ग़ज़ल –41
ताज़ा -तरीन होगा कुछ प्यार छुवन से ।
आख़िर में तुम्हें क्यों है इनकार छुवन से ?
ख़ामोश लवो का क्या आँखे तो हसीं हैं ,
ज़ुल्फों की घटा होगी तैयार छुवन से ।
हर बार वही कस्मे हर बार बहाना ,
कब होगा ख़्वाब मेरा साकार छुवन से ।
चल छोड़ यार करना बातें वो रूह की ,
आ हुश्न तपा कर लें अंगार छुवन से ।
वो सलवटों की रातें वो सर्द कश्मकश ,
हो जाय रफ़ूचक्कर दिलदार छुवन से ।
यूँ उम्र गवाँ बैठोगे यार अग़र तुम ,
इल्ज़ाम किसे दोगे बेकार छुवन से ?
ज़िद छोड़ आ तू रकमिश गाते है तरन्नुम ,
निखरेगा हुस्न ,तेरा क़िरदार छुवन से ।
–रकमिश सुल्तानपुरी
ग़ज़ल –42
गमख़्वार रही क़िस्मत इल्ज़ाम तुम्हें क्या दूँ ।
सुन यार मुहब्बत का पैग़ाम तुम्हें क्या दूँ ।
टूटा है तेरा दिल तो दिल टूट गया मेरा ,
बेकार रहा ख़ुद का अंजाम तुम्हें क्या दूँ ।
जा पूछ किसी से ले तू हाल ग़मे दिल का ,
क़िरदार रहा मेरा बदनाम तुम्हें क्या दूँ ।
बस याद मुअन्सर है रातों में चुभन रहती ,
दर्दों में सिमटती है हर शाम तुम्हें क्या दूँ ।
गिरने दे ज़रा ऑंसू ढहने दे ज़रा ख़्वाहिश ,
जलने दे ज़र्रा ज़र्रा गुलफ़ाम तुम्हें क्या दूँ ।
ऐ दोस्त ! मुहब्बत में हर बार जफ़ा पाया ,
ईनाम मिला ग़म का ईनाम तुम्हें क्या दूँ ।
मत देख मेरे रकमिश' होठों की हँसी झूठी ,
मिलता न मुझे ग़म से आराम तुम्हें क्या दूँ ।
–रकमिश सुल्तानपुरी
ग़ज़ल –43.
दिल तोड़ दिया मेरा दिल यार नही देखा ।
जज़्बात नही समझे क़िरदार नही देखा ।
सुन तेरी मुहब्बत की थी यार ख़बर झूठी ,
लगता है अभी तुमने अख़बार नही देखा ।
है यार ख़बर उनको क्या पाक मुहब्बत की ,
जिसने भी मुहब्बत में गमख़्वार नही देखा ।
डूबा था सफ़ीना तो डूबेगा सफ़ीना फ़िर ,
किस्मत के भरम जिसने पतवार नही देखा ।
दिल हार यहाँ बैठा लहरों से डरा जो भी ,
साहिल से चला आया मझधार नही देखा ।
ले डूब गया फिरसे ख्वाबों की बसी दुनियाँ ,
तन्हा सा कभी मेंने हक़दार नही देखा ।
गलियों में जहाँ तेरा दिल यार बिका रकमिश,
कल यार वहीं दिल का बाज़ार नही देखा ।
–रकमिश सुल्तानपुरी
ग़ज़ल –44
.
मालुम नही दिल की क़दर , तुन्हें क्या ।
जलने दे ख्वाबों का शहर ,तुम्हें क्या ।
तुम ज़रा सा मुस्कुराए और चले गये,
अब ढूढती है तुमको नजऱ ,तुम्हें क्या ।
कल से ठहरी है यहां रूह में उलझन ,
है दिल पर पुरजोर असर ,तुम्हें क्या ।
तेरे चेहरे पे तस्वीर अभी थी उलझी ,
तेरे नफ़रत से जला है शज़र, तुन्हें क्या ।
रुस्वा ख़ुद को मत कर भुला दे मुझको ,
ये ऑंसू हैं बहेंगे मग़र , तुम्हें क्या ।
आज तन्हा है दिल ख़ैर,कोई बात नही ,
ये वक्त भी जाएगा गुज़र, तुम्हें क्या ।
टूट कर राहों पे चला हूँ रकमिश ,
तन्हा कट जाएगा सफ़र , तुम्हें क्या ।
– रकमिश सुल्तानपुरी
ग़ज़ल –45.
वक़्त की उड़ान है ।
इश्क़ बेजुबान है ।
ख़्वाब का मकान है ।
उम्र का रुझान है ।
ज़ख्म इश्क़ में मिले ,
आज भी निसान है ।
इश्क़ जिस्म से अलग ,
हुस्न की दुकान है ।
इश्क़ में टिका नही ,
वो जिसे गुमान है ।
इश्क़ पाक तब तलक ,
जब तलक ईमान है ।
सोचिएगा आप पर ,
कौन मेहरबान है ।
–Rakmish Sultanpuri
ग़ज़ल–46.
धूप से ख़ुद को सम्हाले धूप में ।
चल रहे हैं हुस्नवाले धूप में ।
सुर्ख़ मौसम है भला तो क्या हुआ ,
आ ज़रा नजरें मिला ले धूप में ।
आपकी चर्चा भला हम क्या करें ,
आपके किस्से निराले धूप में ।
आप जैसी है मेरी क़िस्मत कहाँ ,
आप करते है उजाले धूप में ।
कीमतें जिसने न समझी वक्त की ,
छिन गए उनके निवाले धूप में ।
है ज़रूरत आपको अब छाँव की ,
हो गए हैं आप काले धूप में ।
वक़्त से'रकमिश' उन्हें रौंदा बहुत ,
जो थे किस्मत के हवाले धूप में ।
–रकमिश सुल्तानपुरी
ग़ज़ल –47
प्यार की बतकही रही अब तक ।
दोस्ती अपनी निभी रही अब तक ।
मिट गया वो ग़ुरूर तेरा भी ,
जिसके दम तू चली रही अब तक ।
कौन कहता है मौत ने बख्शा ,
जेब जिसकी भरी रही अब तक ।
जिंदगी दर्द में रही उलझी ,
साहिलों पर रुकी रही अब तक ।
वक़्त का क्या हिसाब दूँ तुमको ,
वक़्त से ही ठनी रही अब तक ।
ज़ोर मैंने बहुत लगाया पर ,
क़िस्मतों की चली रही अब तक ।
ख़ैर तुमसे खुशी मिली ' रकमिश ,
रूह तुमसे जुड़ी रही अब तक ।
– Rakmish Sultanpuri
ग़ज़ल –48.
सच का साथ निभाना होगा ।
हर मुश्किल अजमाना होगा ।
राह कठिन होगी पर सुन लो ,
तुमको मंज़िल पाना होगा ।
सुख दुख रुक रुक बारी बारी ,
आयेंगे टकराना होगा ।
आँसू भर आँखों में तुमको ,
दुख में भी मुस्काना होगा ।
दर्द उठेगा जितना गहरा ,
उतना घाव पुराना होगा ।
झूठ लड़े तो लड़ जाना पर ,
ख़ुद को यार बचाना होगा ।
आग़ लगी नफ़रत की रकमिश ,
देकर प्यार बुझाना होगा ।
–Rakmish Sultanpuri
ग़ज़ल –49.
ज़िन्दगी पथ एक मन्दिर ।
अड़चनों के नभ रहे घिर ।
चार दिन का साथ तेरा ,
मुस्कुराकर चल मुसाफ़िर ।
रास्ते होंगे कठिन कुछ ,
मंज़िलें पाना है आख़िर ।
दुर्दिनों को काट ले तू ,
सुख भी हो जाएगा हाज़िर ।
हार से डरना भला क्या ,
जीत जाएगा कभी फ़िर ।
था कभी शायद बुरा पर ,
कर भलाई अब तू ज़ाहिर ।
कारवां के साथ 'रकमिश' ,
हो न जाना तू भी शातिर ।
–Rakmish Sultanpuri
ग़ज़ल –50.
देशवासियों चलो एक पंथ प्यार से ।
एकरूपता रहे नेक हों विचार से ।
रंग रूप जाति पाति भेद भाव से ग्रसित ,
भिन्नता रहे न ऊँच नीच की दीवार से ।
शांति सभ्यता सदा समान भाव से पले ,
मुक्त हो समाज एकजुट रहे सुधार से ।
प्रमाण न बने कभी प्रलोभ की प्रगाढ़ता ,
लोग हों सुदूर रोग भोग के विकार से ।
खान पान नृत्य गान कृत्य भिन्न हो मग़र ,
भाव देशप्रेम का समान हो विचार से ।
शाम दाम दण्ड भेद का उचित प्रयोग हो ,
देशहित में राजनीति हो सभी प्रकार से ।
जीत न सके कभी वो झूठ पैतरे बदल ,
सच भरे उड़ान मान शान की फुहार से ।
–Rakmish Sultanpuri
ग़ज़ल –51.
झूठा हर फ़लसफ़ा यहाँ निकला ।
झूठ सच में सना यहाँ निकला ।
लोग उनसे बना लिए दूरी ,
वक़्त जिनका बुरा यहाँ निकला ।
ज़िन्दगी दर्द में रही उलझी ,
सिर्फ़ ग़म का पता यहाँ निकला ।
देख मौक़ा बदल गयी दुनिया ,
कौन किसका सगा यहाँ निकला ?
यार जिसको यक़ीन था उसका ,
पत्थरों में ख़ुदा यहाँ निकला ।
जिनकी क़िस्मत ख़राब थी यारों ,
उनके हक़ में दग़ा यहाँ निकला ।
ख़ैर ! तिल भर गुरेज़ न 'रकमिश ,
जो भी निकला भला यहाँ निकला ।
–Rakmish Sultanpuri
ग़ज़ल –52.
आशिक़ी के खेल में कच्चा हूँ मैं ।
उम्रभर शायद तभी रोया हूँ मैं ।
था बड़ा मासूम दिल मेरा सुनो ,
पत्थरों को भी ख़ुदा माना हूँ मैं ।
दाँव अपना आजमाया वक़्त ने ,
वक़्त की हर मार से गुजरा हूँ मैं ।
सच, भरोसा है नही क़िरदार का ,
ख़ैर ,अब तक आदमी सीधा हूँ मैं ।
चुप हूँ पर गमख़्वार न समझे मुझे ,
बुत नही बस मोम का टुकड़ा हूँ मैं ।
दोस्त अपने मंजिले सब पा गए ,
साहिलों तक ही अभी पहुँचा हूँ मैं ।
वक़्त थोड़ा है बुरा 'रकमिश मग़र ,
झूठ है ये बात की झूठा हूँ मैं ।
–Rakmish Sultanpuri
ग़ज़ल –53.
चाहतों के फूल सब मुरझा गए ।
ख़ार हिस्से में मेरे सब आ गए ।
ज़िन्दगी ख़ुद की पराई सी लगी ,
और ग़म सारे किनारे पा गए ।
ख़ैर, ज़ख़्मो से निपटना था मुझे ,
पत्थरों से इसलिए टकरा गए ।
इश्क़ पर मुझको भरोसा था मग़र ,
इश्क़ से भी यार धोखा खा गए ।
वक़्त भी करने लगा था साज़िशें ,
गर्दिशों की मार से चकरा गए ।
क़िस्मतों ने ख़ूब अजमाया ज़िगर ,
घाव दिल के और भी गहरा गए ।
रह गयी रकमिश महज़ तन्हाइयाँ ,
दर्द के बादल नुमाया छा गए ।
–Rakmish Sultanpuri
ग़ज़ल –54.
उम्र की पगडंडियों पर फ़र्ज़ का कुहरा घना है ।
वक़्त कम है ज़िन्दगी में और लम्बा रास्ता है ।
स्वार्थ में रिश्ते सने सब कौन किसको दे सहारा ,
प्रेम का अवलम्ब ओछी वंचनाओं से घिरा है ।
गिन रहा जो साँझ से ही भोर तक तारे गगन के ,
अनुभवों की धूप में वो वृद्ध भी काफ़ी तपा है ।
सिर्फ़ अंधेरों के डर से रात भर सोयी ग़रीबी ,
पर अमीरी के लिए तो रात भर दीपक बुझा है ।
रोटियों की डांट से है मौन नतमस्तक श्रमिक वो ,
भाग्य ने रौंदा है उसको इसलिए वो चुप खड़ा है ।
शर्म से मर जा कही पैदाइशी पापी दरिंदे ,
रौंद क्यों मासूमियत तू अब तलक जिंदा बचा है ।
हो गया है क्या ज़माने को निकम्मे यार रकमिश ,
हुस्न का भूखा दरिंदा जिस्म का हवसी बना है ।
–Rakmish Sultanpuri
ग़ज़ल –55.
मिली रूसवाई हिमाक़त कहाँ फ़िर?
असल में हुई वो मुहब्बत कहाँ फ़िर ?
ख़ुदी राजनेता करायेंगे दंगे ।
गुनाहों से होगी हिफाज़त कहाँ फ़िर ?
बढ़ी देश में बेसबब खौफ़ दहशत ।
बची रह गयी वो सियासत कहाँ फ़िर ?
करेगा कोई रहनुमा बदमिजाजी ।
सियासत में उसके शराफ़त कहाँ फ़िर ?
चुभो नश्तरों को लगाये जो मरहम ।
वो है सरपरस्ती शरारत कहाँ फिर ?
अग़र दोस्त जैसा मिले भाई तुमको ।
तुम्हे दोस्ती की ज़रूरत कहाँ फ़िर ?
सज़ा ईल्म को जब मिली यार रकमिश ।
तुम्हारे शहर में मुरौव्वत कहाँ फ़िर ?
–Rakmish Sultanpuri
ग़ज़ल –56.
संबिधान में है निहित , लोकतंत्र की जीत ।
सदा सर्बदा से हुई ,, लोकतंत्र की जीत ।
हुई पराजय झूठ की , हार गया पाखण्ड ,
एक बार फिर हो गयी , लोकतंत्र की जीत ।
नित सच के अवधान से, प्रेरित पुष्पित प्रीति ,
जनता के प्रति खिल गयी, लोकतंत्र की जीत ।
करे समर्थन सत्य का, जनता का है धर्म ,
संचित हो समभावना , लोकतंत्र की जीत ।
राष्ट्रप्रेम की धारणा, प्रगतिशील उद्देश्य ,
दोनों का सहयोग है , लोकतंत्र की जीत ।
निश्चित ही इस बार सच ,,रहा चुनौतीपूर्ण ,
कठिन मार्ग था पर हुई,, लोकतंत्र की जीत ।
शाम दाम के भेद से,, दण्ड उत्तण्ड प्रचंड ,
पाकर मुस्काई पुनः ,लोकतंत्र की जीत ।
_रकमिश सुल्तानपुरी
ग़ज़ल–57.
वफ़ा की यहां यार किसको ख़बर है ।
कि चेहरे पे चेहरा नजऱ पे नजर है ।
निभेगी भला उनसे कैसे मुहब्बत ?
कि कमज़ोर बाहें औ कमसिन उमर है ।
चली गर्दिशों में ग़मों की जो आँधी ,
तमन्ना वफ़ा की गई सब बिखर है ।
यहाँ फ़िक्र किसको रही अब शज़र की ,
निकल जो गया काम उनका अग़र है ।
नशा इश्क़ का जिसने पाला है मसलन ,
घरौंदा उसी का हुआ खंडहर है ।
मैं कल जा रहा हूँ तुम्हारे शहर से ,
बड़ा बेरहम ये तुम्हारा शहर है ।
बचाती रही बद्दुआओं से रकमिश ,
दुआ वो तुम्हारी बड़ी कारगर है ।
–रकमिश सुल्तानपुरी
ग़ज़ल–58.
मुहब्बत की ख़ातिर छुपा मुश्किलों को ।
यूँ ज़ाया न करना कभी आंसुओं को ।
सज़ा कैसे देगे भला मुल्जिमों को ,
जो अंज़ाम देते रहे हादसों को ।
मेरे क़िरदार की यार कमजोरियाँ कुछ ,
पता चल गयी हैं मेरे मुखबिरों को ।
बुझेगी नही ये चराग- ए - मुहब्बत ,
ख़बर जाके कर दो ग़मे आंधियों को ।
यहाँ राजनेता बनाते है मुद्दे ,
कभी मंदिरों को कभी मस्जिदों को ।
सुनो तुम ख़ुदा ख़ाक उनको मिलेगा ,
जो पूजे उमर भर महज़ पत्थरों को ।
उजाला जरू एक दिन होगा रकमिश ,
भरोसा रहा रात भर जुगनुओं को ।
–रकमिश सुल्तानपुरी
ग़ज़ल–59.
किस्मत में कस्तूरी भी हो सकती है ।
चाहत दिल की पूरी भी हो सकती है ,
इस दिल की चाहत का और भरोसा क्या ,
ये चाहत बेनूरी भी हो सकती है ।
ख़ंजर करता सिर्फ़ नही दिल के टुकड़े ,
ख़ंजर जैसी छूरी भी हो सकती है ।
यार मुहब्बत अब तक नामंजूर रही ,
वो कल को मंजूरी भी हो सकती है ।
बात रूहानी छोड़ो आओ प्यार करें ,
हम तुम में कल दूरी भी हो सकती है ।
आज गरीबी है तो क्या कल मेहनत से ,
थाली में तंदूरी भी हो सकती है ।
खामोसी तो शौक़ नही मेरी रकमिश,
चुप रहना मजबूरी भी हो सकती है ।
- रकमिश सुल्तानपुरी
ग़ज़ल–60.
आमजनता घर की टूटी आलमारी हो गयी ।
जब जहां चाहे रखो जो भी बेचारी हो गयी ।
राजनेता ही करें क्या फ़ेल सिस्टम हो न क्यों ,
देश में जब अनपढ़ों की दावेदारी हो गयी ।
हमको उम्दा लग रहे थे झूठ के तेवर मगर ,
जब मिला सच से तो सच की जानकारी हो गयी ।
आशिक़ी में जान की बाज़ी लगाते आप ख़ूब ?
आपको कब से ये अपनी जान प्यारी हो गयी ।
ले गयी बचपन जवानी वक़्त बदला यार फिर ,
रोटी कपड़ा और मकाँ की जिम्मेदारी हो गयी ।
चार पैसे की ललक ले गाँव से आया शहर ,
याद रिश्तों की सताती रात भारी हो गयी ।
इश्क़ जैसा पाक रिस्ता था नही 'रकमिश" मगर ,
इश्क़ की भी तो यहाँ कालाबाज़ारी हो गयी ।
- रकमिश सुल्तानपुरी
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