ग़ज़ल –21.
दर्द अच्छा रोज की ये मयकशी अच्छी नही ।
जानता हूँ आज़कल की आशिक़ी अच्छी नही ।
जानने वाले बहुत हो पर न ख़िदमत हो जहां ,
बेवज़ह उन महफ़िलों में हाज़िरी अच्छी नही ।
आपके जज़्बात की जो कद्र कुछ करता न हो ,
सच कहूँ उस आदमी से दोस्ती अच्छी नही ।
लफ़्ज़ टूटे दिल से उभरे तो मुकम्मल शेर हो ,
बेवज़ह बिन बात के यूँ शाइरी अच्छी नही ।
राजनेता आमजनता के लिए कुछ तो करें ,
सिर्फ़ कोरी काग़जी ये बतकही अच्छी नही ।
हाँ चलो हम भी निभा लें एक दिन की बात हो ,
रोज की ये यार बोझिल मुफ़लिसी अच्छी नही ।
छोड़ दे रकमिश शिक़ायत ग़ैर की करना यहाँ ,
इश्क़ हो या जंग मसलन मुखबिरी अच्छी नही ।
ग़ज़ल –22
जनम -जनम सनम तेरी ये बन्दग़ी क़ुबूल है ।
मिले जो प्यार आपका तो मयकशी क़ुबूल है ।
वफ़ा खफ़ा -खफ़ा रही मग़र वफ़ा- वफ़ा रही ,
जो आदतों सी बन गयी वो आशिक़ी क़ुबूल है ।
है प्यार का मुआमला कुबूल तो जरा मुझे ,
मिलो कहीं मग़र मिलो ये हाज़िरी क़ुबूल है ।
ठहर - ठहर , रुकी- रुकी निहारती रही नजऱ ,
ग़मों की बेबसी रही कि बेरुख़ी क़ुबूल है ।
वो आदतन ज़ुबान इश्क़ की लगा है बोलने ,
मग़र ज़नाब की हमें वो शातिरी क़ुबूल है ।
न देख वज़्न क़ाफ़िया बह्र -वह्र ग़लत -सलत ,
दिलों के लफ्ज़ बोलती वो शाइरी क़ुबूल है ।
कि झूठ क वो दोस्ती क़ुबूल है नही मग़र ,
चुनौतियों भरी वो यार दुश्मनी क़ुबूल है ।
ग़ज़ल –23
आपकी चाहत में जिस दिन मैं फ़ना हो जाऊँगा ।
आपके जख़्मों की बेशक़ इक दवा हो जाऊँगा ।
याद आएगी मुहब्बत की मेरी नादानियाँ ,
तेरी दुनियां से कभी जब लापता हो जाऊँगा ।
आदमी हूँ आदमी से प्यार करता हूँ मग़र ,
कौन कहता है मुहब्बत का ख़ुदा हो जाऊँगा ।
मैं अकेले ही चला हूँ आज सच की राह पर ,
है मुझे मालूम कल तक काफ़िला हो जाऊँगा ।
ख़ैर मुझको दिल्लगी से है गिला कुछ भी नही ,
मिट गया तो भी मुकम्मल फ़लसफ़ा हो जाऊँगा ।
निभ सको गर तुम रदीफ़ों सी बह्र में यार तो ,
प्यार में मैं भी ग़ज़ल का क़ाफ़िया हो जाऊँगा ।
इश्क़ में 'रकमिश' फ़ना होकर किसी दरग़ाह पर ,
आख़िरी मंजिल का तेरे रास्ता हो जाऊँगा ।
ग़ज़ल –24
मुझे सितमगर मत कह देना ।
दिल को पत्थर मत कह देना ।
जाते हो तो प्यार से जाओ ,
चुभते आख़र मत कह देना ।
आँखें -नदियाँ पानी - आँसू ,
इन्हें समंदर मत कह देना ।
अपनो ने भी दी है गश्ती ,
सिर्फ़ मुक़द्दर मत कह देना ।
सच्चाई भी यार बताना ,
झूठा अक़्सर मत कह देना ।
दर्द , जुदाई , तन्हाई ,ग़म ,
को तुम खंज़र मत कह देना ।
जख़्म हुआ है गहरा रकमिश ,
मसलन ठोकर मत कह देना ।
ग़ज़ल –25
जज़्बातों की क़द्र किये बिन तिल-तिल मिटना पड़ता है ।
सच्चाई को रोज छुपाकर झूठ उगलना पड़ता है ।
गिरगिट वाले तंग मुखौटे मुझको ख़लते हैं फिर भी ,
दुनियादारी के नाते क़िरदार बदलना पड़ता है ।
शौक़ नही है मुझको तेरी सूरत का दीदार करूँ ,
लेकिन दिल की मजबूरी को यार समझना पड़ता है ।
कौन चाहता है रिश्वत की पाई-पाई अदा करे ,
पर सिस्टम वाली चक्की में धुन सा पिसना पड़ता है ।
सच की पगड़ी फेंक- फाँक कर सुनो यार मजबूरी में ,
झूठों की चौखट पर झुककर नाक रगड़ना पड़ता है ।
देता हूँ धर्मो की मिलकर सबके साथ दुहाई पर ,
मानवता को ख़ुद पैरों से रोज कुचलना पड़ता है ।
जान रहा हूँ रकमिश काफ़ी दूर उजाला है फिर भी ,
अंधेरों में जुगनू सा बुझ -बुझ कर जलना पड़ता है ।
ग़ज़ल –26
आज़तक वो क़िताब रख्खा हूँ ।
जिसमें सूखा गुलाब रख्खा हूँ ।
ख़ुद मिटाकर वजूद अपना सुन ,
तेरे ग़म का हिसाब रख्खा हूँ ।
आज कर लो सवाल मुझसे खूब ,
आपका हर ज़बाब रख्खा हूँ ।
रात आधी, वीरान मयख़ाने ,
ख़ैर ! कल की शराब रक्खा हूँ ।
सच से लगने लगा है डर सा अब ,
झूठ का इक नक़ाब रख्खा हूँ ।
इश्क़ में सिर्फ़ तेरे चेहरे का ,
आईना बेहिसाब रख्खा हूँ ।
आदमी शानदार हूँ "रकमिश",
थोड़ी आदत ख़राब रख्खा हूँ ।
ग़ज़ल –27
दर्द देकर सवाल करते हो ।
आप भी क्या कमाल करते हो ।
शाम ढलते ही ख़्वाब में आकर ,
आप जीना मुहाल करते हो ।
मैं भुला दूँ भला तुम्हें कैसे ?
तुम जो इतना ख़याल करते हो ।
दे वफ़ा की दलील झूठी क्यों ?
नफरतों की दिवाल करते हो ।
आज़माते हो जख़्म देकर पर ,
प्यार देकर निहाल करते हो ।
इश्क़ पर तो फ़ना रही दुनिया ,
इश्क़ से क्यों मलाल करते हो ?
आग़ दिल की जला यार रकमिश ,
ख़्वामख्वाह क्यों बवाल करते हो ?
✍रकमिश सुल्तानपुरी
ग़ज़ल –28
जज्बातों पर हम ग़र पर्दा कर लेते तो अच्छा था ।
हालातों से कुछ समझौता कर लेते तो अच्छा था ।
दोस्त मिले थे बहुतेरे सब मंजिल पाते चले गए ,
फिर से मिलने का इक वादा कर लेते तो अच्छा था ।
ख़ामोशी बिल्कुल न होती हम भी हँसकर जी लेते ,
तन्हा दिल को और निकम्मा कर लेते तो अच्छा था ।
अच्छे दिन की आस लगाए अच्छे दिन सब गवां दिए ,
बुरे दिनों में ही कुछ अच्छा कर लेते तो अच्छा था ।
सच्चाई का वज़्न घटा तब भारी -भरकम झूठ लिए ,
हम भी अपनाब उल्लू सीधा कर लेते तो अच्छा था ।
तुम थे ,हम थे संकोचों में ख़ुशियों के पल गवां दिए ,
पूरा मन का हर मनसौदा कर लेते तो अच्छा था ।
तस्वीरों को देख के रकमिश दिल की बातें क्या समझो ,
मिलकर किरदारों की चर्चा कर लेते तो अच्छा था ।
ग़ज़ल –29
जीवन का आधार छिपा है अपनी भाषा हिंदी में ।
खट्टा - मीठा प्यार छिपा है अपनी भाषा हिंदी में ।
देवनागरी सरल सुलेखित सहज बोधिनी लिपि सुंदर ,
भावों का संसार छिपा है अपनी भाषा हिंदी में ।
रस ,छंदों की सरिता बहती अलंकार मुस्काते हैं ,
शब्दों का भंडार छिपा है अपनी भाषा हिंदी में ।
एक शब्द के कई अर्थ है अर्थो में भी अर्थ गुँथे ,
पर गुंथन में सार छिपा है अपनी भाषा हिंदी में ।
देवों की वाणी से निकली पावन और मनोरम है ,
वेदों का संचार छिपा है अपनी भाषा हिंदी में ।
आओ बोले पढ़े लिखें हम सोचें समझे मान करें ,
उद्भव का आगार छिपा है अपनी भाषा हिंदी में ।
इसे न त्यगो अपनाओ सब निःसंकोच प्रयोग करो ,
प्रीति ,रीति त्योहार छिपा है अपनी भाषा हिंदी में ।
ग़ज़ल –30
गजीदे दिल का सूफ़ियाना इन्तिजाम करो ।
ज़र्ब गहरा ,दिल अफ़सुर्दा है इब्तिसाम करो ।
नाफ़हम समझ बैठे है वो गम़गुस्सार मुझे ,
दिले आशुफ़्ता के लिए मौज़ ऐहतमाम करो ।
इक़्तिज़ा इश्क़ की होठों पे इख्लास दिखे ,
आईना देखा है बहुत सच न गुमनाम करो ।
हिसाबे- गरज़ को छोड़ देख रूह की गश्ती ,
नादान्स्तिा सही ज़ुल्फ़ों को साज़ शाम करो ।
क़ुबूल ये हुस्न नुक्ताचीं इस ज़माने से अलग़ ,
इज़्तिरार मिटा मस्तियाँ को न तमाम करो ।
सुन ये बेनजीर सुख़न का हसीन फ़तवा है ,
वक़्त नौजवानी का वादों में न ग़ुलाम करो ।
नफ़्स पे ज़ुल्म जहन्नुम सी लगे "रकमिश",
पेशगी इश्क़ की क़ुबूला शरेआम करो ।
ग़ज़ल –31
वो गीतों में रवानी ढूँढता है ।
मेरी ग़ज़लों में सानी ढूँढता है ।
मुहब्बत की निशानी ढूँढता है ,
हरिक दरिया में पानी ढूँढता है ।
मुकम्मल इश्क़ करने के लिए वो ,
बुढ़ापे में जवानी ढूँढता है ।
किताबों में छुपाई चिठ्ठियों से ,
हक़ीक़त वो पुरानी ढूँढता है ।
मिटाकर जिस्म की वो भूख सारी ,
बची यादें रूहानी ढूँढता है ।
बनाकर ख़्वाब में चेहरा अकेले ,
मुहब्बत आसमानी ढूँढता है ।
यक़ीनन छोड़ रकमिश बचपना वो ।
दिनों में रातरानी ढूँढता है ।
ग़ज़ल –32
ज़िन्दगी ख़ाकसार कौन करे ?
दिल को यूँ बेकरार कौन करे ?
इश्क़ में न मिले मुक़ाम सही ,
इश्क़ को दाग़दार कौन करे ?
इश्क़ खुशबू तमाम वक़्त रहा ,
इश्क़ दो वक़्त ख़ार कौन करे ?
शाम की बेक़सी मुहाल बहुत ,
शाम का इंतज़ार कौन करे ?
हूबहू आईने में शक़्ल तेरी ,
ख़ैर , झूठा करार कौन करे ?
सिर्फ़ इक शौक़ पालने के लिए ,
हर खुशी तार-तार कौन करे ?
दोस्त रकमिश जरूर याद रहा ,
दुश्मनों पर ग़ुबार कौन करे ?
ग़ज़ल –33
आदमी वही मिटा जो आन बान शान पर ।
लड़खड़ा गिरा उठा प्रत्येक पायदान पर ।
हारता तमाम उम्र क्षुब्ध न हुआ कभी ,
हौसलों से बढ़ गया वो जीत के निशान पर ।
शान्त चित्त है मग़र वो सिंह सा दहाड़ता ,
आ गयी ख़रोंच यदि वजूद स्वाभिमान पर ।
फ़िक्र न रही उसे कभी भविष्य भूत की ,
दाँव सारे खेलता रहा वो वर्तमान पर ।
दूर हो प्रपन्च से निशुल्क नेह बाँटता ,
सत्य बोलता रहा वो झूठ की दुकान पर ।
हाँ, उसे लताड़ने की साजिशें हुई मग़र ,
गिर सकी न गॉज झूठ-मूठ की ईमान पर ।
नीतियाँ चली ग़लत यदा कदा समाज में ,
वो डटा विरोध में अड़ा रहा ज़ुबान पर ।
ग़ज़ल –34
हौशलों के पंख की उड़ान जिंदगी रही ।
सच कहूँ तो झूठ की दुकान जिंदगी रही ।
बाँह को पसार दौड़ती रही गरीबता ,
लड़ रहा था जब तलक जवान जिंदगी रही ।
रौंदते निकल गयीं वो दर्दोगम की आँधियाँ ,
जूझता मैं कब तलक तूफ़ान जिंदगी रही ।
देखती रही मुरीद , वक़्त की वो क्रूरता ,
हाल पे ख़ामोश बेजुबान जिंदगी रही ।
बार - बार हार यार ठोंकरें लगी मग़र ,
ख़ाकसार पाक ज्यों क़ुरान ज़िन्दगी रही ।
हाँ मिली जो हार देख दोस्त सब बदल गए ,
उम्रभर शिकायतों की खान जिंदगी रही ।
ख़ैर इश्क़ ने दिया खुशी, खुमार ,ख़्वाहिशें ,
और तो वजूद भर निशान ज़िन्दगी रही ।
ग़ज़ल –35
जब से यारी ख़त्म हो गयी ।
पहरेदारी ख़त्म हो गयी ।
लिया उधारी जिसने उसकी ,
रिश्तेदारी ख़त्म हो गयी ।
जज़्बातों को ठेस लगी जब ,
जब क़िरदारी ख़त्म हो गयी ।
आख़िर दिल कैसे दे देता ?
पर इकरारी ख़त्म हो गयी ।
हार गया जो ख़ुद से ,उसकी ,
ज़िम्मेदारी ख़त्म हो गयी ।
सच था इसीलिए मंजिल की ,
दावेदारी ख़त्म ही गयी ।
सच के दस्तक़ से झूठों की ,
सब हुशियारी ख़त्म हो गयी ।
टूट गयीं उम्मीदें रकमिश",
दुनियादारी ख़त्म हो गयी ।
रकमिश सुल्तानपुरी
ग़ज़ल –36
वक़्त की उड़ान है ख़ैर कोई बात नही ।
ये तो हिंदुस्तान है ख़ैर कोई बात नही ।
आपसे बुझी नही आग़ जली रात भर ,
आपका मकान है ख़ैर कोई बात नही ।
फूंक से उड़ा रहे आप भी पहाड़ को ,
आप बुद्धिमान है ख़ैर कोई बात नही ।
शौक़ बस आपने दिल मेरा तोड़ दिया ,
अब तो इत्मिनान है ख़ैर कोई बात नही ।
वक़्त पे तो साथ दिया तोड़ सब वसूल वो ,
झूठ की दुकान है ख़ैर कोई बात नही ।
जिंदगी को नाप लो हौसलों के पंख से ,
दूर आसमान है ख़ैर कोई बात नही ।
कर रहें हैं लोग अभी माफ़ तेरी गल्तियां ,
तू अभी जवान है ख़ैर कोई बात नही ।
ग़ज़ल –37
नफ़रते अंदाज़ अब बेकार है समझा करो ।
आज़कल तो सिर्फ़ तुमसे प्यार है समझा करो ।
ख़ैर ! बातों के लिए पूरा सितम्बर है पड़ा ,
बेक़सी में रूह तक बीमार हैं समझा करो ।
हैं नही यूपी कि एंटी रोमियों होंगे यहाँ ,
ये है दिल्ली चुप यहाँ सरकार है समझा करो ।
आ चलें फुटपाथ पर खायें कहीं पिज़्ज़ा सुंनो ।
गर्म है मौसम मग़र इतवार है समझा करो ।
पार्क के कोने में चलकर गुफ्तगूं कर लें ज़रा ।
भीड़ से हटकर, यहाँ बाज़ार है समझा करो ।
आ चलें नाज़ुक लवों को सौंप दें मदहोशियाँ ।
क्यों खड़ी अब रूह की दीवार है समझा करो ?
फ़िक्र करना छोड़ रकमिश दे तवज़्ज़ो वक्त को ।
वक़्त गुजरा तो मिलन दुस्वार है समझा करो ।
✍ रकमिश सुल्तानपुरी
ग़ज़ल –38
नफ़रत की आग़में तपा दिया ख़ंजर ।
वक़्त देखा और चुभा दिया खंज़र ।
जबकि देना था इक ग़ुलाब उनको ,
मग़र दिल पर आजमा दिया खंज़र ।
ख़ैर नासूर ज़ख़्मो को कुरेदा ख़ूब ,
रंग अपना भी दिखा दिया खंज़र ।
सुकून देता नही तेरे हाथ का मरहम ,
दोस्त तुमने क्यों छिपा दिया खंज़र ।
असर हुआ मग़र सिर्फ बेवफाई का ,
याद तुमको रख भुला दिया खंज़र ।
सिर्फ़ दिखता है रातभर तेरा चेहरा ,
नींद आँखों की उड़ा दिया खंज़र ।
तोड़ ही दिया दिल तुमने रकमिश",
साथ जबकि निभा दिया खंज़र ।
✍रकमिश सुल्तानपुरी
ग़ज़ल –39
ख़ुदा मुझको मिलेगा न तो पत्थर ही सही लेक़िन ।
इबादत दिल से करता हूँ मैं अक़्सर ही सही लेक़िन ।
तेरे हाथों में देखा कल ख़ुदी के नाम का ख़ंजर ,
मिले न प्यार तो दिल पर वो ख़ंजर ही सही लेक़िन ।
तेरी यादों से ऐ हमदम ? महज़ इतनी शिफारिश है ,
रहे बनकर मेरे दिल में सितमगर ही सही लेक़िन ।
किसी भी शर्त पर तुमको कभी मैं खो नही सकता ,
तेरे बदले मिले ग़म का समन्दर ही सही लेक़िन ।
कभीआकर मिलो मुझसे किसी महफूज़ साहिल पर ,
मुकम्मल देख लूँ चेहरा नजऱ भर ही सही लेक़िन ।
यकीं कर ले मुहब्बत में बसा दूँगा तेरी दुनियां ,
ख़ुदी के दिल की बस्ती को लुटाकर ही सही लेक़िन ।
लबो पर रोक बैठे हो असिलियत क्यों मेरे रकमिश ",
इशारों में कहो कुछ तो छिपाकर ही सही लेक़िन ।
2
✍ रकमिश सुल्तानपुरी
ग़ज़ल –40
ग़म का दरिया हूँ कोई साहिल नही हूँ मैं ।
ऐ दोस्त !तेरे ख्बाब की मन्ज़िल नही हूँ मैं ।
दर्द न ले दोस्त मुझसे रख ज़रा दूरी ,
खण्डहर हूँ ख़ुशनुमा महफ़िल नही हूँ मैं ।
दोस्ती में प्यार का रख्खा भरम जब तो ,
आप समझो आपकी मुश्किल नही हूँ मैं ।
सच कहूँ तो आप मेरे दोस्त हो अच्छे ,
वक़्त का पाबन्द हूँ क़ातिल नही हूँ मैं ।
हो सके तो कर ले तू जज़्बात पर काबू ,
प्यार की तरफ़ा ज़रा माहिल नही हूँ मैं ।
इश्क़ में टूटा मग़र ख़ैरात न लूँगा ,
प्यार के ग़म से अभी बोझिल नही हूँ मैं ।
सिर्फ़ मिलना हो सकेगा ख़्वाब में "रकमिश ।
पर हक़ीक़त में कभी हासिल नही हूँ मैं ।
✍ रकमिश सुल्तानपुरी
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