खोढर
पक्षियों के घर
गुलाब कणों से लालायित चोँच
खुलते निसंकोच
दो पल दो क्षण कर्णनाद से
हवाओं के स्पर्श से गुंजन से
माँ की आहट से
देखते खोढर से उचक-उचक ।।
गूँजते चीँ-चीँ के स्वर ।।1।।
बादल
वरसता टपकती सामने बूँदे
पंजो के बल आँखें मूँदे
सभय पंखों में आपस मे
होकर एकीकृत
टहनियों के टूटने से पत्तों के आहट से
बूँदों को समझ अनाज कण
दिखते छिपते मुह खोल निरन्तर ।।
गूँजते चीँ-चीँ के स्वर ।।2।।
माँ
अधखुले चोंचभर
ममता की निधि निधि से
बहु प्रकार बहु बिधि से
आ पहुंचती गाँवों से
करने के लिये भरण
मंसूर गेहुओ के दो-दो छोटे कण
लालिमायुक्त मुखो मे
डालती सम्हल सम्हलकर ।।
गूँजते चीँ-।चीँ के स्वर ।।3।।
-----------Ram Kesh Mishra
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