।कवित।रहने दो ।

         ।रहने दो ।। कविता।

सच्चाई पर चलते है हम
  मोह झूठ की साया है ।
मोह के बन्धन सिर्फ दुखो की
  छाया है परछाया है ।।

ये लोग सरलतम भावो को
  अब कहा तवज्जो देते है ।
थोडा सा स्नेह जताकर
  छीन सुखो को लेते है । 

नही मानता उन भावो को
  जिनका कुछ आधार नही ।
इक न इक दिन ढह जायेगे
  फिर किसकी होगी हार नही ।।

लिखे हुए कुछ शब्दों से
  तस्वीर उतर तो जाती है ।
पर दुनिया की देख हकीकत को
  धूमिल सी हो जाती ह

हृदय रूपी इस आँगन में
   जो फसल प्रेम की बोयेगा ।
निश्चित उसको प्यार मिलेगा 
   काँटे कभी न पायेगा ।।

रहने दो मैं बहुत अलग हूँ
  इस दुनिया इन राहो से ।
खाकर ठोकर टूट गया दिल
  आहो और गुनाहो से । ।

कितना भी हम कोशिस कर ले
  जाने या अनजाने में ।
दर्द किसी को मिल ही जाता 
  खुद की ख़ुशी मनाने मे ।।

हम भी सपनो ख्वाबो से
घरौंदे रोज बनाते है ।।
गिरती है दो बूँद अश्क की
हरहाल बिखर ये जाते है ।।

।कविता।खोड़र से ।

          कविता (खोड़र से)

खोड़र
पक्षिओं के घर
गुलाब कणो से लालयित चोंच
खुलते निःसंकोच
कर्णनाद से
दो पल दो क्षण
हवाओ के स्पर्श ,पंछियो के गुंजन से
माँ की आहट से
देखते खोड़र से उचक-उचक ।
गूँजते चीं चीं के स्वर ।।

बादल
उमड़-उमड़
बरसता, टपकती सामने बूँदे
पंजो के बल आँखे मूँदे
सभय पंजो में आपस में
होकर एकीकृत
टहनियोँ के टूटने से, पत्तो की झुनझुनाहट से
बूदों को समझ अनाज कण
दिखते छिपते मुँह खोल निरन्तर ।।
गूँजते चीं चीं के स्वर ।। 

माँ
अधखुली चोंचभर
चिन्ताकुल ममता की निधि, निधि से
बहु प्रकार बहु विधि से
आ पहुँचती गाँवो से
करने के लिये भरण
मंसूर, गेहुओँ के दो-दो छोटे कण
लालिमा युक्त मुखों में
डालती सम्हल-सम्हलकर ।। 
गूँजते चीं -चीं के स्वर ।। 

                          राम केश मिश्र
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