जनता का क्या है कुसुर

                 सजल

जनता का  इसमें   क्या है कुसूर
जनता से    दूर सदा रहते  हुजूर 

पांच   साल खाएं ख़ुद ही पुलाव
जनता     बेचारी   खाये   खजूर 

आता चुनाव न तो  आते न  द्वार 
लेना था वोट मगर उनको जरूर 

अंधे हुए अनपढ़, पढ़े लिखे गूँग
बढ़ता  ही  जाता  उनका  गुरूर 

करते  आराम  मिलता  न  काम 
सस्ते  किसान  हो  गए   मजदूर 

पिछलग्गू    सारे    उड़ाते   मौज 
सच्चे    समर्थक    रहे    मजबूर 

सच्चे थे, अच्छे थे उनके विचार
जीत जाए मन में चलता  फ़ितूर 

             राम केश मिश्र 
                  भदैयाँ