कविता।बादल और धूप

                   बादल और धूप

नभ घटाओं का बढ़ा घमण्ड देखो ।
हो रहा है सूर्य का प्रचण्ड देखो । 
लालिमामय हो रहा सुंदर सबेरा ।
बादलों को धूप ने आकर है घेरा ।

रुक गयी चंचल हवा बेबस खड़ी है ।
लग गयी हाथों में उसके हथकड़ी है ।
और वृक्षों के रुआंसे रोंगटे है ।
नवखिलित पुष्पों पंखें अटपटे है ।

आ चलें हम बाँध लाये जलधरों को ।
चल बता दें आज हम भी रहबरों को ।
कि नदी ,तालाब खुद प्यासे चिरंगुन ।
है व्यथा छायी उभरती एक धुन ।

जा रहे हैं मेघ आँखे मूँदकर क्यों ?
आज मेरे आंगनों से कूदकर क्यों ?
भाव की रस्सी बनाते क्यों नही हम ?
कामना दिल की सुनाते क्यों नही हम?

एक अर्से की तपिस हम झुक गया क्या?
इंद्र का वो तेज शायद चुक गया क्या?
आह है ,इन आह का आभार तो कर दो ?
हे देव दर्शन दो न दो उपकार तो कर दो ?

                               ©राम केश मिश्र