कविता (खोड़र से)
खोड़र
पक्षिओं के घर
गुलाब कणो से लालयित चोंच
खुलते निःसंकोच
कर्णनाद से
दो पल दो क्षण
हवाओ के स्पर्श ,पंछियो के गुंजन से
माँ की आहट से
देखते खोड़र से उचक-उचक ।
गूँजते चीं चीं के स्वर ।।
बादल
उमड़-उमड़
बरसता, टपकती सामने बूँदे
पंजो के बल आँखे मूँदे
सभय पंजो में आपस में
होकर एकीकृत
टहनियोँ के टूटने से, पत्तो की झुनझुनाहट से
बूदों को समझ अनाज कण
दिखते छिपते मुँह खोल निरन्तर ।।
गूँजते चीं चीं के स्वर ।।
माँ
अधखुली चोंचभर
चिन्ताकुल ममता की निधि, निधि से
बहु प्रकार बहु विधि से
आ पहुँचती गाँवो से
करने के लिये भरण
मंसूर, गेहुओँ के दो-दो छोटे कण
लालिमा युक्त मुखों में
डालती सम्हल-सम्हलकर ।।
गूँजते चीं -चीं के स्वर ।।
राम केश मिश्र
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