर बने बिस्वास का चित्र .
दे दुर्दिन में काम बनाना ऐसा मित्र.
कुंडलियां–45
कहूँ कुली की दुर्दशा , भरते अपनी टेंट .
टेशन विधवा हो गया, गाड़ी घण्टो लेट.
गाड़ी घण्टो लेट गेट पर लगता ताता .
पैसेंजर हैरान दर्द अब सहा न जाता .
राम चली है नीति यहा पर मिली जुली की .
करते है अन्याय कहा तक कहूँ कुली की .
कुंडलियां–46
पुस्तक पढ़ते रात भर,किये बिना आराम .
होत परीक्षा रोज है, मिले नही परिणाम .
मिले नही परिणाम, सिमटता कैसे ताँता .
चलते कछुआ चाल, साल भर लग ही जाता ,
सुन लो हे श्रीराम ,कमी होती है बेसक .
फिर भी ले उम्मीद बढ़ाते जाते पुस्तक .
कुंडलियां–47
आवेदन की होड़ में , प्रतियोगी बीमार .
आवेदित गुजरात से , सेंटर गया बिहार .
सेंटर गया बिहार लगा के तन मन आशा .
गयी परीक्षा छूट बेचारा हुआ रुआँसा .
राम करो कुछ न्याय करूँ मैं यही निवेदन .
क्योंकर इतना दूर गया उनका आवेदन ..
कुंडलियां–48
पर्चा आउट हो रहा , करे भरोशा कौन ,
प्रतियोगी लाचार हैं, राजतन्त्र है मौन .
राजतन्त्र है मौन बना यह कैसा धंधा .
अब लो आँखे खोल बनोगे कब तक अँधा .
राम कही है दोष मुझे होता है डाउट .
लेते है मिल बाँट कराते पर्चा आउट .
कुंडलियां–49
आरक्षण की नाव में ,डूब रहा है देश ।।
महँगाई के ग्रास से ,बचा नही कुछ शेष ।।
बचा नही कुछ शेष भेष बहुविधि अपनाती ।।
नाव चली कुछ तेज नदी जब जब उफनती ।।
हे "राम" दुखी जन सोच रहे है पेट भरण की ।।
जर्जर है कमजोर नाव यह आरक्षण की ।
कुंडलियां–50
निर्धन है मझधार में ,डूब रहे मन मार ।।
आरक्षण की नाव पर, मिला नही अधिकार ।।
मिला नही अधिकार पार कैसे हो पाते ।।
महँगाई का घूँट रहे पीते चिल्लाते ।।
हे "राम" रुकी न नाव डुबे मारे मन ।।
आरक्षण से और दबे बाकी सब निर्धन ।।
कुंडलियां–51
लहरें उफनाने लगी ,भवँर उठ रही तेज ।।
महँगाई की मार से ,कौन करे परहेज ।।
कौन करे परहेज तनिक राहत जब आती ।।
आरक्षण की नाव कुचल उनको है जाती ।।
हे "राम"उबर न पाये गये जो इतने गहरे ।।
पुनः हो गयी शांत चली जो चुनावी लहरे ।।
कुंडलियां–52
आरक्षण किसके लिये ,करे फैसला कौन ।।
कर्मठ है हड़ताल पर, निर्धन है सब मौन ।।
निर्धन है सब मौन पहुँच से उनकी दूरी ।।
दिनभर करें अकाज फसी दैनिक मजदूरी ।।
हे "राम" कोई भी जाति नही करती हैं पारण ।।
तो कैसा दुर्भाग्य मिले न क्यों आरक्षण ।।
कुंडलियां–53
आती है हरहाल में ,आरक्षण की नाव ।।
मिला न जिनको लाभ तो ,कर जाती है घाव ।।
कर जाती है घाव कुढ़न मन ही मन होती ।।
जाति पांति के बीच द्वेष मन में है बोती ।।
हे"राम" मचा कुहराम प्रजा रहती चिल्लाती ।।
भूख लगे न आँख रातभर नींद न आती ।।
कुंडलियां–54
क्रिकेट मे दिलचस्पी हुई, लगता नही सवाल ।
बोर्ड परीक्षा के समय , बुरा हुआ हैं हाल ।
बुरा हुआ हैं हाल कमेंट्री दिल धडकाये ।
हैं काँटे का मैच नज़र न हटे हटाये ।
हे राम ! हुई तखलीफ़ हर एक विकेट मे ।।
हुआ समय बर्बाद हरहाल क्रिकेट मे ।।1।।
कुंडलियां–55
चौका छक्का जब लगे, गूँज उठे आवाज़ ।
रटते रटते थक गये ,फिर हो गये निराश ।
फिर हो गये निराश पास होने की शंका ।
खेल रहा इग्लैंड टास जीता श्री लंका ।
हे राम ! किताबें बंद मिलेगा फिर न मौका ।।
फंसा हुआ हैं मैच लग रहा छक्का चौका ।।2।।
कुंडलियां–56
ट्वेंटी ट्वेंटी की लहर , कर देती मजबूर ।
पर बैटिंग धोनी की देखेंगे आज जरूर ।
देखेंगे आज जरूर दूर निज घर से जाकर ।
और रखेंगे नोट्स कहीं हरहाल छिपाकर ।
हे राम ! परीक्षा बनी गले की भारी घंटी ।
अब तो पड़ा दिमाग़ लगाना ट्वेंटी ट्वेंटी ।
–Rakmish Sultanpuri