परहेज़ भाग -4

 ग़ज़ल –41


ताज़ा -तरीन  होगा  कुछ  प्यार छुवन  से ।
आख़िर  में तुम्हें क्यों है इनकार छुवन से ?

ख़ामोश लवो का  क्या आँखे  तो हसीं हैं ,
ज़ुल्फों  की  घटा  होगी तैयार  छुवन  से ।

हर   बार   वही  कस्मे  हर  बार  बहाना ,
कब होगा ख़्वाब मेरा  साकार  छुवन  से ।

चल छोड़ यार  करना बातें वो  रूह  की ,
आ  हुश्न  तपा  कर  लें  अंगार  छुवन से ।

वो सलवटों  की रातें वो  सर्द  कश्मकश ,
हो जाय  रफ़ूचक्कर  दिलदार  छुवन  से ।

यूँ   उम्र   गवाँ   बैठोगे   यार  अग़र  तुम ,
इल्ज़ाम  किसे   दोगे   बेकार  छुवन  से ?

ज़िद छोड़ आ तू रकमिश गाते है  तरन्नुम ,
निखरेगा  हुस्न ,तेरा   क़िरदार  छुवन  से ।

                   –रकमिश सुल्तानपुरी

ग़ज़ल –42



गमख़्वार  रही क़िस्मत  इल्ज़ाम तुम्हें  क्या दूँ ।
सुन  यार   मुहब्बत  का  पैग़ाम तुम्हें  क्या दूँ ।

टूटा  है   तेरा  दिल  तो   दिल  टूट गया  मेरा ,
बेकार  रहा   ख़ुद  का  अंजाम  तुम्हें  क्या दूँ ।

जा पूछ  किसी से ले  तू  हाल  ग़मे दिल का ,
क़िरदार   रहा  मेरा   बदनाम   तुम्हें  क्या  दूँ ।

बस  याद  मुअन्सर है  रातों में  चुभन  रहती ,
दर्दों में  सिमटती है  हर  शाम  तुम्हें  क्या  दूँ ।

गिरने दे  ज़रा ऑंसू ढहने  दे  ज़रा  ख़्वाहिश ,
जलने  दे  ज़र्रा ज़र्रा  गुलफ़ाम  तुम्हें  क्या दूँ ।

ऐ दोस्त ! मुहब्बत में  हर   बार जफ़ा  पाया ,
ईनाम  मिला  ग़म  का  ईनाम  तुम्हें  क्या दूँ ।

मत देख मेरे रकमिश' होठों की  हँसी  झूठी ,
मिलता न मुझे ग़म से आराम  तुम्हें  क्या  दूँ । 

                        –रकमिश सुल्तानपुरी 

ग़ज़ल –43.


दिल तोड़  दिया  मेरा दिल  यार  नही  देखा ।
जज़्बात  नही   समझे  क़िरदार  नही  देखा ।

सुन तेरी  मुहब्बत की  थी यार  ख़बर  झूठी ,
लगता है  अभी तुमने  अख़बार  नही  देखा ।

है यार  ख़बर उनको क्या पाक मुहब्बत की ,
जिसने भी  मुहब्बत में  गमख़्वार नही देखा ।

डूबा था  सफ़ीना  तो  डूबेगा  सफ़ीना  फ़िर ,
किस्मत  के भरम जिसने पतवार नही देखा ।

दिल हार  यहाँ  बैठा लहरों से  डरा  जो भी ,
साहिल से चला आया   मझधार नही  देखा ।

ले डूब गया फिरसे  ख्वाबों की बसी दुनियाँ ,
तन्हा   सा  कभी  मेंने  हक़दार  नही  देखा ।

गलियों में जहाँ तेरा दिल यार बिका रकमिश, 
कल यार  वहीं  दिल  का बाज़ार नही देखा ।


                         –रकमिश सुल्तानपुरी 


ग़ज़ल –44

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मालुम  नही  दिल की  क़दर , तुन्हें  क्या ।
जलने  दे  ख्वाबों  का  शहर  ,तुम्हें  क्या ।

तुम  ज़रा  सा   मुस्कुराए  और  चले  गये,
अब  ढूढती  है  तुमको  नजऱ ,तुम्हें क्या ।

कल  से  ठहरी  है  यहां  रूह में  उलझन ,
है  दिल   पर  पुरजोर  असर  ,तुम्हें क्या ।

तेरे   चेहरे  पे  तस्वीर  अभी  थी  उलझी ,
तेरे नफ़रत से  जला है शज़र, तुन्हें  क्या ।

रुस्वा  ख़ुद  को मत कर भुला दे मुझको ,
ये  ऑंसू   हैं   बहेंगे   मग़र , तुम्हें   क्या । 

आज तन्हा है  दिल ख़ैर,कोई  बात नही ,
ये वक्त  भी   जाएगा  गुज़र,  तुम्हें  क्या ।

टूट   कर   राहों   पे   चला  हूँ  रकमिश ,
तन्हा   कट  जाएगा  सफ़र , तुम्हें  क्या ।

                – रकमिश सुल्तानपुरी


ग़ज़ल –45.


वक़्त  की    उड़ान   है ।
इश्क़      बेजुबान    है ।

ख़्वाब  का  मकान  है ।
उम्र   का    रुझान   है ।

ज़ख्म  इश्क़  में  मिले ,
आज  भी   निसान  है ।

इश्क़ जिस्म से  अलग ,
हुस्न   की   दुकान   है ।

इश्क़  में   टिका   नही ,
वो    जिसे  गुमान   है ।

इश्क़ पाक तब  तलक ,
जब  तलक  ईमान  है ।

सोचिएगा   आप   पर ,
कौन     मेहरबान    है । 


   –Rakmish Sultanpuri 


ग़ज़ल–46.


धूप  से  ख़ुद  को  सम्हाले  धूप में ।
चल   रहे   हैं  हुस्नवाले   धूप   में ।

सुर्ख़  मौसम है भला तो क्या हुआ ,
आ  ज़रा  नजरें  मिला  ले धूप  में ।

आपकी  चर्चा  भला हम क्या करें ,
आपके   किस्से   निराले  धूप   में ।

आप  जैसी है  मेरी क़िस्मत  कहाँ ,
आप   करते   है   उजाले  धूप  में ।

कीमतें  जिसने न समझी वक्त की ,
छिन  गए  उनके  निवाले  धूप  में ।

है ज़रूरत  आपको अब  छाँव की ,
हो   गए   हैं  आप  काले  धूप  में ।

वक़्त से'रकमिश' उन्हें रौंदा  बहुत ,
जो थे किस्मत  के  हवाले  धूप में ।

            –रकमिश सुल्तानपुरी


ग़ज़ल –47


प्यार की  बतकही  रही अब  तक ।
दोस्ती अपनी निभी रही अब तक ।

मिट   गया    वो  ग़ुरूर   तेरा  भी ,
जिसके दम तू चली रही अब तक ।

कौन   कहता  है   मौत ने  बख्शा ,
जेब  जिसकी  भरी रही अब तक ।

जिंदगी    दर्द   में    रही   उलझी ,
साहिलों पर रुकी  रही अब  तक ।

वक़्त का क्या हिसाब  दूँ  तुमको ,
वक़्त से  ही  ठनी  रही  अब तक ।

ज़ोर    मैंने    बहुत   लगाया  पर ,
क़िस्मतों  की चली रही अब तक । 

ख़ैर तुमसे खुशी  मिली ' रकमिश ,
रूह  तुमसे  जुड़ी  रही  अब तक ।

        –   Rakmish Sultanpuri

        
ग़ज़ल –48.


सच   का  साथ  निभाना होगा ।
हर   मुश्किल  अजमाना  होगा ।

राह  कठिन  होगी  पर सुन लो ,
तुमको   मंज़िल    पाना  होगा ।

सुख दुख  रुक रुक  बारी बारी ,
आयेंगे        टकराना      होगा ।

आँसू   भर   आँखों  में  तुमको ,
दुख  में  भी   मुस्काना    होगा ।

दर्द    उठेगा    जितना    गहरा ,
उतना    घाव     पुराना   होगा ।

झूठ  लड़े  तो   लड़  जाना पर ,
ख़ुद   को  यार   बचाना  होगा ।

आग़ लगी नफ़रत की रकमिश ,
देकर    प्यार    बुझाना   होगा ।

      –Rakmish Sultanpuri


ग़ज़ल –49.


ज़िन्दगी   पथ  एक  मन्दिर ।
अड़चनों के  नभ  रहे   घिर ।

चार    दिन  का  साथ  तेरा ,
मुस्कुराकर  चल   मुसाफ़िर ।

रास्ते    होंगे  कठिन  कुछ  ,
मंज़िलें   पाना  है   आख़िर ।

दुर्दिनों    को   काट  ले  तू ,
सुख भी हो जाएगा हाज़िर ।

हार  से  डरना  भला  क्या ,
जीत   जाएगा  कभी  फ़िर ।

था  कभी  शायद  बुरा  पर ,
कर भलाई अब तू   ज़ाहिर ।

कारवां  के  साथ  'रकमिश' ,
हो न जाना  तू  भी  शातिर ।

–Rakmish Sultanpuri 

ग़ज़ल –50.


देशवासियों   चलो    एक   पंथ  प्यार  से ।
एकरूपता    रहे    नेक    हों   विचार  से ।

रंग रूप जाति  पाति भेद  भाव से ग्रसित ,
भिन्नता  रहे  न ऊँच  नीच  की  दीवार से ।

शांति सभ्यता सदा  समान  भाव से  पले ,
मुक्त  हो समाज  एकजुट  रहे   सुधार  से ।

प्रमाण न बने कभी प्रलोभ की  प्रगाढ़ता ,
लोग हों सुदूर  रोग  भोग  के   विकार से ।

खान पान नृत्य  गान कृत्य भिन्न हो मग़र ,
भाव  देशप्रेम   का  समान  हो विचार से ।

शाम दाम दण्ड भेद का उचित  प्रयोग हो ,
देशहित में  राजनीति हो  सभी  प्रकार से ।

जीत न  सके  कभी  वो झूठ पैतरे  बदल ,
सच भरे उड़ान  मान शान  की फुहार  से । 

     –Rakmish Sultanpuri 


ग़ज़ल –51.


झूठा  हर  फ़लसफ़ा  यहाँ  निकला ।
झूठ  सच  में   सना  यहाँ   निकला ।

लोग     उनसे    बना   लिए    दूरी ,
वक़्त  जिनका  बुरा  यहाँ  निकला ।

ज़िन्दगी   दर्द    में    रही    उलझी ,
सिर्फ़  ग़म  का  पता  यहाँ निकला ।

देख   मौक़ा   बदल   गयी   दुनिया ,
कौन  किसका  सगा  यहाँ निकला ?

यार  जिसको  यक़ीन  था   उसका ,
पत्थरों   में    ख़ुदा   यहाँ   निकला ।

जिनकी  क़िस्मत  ख़राब  थी यारों ,
उनके  हक़  में  दग़ा  यहाँ  निकला ।

ख़ैर !  तिल भर  गुरेज़ न 'रकमिश ,
जो भी निकला भला यहाँ निकला ।

         –Rakmish Sultanpuri 


ग़ज़ल –52.


आशिक़ी  के  खेल  में कच्चा हूँ मैं ।
उम्रभर   शायद  तभी  रोया  हूँ  मैं ।

था  बड़ा  मासूम  दिल  मेरा  सुनो ,
पत्थरों को  भी  ख़ुदा  माना  हूँ मैं ।

दाँव  अपना  आजमाया  वक़्त  ने ,
वक़्त  की  हर  मार से गुजरा हूँ मैं ।

सच,  भरोसा है  नही क़िरदार का ,
ख़ैर ,अब  तक आदमी सीधा हूँ मैं ।

चुप हूँ पर गमख़्वार न समझे मुझे ,
बुत नही बस मोम का टुकड़ा हूँ मैं ।

दोस्त अपने मंजिले  सब  पा  गए ,
साहिलों तक ही अभी पहुँचा हूँ मैं ।

वक़्त थोड़ा है बुरा 'रकमिश मग़र ,
झूठ है  ये  बात  की  झूठा  हूँ  मैं ।

          –Rakmish Sultanpuri


ग़ज़ल –53.


चाहतों  के  फूल  सब  मुरझा  गए ।
ख़ार हिस्से   में  मेरे  सब  आ  गए ।

ज़िन्दगी ख़ुद की  पराई  सी  लगी ,
और   ग़म   सारे  किनारे  पा  गए ।

ख़ैर, ज़ख़्मो से  निपटना  था  मुझे ,
पत्थरों   से    इसलिए  टकरा  गए ।

इश्क़ पर मुझको भरोसा था  मग़र ,
इश्क़ से भी  यार  धोखा  खा  गए ।

वक़्त भी करने लगा  था  साज़िशें ,
गर्दिशों   की  मार  से  चकरा  गए ।

क़िस्मतों ने ख़ूब अजमाया  ज़िगर ,
घाव दिल के  और भी  गहरा  गए ।

रह गयी रकमिश  महज़ तन्हाइयाँ ,
दर्द   के  बादल  नुमाया  छा  गए ।

        –Rakmish Sultanpuri


ग़ज़ल –54.


उम्र  की  पगडंडियों  पर  फ़र्ज़ का  कुहरा घना है ।
वक़्त  कम  है  ज़िन्दगी  में और  लम्बा  रास्ता है ।

स्वार्थ में रिश्ते  सने सब  कौन  किसको दे सहारा ,
प्रेम  का  अवलम्ब  ओछी   वंचनाओं  से घिरा है ।

गिन रहा जो साँझ से  ही भोर तक तारे  गगन के ,
अनुभवों की  धूप  में  वो वृद्ध भी काफ़ी  तपा है ।

सिर्फ़  अंधेरों  के  डर से  रात भर  सोयी  ग़रीबी ,
पर अमीरी  के  लिए तो रात भर  दीपक बुझा है ।

रोटियों की डांट से है मौन नतमस्तक श्रमिक वो ,
भाग्य ने रौंदा है उसको इसलिए वो चुप खड़ा है ।

शर्म   से   मर  जा  कही  पैदाइशी  पापी  दरिंदे ,
रौंद क्यों मासूमियत तू अब तलक जिंदा बचा है ।

हो गया है क्या ज़माने को निकम्मे यार रकमिश ,
हुस्न  का भूखा दरिंदा जिस्म का  हवसी बना है ।

            –Rakmish Sultanpuri


ग़ज़ल –55.

मिली  रूसवाई   हिमाक़त  कहाँ   फ़िर?
असल  में  हुई  वो  मुहब्बत  कहाँ फ़िर ?

ख़ुदी       राजनेता       करायेंगे     दंगे ।
गुनाहों  से  होगी  हिफाज़त कहाँ फ़िर ?

बढ़ी  देश  में  बेसबब   खौफ़   दहशत ।
बची  रह  गयी वो सियासत कहाँ फ़िर ?

करेगा    कोई    रहनुमा   बदमिजाजी ।
सियासत में उसके शराफ़त कहाँ फ़िर ?

चुभो  नश्तरों   को  लगाये जो  मरहम ।
वो  है  सरपरस्ती  शरारत  कहाँ  फिर ?

अग़र  दोस्त  जैसा  मिले भाई  तुमको ।
तुम्हे  दोस्ती  की  ज़रूरत  कहाँ  फ़िर ?

सज़ा ईल्म को जब मिली यार रकमिश ।
तुम्हारे   शहर  में   मुरौव्वत  कहाँ फ़िर ?

        –Rakmish Sultanpuri


ग़ज़ल –56.


संबिधान   में  है  निहित , लोकतंत्र  की  जीत ।
सदा   सर्बदा   से   हुई ,,  लोकतंत्र   की  जीत ।

हुई   पराजय   झूठ  की , हार   गया  पाखण्ड ,
एक  बार   फिर  हो  गयी , लोकतंत्र की जीत ।

नित सच के अवधान से,  प्रेरित  पुष्पित प्रीति ,
जनता के प्रति खिल गयी, लोकतंत्र  की जीत ।

करे  समर्थन   सत्य  का, जनता  का  है  धर्म ,
संचित   हो    समभावना , लोकतंत्र की जीत ।

राष्ट्रप्रेम    की   धारणा,  प्रगतिशील   उद्देश्य ,
दोनों   का   सहयोग  है , लोकतंत्र  की जीत । 

निश्चित  ही  इस  बार  सच ,,रहा चुनौतीपूर्ण ,
कठिन मार्ग था पर हुई,, लोकतंत्र  की  जीत ।

शाम दाम के  भेद  से,, दण्ड   उत्तण्ड  प्रचंड ,
पाकर   मुस्काई   पुनः ,लोकतंत्र  की   जीत ।

                        _रकमिश सुल्तानपुरी

ग़ज़ल–57.


वफ़ा  की  यहां  यार  किसको  ख़बर है ।
कि  चेहरे  पे  चेहरा  नजऱ  पे  नजर  है ।

निभेगी   भला   उनसे   कैसे   मुहब्बत ?
कि कमज़ोर बाहें  औ कमसिन उमर है ।

चली   गर्दिशों  में  ग़मों  की जो  आँधी ,
तमन्ना   वफ़ा  की  गई  सब   बिखर है ।

यहाँ फ़िक्र  किसको रही अब शज़र की ,
निकल  जो गया  काम  उनका अग़र है ।

नशा इश्क़ का जिसने पाला है मसलन ,
घरौंदा    उसी   का    हुआ  खंडहर  है ।

मैं  कल  जा   रहा  हूँ  तुम्हारे  शहर  से ,
बड़ा   बेरहम    ये   तुम्हारा    शहर   है ।

बचाती   रही   बद्दुआओं   से  रकमिश ,
दुआ   वो    तुम्हारी   बड़ी   कारगर  है ।

                    –रकमिश सुल्तानपुरी


ग़ज़ल–58.


मुहब्बत की ख़ातिर  छुपा मुश्किलों को ।
यूँ  ज़ाया  न करना  कभी आंसुओं  को ।

सज़ा    कैसे   देगे  भला  मुल्जिमों  को ,
जो   अंज़ाम    देते   रहे    हादसों   को ।

मेरे क़िरदार की यार  कमजोरियाँ  कुछ ,
पता   चल  गयी  हैं  मेरे  मुखबिरों  को ।

बुझेगी  नही   ये   चराग-  ए - मुहब्बत ,
ख़बर  जाके कर  दो  ग़मे  आंधियों को ।

यहाँ     राजनेता     बनाते     है    मुद्दे ,
कभी  मंदिरों को   कभी   मस्जिदों को ।

सुनो तुम  ख़ुदा  ख़ाक  उनको  मिलेगा ,
जो  पूजे   उमर  भर  महज़ पत्थरों को ।

उजाला जरू  एक  दिन होगा रकमिश ,
भरोसा   रहा  रात   भर  जुगनुओं  को ।

                     –रकमिश सुल्तानपुरी


ग़ज़ल–59.


किस्मत  में  कस्तूरी  भी  हो  सकती  है ।
चाहत दिल  की  पूरी भी हो  सकती  है ,

इस दिल की चाहत का और भरोसा क्या ,
ये   चाहत  बेनूरी   भी   हो   सकती  है । 

ख़ंजर करता सिर्फ़  नही दिल  के टुकड़े ,
ख़ंजर  जैसी   छूरी  भी   हो  सकती  है ।

यार   मुहब्बत  अब  तक  नामंजूर  रही ,
वो  कल को   मंजूरी भी  हो  सकती है ।

बात   रूहानी  छोड़ो  आओ  प्यार  करें ,
हम तुम में  कल  दूरी भी हो  सकती है ।

आज गरीबी है तो क्या कल  मेहनत से , 
थाली   में   तंदूरी  भी    हो  सकती  है ।

खामोसी तो  शौक़  नही  मेरी  रकमिश,
चुप   रहना  मजबूरी  भी हो  सकती है । 


                -  रकमिश सुल्तानपुरी


ग़ज़ल–60.
आमजनता  घर  की  टूटी  आलमारी   हो   गयी ।
जब जहां  चाहे  रखो  जो  भी  बेचारी  हो  गयी ।

राजनेता ही  करें क्या  फ़ेल  सिस्टम  हो  न क्यों , 
देश  में   जब   अनपढ़ों  की  दावेदारी  हो  गयी ।

हमको  उम्दा  लग   रहे  थे  झूठ  के  तेवर  मगर ,
जब मिला सच से तो सच की जानकारी हो गयी ।

आशिक़ी में जान की बाज़ी  लगाते  आप  ख़ूब ?
आपको कब से ये अपनी  जान प्यारी  हो  गयी ।

ले गयी बचपन  जवानी वक़्त बदला  यार फिर , 
रोटी कपड़ा और मकाँ की  जिम्मेदारी  हो गयी ।

चार  पैसे  की  ललक  ले गाँव से आया  शहर  , 
याद रिश्तों  की  सताती  रात  भारी   हो  गयी । 

इश्क़ जैसा पाक रिस्ता था नही 'रकमिश" मगर ,
इश्क़  की भी  तो  यहाँ कालाबाज़ारी  हो  गयी । 


                        - रकमिश सुल्तानपुरी


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