संगीता के गीत भाग–2

 संगीता के गीत

            14–गीत

सूरज  सच   का  कब  यार ढला ?

जीता   कब  जग  में  झूठ  भला ?


ये   द्वंद्व    विषमता   छोड़   सखे !

कर  ले  सच  से   गठजोड़  सखे ।

सुख   दुर्लभ   है  पर  लुप्त   नही ।

सुख   से   कोई   भी   तृप्त  नही ।


सुख  आकर   जाता  द्वार  चला ।

जीता   कब  जग  में  झूठ  भला ?


है  स्वार्थ   निहित  रिश्ते  जिनके ।

अफ़सोश  बने   हैं   दो   दिन  के ।

सुन  भाग्य   करेगा  क्या  उनका ?

अवलम्भ जिन्हें  निज सम्बल का ।


वह  दुर्दिन  से  भी  बच  निकला ।

जीता   कब  जग  में  झूठ  भला ?


है  कर्णप्रियम   यह   झूठ   सरल ।

रिसता   तन  में  ज्यों  यार  गरल ।

है सत्य कठिन पर  शख़्त  अटल ।

सँग   यार   खड़ा   रहता  निश्चल ।


कर   हार    गए    दुर्गुण   हमला ।

जीता   कब  जग  में  झूठ  भला ? 


व्यवहार   किये   जो    झूठ  सने ।

समझो  अवनति  के   ग्रास   बने ।

परिवार  सखा  निज  गाँव  सभी ।

मुख  मोड़  न  आते  पास  कभी ।


हर    दाँव    गया   बेकार   चला ।

जीता   कब  जग  में  झूठ  भला ?

जो   लोग   गए  सत्कर्म   समझ ।

खुश हैं सच को निज धर्म समझ ।

दुख   दर्द  न  उनको  ताप  डसे ।

वो   पुष्प   सरीखें   नित  विहँसें ।


तम  झूठ  यहाँ  सच  है  उजला ।

जीता   कब  जग  में  झूठ भला ?


             ✍रकमिश सुल्तानपुरी




              2–चलो प्रेम की ज्योति जलाएं।




बीत न जाये उम्र कर्म बिन, चूक न जाये अवसर

सत्कर्मों से मिला हमें मानव जीवन अति दुष्कर

मानव बनके

तन,मन,धन से

आओ इसको सफ़ल बनाएं ।

चलो प्रेम की ज्योति जलाएं ।


ईश्वर ने उपकार किया मानव जीवन की रचना

वाणी का उपहार भिगोंकर प्रेम सुधा से  रसना

कटुता का

परित्याग करें हम

मानवता   का   पाठ  पढ़ाएं ।

चलो प्रेम की ज्योति जलाएं ।


निर्णय करने की क्षमता केवल मानव ने पाया

इंद्रियों की शक्ति अनूठी सँग में अनुपम  काया

कर्म करें

मानव हितकारी

दुविधाओं को हम सुलझाएं ।

चलो प्रेम की ज्योति जलाएं ।


बड़ा कीमती है यह जीवन क्योंकर व्यर्थ  गवांना

दो दिन का ठहराव यहाँ पर ,छोड़ सभी को जाना

चाहे सुख हो

या दुःख कोई

कर्त्तव्यों को  सदा  निभाएं ।

चलो प्रेम की ज्योति जलाएं ।


प्रेम भक्ति है, प्रेम है पूजा ,प्रेम  एक  उपहार ।

प्रेम भरोसा निज ह्रदय का मात्र एक आधार ।

भौतिकवादी

तृषा छोड़कर

भावों  के  अंकुर  उपजाएँ ।

चलो प्रेम की ज्योति जलाएं ।


                     

           ✍ रकमिश सुल्तानपुरी




              16–आग लगती जा रही है 


चल मनायें फिर वही फ़ीकी दीवाली ।

बस रही है आज मन में रात काली ।

झूठी-मूठी

लौ जलाकर

बात बनती जा रही है ।

आग लगती जा रही है ।।


रंग गिरगिटी हो रहा इंसान का अब ।

है नही चिंता इसे अपमान का अब ।

कन्ठ में

इसके गरल की

झांग बढ़ती जा रही है ।

आग लगती जा रही है ।। 


तम भरे इस विश्व को है जगमगाना ।

एक दीपक निज हृदय का भी जलाना ।

अब बुराई

बेबसी की

रात बढ़ती जा रही है ।

आग लगती जा रही है । 


कौन खुलकर अब चिरागों सा जलेगा ।

ज्योति बनकर विश्व को रोशन करेगा ।

अब कमी

उस आदमी की

आज खलती जा रही है ।

आग लगती जा रही है ।


बन उजाला ,सत्य का प्रमाण कैसा ?

हृदय अंकुर बन सको तो त्राण कैसा ?

आ बुझा दे

लोभ अग्नि

आश चलती जा रही है ।

आग लगती जा रही है ।। 


                         –रकमिश सुल्तानपुरी



               17–सच बतलाने में क्या रखा ।


अफवाहों की डोर छोड़ कर सच की राह दिखाएँ

सम्बन्धों   में  नेह  भरे  मिल  आओ  हँसें  हँसाएँ

जीवन के

अनमोल क्षणों को

व्यर्थ गवांने में क्या रखा ।

सच बतलाने में क्या रखा ।।


धन के मतवालों से पूछो निर्धनता की ताक़त

दुर्भावों को त्याग कर्म कर चढ़ जाता है पर्वत

कठिनाई की

बाहें तोड़े

क्षोभ बढ़ाने में क्या रखा ।

सच बतलाने में क्या रखा ।।


दुःख के गहन तमों को सहकर धर्मो का प्रतिपालन

करता  है  मजदूर  बेचारा  निज  घर  का  संचालन

उसका हक़ तो

उसको दे दो

पाप कमाने में क्या रखा ।

सच बतलाने  में क्या रखा ।।


क्या छोटा क्या बड़ा धनी– निर्धन  की कैसी खाई

मै-मै ,तू-तू जाति धर्म  की ,धन   की  पाई- पाई

छोड़ तुच्छता

असहायों सँग

हाथ बंटाने में क्या रखा ।

सच बतलाने मे क्या रखा ।।


बीज दुःखों के बोकर के क्यों करते सुख की आशा

कर्तव्यों से ही  लिखना  तुम  जीवन  की  परिभाषा

लगा मुखौटा

झुठेपन का

हॄदय दुखाने में क्या रखा ।

सच बतलाने मे क्या रखा ।।


                       ✍रकमिश सुल्तानपुरी




                 18–भारत माता की जय बोलो ।।


देशभक्ति बस एक धर्म हो

मंदिर मस्ज़िद वालों

नर– नारी भारतवासी में

देशप्रेम भर डालो

जाति –पाति का

भेद मिटाकर

मानवता का अमृत घोलो ।

भारत माता की जय बोलो ।।1


धर्म श्रेष्ठ यह देशभक्ति है

कर्म करो तुम देशज

चारोधाम सा फल मिलता है

हो जाता इसमें हज

देश रहेगा

जाति रहेगी

पावनता में मन को धो लो।।

भारतमाता की जय बोलो ।।2


जाति– पाति मे बटा मिला था

देश बड़ी मुश्किल से

बाँट रहे क्यों राजनीति में

वतन हमारा फिर से

आओ मिलकर

करें सामना

राख़ नही अंगारे हो लो ।

भारत माता की जय बोलो ।


तोड़ सभी अनुबन्ध झूठ के

मात्र बनो तुम इंसां

मानवता का पाठ पढ़ो तुम

पावन सत्य अहिंसा

पड़ी हुई है

इस समाज में

कट्टरता की गाँठें खोलो ।

भारत माता की जय बोलो ।।


गाती रहती गीत प्रेम की

कलरव करती गंगा

भरता है हुंकार विश्व में

विजयी विश्व तिरंगा

आओ इसे

प्रणाम करें हम

चरण भारती माँ के छू लो ।

भारत माता की जय बोलो ।


                   ✍रकमिश सुल्तानपुरी




         18–मैंने फूलों सा बनकर देखा



मैंने फूलों सा बनकर देखा

  कलियों की हैरानी ।

कभी धूप में प्यास बुझी न

  कभी था पानी –पानी ।।1


विपिन बीच कंटक से लिपटा

  जितना दुःख सहता था

चले हवाएँ और घना -घन 

  बरसे उर कहता था

पतझड़ ने कुछ कहना चाहा

  मैंने एक न मानी ।

मैंने फूलों सा बनकर देखा

  कलियों की हैरानी ।। 2


ओस पड़ी ठंडक से ठिठुरा

  परिवर्तन न लाया

खिला था खिलकर ही दुनिया में

  लहराया मुस्काया

सहते –सहते हवा का झोंका

  हो गयी और सयानी ।

मैंने फूलों सा बनकर देखा

  कलियों की हैरानी ।।3


ओस झरी सूरज की किरणें 

  आ बैठी मुस्कायी

चिड़ियाँ और चिरंगुन आकर

  पँखों से सहलायी

चली गयी फिर आऊँगी

  यह कहकर तितली रानी ।

मैंने फूलों सा बनकर देखा

  कलियों की हैरानी ।।4


चले गये नभचर,सूरज,

  वर्षा ,समीर का फेरा

आहट पाकर नभ,जल,थल से

  कुहरों ने आकर घेरा

मुझे खबर क्या परिवर्तन की

  मैं पगली ,अंजानी ।

मैंने फूलों सा बनकर देखा

  कलियों की हैरानी ।।5


तभी अचानक किसी मनुज ने

  मुझपर हाथ बढ़ाया

सहम गयी द्रवित हृदय से

  आँखों में जल आया

"आओ तुमको प्यारी के हित

  दूँगा एक निशानी" ।

मैंने फूलों सा बनकर देखा

  कलियों की हैरानी ।।6


बनकर संरक्षक काँटों ने

  अपना धर्म निभाया

पकड़ गात दो खण्ड बना

  वन में दुःख उपजाया

सुलभ पंथ पर दृड़ निश्चय को

  हो गयी और आसानी ।

मैंने फूलों सा बनकर देखा

  कलियों की हैरानी ।। 7


दिया मनुज ने स्वप्न परी को

  खुसी से भर गया दामन

मेरे जीवन की खुशबू का

  बिखर गया था आँगन

धीरे –धीरे होश खो गयी

  मैं हो चली बेगानी ।

मैंने फूलों सा बनकर देखा

  कलियों की हैरानी ।।8


वह सुरभित झोंका पवनों का

  गर्म वायु यह श्वासों की

वह विहगों का कलरव गुंजन

  यह अट्टहास उल्लासो की

प्रेम पथो पर क्यों चढ़ती है

  कलियों की कुर्बानी ।

मैंने फूलों सा बनकर देखा

  कलियों की हैरानी ।।9।





              20–नया वर्ष यह मंगलमय हो ।



नये वर्ष पर स्नेहों का

हो अविरल प्रवाह

सम्बन्धों में बना रहे वह

अपनेपन की चाह

इस जीवन में

तन, मन, धन में

आशाओं  की नव किशलय हो ।।

नया वर्ष यह मंगलमय हो ।।1


दुःख की रजनी ठहर न पाये

चाँद करे रखवाली

सुबह सूर्य खुद लेकर आये

खुशियों की इक थाली

मुस्कानों से

रहे उजाला

जीवन ज्योतिर्मय हो ।।

नया वर्ष यह मंगलमय हो ।।2


जिन राहों पर पड़े कदम

वे हो सतपथ की राहें 

तेरी मंजिल तुम्हें  ढूंढकर

स्वंम पास तक आये

पर हृदय की

सभी चाहतें 

निश्चित हो, निर्भय हो ।।

नया वर्ष यह मंगलमय हो।।3


सरस बने व्यवहार तुम्हारा 

मन के सब सन्देह

भरा मिले सबकी आँखों में

आरोपित स्नेह

प्यार तुम्हारा

न होवे कम

अनुशासन भी तय हो ।।

नया वर्ष यह मंगलमय हो।।4


ख्याति मिले तुमको जीवन में

बना रहे अभिमान 

पूरी हो सारी अभिलाषा

बना रहे सम्मान

समावेश हो

सच्चाई का

कहने का जो भी आशय हो ।।

नया  वर्ष यह मंगलमय हो ।।5


अभिलाषाएं तेरे मन की

पूरी हो सुनियोजित

प्रकृति भी आकरके उसको

करे स्वमं संसोधित

आशाओ में

आये दृढ़ता

हर चाहत संभव हो ।।

नया वर्ष यह मंगलमय हो ।।6


धूप तुम्हारे लिए सुखद हो

शीतल बने समीर

धन, वैभव की वर्षा कर दे

बरसातों का नीर

दुःख की बदली

छट करके सब

सुख के साथ विलय हो ।।

नया  वर्ष यह मंगलमय हो ।।7


सदाचार के आदर्शो का

सदा रहे प्रयाश

और तुम्हारे सतकर्मो का

बन जाये इतिहास

बिना किसी को

व्यथित किये ही

तेरी नेक विजय हो ।।

नया  वर्ष यह मंगलमय हो ।।8


जैसे– जैसे बढे आज से

यह दिन यह तारीख

उसी तरह से खुशियां बढ़कर

आ जाये नजदीक

मन के तेरे

सुविचार में

न कोई शंशय हो ।।

नया  वर्ष यह मंगलमय हो ।।9


नव विचार हो नयी चेतना

नया– नया अधिकार मिले

नये वर्ष पर नव निर्मित सा

प्यार भर संसार मिले

यही प्रार्थना

है ईश्वर से

तेरी सदा विजय हो ।।

नया वर्ष यह मंगलमय हो ।।10


                   *****



                     21–हमको सच की राह दिखाते



            खुद दुनिया को नाच नचाते ।

            हमको सच की राह दिखाते ।।


निजता पर कैसी पाबन्दी

मौलिकता की देखो मंदी

गैंगरेप   के   है   आरोपी

कानूनी   पहने   हैं  टोपी

राजनीति का अलख जगाते ।

हमको सच की राह दिखाते ।।


            फर्जीवाड़ा  एक   शलीफ़ा

            खाते  फ़िर  देते   इस्तीफ़ा

            राजनीति बहुरूपिया मोड़

            जब चाहो कर लो गठजोड़

            जनमत की जो हँसी उड़ाते ।

            हमको सच की राह दिखाते ।।


बढ़ती रही  कमीशन  खोरी

जनता ने फिर खीस निपोरी

अबकी     देगे   पाई  –पाई

कहते    है    मौसेरे    भाई

पेट भरा है फिर  भी  खाते ।

हमको सच की राह दिखाते ।।


            सड़कों के  गड्डों   को   पाटे

            करें बराबर  खुद   के   घाटे

            बहुत तेज  हो  गयी  सफाई

            नदियों   में   मुस्काती  काई

            जो आकर अभियान चलाते ।

            हमको सच की राह दिखाते ।।


ओट मिले गर  कूकर  बाटे

आज   नही   भरते  खर्राटे

नही   रहेगी   जनता   मौन

बदल  गया है  टाइम  ज़ोन

वादा   करके  रोज  भुलाते ।

हमको सच की राह दिखाते ।।


           नेता   अभिनेता  है  थस्टी

           देखो कैसी लहर जीएसटी

           मंहगाई  का  दे   इंजेक्सन

           सन्यासी  करते   प्रोडक्शन

           स्वर्ण भस्म का भोग लगाते ।

           हमको सच की राह दिखाते ।।


अधिकारी गैताल  हो  गये

मौका मिला दलाल हो गये

हर   स्टेप   पे   लेते   घूस

मजबूरों  को    लेते    मूस

कर्तव्यों से विमुख हो जाते ।

हमको सच की राह दिखाते ।।


           बेईमानी  के   नये   फैक्टर

           मिले  दवाई  खात  डॉक्टर

           पकड़ रहें  क्यो  झोलाछाप

           सरकारी    को   लेते   नाप

           जो मरीज को चट कर जाते ।

           हमको सच की राह दिखाते ।।


हुई नकलची बेशक़ शिक्षा

शिक्षक  देते  यहाँ  परीक्षा

आये दिन बन गयी पनौती

डिकटेंशन से मिली बढ़ौती

बच्चों  की   गुमराह  बनाते ।

हमको सच की राह दिखाते ।।


            उठो नागरिक देश  बचाओ

            झूठे मन मत शीश झुकाओ

            चलने मत  दो  जुमलेबाजी

            टोको, मत कर हाँजी –हाँजी

            कठपुतली सा  नाच  नचाते ।

            हमको सच की राह दिखाते ।।


                            ****

             


       22–हमें हिंदुस्तान का सिपाही चाहिए ।

                  




    देश का रखवाला हर राही चाहिए ।

    हमें हिंदुस्तान का सिपाही चाहिए ।।


    जो करे निज देश में शांति का प्रचार

    दृढ़ प्रतिज्ञ हो करे जान  को  निसार

    जो उठाये  दृग तो उठे  नजर  हजार

    तूफ़ां से रुके नही  वो मौसमी  बहार

    आजाद जैसा दोस्त, भगत भाई चाहिए ।

    हमें  हिंदुस्तान  का  सिपाही  चाहिए ।।


    जो करे सदा विफ़ल दुश्मनों के कहर

    जो भरे हुँकार तो काँपने  लगे  शहर

    काफ़िलों को चीरता चल पड़े निरंन्तर

    देश प्रेम के लिये  जिये मरे  उमर भर

    उस अग्रसर की अब अगुवाई चाहिए ।

    हमें  हिंदुस्तान  का  सिपाही  चाहिए ।।


    हौसलें बुलंद हों  जमीं  आसमान  से

    हिफ़ाजत जो करे  देश की ईमान  से

    जीतता हो  जिंदगी जंग के  मैदान से

    आज तो मिलूंगा मैं बस उसी इंसान से

    आजादी की  फिर  से  लड़ाई चाहिए ।

    हमें  हिंदुस्तान  का  सिपाही  चाहिए ।।


    बदल दें हवाएँ रूख़ जिसके नाम  से

    ज़लज़ला उठने लगे  जंग मे एलान से

    वीरता हृदय  में हो न कि  जुबान  से

    अब यही उम्मीद है मुझे उस जवान से

    सिंहनाद कर  उठे  सहनाई  चाहिए ।

    हमें  हिंदुस्तान का  सिपाही चाहिए ।।


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              23–पहले मेरी बात समझिये ।


नीच नीचता छोड़ सके न, करे नीच ही काम ।

बिना बुराई मिथ्या बोले मिलता नही आराम ।

कीमत भाये

दिल छू जाये

जूते की औकात समझिये ।

पहले मेरी बात समझिये ।।1


हुआ स्वार्थी, बना लुटेरा, है दहेज़ का कीड़ा ।

मानवता से खेल रहा, दे समाज  को पीड़ा ।

परम्पराएँ

शीश कटायें

बेटी का आयात समझिए ।।

पहले मेरी बात समझिए ।।2


धर्मयुगों में  अंधायुग बन आया  एक पहेली ।

सच्चाई कब तक ठहरेगी लड़ती एक अकेली ।

समता वाला

भाव निराला

नीची नर की जात समझिए ।।

पहले मेरी बात समझिए ।।3


राजनीति के हर पत्तों पर बैठा है इक काग ।

बड़बोले चंचल पत्तो पर लगा हुआ है दाग़ ।।

चलो मिटाये

झाग उड़ाये

वोटों की खैरात समझिए ।।

पहले मेरी बात समझिए ।।4


प्रेम भाव वह पावनता का उर मे करे निवास ।

प्राणी का प्राणी के ऊपर हो अटूट विश्वास ।।

खुद मिल जाता

ढूढ़ न पाता

ईश्वर की सौगात समझिए ।

पहले मेरी बात समझिए ।।5


झूठा दुश्मन गर्व करे क्यो दुश्मन मृत्यु न टारी ।

लड़ते –लड़ते जीत सका न सारी दुनिया हारी ।।

मानव रूखे

प्रेम के भूखे

बस दिल के जज़्बात समझिए ।

पहले मेरी बात समझिए ।। 6


ढोंगी लम्पट बने हुये है अन्धों मे काना राजा ।

दुराचार के नव निर्माणक है समाज के साजा ।

क़ीमत इनकी

दो इक दिन की

पर हाथी के दाँत समझिये ।

पहले मेरी बात समझिए ।।7


जर्जर है कमजोर यहाँ पर सम्बन्धों की नाव ।

पर विकास की धारा पर जमा रही है पाँव ।

बढ़ती जाती

है सम्पाती

बिना नियम विख्यात समझिये ।

पहले मेरी बात समझिए ।।8


सतपथ की पगडंडी देखो पड़ी है सूनी –सूनी ।

कौन करेगा यहाँ सामना दाँव पेंच कानूनी ।

झूठा भल है

राह सरल है

अंत दुःखद पर्याप्त समझिये ।

पहले मेरी बात समझिए ।। 9


दर्पण की छवि नही कलंकित हैं मन के वर्ताव ।

साफ करो मन उर उपजाओ पावनता का भाव ।

चलेंगे हारे

साथ तुम्हारे

नवयुग की सुरुआत समझिये ।

पहले मेरी बात समझिए ।। 10



                   24–तुम जीते मै हारा



इस जीवन के

अंधकार में

कोई नही सहारा ।

तुम जीते मैं हारा ।।1


वन से लेकर और वनों तक खोज  रहा परछाईं ।

स्वप्नों में भी इन आँखों ने कितना जल बरसायीं ।

शायद तुमको

पता नही है

न मिल सकें दुबारा ।

तुम जीते मैं हारा ।। 2


यही वटों का वृक्ष पुराना यही गहनतम छाया ।

एक तुम्हीं तो न आये ,बाकी सब कुछ आया ।

आता –जाता

आस लगता

दिन भर बारंबारा 

तुम जीते मैं हारा ।।3


अभी– अभी तो इन आँखों में चित्र बना एकाकी ।

धूमिल– धूमिल तस्वीरें है और नही कुछ बाकी ।

न हाँ तुमने

कभी कहा था

न अब तक इनकारा ।

तुम जीते मैं हारा ।।4 ।


तुम तो कहते उचित रूप से सही नही संयोग ।

तुम अनजाने ,मैं अनजाना विफल रहा प्रयोग ।

रुका रहा मैं 

सरकंडे– सा

बीच नदी के धारा ।

तुम जीते में हारा ।।5


नही रह गया थोड़ा रुचिकर अब खुद में मुस्काना ।

अब तो लगता दूभर मुझको जीवन मात्र बिताना ।

यादों में ही

बित जायेगा

मेरा जीवन सारा ।

तुम जीते मैं हारा ।।6


प्रतिबंधित मैं रहा ढूढ़ता दिन भर कानन –कानन ।

परन्तु रात में हो जाता है बोझिल  यह मेरा मन ।

बिना बताये

बिन समझाये

तनिक न मुझे निहारा ।

तुम जीते मैं हारा ।। 7।


पहली कोशिश थी तुमको मैं प्रकृति को दिखलाता ।

पुष्प,'कली को ,खग, हृदय की आहट को समझता ।

परन्तु हाय रे!

नही बना था

कल्पित भाग्य हमारा ।

तुम जीते मैं हारा ।।8 ।


हे अजनबी ! कहाँ थे तुम क्यो आये थे पास ।

शायद अब तुम नही करोगे मिलने का प्रयास ।

सूना– सूना

रह जाता है

भावों का फौव्वारा ।

तुम जीते मैं हारा ।।9।


गाता रहता गीत मनोहर बैठ नदी के कूल ।

वही दृश्य हैं रम्य मनोहर दिखते हैं प्रतिकूल ।

"प्रेम" निरख कर

शान्त प्रकृति में

करता रहा इशारा ।

तुम जीते मैं हारा ।।10 ।


25. बेटी घर की सुंदरता है ।।



ईश्वर की अनुपम रचना है

प्रकृति का उत्तम उपहार 

सतरंगी खुशियों वाली वह

भर देती जीवन में प्यार 

रूप सलोने

बोल तोतली

अमृत रूपी कोमलता है ।

बेटी घर की सुंदरता है ।।1।।



देख तितलियों को इठलाती

रखे जुगनुओं तक की चाह

अपने मन का खेल रचाती

गुड्डे संग गुड़ियों का व्याह

फूलों जैसी

मुस्कानों से

आँगन सदा महकता है ।।

बेटी घर की सुंदरता है ।।2।।

सुख में दुःख में सम व्यवहारी

रचती स्नेहिल परिवेश

माँ की ममता पिता वचन को

कभी न पहुँचाती वह ठेष

दुःख की रजनी

में हर्षाती

सुख में सच्ची सहजता है ।।

बेटी घर की सुंदरता है ।।3।


यह जीवन है एक बगीचा

बेटे है इक सुन्दर फूल

और बेटियां तितली सी है

भर जाती है रँग अनुकूल 

भाग्य लक्ष्मी

बनकर आती

मिटती इनसे निर्धनता है ।

बेटी घर की सुंदरता है ।।4।।


बेटों से कम नही बेटियां

दिन दिन करती नव प्रयास

खेल खेल में हँसती गाती

रचती जाती है इतिहास

रौशन करती

नाम देश का

इन्हें रोकना बर्बरता है ।।

बेटी घर की सुंदरता है ।।5।।


बेटी,पत्नी,बहू ,बहन बन

देती है पुरुषों का साथ ।

माँ बनकर ममता उमड़ाती

करती जीवन का सूत्रपात

हर पथ पर वह

नेह सँजोती

स्वाभिमान है ,निजता है ।।

बेटी घर की सुंदरता है ।। 6।।


बेटी है हर घर की शोभा

करती है शोभित संसार

बहन बिना सूना लगता है

रक्षाबन्धन का त्यौहार

रीति रिवाज़ो

की भरपाई

कैसे कोई करता है ।।

बेटी घर की सुंदरता है ।।7।।


बेटी वांछनीय धन सबका

बेटी है सुदृढ़ स्तम्भ ।

नव स्वर्णिम इस नव समाज का

बेटी ही करती प्रारम्भ

युगों युगों से

नव गेहो में

रोपी जाती एक लता है ।।

बेटी घर की सुंदरता है ।।8।।


अंतरिक्ष हो , पर्वत चोटी

या कोई खेल निराला हो

राजसिंहासन की इच्छा या

चाहे विष का प्याला हो

पी जाती वह

समझ के अमृत

गौरव की जिसे सजगता है ।

बेटी घर की सुंदरता है ।। 9।।


त्याग समर्पण ममता वाली

छोड़ रही अपना परिवार

एक धरोहर पाकर देखो

धनी हुआ पूरा संसार 

पारश पत्थर

शुख प्रदायिनी

हर मानव की निर्भरता है ।

बेटी घर की सुंदरता है ।।10।।


                Rakmish Sultanpuri 


                      

समस्त रचनाएं Rakmish Sultanpuri द्वारा रचित एवं प्रकाशित है। 


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