परहेज़
1.
प्रेम भक्ति शक्ति दे सुपंथ मातु शारदे ।
भक्त की पुकार सुन कि शब्द -शब्द तार दे ।
भानु सा प्रकाश्यमान दीप्यमान चन्द्र सा ,
भाव को विधान दे कि ज्ञान को आधार दे ।
कल्पना के पंख दे रुझान ,ध्यान लक्ष्य संग ,
बोधगम्यता प्रदान रोम - रोम तार दे ।
शब्द सँग गुँथी चले वो कल्पना सरल,सहज ,
भाव के प्रभाव से तू लेखनी को धार दे ।
अर्थ दृश्यमान हों उकेर शब्द शौष्ठव ,
गल्फ दे नवीनता अलंकरण का भार दे ।
नित्य नव्य नवविधा स्वच्छन्द छंद सन्निहित ,
बुद्धि का विकास कर के सार्थक विचार दे ।
आरती करूँ तेरी विनम्र हंसवाहिनी ,
यूँ कृपा बनी रहे आशीष बार -बार दे ।
02.
सघन दुख के मरुस्थल में रचा सुखधाम देता है ।
दुखी उर को सृजन से वह बड़ा आराम देता है ।
स्वयं के भाव,रस अनुभूतियों को शब्द दे करके ,
वही कवि है जो कविता को सफ़ल आयाम देता है ।
लगाकर यार गोता अनुभवों के क्षीरसागर में ,
पिरोकर भाव निज उर का सफल पैग़ाम देता है ।
लुटाकर फूल सा खुशबू मिटा बैठा ख़ुदी को जो ,
निछावर आत्मा करके नया अभिराम देता है ।
किसी मुनि सा लगाता ध्यान उर की कन्दराओं में ,
झलक भर दिव्य दर्शन का उचित परिणाम देता है ।
अलौकिक कल्पना से वो बनाता लौह को पारस ,
छिपी अभिव्यंजनाओं को नया इक नाम देता है ।
कहीं वो चुन रहा होता नियति की रम्य घटनाएं ,
जहाँ को नित नये भावों का इक इनआम देता है ।
3
जिंदगी की दास्तां की क्या कहूँ मैं हार फिर से ।
वक़्त ने ख़ुशबू उड़ाकर भर दिया है ख़ार फिर से ।
देखकर तस्वीर ख़ुद की आज़कल लगने लगा यूँ ,
खामुसी ने ज्यूँ चलाई हो कोई तलवार फिर से ।
क़त्ल करके रूह का जो छोड़कर जिंदा गया था ,
ढूढ़ने निकला हुआ हूँ मैं वही क़िरदार फिर से ।
उम्रभर हमने बसाई प्यार की जो बस्तियाँ सब ,
आज बेशक़ हो गईं हैं हुस्न की बाज़ार फिर से ।
आज मुझको लग रहा है छोड़कर क़ौमी सियासत ,
देशहित में कर रही है काम कुछ सरकार फिर से ।
बेवज़ह तुम आँकते हो वज़्न इस दिल के सितमगर ,
इश्क़ के ग़म में तपा दिल हो गया अंगार फिर से ।
खैर ! रकमिश तू बता किसकी तरफ़दारी करूँ मैं ,
दे रहें मुझको सुकूँ ये दर्द के अशरार फिर से ।
4.
दुश्मनी चल रही है दर्द से पुरानी अपनी ।
नज़्र पुरनम,जुबां चुप है कि,आँख गीली अपनी ।
कातिलों में नुमाया वक़्त भी तो सामिल निकला ,
क़िस्मतें रूठ बैठी हैं गुमाँ की मारी अपनी ।
साज़िशें प्यार की हर बार सित्म ढायी मुझपर ,
काँच के टूटते टुकड़ों सी उम्र गुजरी अपनी ।
गर्दिशे - वक़्त में ख़ैरात कहाँ देता किसको ,
ख़ुशनुमा ख़्याल से थी रोज़ ज़ेब ख़ाली अपनी ।
इश्क़ ने ज़िन्दगी को बार -बार मोड़ा इतना ,
उम्र भर मंजिलों से थी क़रीब दूरी अपनी ।
छोड़कर साहिलों पर दोस्त जब गये थे मुझको ,
किश्तियाँ हो गयीं बर्बाद पानी -पानी अपनी ।
आज़माता रहा खंज़र से ये जमाना "रकमिश' ,
रास आयी नही इसको ज़रा नबाबी अपनी ।
5.
आँसू लिखना ख़ंजर लिखना ।
दिल को यार सितमगर लिखना ।
सुनो प्यार में दिल टूटे तो ,
बेशक़ तन्हा मंज़र लिखना ।
ज़ुल्फ़ें , आँखें और लबों पर ,
बनकर एक सुख़नवर लिखना ।
मुश्किल होता यार बहुत ही ,
पत्थर से पत्थर पर लिखना ।
नाज़ुक ख़्वाबों की दस्तक़ से ,
दिल में उपजे आख़र लिखना ।
लिख देना जज़्बात दिलों के ,
दरिया, झीलें सागर लिखना ।
झूठा रकमिश झूठ लिखे पर ,
सच्चाई तुम अक्सर लिखना ।
06.
जिन्होंने आबरू बेची भरी बाज़ार में कल ही ।
वही बन राहनुमा बैठे नये क़िरदार में कल ही ।
मेरा तू खून कर दे और मैं बैठा रहूँ चुप तो,
बनेगी न्यूज़ जा करके किसी अखबार में कल ही ।
चलो मैं माफ़ भी कर दूँ ख़ुदा से क्या कहोगे तुम ?
मुक़दमा जब चलेगा इश्क़ के दरबार में कल ही ।
गनीमत है अभी साहिल पे ठहरे हो मजे ले लो ,
वगरना डूब जाओगे कहीं मझधार में कल ही ।
कोई महिला पुरुष को छेड़ दे कुछ भी नही होता ,
पुरुष जो छेड़ बैठे तो हो कारागार में कल ही ।
पिघल जाएगा मालुम है तेरे नफ़रत का ये पत्थर ,
बदल जाएगी ये हरक़त यक़ीनन प्यार में कल ही ।
ख़ुदी को सेफ़ मत समझो मुहब्बत में मेरे रकमिश',
तेरे दिल का लहू होगा किसी तलवार में कल ही ।
07.
देख दिल पर ज़ख्म गहरा हसरतों ने ख़त लिखा ।
आज फिर मुझको मेरी तन्हाइयों ने ख़त लिखा ।
उम्र गुज़री तड़पती यूँ करवटों में रात भर ,
दर्द से हो रूबरू अंगड़ाइयों ने ख़त लिखा ।
दिन तो जैसे -तैसे गुजरा शाम की ख़्वाहिश लिए ,
रात भर आँखों से बहकर आँसुओं ने ख़त लिखा ।
आजकल यादों में चलती हैं तेरी किरदारियाँ ,
देखकर तस्वीर तेरी हरक़तों ने ख़त लिखा ।
दफ़्न है सीने में कितने खार ,खंज़र और ख़ुशबू ,
जिंदगी को लूटकर बर्बादियों ने ख़त लिखा ।
इश्क़ की इस आग़ में तो सिर्फ़ बचता है धुआँ ,
ज़ख्म खाई रूह की परछाइयों ने ख़त लिखा ।
है जुबां पर नाम 'रकमिश' हो रहे पर लफ़्ज़ चुप ,
दिल के कागज़ पे तेरी ख़ामोशियों ने ख़त लिखा ।
08.
ज़िन्दगी यूँ धुआँ बनके उड़ती रही ।
आग़ जलती रही ख़ाक बनती रही ।
उम्र से हार ख़ुद को हवाले किया ,
मौत को ज़िन्दगी रोज छलती रही ।
मौत ने वक़्त पर जब शिकंजा कसा ,
आह घुटती रही सांस थमती रही ।
मौत आयी कि जैसे तमाशा हुआ ,
मौन हो करके जब लाश जलती रही ।
छूट अपने पराये गए सब यहाँ ,
चुप जुबां थी मग़र आँख कहती रही ।
चार दिन की महज़ जिंदगी स्वप्न थी ,
ख्वामख्वाह ही हक़ीक़त से डरती रही ।
हस्र 'रकमिश' सभी का यही एक दिन ,
मौत किसकी कहाँ यार टलती रही ।
09.
मुसाफ़िर हूँ मुहब्बत का कोई रहबर नही हूँ मैं ।
मुझे तू माफ़ कर देना तेरा दिलवर नही हूँ मैं ।
यक़ीनन खूबसूरत हो मग़र नफ़रत से मत देखो ,
लगा जो आपके पैरों में वो ठोकर नही हूँ मैं ।
चला आऊंगा दिल तक तो परेशा आप मत होना ,
ज़िगर को चीर बैठे वो कोई खंज़र नही हूँ मैं ।
ज़रा से हादसों में टूटकर जो चूर हो जाये ,
वो तेरे इश्क़ की बुनियाद का पत्थर नही हूँ मैं ।
मुहब्बत में गुनाहों की दलीलें आपकी सुनकर ,
चला जाऊँगा मयख़ाने कोई पैकर नही हूँ मैं ।
तू न कर राह में पाकर दिलों के कर बन्द दरवाज़े ,
किराये का सही बेशक़ मग़र बेघर नही हूँ मैं ।
महज़ अल्फ़ाज़ दिल के ही पिरोना शौक़ है रकमिश ,
मुहब्बत में जफ़ा खाया कोई शायर नही हूँ मैं ।
10
थे ग़लत हम यार ख़ुद तो मुखबिरों को क्या कहें ।
जब हवा से डर गए तो आँधियों को क्या कहें ।
बालुओं की ढेर पर फिसली हमेशा ज़िन्दगी ,
खुरदुरे चुभते रहें इन पत्थरों को क्या कहें ।
वक़्त के हर पैंतरे को जीत में बदला मग़र ,
इश्क़ ने उलझा दिया इन चुप्पियों की क्या कहें ।
हारना था, रह गए पर जीत का लेकर वहम ,
टिमटिमाते रात भर उन जुगनुओं को क्या कहें ।
टूट कर पत्ता शज़र से फिर न वापस आ सका ,
राह तकती रह गईं उन डालियों की क्या कहें ।
ख़ुद पे गुज़री हो तो मालुम हो जुदाई की तड़प ,
टूटे दिल पर ज़ख्म करती फब्तियों की क्या कहें ।
रूह की इक चाल रकमिश' इश्क़ में जायज़ मग़र ,
यार किरदारों पे खेली बाजियों की क्या कहें ।
ग़ज़ल no–11
मोम था मगर जो यार मोम सा गला नही ।
इश्क़ के कमाल का पता उसे चला नही ।
उम्र ढल गयी यहाँ ढला ज़रूर जिस्म पर ,
आफ़ताब आशिक़ी का आजतक ढला नही ।
पाक दिल न हो तो लोग बोलते इरादतन ,
झूठ बोलना कोई ज़बान की कला नही ।
क़द्र हो जिसे नही ईमान की , ज़ुबान की ,
शानदार है मग़र वो आदमी भला नही ।
सच कहूँ दिमाक से ख़याल तुम निकाल दो ,
इश्क ने हता जिसे सुराग़ तक मिला नही ।
आपके हुनर से यार आपका वजूद है ,
रंग रूप जाति का ज़रा मुआमला नही ।
जिंदगी जियो या दोस्त वक़्त यूँ गुजार दो ,
वक़्त ने तो आज़तक मौत को छला नही ।
ग़ज़ल no–12
आँधियों से लड़ गया तूफान खोजता रहा ।
हौसलों के पंख से उड़ान खोजता रहा ।
कुछ दुरूह है नही कभी 'प्रगल्भ' के लिए ,
नित नवीन ढंग से निदान खोजता रहा ।
नापता जो जा रहा है सूर्य चंद्रमा सकल ,
सोंच से परे नया जहान खोजता रहा ।
आचरण से ,कर्म से जो दे रहा उदाहरण ,
आदमी महान है महान खोजता रहा ।
कर्मवीर शूरवीर धैर्य सत्यता लिए ,
आदि से अनादि तक विहान खोजता रहा ।
सिद्ध ,सिद्धि वृद्धि से प्रयोग योग बोध से ,
दुर्दिनों में शोध का रुझान खोजता रहा ।
सत्य के समास से वो छोड़ रूढ़िवादिता ,
रीति- प्रीति -नीति में ईमान खोजता रहा ।
ग़ज़ल no–13
इश्क़ में फ़िर बेवफाई का सिला अच्छा नही ।
तोड़ कर दिल आपने जो भी किया अच्छा नही ।
मानता हूँ गलतियां मुझसे हुई होंगी बहुत ,
सुन मग़र दिल तोड़ने का फ़ैसला अच्छा नही ।
एक हद तक चाहिए ग़र चाहना है आपको ,
हद से ज़्यादा इश्क़ का भी तो नशा अच्छा नही ।
खूबसूरत हो मग़र तुम एक पर्दा डाल लो ,
हर नजऱ से हुस्न का यूँ सामना अच्छा नही ।
घाव कर देगा दिलों में प्यार से यूँ देखना ,
हर किसी को प्यार से यूँ देखना अच्छा नही ।
आज़कल करने लगा है बात ख़ुद जज़्बात की ,
आपके घर का निकम्मा आईना अच्छा नही ।
दर्दोगम से हार "रकमिश' भूल न जाये कहीं ,
इश्क़ में मसलन सितमग़र फासला अच्छा नही ।
ग़ज़ल no–14
हो गया है चांद ओझल देख करके रात काली ।
प्यार का दीपक जलाने आ गयी फिर से दिवाली ।
छोड़ नभ को सब सितारे अब धरा पर छा रहे हैं ,
रौनकों से हो गया है आसमां का हाथ खाली ।
टिमटिमाते जल रही है दीपमालाएं धरा पर ,
लग रहा हैं जुगनुओं ने इक नई टोली बना ली ।
आज फुलझड़ियां पटाखे शोर करते है गगन तक ,
दीपकों से भव्य सुंदर लग रही धरती निराली ।
देवताओं का घरों में हो रहा है भव्य पूजन ,
दीपमालाओं ने खुद को रोशनी से ही सजा ली ।
झिलमिलाती छाँव ठहरी गीत गाती हैं दिशाएँ ,
चुप्पियों ने मौन तोड़ा मौन करता है जुगाली ।
जल रहा है द्वेष रकमिश पल रही संवेदनायें ,
हर्षध्वनि की गूँज सुनकर दे रहे है लोग ताली ।
ग़ज़ल no–15
फ़र्क पड़ता है बहुत गमख़्वार होने पर ।
ज़िन्दगी जन्नत सी लगती प्यार होने पर ।
बारिशें होती तो कहते क्या भला नेता ,
जब घरौंदे ढह गये बौछार होने पर ।
वक़्त रहते ऐब को भरसक छुपाते है ,
सोंचते है तीर का तलवार होने पर ।
छोड़कर जज़्बात बस क़ीमत लगाते सब ,
बेबसी में हुस्न के बाज़ार होने पर ।
साहिलों पर डगमगाते लोग जो उनके ,
चांस बचने के नही मझधार होने पर ।
भुखमरी का जब ये रोना रो गयी जनता ,
फायदा क्या काग़जी सरकार होने पर ।
इश्क़ में पत्थर पिघल जाते यहां 'रकमिश ,
मोम की औक़ात क्या अंगार होने पर ।
ग़ज़ल no–16
उम्र भर विकास की वो राह देखता रहा ।
आदमी ग़रीब था निबाह देखता रहा ।
बारिशों की आँधियों में ढह गया मकान तो,
टपकती रसोईयों में छाँह देखता रहा ।
रौनकें समेट घर की बेटियाँ विदा हुईं ,
आँसुओ की धार से निक़ाह देखता रहा ।
रुपयों की बेबसी में सूखती रही फ़सल ,
आसमान को किये निगाह देखता रहा ।
ख्वाहिशें अधूरी रह गयी हैं नाममात्र की ,
सच पे चल के झूठ का गुनाह देखता रहा ।
भूख की चपेट में लगा जो कर्ज़ लीलने ,
बौखला के दर बदर पनाह देखता रहा ।
टूटता पहुँच गया वो आख़िरी पड़ाव पर ,
ज़िन्दगी से मौत की सलाह देखता रहा ।
ग़ज़ल no–17
ज़िन्दगी काग़जी हो गयी ।
आरजू इक नदी हो गयी ।
बात होती रही और अब ,
आपसे दोस्ती हो गयी ।
आप आये जो दिल में मेरे ,
सच कहूँ रोशनी हो गयी ।
तोड़ी आहों ने ख़ामोशियाँ ,
ख़्वामख्वाह शाइरी हो गयी ।
इस क़दर यार टूटा है दिल ,
इश्क़ से बेरुखी हो गयी ।
रूह को यूँ मिली गश्तियाँ ,
दर्द से दिल्लगी हो गयी ।
झूठ रकमिश तू सुनता रहा ,
सच से क्यों किरकिरी हो गयी ।
ग़ज़ल no–18
मामले सब सलट गए होते ।
काश ! सच से पलट गए होते ।
जाग जाती ये सोई जनता तो ,
तख़्त कब के पलट गए होते ।
सख़्त होती ज़रा सियासत तो,
होल सड़को के पट गए होते ।
बंदिशें वाहनों पे होती तो ,
दाम डीजल के घट गए होते ।
वक़्त से दुश्मनी रही वरना ,
काम सारे निपट गए होते ।
झूठ होता रहा सही वरना ,
शर्म से हम तो कट गए होते ।
इश्क़ रकमिश तुम्हें मिला होता,
ग़र इबादत से डट गए होते ।
ग़ज़ल no–19
न रोको राह में उनको सजी महफ़िल में आने दो ।
उन्हें भी तो मुहब्बत में कोई वादा निभाने दो ।
ये महफ़िल कह रही उनको निहायत खूबसूरत हैं ,
चलो हम देख लें चेहरा उन्हें परदा उठाने दो ।
जिन्होंने शौक़ पाला था दिलों को तोड़ देने का ,
ज़िगर उनका भी टूटा तो हमें भी मुस्कुराने दो ।
ज़माने को पता क्या है मेरे क़िरदार की क़ीमत ,
मग़र क़ीमत मेरे दिल की लगाते हैं लगाने दो ।
ये रोयेंगे बुढ़ापे में जो उलझे हैं अदाओं में ,
अभी बहकी जवानी है हसीनों पर लुटाने दो ।
मेरे दिल पे जो आज़माते मुझी से माँगकर ख़ंजर ,
हक़ीकत तो नज़र आये उन्हें ख़ंजर चुभाने दो ।
मुझे काटें चुभे सहता रहा मैं आज तक रकमिश",
जरा पत्थर के ज़ख्मों को उन्हें भी आजमाने दो ।
ग़ज़ल no–20
ज़िन्दगी यूँ धुआँ बनके उड़ती रही ।
आग़ जलती रही ख़ाक बनती रही ।
उम्र से हार ख़ुद को हवाले किया ,
मौत को ज़िन्दगी रोज छलती रही ।
मौत ने वक़्त पर जब शिकंजा कसा ,
आह घुटती रही सांस थमती रही ।
मौत आयी कि जैसे तमाशा हुआ ,
मौन हो करके जब लाश जलती रही ।
छूट अपने पराये गए सब यहाँ ,
चुप जुबां थी मग़र आँख कहती रही ।
चार दिन की महज़ जिंदगी स्वप्न थी ,
ख़्वाब में खो हक़ीक़त से डरती रही ।
हस्र रकमिश सभी का यही एक दिन ,
मौत किसकी कहाँ यार टलती रही ।
Rakmish Sultanpuri
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