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सरसई धूप भाग–6

 Rakmish Sultanpuri द्वारा रचित 
सरसई धूप भाग 6 की रचनाएं 
______________________________________

61.

देख –देखकर
यह रूपांकन
आंखों की
धुँधली तस्वीरों में
अवशोषित करतीं हैं आँखें स्नेहों के अंकुर को
उस तन से
मेरा मन भी
नही हो रहा अपनेबस में ।

कोशिश पर
कोशिश करता हूँ
संकेतों पर
हृदय भाव रखने की
और समाजिकता की व्यंग्य हँसी भी झलक दे रही है
चुप हैं केवल
डूब गयीं हैं
नतमुख होकर नित अपयश में ।

झाँक रहे हैं
छुप– छुपकर हम
प्रेमपथों के
दुःखद मार्ग के सुख को
पगडण्डी पर चलकर धीरे-धीरे पास आ गए हैं
और अचानक
हम दोनों ही
रुके हुये है असमंजस में ।



62.


निर्मिमेश मैं
देख सकूँ न
इस पतझङ में
तेरे तन की हरियाली
कहीं हमारी मानसिकता में घर न कर जाए
कि तुमको भी
इस कलियुग में
इस यौवन का अहंकार है ।

अनमयस्कता से
पर तुमको ही
मनसपटल पर
आभाषित करता हूँ
और किसी कोने में उर के स्थापित कर
बहुत अधिक
प्रयासों से
देख सका न निरंकार है ।

तेरे मन की
उन लहरों पर
स्नेहों की
नीली छाया उभर रही है
फिर भी तुमने कभी कहा न संकेतों से आहत होकर
मेरे मन को
खींच रहा जो
तेरे मन का संस्कार है ।


63.



यें आँखें तो
तपी हुई हैं
देख– देखकर
आकर्षित परछायी को
हर चेहरे पर ढूढ़ रहे हैं वैकल्पिक अनुरागों को
व्यंग्य बोलकर
हँसी ले रहे
प्रेम नही यह छिछलापन है ।

छिछलापन भी
एक रूप है
मन पर आकर्षक फैलाने का
शब्दों की प्रतिध्वनयों से ही हृदय व्यथित होता है
परन्तु क्षुब्ध यह
मन होता है
प्रेम नही यह अन्धापन है ।

अंधापन तो
स्वच्छ प्रमाण है
अनुरागों की
विह्वलता का
मन की आंखों से प्रेमचिन्ह न टटकोर सके तो
वह इक भौतिक
क्षुधा मात्र है
प्रेम नही यह पागलपन है।

64.

सन्देहों में
खोज रहा हूँ
ढूढ़ रहा हूँ
पदचिन्ह तुम्हरा प्रेमपथों पर
हो न हो पर तेरी परछायी या तुम विचरण की हो
जाने या अनजाने में
स्नेहों का प्रथम चरण है ।

क्योंकि आँखों का
प्रत्युत्तर
तेरे मन से
मेरे मन तक पहुंच रहा है
प्रतिक्रियाएँ जटिल परन्तु समाधान तो निश्चित है
पहले मन से
पुनः हृदय पर
द्विघात का समीकरण है ।

इसी तरह तुम
बिना झिझक के
भिगो रहे हो
इस तन मन को
भावों के इस गहन तमों मे स्नेहों का अंधकार है
मेरे प्रति
तेरी यह चितवन
मेरे उर का वशीकरण है ।

65.

बहुत दिनों से
मै ठहरा हूँ
प्रेमपथों पर
आशाओं के एक वृक्ष के नीचे
सूख गया है वृक्ष, पत्तियाँ टूट रही हैं इस पतझड़ में
निरख –निरखकर
सन्नाटे को
व्याकुल आँखे अकुलाती हैं ।

कभी –कभी तो
उसी वृक्ष पर
कल्पनाओं की
कोयल कूजा करती है
दिनभर तो मै ध्वनियों का बस  ताना बाना बुनता हूँ
परन्तु शाम को
दुःखी देखकर
कोयल भी तो सकुचकती है ।

न मिलते तुम
न बसती
इन आँखों में
परछायी तेरे रूपों की
कभी झरोखों मे परछायी कभी स्वंय को निरख निरखकर
स्मृतियों में
भटक –भटककर
अवनत होकर पछताती है ।

66.

आज पुनः
तेरे स्वप्नों के
अवलम्बन से
गूँज रही थी आवाजें
सिहर उठा था वर्षो पहले अवलोकन से
द्रवित हो रहा स्नेहों के प्रलोभन से
इसी हृदय मे
आज तुम्हे भी
डुबो दे रहा हूँ ।

स्नेहों का
बिम्ब तुम्हारे
इस चेहरे पर
रुक हुआ सा है
ये आँखें न जाने कब से उत्प्रेरित थी
अवलोकन के सघन रूप से सम्प्रेषित थी
उसी रश्मि में
अपने तन को
भिगो दें रहा हूँ ।

संकेतों मे भी
तेरे ही
भावों पर प्रहार कर रहा हूँ
संकेतों से प्रेरित होकर आकर्षक से
हर्षित हैं आँखें आँखों के दर्पण से
स्मृतियों की
मालाओं में
पिरो दे रहा हूँ ।


67.


तुमसे ही तो
संकेतों से
कह पाया हूँ
इस हृदय के छिपे भाव को
टाल दिया है जिसको तुमने विहँस –विहँस कर
उसी हँसी मे
एक खुसी की
कुछ पल रौनक सज जाती है ।

धीरे-धीरे
अस्ताचल से
दूर सेवारों मे
निशा उतर कर आ जाती है
संकेतों की उस भाषा के तर्क वितर्कों मे
भूल जा रहा
हूँ मै तुमको
क्योंकि आँखें लग जाती हैं ।

परन्तु नही
स्वच्छंद रूप से
चलता रहता हूँ
स्मृतियों के पदचिन्हों पर
संकेतों मे एक हँसी का अर्थ ढूढता हूँ
किसी रूप मे
किसी भाव मे
आँखें मेरी भर जाती हैं ।


68.


यह प्रलोभन
कि तुमने भी
आशाओं में
उस हृदय को व्यथित कर दिया है
व्यर्थ रहा जब काट रही थी कोई जीवा
किसी वृत्त सा
पूर्ण नही थी
प्रेमपथों की एक परिधि सी ।

त्रिज्याओं सी
स्मृतियाँ ये
खिंच जाती है
हृदय केंद्र से होकर
जीवा के उस पार परन्तु धूमिल हो जाता है
कही तुम्हारे
भी हृदय को
डुबो सके न वह वारिधि सी ।

दूर बहुत हूँ
रेखाखण्डों के
दो छोरों सा
जुड़े हुए है भाव बिंदु से
शायद बने कभी झरोखें त्रिभुज या बहुभुज सा
रूप तुम्हारा
सजा रहेगा
इस हृदय मे एक निधि सा ।


69


रूप तुम्हारे
उभर रहे हैं
सँवर रहे हैं
एक भाव से कल्पनाओं की हद तक
कभी रंग में
कभी बिरंगे
पुष्पों से खिलता रहता है ।

जबकि मैं
परछायी को ही
निरख रहा हूँ
परख रहा हूँ
वर्षों पहले और अभी भी मेरा हृदय
उसी दृश्य को
एक बार फिर
अवलोकन करता रहता है ।

यही क्रम फिर
चलता रहता
दिन भर और
निशा स्वप्नों में
प्रेमपथों से भटक गया पर ढूढ़ रहा हूँ अब भी
यह मेरा मन
और रास्ता
जीवन भर बढ़ता रहता है ।

70.

उन खेतों में
जहाँ जहाँ तक
धीरे-धीरे
किसी बहाने
तुम टहला करती थी इस ठंडक में सिहर- सिहर कर
उन्ही गेहूओं
के खेतों में
पुनः आज मैं गया हुआ था ।

सरसो झूमी
मुस्काई थी
पीलेपन की आभा
पगडण्डी से
इधर उधर तक बिछी हुई थी पंखुड़ियां मुरझाई
और फैलकर
दूर क्षितिज तक
हल्का कुहरा पड़ा हुआ था ।

तसवीरें जो
कभी– कभी
आकर्षित करती थी
मेरे मन को
भृम से ही पर आह्लादित करती थी उर को
परन्तु आज
चितवन न उठती
आँखें नम मै खड़ा हुआ था ।


71.

पहले ही दिन
इस पतझड़ में
भावों की हलचल से
आशाओं सी
प्रबल वेग से वायु बह चली थी
और पत्तियां
इस मन की कुछ
जीर्ण निराशाओं सी
इस धरती पर बिछी हुई थी ।

नये-नये
अंकुर पुष्पों के
न जाने
कब फूटेंगे
पीले-पीले इन पत्तों पर असफलताओं का
कुहरा है
धूमिल-धूमिल पर
धुँधलेपन में
एक सफलता छिपी हुई है ।

नव पुष्पों सा
अपना जीवन
मिट जाता है
पनप-पनपकर
शाखाओं के पथ के काटें जब चुभते है
स्नेहों की
वही सुगंधें
पतझड़ की छाया सी
इस हृदय पर लिखी हुई है ।

72.

आख़िर कैसे
समझायें हम
इस कुहरे के
सधन प्रवाह मे
इस हृदय पर तस्वीरें है, रूप तुम्हारा है
और अधिक कुछ
कह न सकूँ मैं
इस जीवन की सीमाएं है ।

उन आँखों में
बसा बसाया
चित्र हमारे
तन-मन का
चाह रहा है मुझ तक आना स्वच्छंद रूप से
परन्तु तुम्हारे
कोमल जीवन से
जुड़ी हुई कुछ दुविधाएं है ।

इसीलिए तुम
दूर– दूर से
मेरे मन को परख रही हो
और हमे भी ज्ञात हो रहा स्नेहों का संकेतन
कभी बात
हो जाये उर की
बस इतनी सी आशाएँ हैं ।

73.

इस पतझङ में
अंकित होकर
घटनायें कुछ
स्मृतियाँ कुछ
झरती रहतीं है पत्तों सी इन वृक्षों से
इस हृदय पर
गिरती रहती
जर्जर होकर टूट –टूटकर ।

आशाओं पर
घटनाओं पर
आश्वासन
मिलता रहता है
प्रतिबिम्बों से झाँक रहीं है असफलताएं
इक कोने मे
भाग्य बैठकर
रोटा रहता फूट फूटकर ।

फिर भी मैने
अनुमानों से
सन्देहों पर
चित्र बना रखा है
इस हृदय और स्वच्छ रूप से इक दर्पण सा
हृदय भी
पुष्पित कष्टों को
पी जाता है घूँट– घूँटकर ।


74.


आज नदी पर
कुछ ही नावें
तैर रही हैं
स्मृतियों सी
और किनारों पर आकरके नष्ट हो गयीं हैं
कभी उन्ही पर
बैठ– बैठकर
वर्तमान को भूल रहा था ।

ये नावें भी
जर्जर ही है
आते –जाते मनसपटल पर
जीर्ण हो गयीं है
किसी तरह से जोड़– जोड़कर घटनाओं तक पहुंच रहा हूँ
जबकि पहले
बारी –बारी से
शांत परन्तु झूल रहा था ।

आशाओं के
तटबन्धों के
एक किनारे पर
स्मृतियाँ शिथिल पड़ गयी हैं
उस तट पर बस एक तुम्हारी छायाकृति देख रही है
सन्देहों पर
स्नेहों को
धीरे धीरे ढूढ़ रहा हूँ ।

75.


ये आँखें भी
सूर्यमुखी सी
अनुसरण करेंगी
कब तक
न जाने कितने कोणों से एक बिंदु पर पड़ी हुई हैं
स्नेह किरण यह
विह्वल होकर
छाया पाकर रुक जाती है ।

सिर्फ तुम्हारी
परछायी पर
बैठ बैठकर
खग वृन्दो सा
स्नेह बिंदु से चुकने लगती एक घोषला एक आश्रय
हिलती डुलती
परछायी पर
झूम– झूमकर झुक जाती है ।

आवरणों के
पार जहाँ तक
न दिखती है छाया
तस्वीरों की
अंकित करके आभाषी प्रतिबिम्ब दिखाती है
और दृश्य सब
रेखाएं सब
जर्जर होकर चुक जातीं हैं ।


76.


मैने तुमसे
कभी कहा न
संकेतों में कभी किया न
स्नेहों का प्रदर्शन
क्योंकि तुम तो बधे हुए हो बन्धन में
इस जीवन से
और कभी न
सीमाएं मै पार कर सकूं ।

यें आँखे अब
अफ़सोसों में
किसी झील सी
सूख जा रहीं हैं
परन्तु तुम्हें क्या व्याकुलता से वही निखरना
जारी रखकर
इन नयनों को
तेरे प्रति तैयार कर सकूँ ।

यह कोमलता
यह चंचलता
बाँध सकूँ मैं
स्मृतियों के धागों से
उर मे निर्मित प्रेमपथों का वह सागर
संकेतों से
मात्र डूबकर
कभी नही इनकार कर सकूँ ।

77.

सीमाएं हैं
सघन कुंज है
दूर –दूर तक
नदियाँ बहती हैं
किन्तु दूर तक स्पंदित इन वायु झरोखों से
बन जाता है
चित्र तुम्हारा
नयनों के बरसातों से ।

भय किसका है
शत्रु कहाँ के
ये बातें तो
छिप जाती हैं
तस्वीरों की परछाई मे पूर्ण रूप से
मुस्कानों का
एक उजाला
छाया रहता रातों से ।

और स्वप्न में
तुम आती हो
सन्नाटों में
धीरे –धीरे छिप करके
फिर बालों पर हाथ फेरकर पास बुलाती है
रूप बदलकर
संकेतों से
आशाओं मे बातों से ।

        ****

समस्त रचनाएं Rakmish Sultanpuri द्वारा रचित और प्रकाशित हैं । 
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सरसई धूप भाग 5

Rakmish Sultanpuri द्वारा सरसई धूप भाग 5 की रचनाएं । 

                  41. तू मेरा हृदय है ।
                                 20।11।10

रूप तुम्हारा स्मृतियों में
उभर –उभर कर
आता –जाता
क्या सच है क्या झूठ तुम्हें कैसे बतलाऊँ ?
पूर्णरूप से
सच है क्योंकि
वह मेरा स्वप्नालय है ।।

न जाने
कितने पुष्पों से
रँग जाती है
नयनों की परछायी
और तुम्हारे अधराधर के अनुरागों पर
रुकी हुई है
हटकर क्योंकि
तू कलियों की किशलय है ।। 

सन्नाटा है
अखिल विश्व में
और तुम्हारी
रेखाकृति है 
दूर सही पर रुकी हुई है साँसे प्रतीक्षा में
मन्द सही पर
है स्पंदन
क्योंकि तू मेरा हृदय है ।।

              *"*

            42.अनुरागों के प्रलोभन में ।
                               24/11/10

अरे –अरे यह
चित्र तुम्हारा
इस हृदय में
अंकित है
और तुम्हारे नयनों को कुछ भ्रंम हो गया है
किसे ढूढते
मुझे भूलकर
अनुरागों के प्रलोभन में ।।

कितने मौसम
कितने दिन से
स्नेहांकुर
सींच रहा हूं ।
अपलक नयनों की ज्योति से दुःखी हो रहा है 
यह हृदय भी
व्यस्त हो गया
संकेतों के संसोधन में ।।

देख रहा हूं
सोच रहा हूं
प्रतिबिम्बों को
स्नेहों के दर्पण में
उसी हृदय में किसी और की स्नेहलता सधन हो गयी है
आश्वासन के
शब्द बचे न
इस हृदय के सम्बोधन में ।।

            ***

           43.दिवा स्वयं को निरख निरख कर ।
                                  25/01/11

और आज भी
वह हिमनद
खिसक रहा है
धीरे –धीरे
वर्षो पहले जिसको तुमने सँचित कर रखा था
इस हृदय में
इन आँखों तक
आते रहते पिघल– पिघल कर ।।

जब ये आंखें
भर जाती है
ढर जाते है
दो एक बूँद
क्षणभर में ही 
जाती है इस चेहरे पर
स्मृतियों के
इस आतप में
छिप जाते है सूख सूख कर ।।

और अचानक
आहट पाकर
वतमान में
लौट रहा हूं
कोस रहा हूं चंचल मन की चंचलता को
दुःख मे भी
सुख पा जाता
दिवा स्वप्न को निरख निरखकर ।।

          ***

                     44.इस हृदय के आँगन में ।
                             रिपब्लिक डे 2011 

यही तुम्हारा
रूप एक दिन
आया था
मेरे स्वप्नों में
ढूढ़ रहा था तब से तुमको स्वप्नों के कानन में
आज मिले तुम
फूल खिले है
इस हृदय के आँगन में ।।

निरख रहा था
चित्र तुम्हारा
टकटकी लगाकर
बहुत चाव से
सुख था हृदय भींग रहा था स्नेहों के सावन में ।
झलक रहा था
अंग –अंग तक
चमक रहा था पावन में ।।

तृप्त हो गया
है यह हृदय
आँखे प्यासी
प्यासी हैं
स्वप्नों मे ही पर मिलना तुम मेरे सुख के पालन में
सकुचाना तुम 
मुस्काना तुम
तुमको है हर बार नमे ।।

               ***

              45.और नही है परिभाषा कुछ ।।
                             27/04 /11

यह स्वप्नों की
नही सत्यता
हृदय के इन
अनुरागों की
यही दुःखद है, नही मिल सका संसर्ग तुम्हारा 
इस जीवन में
परन्तु मनो को
और नही है निराशा कुछ ।।

प्रेम वही है
जो अधरों से
और तुम्हारी
इन आँखों से
झरकर झरनों सा समा रहा है इन आंखों में
इस हृदय तक
सन्तुष्टि की
और नही है परिभाषा कुछ ।।

न बह जाये
इन आँखों से
जब तक आँसू
की दो बूँद
रहू निरखता तब तक तुमको ,इन आँखों में
बिम्ब स्वयं का
देख सकू मैं
और नही है अभिलाषा कुछ ।।

               ***


              46.करता रहता हूं प्रबन्ध ।। 05/02/11

इस कुहरे में
मुस्काते है
सरसो के कुछ फूल
तुम्हारे रूपों सा
भींग रही हैं स्मृतियों से आंखों मे तस्वीरे
तुम्हें देखकर
मुस्कानों पर
बढ़ता जाता है प्रतिबन्ध ।।

इधर उधर से
कनखियों से
निरख –निरख कर
बचकानी आहट को
प्रेरित करके स्नेहों की परछायी को
तुम्हें दिखाने
तुम्हें बताने का
करता रहता हूं प्रबन्ध ।।

आख़िर तुम भी
और हृदय यह
सुन सकता है
कोलाहल वह
चींख –चींख कर स्मृतियां भी सुबक रहीं हैं 
अब तो तुम्हारी
आहट से ही
आती कोमल सरस सुगन्ध ।।

         ***

     47.प्रथम मिलन से प्रस्तावित है ।। 18/02/11

आशाओं मे ही
बीत गया वह
प्रेम दिवस भी
प्रेम पथों पर आकरके
जबकि तुमने कभी न सोचा कभी न झांका हृदय में
जो बस दर्शन
भर से तेरे
निशास्वप्न तक प्रभावित है ।।

परन्तु तुम्हारी
क्या है कैसे
गतिविधियां
जीवन जीने की
मेघाच्छन्न बादलों सा स्नेह भरे हृदय से
आज नही पर
कल परसों तो
वर्षा निश्चित सम्भावित है ।।

फिर क्यो आँखे
प्यासी प्यासी
हर दिन
रह जाने देते हो 
ये आंखे तो बौछारों से ही शायद खिल जयेंगी
स्नेहों का
अनुमोदन तो
प्रथम मिलन से प्रस्तावित है ।। 

                   **

            48.इस हृदय को उलझन मे ।। 15/02/11


सिर्फ तुम्हारी
इन आँखों में
छण भर ही तो
झाँक रहा था
जैसे राकापति झाँक रहा था किसी झील में
न जाने क्या
खींच रहा है
इस हृदय को उलझन में ।।

और तुम्हारी
भी आंखे
उस चेहरे पर
स्थिर हो जाती हैं
जैसे वर्षा मे भींग रही पुष्पित कोई इंद्रधनुष हो ।
छिप जाती फिर
तितली सी तुम
अरहर सरसो के उपवन में ।।

इन आँखों की
अवलोकन की
त्रिशा कभी क्या
हो पायेगी तृप्त
ज्ञात नही हो सकेगी तुमको हृदय व्यथा मेरी
अभिनव अंकुर
मुरझाने तक
परजीवी इस तनमन में ।।

                  ***


            48.याद कहा आती होगी ।। 16/02/11

देख नही सकता
तुमको मैं
टकटकी लगाकर
इन आँखों से
ये आंखे भी तरस गयी है सिर्फ तुम्हारे अवलोकन को
उस हृदय में
स्वप्निल मन में
भी हलचल होती होगी ।।

किसी तरह से
साम्य नही है 
इस कंकण से उस हीरे का
जिसने भावों के आयुध से उर को आहत कर डाला है
जिसे चाँदनी
स्नेह रश्मि से 
मुखमण्डल धोती होगी ।।

पर भावुक इस
हृदय को 
छणभर भी
सन्तोष नही होता है
परन्तु तुम्हारे जीवन पथ की होंगी कुछ सीमाएं
अभिलाषा भी
और व्यस्तता 
याद कहां आती होंगी ।।

            ***

           50.मेरे मन की गहराई तक ।।  16/02/11

मुस्काते इन
अधरों से फैली
मत डूबो
स्नेह रश्मियों में
नयनों के इस गहन गर्त मे छिपे हुये है
निरख सको तो
कोशिश कर लो
तस्वीरों को परछाई तक ।।

बहते रहते
चित्र उभरने
मिटने का क्रम
घाव कर गया है
पिघल सकेगा न यह हृदय छणभर स्नेहों से
पड़ सकता है
थोड़ा सा दुःख
स्नेहों की भरपाई तक ।।

मैं जो तुमको
निरख रहा था।
खोज रहा था
स्नेह औषधि भावों में
यह मत समझो अवलोकन मे आँखे प्रेमातुर हैं
आते– आते तक जाओगे
मेरे मन की गहराई तक ।।

            ***

            51.तुम बिन बहुत करकती हैं । 17/02/11


आज सुबह से
तेरा चेहरा
फिर देख रहा हूं
हाथों की रेखाएं
किसी तरह से नही मिल रही दूर दूर तक अभाएँ
न ही तेरी
आशाओं की
वह इक डोर झलकती है ।।

जिसे पकड़कर
धीरे– धीरे
पहुंच सकूँ मै
कभी तुम्हारे स्वप्नों तक
व्यथित कर सकूं तन को मन को स्पंदित हृदय से
और हमारी
आंखे भी तो
स्वप्नों मे दुखी तरसती है ।।

जिसमे मैंने
बना लिया है
स्नेहों का एक घरौंदा
बूँद– बूंद तिनको से
तुम रह जाओ एक रात ही फिर उषाकाल मे चल देना
पर आ जाओ
किसी रात को
तुम बिन बहुत करकती है ।। 

          ***

               52. प्रथम मिलन से प्रस्तावित है 
                               52  18/02/11

आशाओं में ही
बीत गया वह
प्रेम दिवस भी
प्रेम पथों पर आकर के
जबकि तुमने कभी न सोचा कभी न झांका हृदय में
जो बस दर्शन
भर से मन में तेरे
निशा स्वप्न तक प्रभावित है ।

परंतु तुम्हारी
क्या है कैसे
गतिविधियां
जीवन जीने की
मेघाछन्न बादलों सा स्नेह भरे हृदय से
आज नहीं पर
कल परसो तो
वर्षा निश्चित संभावित है ।

फिर क्यों आंखें
प्यासी प्यासी
हर दिन
रह जाने देते हो
यें आंखें तो बौछारों से ही शायद खिल जाएंगी
स्नेहों का अनुमोदन तो
प्रथम मिलन से प्रस्तावित है ।


              53. परिधानों से ढाक रहे थे 
                           18/02/11

भूल गया हूं
इस बसंत को
आते-आते
खेतों की पगडंडी से
सरसों के पुष्पों  से पल्लवित जिनकी स्मृतियों में
पास पहुंच कर के
देखा तो हरियाली को ताक रहे थे ।

फिर मेरे
आने की आहट से
बाधित हो गई
तारतम्यता अवलोकन की
मैं तो उनके ही दर्शन का अनुरागी था अभिलाषी था
जो तन की
कुछ पारदर्शिता
परिधानों से ढाक रहे थे ।

यह हृदय भी
शिहर  गया था
आभाषित
प्रतिबिंब देख कर के
चंचलता यह माने कैसे भावावेषित हो करके
जब उनको
कनखियों से देखा
आखिर वह भी झांक रहे थे ।



54.


तुम तो शायद
सीख रहे हो
कोमल पंखों से
इस आसमान में उड़ना
लेकिन मैं तो दर्शन भर से व्यतीत हो गया हूं
शायद तुम को
पता नहीं है
तेरा यह तरसाना । 

अभी अभी तो
प्रखर हो रहा
भाव का संचार
तुम्हारी आंखों में की गहराई में
जिन पर यह कलुषित कठोर मन मुग्ध हो रहा है
पाकर आहट
स्नेहों की 
रोक रहे हो सकुचाना ।

उस
पतझड़ के
आते आते
भूल न जाना
इस बसन्त के आकर्षण को
बस ऐसे ही रो निरखते मन के संकेतों को
धीरे धीरे
सिख जावोगे
कलियों सा मुस्काना ।


55

अब उनके भी
अन्तःकरण मे
झलक रही है
स्नेहों की परछायी
परख रहा हूं भावावेश को संकेतों के आस्वादन से
कुछ दिन तक तो
मैने भी
अवलोकन का दुःख पाया था ।

निरलम्ब ने
अवलम्बन का
सामंजस्य
प्राप्त कर लिया है
फिर उनको अनुभूति नही तो व्यर्थ हो रहा है
क्योंकि उसने
बस भावों तक
स्नेहों का सुख पाया था ।

अब नयनों से
आभाषित कर
स्मृतियों का
महल खड़ा कर रहा हूँ
कहीं हमारे प्रति तो कोई कमी नही रह गयी है
क्योंकि उसने
मेरे दिल को
आकर्षक मे उकसाया था ।

56

स्नेहों की
पराकाष्ठा
सुलझ गई हैं
एक फसल सी तन मे
परन्तु अंकुरित हृदय कणों को सींच रहा हूँ प्रतीक्षा मे
ये आशाएं
ही तो मेरे
पल्लवित दुःख का कारण है ।

सन्नाटों मे
पुनः हो रहा
गुंजन
उदासीनता का
परन्तु चित्र भी बदल रहा है दृष्टिपात पुष्पों से
और क्रमशः
हर पुष्पों तक
बस एक चित्र का निर्धारण है ।

छिपा हुआ है
यह भृम मेरा
फैल गया है
इन पुष्पों के आकर्षण मे
मिला नही अवशर तक अब तक अवलोकन का
आशाएं है
चित्र तुम्हारा
स्नेहों का पारण है ।

            

57.

इन पलकों पर
ये आशाएं
सोच-सोच कर
कि कब आओगे
धीरे धीरे स्मृतियों मे दिवास्वप्न के सन्नाटों में
साहस पाकर
चंद्रकला सी
दो इक दिन में बढ़ जाएगी

किंतु दुखी है
यें आंखें
पूर्णमासी के
इस शशांक में
देख देख कर तेरा चेहरा दिनकर के धूमिल प्रकाश में
हास्य किरण पर
निशा निराशा
दो इक दिन में चढ़ जाएगी

फिर कुछ दिन तक
तांक झाँक मे
रहकर तेरी
स्मृतियों तक
विस्तृत करके सरस् कल्पना पर तैर रहा हूँगा
फिर नयन धूप
इस चेहरे पर
दो इक दिन मे पड़ जाएगी ।

58

और तुम्हारी
इन आंखों में
मछली बनकर
तैर रहा हूं 
उभर सके न  शब्द तुम्हारे इन होठों पर इन आंखों में
और मुझे
अन्यत्र कहीं पर
अपने से  झोंक सके न

निरख निरख कर
इन आँखों को
जला रहा था
एहसासों का दीपक
जिसकी छाया मे बैठा आनन्दित रहता हँ
आते जाते
आस पास पर
ख़ुसी बहाने टोक सके न

आखिर कब तक
और छिपाता
स्नेह अश्रु
इन आँखों मे
छिप न पाता बहुत दिनों से प्रबल हो रहा था
औऱ आज तो
स्मृतियों मे
बह जाने से रोक सके न

59.

इस चेहरे के
क्षणिक भाव मे
खुशियों की छाया
ढूंढ रहे हैं
अभी अंकुरित इस तन मन मे स्वप्नों को प्रसार रहे हो
इस जीवन की
विरह व्यथा का
शायद तुमको पता नही है ।

ठहर गया हूँ
आशाएँ भी
टूट रहीं है
और मनोबल
धीरे धीरे बिफल हो रहा स्मृतियों के अवकुंठन से
प्रेम पथों के
सधन धुंध मे
किसने मन को हता नही है ।

स्वाभाविक है
यह निगरानी
नयनों की नयनों के तह तक
आकर्षण, अनुरागों मे सच क्या कोई परख सका है
निष्फल होना
एक सफलता
यह जीवन की व्यथा नही है ।


60.


नही कह सका
इन अधरों से
स्नेहों के शब्द
तुम्हारी इन आँखों पर
जिनकी परछायी भर ही उर को शीतल कर देती है
तुम भी तो
इक तितली सी
आते जाते इठला जाती ।

अनुभव के
प्रत्येक क्षणों मे
रूप तुम्हारा
इस हृदय मे उभर रहा है
मन के दर्पण मे देख सकूँ ऊँन संकोची नयनों को
संकेतों के
रेखाचित्र को
इन आँखों मे बिठला जाती ।

चुप हूँ क्योंकि
कल्पनाओं मे
होता रहता
भावों का आदान प्रदान
और सुखी हूँ अपने पन मे भावों को ही छेङ छेड़कर
इस मन को
सन्तोष न होता
कहीं अगर तुम झुठला जाती ।

                *****


समस्त रचनाएं Rakmish Sultanpuri द्वारा रचित और प्रकाशित हैं । 
सरसई धूप भाग 6 की रचनाएं भी अवश्य पढ़े ।
______________________________________

सरसई धूप भाग –4

Rakmish Sultanpuri द्वारा रचित एवं प्रकाशित सरसई धूप भाग 4 की रचनाएं 


     31.स्नेहों की इक परछायीं ।
                 28/05/10

इस हृदय पर
अधिकारों से
अमिट छाप
भरते रहते है
प्रियवाक्य से मुस्कानों से भर देते है
तन में
मन में
स्नेहों की इक परछायीं ।1।

वर्षो में
या दो वर्षों में
मुड़ जाते है
पंथ छोड़कर
भौतिकता मे संसर्गो में हो जाते है
बहुत दूर वे
रीति –रिवाजों
से आ जाती धुमिलाई ।2।।

एक स्वप्न की
भाँति तुम्हारी
अनुरागों की
प्रतिक्रिया भी
प्रेमपथों पर कुचल– कुचल कर बढ़ जायेगी
और एक दिन
बज जाएगी
तेरी भी सहनाई ।3।

                   ***

             32. और इसी मे अपना हित है ।।
                            10/06/10

स्वप्नों की
नैसर्गिक'ज्योति'
खींच रही है
मेरे मन को
स्नेहों मे प्रेमपथों की कल्पभूमि वह
नही मिल सकी
और किसी को
और आज तक अपराजित है ।1।

आशायें भी
प्रबल हो रही
जिज्ञाषा तो
अटल ,अडिग है
उसी दृश्य का स्मृतियों तक न आने से
भृमित होकर
आते –जाते
उर मेरा यह सशंकित है ।2।

भौतिकता के
आधारों पर
जीवन का
अस्तित्व है सम्भव
त्याग करूँ मैं किस जीवन का सफल अर्थ में
दो नावों की
सोंच रहा हूं
और इसी में अपना हित है ।3।

          ***


             33.जाने दो फिर और किसी दिन ।
                             15/07/10

आज धरा पर
बहते जल सी
फैल गयी है
मधुमास की यह हरियाली
तन पर तेरे, खींच रही है चंचल मन को।
ठहर– ठहर कर
रुक जाऊँगा
जाने दो फिर और किसी दिन ।1।

अगर हो सके
बौछारों तक
सहते रहना
सघन उमस यह
अभी अभी मन-मोर आस संतृप्त नही है
ह्रदय व्यथा को
कह जाऊँगा
जाने दो फिर और किसी दिन ।।2।।

परिवर्तन की
हवा से तुम पर
प्रतिक्रिया का मनन
उचित हो सकेगा
फिर भी झरती रही प्रेम रश्मि इन आँखों में
अनुरागों को
भर जाऊँगा
जाने दो फिर और किसी दिन ।3।

      ****

                  34. वही पुरानी कविताएँ है ।
                            05/09/10

और अभी भी
पल्लवित होकर
स्मृति पयोधर
तैर रहे है  
भावों के विक्षोभ मण्डल पर द्रवित हो रही
स्मृतियाँ है
अरे नही यह
वही पुरानी घटनाएँ है ।1।

जिसने मन में
अन्तःकरण में
अंकित करके
अविस्मरणीय दृश्य
नवजीवन की आशाओं से, संघर्षो से
दिखा रही है
अरे नही यह
वही पुरानी बाधाएं है ।2।

जो आकर के
सभी पथों पर
सूर्य किरण सी
फैल गयी हैं
गंतव्यों तक धीरे –धीरे बढ़े डगों से बढ़ जाती है
अरे नही यह
किसी और की
वही पुरानी कविताएँ है ।3।

              ****

                    35.दुहराते है अभ्यासों को ।
                            07/10/10

सन्देहों पर
किसने कब तक
ठहराया है
आत्म विजय को
अवलोकन से अनुरागों से सघन रात्रि में
तारों से वे
उभर –उभर कर
ढहते रहते विश्वासों को ।1।

फिर भी मन को
शांति मिली है
बौछारों से
हल्की –हल्की
संकित मन भी भीग –भीग कर ठहर गया है
व्यकुल दृग भी
अवसरगामी
दुहराते है अभ्यासों को ।2।

और हृदय में
रुकती छनकर
आशाओं की
इक दो बूंदे
ढाढ़स बध जाता मन को ,नयनों को, संकेतो को,
तृप्त हो रहे
स्नेहलता के
निरख निरख कर परिहासों को ।3।

                 ***



            36 मुझे पता है तुम्हें पता है।
                          10/10/10

आकर्षण की
सघन वायु में
स्पंदित हो रहे
अधर हैं ।
अरुणोदय की अरुण 'ज्योति के परिवर्तन से
छाया पाकर
उद्दीप्त हो रहे
अधरों पर यह कोमलता है ।1।

उसी नयन की
उसी धार में
जिसमे बहते
अमृत भाव है 
मुझे डुबो दो ,मुझे भिगा दो छणभर भर के 
नयनों को
तुमने देखा है
आख़िर कितनी विह्वलता है ।2।

समृतियों में
बहुत पास है
बड़ी दूर तुम
सन्नाटों में
मै देखू या तुम देखो स्वप्नों का क्या है
मेरी हालत
और तुम्हारी
मुझे पता है तुम्हे पता है ।3।

         ***


              37 रूप तुम्हारा दर्शनीय है ।
                               28/10/10

शायद तुम भी
समझ सके न
संकेतो को
इस हृदय को
आशाओं की छाया मौन खड़ी है रुकी हुई है
कभी न हिलती
कभी न डुलती
चित्रित सी वह चिंतनीय है ।1।

उस गर्मी से
इस सर्दी तक
विचारों की
जो एक परत है
स्नेह दृष्टि से फौव्वारों से धो देता हूं खुद को
निर्मल मन से
आकर्षित तन
छन भर ही पर प्रशंसनीय है ।2।

कैसे कब तक
चला सका हूं 
मन भावों पर
नौकाओं को
लक्ष्यहीन आशायें है इन कुहरों में और धुंध में ,
शशि किरणों के
स्नानों से
रूप तुम्हारा दर्शनीय है ।3।

             *****

               38.और उसी में मुझको सुख था ।
                                 29/10/10

अंधकार में
रुकी हुई थी
अनुरागों की
स्वप्न कथा वो
यही वृक्ष थे, यही फूल थे, यही टहनियाँ
भाव था कोमल
अस्थायी
और उसी में मुझको सुख था  ।1।

दूर –दूर से
कोना –कोना
सजग नयन से
ढूढ रहे थे
इसी धूप में ,इसी छांव की विह्वलता में
मुस्कानों पर
थी परछायीं
और उसी में मुझको सुख था ।2।

कभी कॉपियां
कभी किताबें
आती –जाती
अदल –बदल कर
इन्ही कनेरों की छाया में प्रेमयन्त्र पर
प्रेम चिन्ह का
अवलोकन था
और उसी में मुझको सुख था।3।

        ***


             39.किरण दिख रही है ।
                      19/11/10

उन शब्दों से
दुःखी हो गयी
कोमल मन की
सरस् भावना
सन्देहों के अंधकार मे हल्की– हल्की
तेरे उर में
अनुरागों की
किरण दिख रही है ।1।

आंसू थे
पलको पर फिर भी
अंतर्मन को
व्यथित कर गये
जिस हृदय में अपनेपन से कभी न देखा कभी न झांका
सिर्फ तुम्हारे
चेहरे की
किरण दिख रही है ।2।

संकेतों के
प्रयासों से
उर मे तेरे
विश्रामालय बना लिया है
खोज रहा था वर्षो जिसको दूर –दूर तक
उसी आकृति
उस रेखा की
किरण दिख रही है ।3।।

   ***


                30किसी स्वप्न सा झूठ रहा है ।
                                  29/11/10

और तुम्हें तो
मालुम ही है
सारी भाषा
स्नेहों की
जिससे तुमने इस हृदय पर घाव किया है
भाव भरा है
अनुरागों का
अब अंकुर सा फूट रहा है ।1।

सूनेपन में
कभी स्वप्न में
व्याख्या करके
संकेतो की
विह्वलता की सघन जाल में उलझ गया हूं
सुलझ रहा है
संकेतों बिन
हिमखण्डों सा टूट रहा है ।2।

भय है मुझको
इस हृदय से
क्योकि यह भी
संकेतो से जुड़ा हुआ है
स्पंदन से कही रुध गया ,कही विध गया वह तो
कभी न कहना
कि व्याख्याएँ
किसी स्वप्न सा झूठ रहा है ।3।

                 ****

समस्त रचनाएं Rakmish Sultanpuri द्वारा रचित और प्रकाशित हैं । 
सरसई धूप भाग 5 की रचनाएं भी अवश्य पढ़े ।


     



सरसई धूप भाग –3

Rakmish Sultanpuri द्वारा रचित सरसई धूप भाग–3 


21.तब अतीत में 


तब अतीत में
सजते रहते
वर्षों तक
स्नेहों के अभिनव अंकुर
पवनदूत थे ,मेघदूत थे सांसो के स्पंदन तक
और आज
मिस्कालों तक
बढ़ा हुआ संक्षिप्त हो गया ।

स्मृतिओं के
सुखद क्षणों के
आस्वादन का
समय नही रह गया है
निरंकुशता की एक लहर में भावुकता कुढ़ जाती है
पंथ नही हैं
न अधीर डग
दृश्य भी संतृप्त हो गया ।

बदल रही है
चित्तवृत्तियाँ
जर्जरता में
आशाओं के आधारों पर
स्नेहों के संकीर्ण मार्ग से गंतव्यों तक
व्यभिचारों के
सुविचारों में
बिवस हुआ मन लिप्त हो गया ।


                     ***


22.जिन पौधों के।                  23/04/10

जिन पौधों के
जिन पुष्पों का
संसर्ग प्राप्त करके दोनों
पुनः मिल सके थे
कल ही अनुपस्थिति में तुम्हारे प्रौढ़ हो गयी थी
आज सेवारें
सूनी है फिर
उन फसलों के कट जाने पर ।

नीलगायें भी
प्रबल वेग से
दौड़ रहीं है
इस घाटी से दूर क्षितिज तक
किसी किसान को अब कोई दुःख नही हो रहा है 
शेष निराशा
तृणाग्रो पर
उस सरिता के घट जाने पर। 

उस मयूर का
नर्तन अभिनय
और खगों को निरख –निरख कर
ऊब गया सा हूं
स्मृतिओं के सँग अविद्यमान दृश्य को खोज रहा हूं ।
दुःख में दुःख है,
पुनः अचानक
प्रतिबिम्बों के हट जाने पर ।


                  ***

    23.।प्रेम नही यह पागलपन है ।


ये आँखे तो
तपी हुईं है
देख –देखकर
आकर्षित परछायीं को
हर चेहरे पर ढूंढ़ रहे है वैकल्पित अनुरागो को
ब्यंग्य बोलकर
हँसी ले रहें
प्रेम नही यह छिछलापन है ।

छिछलापन भी
एक रूप है
मन पर
आकर्षण फ़ैलाने का
शब्दों की प्रतिध्वनियों से ही हृदय व्यथित होता है
परन्तु क्षुब्ध
यह मन होता है
प्रेम नही यह अंधापन है ।

अंधापन तो
स्वच्छ प्रमाण है
अनुरागों की
विह्वलता का
मन की आँखों से प्रेमचिन्ह टटकोर सके तो
वह इक भौतिक
तृषा मात्र है ।
प्रेम नही यह पागलपन है ।

                   ***

             24.अब तक अपने मन के ।


और अभी भी
आ जाती हैं तस्वीरे
मेरी यादों में 
छण भर ,
रुक जाते हैं
दुख देते हैं
लम्हें इस जीवन के ।
अब तक अपने मन के ।

चुप रहता हूँ
बहुत देर तक
सोच –सोचकर
घटनाओं को,यादों को 
तभी अचानक
हो जाता शक
जब आती परछाया बनके ।
अब तक अपने मन के ।

इस कुहरे में
पाकर ठण्डक
सिकुड़ गयी हैं
आशाएं स्नेहो की,
काँप रही हैं
ताप रही हैं
चाहत भी अब डर के ।
अब तक अपने मन के ।

सिर्फ तुम्हारे
चुप रहने से
शेष फाँसले बने रह गये
संदेहों में,
काश! कि आते
हम बरसाते
आँसू अपनेपन के ।
अब तक अपने मन के ।

          ***

                25. अब मेरा मन डरा हुआ है।


पतझड के दिन
और धूप में
इन पत्तों सी
टूट रही हैं उम्मीदें
कुछ दिन तक तो हॄदय न माना
परन्तु आज फिर
तन्हा –तन्हा
और दुखों से भरा हुआ है ।
अब मेरा मन डरा हुआ हैं ।

जब तक था मैं 
पास तुम्हारे
तस्वीरें थी छिपी
तुम्हारी आँखों में
आकर्षण था अवलम्बन था मेरे मन में, मेरे दिल में
अब तो केवल
बोझ दुखों का धरा हुआ हैं ।
अब मेरा मन डरा हुआ हैं ।

एक ठूंठ सा
बचा रह गया
सूख रहा दिल
अब आ जाओ
यही फाँसले कम हो जाते तो शायद मैं
पा ही जाता
जीवन अपना
आँखों में तेरी भरा हुआ हैं ।
अब मेरा मन डरा हुआ हैं ।

         ****

                    26.शायद तुमको पता नही है 


जबकि सबने
चेहरा देखा
दिल की हालत
कभी न पूंछी
बिना कहे अनकही बात वह आँखों से तुमनें कह डाली
तेरे दिल की
यह सुन्दरता
शायद तुमको पता नही है ।

न जाने कितने
लोगों ने
अजमाया हैं
मेरे दिल को
और सभी बस मतलब भर का ठहर –ठहर कर चले गये 
पर तेरे मन की
यह कोमलता
शायद तुमको पता नही है ।

कुछ भी हो पर
रूप तुम्हारा
इस दिल में
अब झलक रहा हैं
उन साँसों की खुशबू में, मै अनचाहा पर डूब गया हूँ
तेरे तन की
यह नाजुकता
शायद तुमको पता नही है ।


         ***

                   27.स्नेहों में पागलपन को


चलते-चलते
प्रेमपथों पर
रुक जाता हूँ
असमंजस के कारण 
क्योंकि तस्वीरें वे  आती रहती आहट बनकर यादों की 
और निराशा
देकर झांसा
बगदाती हैं मेरे मन को ।
स्नेहो मे पागलपन को ।

उलझ गया हूं 
एक पथिक सा
और रास्ते भरे हुये हैं
दुबिधाओ से कठिनाई से
और अकेले तन्हा– तन्हा भीग रहा हूँ  मायूसी में,
जब –जब चलता
बहुत अखरता
तकलीफें होती हैं तन को ।
स्नेहो मे पागलपन को ।

बहुत हो चुका
मुझसे धोखा
अब मै तुमसे दूर रहूँगा
दर्द भरा या सुखद रास्ता
चलना तो हैं आज नहीं तो कल पहुचूगा देर –सबेर
मै क्या करता
यदि न सहता
इस अपयश रूपी धन को ।
स्नेहो में पागलपन को ।

                    ***

              28.थोड़ी सी आदत हो जाती ।


और
तभी तक
प्यार पनपता रहता है
एक दूसरे के दिल में
जब तक हमनें कहा नही है ,सुना नही है
बनती जाती
है तस्वीरें
चाहत की आदत हो जाती ।

और
जुबां तक
आते– आते
संदेहों के समाधान तक
हद होते ही निश्चितताये रुक जाती है ढह जाती है उत्सुकताये
आती –जाती
थोड़ी सी राहत हो जाती ।

और अन्त में
गहराई तक
निष्कर्षो तक
ब्याकुलता की तह तक
पहुंच– पहुंच कर फिर मडराती रुस्वाई आ ही जाती बिना बताये,
धीरे –धीरे
जीवन की आहट हो जाती ।

                           ****


         29. जीवन का वह अमृत रस था ।11/05/10
                   

आज शाम की
अति अधीरता
उर को झांकी
दिखा रही है
प्रतीक्षा की घड़ी मिट गयी सम्पर्को से
स्पर्शो से
उभर रहा जो
स्पंदित वह सरस् सरस था ।

प्रबल हो रही
थी इच्छाएँ
मुखरित स्वर के
दब जाने से
पूर्ण हुई रहने की इच्छा संसर्गो में
संकेतो के
अवलम्बन से
खिसक रहा वह एक बरस था ।

प्रस्फुटित हो रहे
उन अधरों पर
स्नेहों के
दृश्यमान कण
जो छिटक रहे थे नभ उडगन से
वही ,ज्योति ,थी
उल्लासों की
जीवन का वह अमृत रस था ।

           ****

          30. विश्वासों की एक कड़ी वह ।
                      25/05/10


अनुरागों की
जटिल सृंखला
तन जायेगी
कड़ी धूप में
जिसने मन को बांध लिया है
धीरे –धीरे
ढल जायेगी एक कड़ी वह ।

कलियों से वह
सरस पंखुड़ी
उस पतझङ में
वृक्षों के पत्ते
स्मृति मार्ग भी उसी तरह से हो जाएगी जर्जर
न दौड़ सकेंगे
मन के वे पर
जब आ जायेगी एक घड़ी वह ।

मिट जायेंगे
सभी झरोंखे
आंखों से ओझल
हो जाने पर
कभी न कभी आशातीत
में झर जायेगी
संकुचित होकर
शुष्क हृदय से
अनुरागों की एक झड़ी वह ।


समस्त रचनाएं Rakmish Sultanpuri द्वारा रचित और प्रकाशित हैं । 
सरसई धूप भाग 4 की रचनाएं भी अवश्य पढ़े ।



       

सरसई धूप भाग –2

सरसई धूप Rakmish Sultanpuri द्वारा रचित  लघु कविताओं का संकलन है ।
सरसई धूप भाग–2

11.विविध दृश्य में।। 08/03/10

विविध दृश्य में
रंग रूप में
आकर्षित
अवलम्बित सा रहता है
हो जाता है किंतु विस्मृत अवलोकन की अधिकता से
रेखांकित हो
एक तुम्हारा
चित्र टँगा सा रह जाता है ।

और निशा में
धुँधले होकर
सभी झरोंखे
छुप जाते है रजनी पट में,
उष्ण हृदयतल पर शशि रश्मि प्रवाह में अविरल
मद्दिम– मद्दिम
रूप तुम्हारा
खिला हुआ सा रह जाता है ।

प्रातःकाल
स्वप्नों से बोझिल
नयनों को
क्या जग रुचता है ?
फिर –फिर कर फिर वही दृश्य फिरते हृदयपटल पर
स्मृतिओं के
गहन गर्त में
अश्रु छुपा सा रह जाता है ।

               ***


12.उर अवशोषित ।।       11/03/10

उर अवशोषित
अनुरागों का
मूल्य कहा
सम्भव जीवन में
जीवन पर प्रतिबंध उचित, अनुचित है भावों पर
यह जीवन भी
एक सम्पति है
कभी समझ पाया क्या तुमने ?

नयन रश्मि से
स्पर्श रहित
ओझल से 
तुम रहते हो
अंधकार फिर फ़ैल रहा है हृदय क्षेत्र पर।
दीपशिखा वह
मन्द हो रही
कभी जलाया जिसको तुमने ?

निरख– निरख कर
मन्द हँसी से
टाल रहे हो
अनदेखा सा
संकेतों में, अनुरागों की धाराओं के प्रवाह को
स्नेहों में
मूक व्यथा है
कभी न जाना जिसको तुमने ?

                     ***


13.शांत और स्थिर।।।          20/03/10

शांत और स्थिर
भावों को
देकर
ख़ामोशी का रंग
मनसद्वंद्व में पुष्पों से ये झुके दृग है स्नेहों  की
बरसातों तक
बरसातों में
भींग रही हो एक लता सी ।

तुम्हें पता क्या 
उस हृदय की
जिस मंदिर पर
छाया तेरी
बनकर आहट खुले द्वार पर छिपी हुई है
नवनिर्मित है
स्नेहों से
झांक रही है कोमलता सी।

कुटिल वार
उन संकेतों के
भर जाते है
विशद विबसता
एक सुगन्ध सी खिली भावना ठहर गयी है
इस चेहरे पर
उभर –उभर कर
खीँच रही मुझको ममता सी ।

                   ***


14.प्रथम मिलन से।।             24/03/10

प्रथम मिलन से
पूर्ण हमारी
आशाओं पर
ज्योति सजी है
भाव त्वरित परिवर्तित होकर स्नेहों में
खिसक कर रहे हैं
हिमनद जैसे 
मन से उर की राहों पर ।

स्नेहों के
उत्कंठा की
स्मृतियों के अवलम्बन से
तृप्ति हो रही है
वही तुम्हारे संसर्गो के क्षण रुके हुए है,
छाया रहता
विह्वल होकर
अन्तःकरण से आहों पर ।

यही तुम्हारी
मुस्काने है
जिसने मन को
घेर लिया है
हर्ष धमनियों में छिपकर झांक रहा है
अभिलाषा की
पूर्ति हुई जब
कल्पित पुष्पित भावों पर ।

                    ***

15.छाया में ।।                 25/03/10


छाया में
आकर रुक जाओ 
क्यों इतना
तुम भार लिये हो ?
क्या तुमको है ग्लानि नही वत्स तुम्हारे कहा गये ?
स्वास्थ्यहीन हो
वयोवृद्ध
फिर जीर्ण तुम्हारा तन है ।

अहम भूमिका
रखता है
जीवन में
कर्तव्यों का भार
पत्नी है बीमार प्रवासी पुत्र हुये है ।
निज कर्मो का
प्राप्त सुफल ही
अपने सुख– दुःख का साधन है ।

सम्बन्धों का
अस्तित्व खो गया
धीरे –धीरे
स्वार्थ और भौतिकता में,
उद्देश्यों की डोर पकड़कर चला आ रहा हूं
शांति मिलेगी
कभी तो मुझको
क्योंकि आशा ही जीवन है ।

                     ***

16.उपज रहे थे।।           26/03/10

उपज रहे थे
मरुस्थल में
स्नेहों के
अभिनव अंकुर
पछुआ पवन से बढ़ी निराशा दूरी से
स्मृतियों से
साहस पाकर 
दुःख दर्दो को घूँट रहा हूं ।

जीवन की
इस पगडंडी पर
स्नेहों का
अवलम्बन था
स्नेहों की वह लाठी अब तो ऊर्ध्वाधर है ।
गतव्यों के
बिमुख भूलकर
इक अंधे सा छूट गया हूं ।

उन लहरों के
उन भवरों के
प्रभावों से
उठती हलचल
बार –बार स्नेहों का जल भिगो रहा है काया
पड़ी दरारें
टुटे हुये से
तटबन्धों सा टूट गया हूं ।

                ***


                मेघों सा ।।।        28/03/10

मेघों सा
छाया रहता है 
स्नेहों का उमड़ाव
तुम्हारे चेहरे के भावों पर
ना जाने फिर भी क्यों तुम शांत रहा रहते हो
इस जीवन में
तन को मन को
विह्वल किया आकर्षित है ।

वाक्यार्थ के
अनुगमनों से
करते रहते हो कोशिश
मेरे उर तक जाने की
जिसमें तस्वीरें हैं तेरी जान रहे हो समझ रहे हो
नयनों की
संकोची जिज्ञासा
विह्वलता से परिचित है ।

फिर क्यों तुमने
जीत लिया है उर
नयन रश्मि के
द्वन्दों से
अब तो अंतिम पहर शाम का हो चला सक्रिय है
फिर जग के
इस अंधकार में
खो जाना तो निश्चित है।

                   ***
18.समृतियों में ।।।       31/03/10 

स्मृतियों में
भेज रहा हूं
बोझिल मन को
क्षणभर स्थिर हो जाता है
भौतिकता से हटकर के सुख की छाया में फिरता है
पा करके वह
एक ज्योति फिर
हो जाता है बिल्कुल शांत ।

विफल बिवशता
में मुड़ जाता
स्वाभाविक
जन –जीवन की इसी त्रासदी में
किसी विकल्प में एक भाव वह नहीं पा रहा है
कहीं मिटे न
रूप तुम्हारा
इस भय से रहता आक्रांत।

यही चांदनी
घर तेरे है
यही चांद मेरे घर पर भी
धीरे-धीरे उतर रहा है
दृग चिन्ह तुम्हारे इसी चांद में अब देखा करता हूं
कभी-कभी तो
सैनों का मंथन
हो जाता है बहुत नितांत।

                  ***

19.उन अधरों पर ।।।       09/04/10

उन अधरों पर
संकोचों से,
संकेतों से,
बह रही स्नेहों की धारा
उसी झील में खोज रहे है ,है कितनी गहराई
एक दूसरे की
आँखों का
बना लिया है दर्पण ।

परन्तु दूर तुम
दुर्लभ दर्शन
आखिर कब तक
दुःखी रहोगें समाजिकता से,
आकर देखो वातावरण के परिधानो पर,
आज रुकी ये
स्मृतियाँ है
है स्नेहों का वर्षण ।

किन्तु अंततः
सुदृढ़ हो गया
स्नेहों के प्रति
आज मनोबल मेरा
रोक सके न तुम भी अपनी अभिलाषा को
अपने सुख को
और दुःखो को
करके मुझको अर्पण ।

                   ***


20.उन्ही दृगों से ।।।                13/04/10

उन्हीं दृगों से
वही दृश्य फिर
लगने लगता
अवलोकन का सुख सर्बश्रेष्ठ है
विह्वलता में और निकटता संकेतो के परिवर्तन से
बढ़ती जाती
सुख की छाया
स्नेहों में संघर्षो तक ।

आते –आते
पतझङ सावन
व्यग्रता की लता
जीर्ण हो गयी है
अवलोकन से वाक सलिल से वाष्पित होकर,
और अचानक
बह जाता है
छुपा हुआ था जो वर्षो तक ।

और अंत में
भौतिकता में
समाजिकता में
दब जाती है भावुकता वह
रीति –रिवाजों की एक परिधि में लुप्त हो रहा है ।
स्मृतियाँ ही
शेष रह गयी
स्नेहों के निष्कर्षों तक ।

****
समस्त रचनाएं  Rakmish Sultanpuri द्वारा रचित  एवं प्रकाशित हैं ।
सरसई धूप भाग–3 भी अवश्य पढ़ें।

सरसई धूप

सरसई धूप Rakmish Sultanpuri द्वारा रचित  लघु कविताओं का संकलन है ।
सरसई धूप भाग–1

1.पुनर्मिलन

पुनर्मिलन
इन आँखों का
तस्वीरों का तस्वीरों से
तृप्त हुयीं
आँखें मुस्काई
शांति मिली है मन में ।

नवाकलन
स्नेहों का
भावों से ,रेखाओं से
चेहरे पर ठहरे दृगपर
संतुष्ठि मिली है तन में ।

हृदयाभरण
स्नेहो में
क्यों छोड़ गये, क्यों दूर रहे ?
मूक हँसी से
रुके अधर ये
पूछ रहें है स्पंदन में ।

×××


2-इस सन्ध्या में ।।   14/02/10

इस सन्ध्या में
प्रबल हो रहे
स्नेहों पर
अवरोध बनी सरसों की लतायें
झलक रहा है
चित्र तुम्हारा
फिर भी धुंधलेपन में ।

सूनेपन में
आहट पाकर
उर गुंजन की
स्नेहभरी साँसों से पुष्पित
अरहर, सरसों
बरसाते पर
झूम –झूमकर अभिनन्दन में।

कभी फूल तो
कभी टहनियां
आ जाती है
मध्य –मध्य में खो जाती हैं
तस्वीरों पर
उलझ रहे दृग
हल्के– हल्के अभिनन्दन में ।

***

3-फिर खेतों में ।।।  14/02/10


फिर खेतों में
प्रकृति आकर
रुकी रह गयी है,
खोल रही है घूँघट को ज्यों
हरियाली पर
फ़ैल गयी है
एक परत यह पीलेपन की ।

यह सन्ध्या जो
रुकी हुई सी
घनी हो रही है
इस विश्राम सैय्या पर रुककर
इंदु किरण संग,
खो जायेगी 
गहराई में धुंधलेपन की ।

स्नेहमयी
आँखों की ‘ज्योति’
दुःखी हो रही है
प्रतीक्षा में खुले रहे दृग
सन्नाटों में
महक आ रही
स्नेहों में अंधेपन की ।

***


4-उस विधवा के ।। 15/02/10

उस विधवा के
कर्णपटल पर
गूँज रही है
पतझङ की आवाज
छूट गयी है, टूट गये मकरन्द पंखुड़ी
बड़ा किया था
जिसको दुःख में
पास –पोषकर स्नेहों से ।

एक अकेली
रोपी थी मैं
एक अकेली
आज शेष हूं
माँ-माँ कहकर छुप जाते तब आँचल में ।
अब तो आते -जाते
देख सदन में
निरख रहें है सदेहों से ।

उजड़ गया
वह एक घोषला
जिसके तृण से
बने महल ये
उस तिनके की छाया में धूप कभी न लग पायी
उम्र ढली
पतझङ क्या आया
अलग हो गये निज गेहो से ।

***


5-अंकित होकर।।  22/07/10

अंकित होकर
सुलभ दृश्य पर
छा जाती है
इस होली में
जीवन के परिपथ पर मौसम के फौव्वारों से
आज तुम्हारे
उसी चित्र पर
सुख– दुःख के दो अंग बने है ।

विकृत हो रही
गीतों की ध्वनि
प्रयासों में
रूखा –रुखा उभरा है स्वर,
शेष नही हैं हृदय स्पर्शी स्नेहीजन
पतझङ में
जीवन के काटें
किन्तु आज भी संग बने है ।

ओशों सी
कण –कण बनकर
गहन नीरसता
छा जाती है
भूतकाल में स्नेहों की स्मृतियों से,
सुख की छाया
छूट गयी है
दुःख परिपथ के अंग बने है ।

***


6.शांत दृगों से ।। 25/02/10

शांत दृगों से
करते रहते
दो क्षण तक
भावों का आदान –प्रदान
वायुमण्डल पर अवलोकन की किरणों से
बन जाता पुल
संकेतों के यान दौड़ते
उर स्पंदन की गति से ।

आ जाते है
चलचित्रों सा
उभर– उभर कर
दृश्य तुम्हारे चहरे के
उत्सुकता में झलक रही है प्रकृति भी आँखों में
उसी कान्ति का
उसी ‘ज्योति का
अनुरागी हूं संगति से ।

परिवर्तित
हो गये झरोखे
बिवसता में
दूर हो गये तुम भी,
दिकसूचक की तरह परन्तु सम्मुख ही रहते हो
स्नेहों की नदियों में
विस्वासों की नाँव
चलाते है कितनी दुर्गति से ।

****


7.संचित मन की ।।  28/02/10

संचित मन की
आशाओं पर
कुहरों की
इक परत जम गयी है
बिछड़ रहे मिलने से पहले अंधेरों में
‘ज्योति" मिली जो
झिलमिल होकर
इक न इक दिन बुझ जायेगी ।

पतझङ में भी
सूखे तरु ये
आँखों के परावर्तन से
रमणीय हो गये है
हर दृश्यों पर रंग तुम्हारी मुस्कानों का,
स्मृति वटों से
समय की बारिस से
इक न इक दिन धुल जायेगी ।

शेष बचेगी
कुछ घटनायें
और तुम्हारी चितवन
जो हृदय में रम गयी है
पास नही क्यों दूर रहे तुम पूछ रही होगी
हृदय से निकल– निकल कर
इन्ही नसों में
इक न इक दिन घुल जायेगी ।

***

8.नयनों की ‘ज्योति ।।27/02/10

नयनों की ज्योति
टहल रही है
अजनबियों सी
झील तटों पर
स्नेह लहर में उलझ गयीं है भींग गयी हैं
आशाओं की
अधिकता में
अभिलाषा की प्रबलता है ।

कभी भवँर में,
कभी कुञ्ज में,
छण दो छण
करती है स्नान ।
बोझिल होकर तस्वीरों से ठहर गयी है
मधुकर को भी
कान्तिमयी
कलियों पर रुकना पड़ता है ।

बड़ी शांति है
सुख की छाया
पलकों पर
सुंदरता भी है
रमणीय हो गयी है प्रकृति भी अवलोकन से
जग दर्पण से
इस गहन कुञ्ज में
स्नेहों की सघनता है ।

***



9.यह लघु सरिता ।।05/03/10

यह लघु सरिता
और खाइयाँ
प्रसुप्त झरोखें
अब प्रफुल्लित नही दिख रहे
वही फसल है , उन फूल पर कीट –पतंगे,
सन्ध्या के
मद्दिम प्रवाह में
आज भी ठहरा है निर्जन ।

प्रज्वलित करके
स्नेह –अग्नि
अन्तःकरण में
आँखों में
दूर –दूर मेघों सा छाकर ढह जाते है
स्मरण तुमको
नही रह गया
वर्षो पहले का गुंजन ।

क्षुब्ध हृदय से
लौट रहा हूं
प्रकृति भी यह
सन्नाटों में हँसी ले रही है
सन्ध्या से अंधकार में खो जाते है शुष्क झरोखे
सम्भव कैसे
हो पाया है
तुममे इतना परिवर्तन ।

***

10.नियंत्रित करता है।। 09/03/10

नियंत्रित करता है
संचार रगों का
स्नेह
तुम्हारी आँखों का,
दुर्लभ शनिध्यों में स्पर्श कर रहा हूं ।
संकेतो से
मधुरिम मन को
जिसका कोई अंत नही है ।

रहता है बस
एक परिधि में
चंचल मन
चक्रवात की वातों सा
नियत वेग से धीरे –धीरे तीव्र हो रहा है
स्थिरता भी
उदासीनता
अब जीवन पर्यंत नही है ।

बढ़ता है
झरता रहता है
स्नेह
कोमल मुखमण्डल से
असंतृप्ति ,संतुष्टि तृप्ति भर रहा है
अब प्रणय निवेदन
हुआ नही तो
मत कहना बसन्त नही है ।

***

सरसई धूप की अन्य रचनाएं "सरसई धूप भाग –2" में पढ़े
नोट– समस्त रचनाएं रकमिश सुल्तानपुरी द्वारा रचित एवं प्रकाशित है ।