गीत।बस अपनेपन के नाते ।
धूप चढ़ी भट्ठों के ऊपर
दहक रहे अंगारें
कटी अगुंलिया ईंट उठाती
भूख प्यास के मारे
हाथ पैर में
फ़टी बिवाई
धूमिल अधर सुखाते ।
बस अपने पन के नाते ।।
सड़क किनारे गिट्टी ढोती
दुःख से तपे शरीर
साथ दुधमुँहा सिर पर तसले
बहे नयन से नीर
अर्धनग्न
धोती के पहलू
दहते रहे छिपाते ।
बस अपनेपन के नाते ।।
छोटी चींटी सम्हल रही है
ले अनाज का दाना
गिरती रही उलझती क्योंकि
दूर अभी है जाना
लड़ती और
झगड़ती रहती
चलती पता लगाते ।
बस अपनेपन के नाते ।।
स्नेहो में बढ़ी दूरिया
सन्नाटों के ताने
यादों की धुँधली परछायी
आँखे कहा न माने
आहे तपकर
अश्रुकणो में
पलकों पर छा जाते ।
बस अपनेपन के नाते ।।
जंगल में पशु पंछी सारे
सम्बन्धों की नाप
सहते कीड़े और मकोड़े
जीवन का परिताप
दुःख में भी
सुख का अनुभव कर
रहे गीत है गाते ।
बस अपनेपन के नाते ।।
----©राम केश मिश्र
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