एक अंधेरा सा

नवगीत

---------

एक  अँधेरा 
सा  छा जाता है
परिवर्तित  व्यवहारों  में ।
द्वंद्व  अनेकों  
पलते   देखे,
संवेदनहीन  विचारों  में ।

स्वार्थ लिए
निजता बढ़ती है
लघुता विस्तृत हो जाती
सम्बन्धों  की 
डोर  सुकोमल
टूट  कहीं  पर मुरझाती 
अनबन  चुप्पी 
साधे  बैठी 
नित खुश रहते  परिवारों   में ।

आच्छादित 
सच्चाई की
अनुभूति  नही कर  पाता है
अहसास प्रकृति के
मिट जाते
उर पत्थर  बन जाता है
लोलुपता घुल
जाती है हठकर
मानव  के  संस्कारों  में ।

मन  के चौखट 
पर  विस्तारित
दुर्गुण  पहरा देता है
निर्णय की 
सामर्थ्य तिरोहित 
कर दुख गहरा देता है
मनुज  सदा  
उलझा  रहता है 
निजहित के ही  त्योहारों  में ।

पशु से भी बदतर
वह मानव
जड़ चेतन का भान नही
भाव-विहीन
समाज-विनाशक
है जिसको अनुमान नही
क्या अच्छा है
और बुरा क्या ?
फ़र्क नही कुछ अधिकारों में ।

              --रकमिश सुल्तानपुरी


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें