तेवरी काव्य विधा और रचनाधार
तेवरी भाषा, छंद, अलंकार, मुहावरे, प्रतीक सभी स्तरों पर स्वतंत्रा इयत्ता की स्वामिनी है,
___रमेश राज जी
तेवरी में मुहावरों तथा प्रतीकों का विशेष महत्व है। इन्हीं से तेवरी सप्रमाण है। तेवरी के प्रतीक ऐसे हैं जो जनसमान्य की समझ में तुरन्त आते हैं और उसे वस्तु-स्थिति का ज्ञान करा देते हैं। ये प्रतीक राजनैतिक, नौकरशाही, प्राकृतिक दैनिक व्यवहार सम्बन्धी , वैज्ञानिक तकनीकी ऐतिहासिक व पैराणिक वातावरण सम्बन्धी , खरीद व रोग सम्बन्धी , पशुपक्षी सम्बन्धी तथा अन्य विविध प्रकार के हैं।
+डॉ. कृष्णावतार ‘करुण’, तेवरीपक्ष-जन.-मार्च. 87, पृ. 27 ।
‘‘दरअसल तेवरी नये तेवरों के अनुशीलन की विधा है, जिसमें राग है, लय है और सबसे बड़ी बात इसकी मारक क्षमता है।’’
+श्रीराम मीना,तेवरीपक्ष-जन.मार्च.87,पृ. 20 ।
रकमिश सुल्तानपुरी की तेवरियां
तीन चरण और तेरह मात्राभार पर लिखी गई तेवरी काव्य विधा के उदाहरण
1–
तेवरी । चारो तरफ़ बवाल है ।
भारत माँ की शान का ।
जनता के अपमान का । बुरा हो रहा हाल है ।।
दिशाहीन इस राज में ।
अंधे बने समाज में ।चारों तरफ़ बवाल है ।
प्रेम नही बस स्वार्थ है ।
जन जन का ,चरितार्थ है । हुआ जा रहा काल है ।
सज्जन तरसे भात को ।
करे घोटाला रात को । गुंडे मालामाल है।
रंक गिरा मझधार मे ।
महँगाई की मार में ।काढ़ी उनकी खाल है ।
आतंकी आधार पर ।
होते रहे शिकार पर । छुपे रह गये व्याल है ।
इन्हें फ़िक्र क्या शेष का ।
मोल करेगे देश का । टेड़ी इनकी चाल है ।
देश बन्धु !हर मामला
डटकर करो मुकाबला ।तन मन धन काल है।
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तेवरी–2
मुझे अकेला छोड़ गयी क्यो ?
मेरे दिल को तोड़ गयी क्यों ? तू मेरा हक़दार नही है ।
बचा नही है प्यार का मंजर ।
उजड़ गया है अब मेरा घर । सच मे यह तो प्यार नही है ।
बहुत हो चुका दिल बहलाना ।
जा ग़ैरों की तू हो जाना । दिल इतना बेकार नही है ।
दिल से दिल का फूल खिला है ।
मांगे से कब प्यार मिला है । बिका हुआ किरदार नही है ।
अब मत कर मुझसे अठखेली ।
होगी तू होगी अलबेली । पर तेरा अधिकार नही है ।
दुःख देती नूतन परछायी ।
क्या लौटेगे गम तन्हाई । मिलने का आधार नही है ।
मेरे चक्कर मे मत आना ।
मैन छोड़ दिया मुस्काना । हँसने का आसार नही है ।
तेवरी –3
मानवता के पाठ मे ,
सच्चाई के हाट मे , झूठा मालामाल है ।
पिछलग्गू के यार है ,
कुछ नेता गद्दार है , चले दोगली चाल है ।
बस विकास के नाम से ,
चौराहों पर जाम से , झूठों की हड़ताल है ।
जनता है अफशोस मे ,
सूखा राहत कोष मे , बना हुआ भौकाल है ।
शहर ,घरों ,निज देश मे ,
छिपे अनेको वेश मे , मानवता के काल है ।
एकजुट हो जाइए ,
बहुमत से हरवाइये , पोजीशन ही ढाल है ।
तेज़ करो प्रहार को ,
व्यंग्यों की तलवार को , मोटी इनकी ख़ाल है ।
रकमिश सुल्तानपुरी
तेवरी –4
तिल का ताड बना दिये ,
सच्चाई झुठला दिये , हमको नही सुहात है ।।
करे बुराई आपकी,
रोटी खाये पाप की, ये दुष्टो की जात है ।।
ढोंग और निज स्वाँग मे,
स्वार्थ भरेंगे मांग मे , झूठे सब जज़्बात है ।।
फूल नही वो खार है ,
दोस्त नही गद्दार है, वन बबूल के पात है ।।
हृदय भरा प्रतिशोध से ,
रोम रोम बस क्रोध से , पीली इनकी गात है ।।
दुर्जन को दुत्कार दो ,
सज्जनता को प्यार दो , इनपर फबता लात है ।।
तेवरी –5
राजनीति है झूठ की ।
आँधी आयी लूट की । महिमा अपरंपार है ।।
बदला लो अब ओट का ।
घाव लगे हर चोट का । छुपे हुये गद्दार हैं ।।
हर तबके हर लोग से ।
मोदी के सहयोग से । सबका ही उद्धार है ।।
कालाधन तो काल है ।
पर देश का हि माल है । जन जन का अधिकार है ।।
बात नही अब लात से ।
व्यंग्य नही आघात से । करना अब परहार है ।।
तेवरी–6
ढूंढ निकालो देश में ।
गद्दारी के वेश में । नियम नीति प्रयोग से ।।
करूँ निवेदन मान का ।
वीरों के सम्मान का । हिंदुस्तानी लोग से ।।
बन जन रूप महेश का ।
खुद रक्षक निज देश का । निकल निजी उद्योग से ।।
ताल ठोक ललकारना ।
चुन चुन इनको मारना । नही महज़ संयोग से ।।
सिँहनाद हुंकार कर ।
दुशमन पर प्रहार कर । वैज्ञानिक उपयोग से ।।
भारत माँ ! तू वीर दे ।
बढ़कर सीना चीर दें । जनता के सहयोग से ।।
राजनीति का ध्यान हो ।
छुटकारा आसान हो । आतंकवाद रोग से ।।
तेवरी –7
थोथी बातें ज्ञान की ।
बस अपने सम्मान की । सच का नही निसान है ।।
पर निकले है ठूठ के ।
लुट जाते है लूट के । झूठी उनकी शान है ।।
बिना मांस बिन हाड़ का ।
चलता यहा जुगाड़ का । मेरा देश महान है ।।
बचो स्वयं के दाप से ।
दो डग वाले सांप से । डरा हुआ सम्मान है ।।
पिये हवस रस सोम का ।
चादर ओढ़े मोम का । खुद का वो भगवान है ।।
नर पंछी पशु गात है ।
अधम हो रहा खात है । छिपा हुआ हैवान है ।।
दुर्गुण को संहार दे ।
जन जन को तू प्यार दे । दो दिन का मेहमान है ।।
तेवरी –8
संकेतों का गात का ।
चाल ढाल जजबात का । बदल रहा व्यवहार है ।।
नयनों में तस्वीर से ।
रूठों मत तकदीर से । कह दो मुझसे प्यार है ।।
क्यों डरते हो लाज़ को ।
ढोंगी बने समाज को । नियमो की भरमार है ।।
खुद पर हो विश्वाश तो ।
आ जाओ तुम पास तो । ये आँखे बेजार हैं ।।
सुख दुख उर से तोल के ।
करो प्यार बिन मोल के । हर दिल का अधिकार है ।।
तेवरी–9
कमा रहें पद लोभ का ।
स्वार्थ निजी उपभोग का । अनुपम अनुसन्धान है ।।
ढूढ़ रहे धन हाड़ में ।
दुनिया जाये भाड़ में । शोषण करें गुमान है ।।
अपने पद की ओट में ।
प्रेम पले बस नोट में । थोथी धन की शान है ।।
मूर्त रूप अपमान का ।
झूठी सजी दुकान का । सब फ़ीके पकवान है ।।
आन बान इस ठाठ का ।
पानी पीते घाट का । समता के शैतान हैं ।।
झूठे धब्बे दाग़ को ।
चलो लगा दे आग को । बच जाये इंसान है ।।
रकमिश सुल्तानपुरी