हवा


विधा-गीत

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बुलाये  बिना   ही   मैं   आती  हवा  हूँ ।
वफ़ा  जिंदगी  भर   निभाती  हवा   हूँ ।

समुंदर को छूकर  हिमालय को धोकर 
चली आयी गाँवो  में  शहरों  से  होकर 
लिपट आम पीपल वो नीमों  के तरुवर 
सुहावन सी बहती हूँ निशदिन निरन्तर 
कड़ी  धूप   में   चिलचिलाती  हवा  हूँ ।
वफ़ा  जिंदगी  भर   निभाती  हवा   हूँ ।

सनातन,पुरातन हूँ जीवन  की  वाहक
अबाधित मैं  बहती  धरा से गगन तक
बिना मेरे   जीवन  तो सम्भव  नही है
जहाँ    देखो  मेरी  उपस्थिति  वहीं है
मई  जून   की  तपतपाती    हवा   हूँ ।
वफ़ा  जिंदगी  भर  निभाती  हवा   हूँ ।

सरस हूँ, सहज हूँ, सुलभ हूँ सुकोमल
कभी आँधियाँ  तो  कभी मन्द चंचल 
सयानी  जरा  मस्तमौला  हूँ  नटखट
ठहरती कभी  तो चली  जाती सरपट
मैं  बरसात  की   सनसनाती  हवा  हूँ ।
वफ़ा  जिंदगी  भर   निभाती  हवा  हूँ ।

         -  रकमिश सुल्तानपुरी


एक अंधेरा सा

नवगीत

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एक  अँधेरा 
सा  छा जाता है
परिवर्तित  व्यवहारों  में ।
द्वंद्व  अनेकों  
पलते   देखे,
संवेदनहीन  विचारों  में ।

स्वार्थ लिए
निजता बढ़ती है
लघुता विस्तृत हो जाती
सम्बन्धों  की 
डोर  सुकोमल
टूट  कहीं  पर मुरझाती 
अनबन  चुप्पी 
साधे  बैठी 
नित खुश रहते  परिवारों   में ।

आच्छादित 
सच्चाई की
अनुभूति  नही कर  पाता है
अहसास प्रकृति के
मिट जाते
उर पत्थर  बन जाता है
लोलुपता घुल
जाती है हठकर
मानव  के  संस्कारों  में ।

मन  के चौखट 
पर  विस्तारित
दुर्गुण  पहरा देता है
निर्णय की 
सामर्थ्य तिरोहित 
कर दुख गहरा देता है
मनुज  सदा  
उलझा  रहता है 
निजहित के ही  त्योहारों  में ।

पशु से भी बदतर
वह मानव
जड़ चेतन का भान नही
भाव-विहीन
समाज-विनाशक
है जिसको अनुमान नही
क्या अच्छा है
और बुरा क्या ?
फ़र्क नही कुछ अधिकारों में ।

              --रकमिश सुल्तानपुरी