।रहने दो ।। कविता।
सच्चाई पर चलते है हम
मोह झूठ की साया है ।
मोह के बन्धन सिर्फ दुखो की
छाया है परछाया है ।।
ये लोग सरलतम भावो को
अब कहा तवज्जो देते है ।
थोडा सा स्नेह जताकर
छीन सुखो को लेते है ।
नही मानता उन भावो को
जिनका कुछ आधार नही ।
इक न इक दिन ढह जायेगे
फिर किसकी होगी हार नही ।।
लिखे हुए कुछ शब्दों से
तस्वीर उतर तो जाती है ।
पर दुनिया की देख हकीकत को
धूमिल सी हो जाती ह
हृदय रूपी इस आँगन में
जो फसल प्रेम की बोयेगा ।
निश्चित उसको प्यार मिलेगा
काँटे कभी न पायेगा ।।
रहने दो मैं बहुत अलग हूँ
इस दुनिया इन राहो से ।
खाकर ठोकर टूट गया दिल
आहो और गुनाहो से । ।
कितना भी हम कोशिस कर ले
जाने या अनजाने में ।
दर्द किसी को मिल ही जाता
खुद की ख़ुशी मनाने मे ।।
हम भी सपनो ख्वाबो से
घरौंदे रोज बनाते है ।।
गिरती है दो बूँद अश्क की
हरहाल बिखर ये जाते है ।।
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