चलो यहां से दूर


कविता
चलो  यहाँ  से  दूर  चले  हम   ढूंढे  स्वर्ग  सुरक्षित ।
यह तो मानव लोक नही है यह है नरक अपरिचित ।

पाल   रहें  है  सम्बन्धों   में  कटुता  की  प्रतिछाया ।
लोग  समझते निज बेटी  को क्योंकर  यहाँ पराया  । 

सारे  रिश्ते  टिके  यहाँ  पर  निजी  स्वार्थ  के  नाते ।
अवसर  पाकर  लोग  गिरगिटी  रंग  बदलते   जाते । 

जाति- पाति के तुच्छ भाव से  लोग यहाँ  है कुंठित ।
यह तो मानव लोक नही है यह है नरक अपरिचित ।

नेता  ,मंत्री , अफ़सर ,  बाबू   चपरासी   तक  भूखे  ।
खाते  जनता  का  हक़ फिर  भी  पेट  भरा न, रुखे  । 

वहसीपन नित  फैल  हृदय  में  अंधकार  भर  देता  ।
सच का  सूरज  अस्त  हो  रहा  झूठा  बना  विजेता  । 

छोड़  निरीहों को  बढ़  जाते  धन-मद  से  आवेशित ।
यह  तो  मानव  लोक नही है यह है नरक अपरिचित ।

भीख   माँगती   है   सज्जनता  दुर्जनता   के  आगे ।
दुर्व्यसनाएँ    प्रौढ़   हो   गईं   मानवता   को  त्यागे । 

अंधे,  बहरे, लूले   ,लंगड़ों   सा   रहता   जनमानस ।
अन्यायों  को  सहकर  जीते  हैं  जीवन को  बरबस । 

क्षण भर मात्र न रोको मुझको यहाँ पवन तक दूषित ।
यह तो मानव लोक नही है यह है  नरक  अपरिचित ।

स्वरचित
रकमिश सुल्तानपुरी
उत्तर प्रदेश

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