==गीत==
1–
ख़फ़ा मै नही यूँ फ़ासले से तेरे ।
मायूस तो हूँ कुछ वायदे से तेरे ।
दर्द दिल ये हमेसा सहेगा नही ।
ये मुहब्बत का आलम रुकेगा नही ।
याद है,ख़्वाब है, और परछाइयाँ ।
आज ठहरी हुई हैं तनहाइयाँ ।
अनकहा रह गया फ़लसफ़े से तेरे ।
मायूस तो हूँ कुछ वायदे से तेरे ।
उम्रभर प्यार मुझको है पाना तेरा ।
हो सही या गलत आजमाना तेरा ।
प्यार का रूप है मेरी खामोशियाँ ।
आप ही ही मेरी सारी कमजोरियाँ ।
चल रही जिंदगी आसरे से तेरे ।
मायूस तो हूँ कुछ वायदे से तेरे ।
***
गीत–2
बड़ी बेबसी है बड़ी है निराशा ।
मुझे मेरे गम के अलावा मिला क्या ।
खिली धूप थी पर बेकार थे दिन ।
हो न सका तेरा दीदार मुमकिन ।
तड़पता रहा मैं मुहब्बत मे प्यासा ।
मुझे मेरे ग़म के अलावा मिला क्या ।
बढ़ा दर्द जब जब तुम मुस्कराये ।
तसल्ली दिये पर पास तुम न आये ।
मुझे याद है तुमने दिया था दिलाशा ।
मुझे मेरे ग़म के अलावा मिला क्या ।
इत्तिफाकों से तू हुई रूबरू जब ।
वफ़ा बेवफ़ाई की हुई जुस्तजू तब ।
बनाया था तुमने दिल का तमाशा ।
मुझे मेरे ग़म के अलावा मिला क्या ।
फिर भी सकूँ की तस्वीर बनके ।
तराने भरे क्यूँ दर्दीले गम के ।
बरसती थी आँखें ये बनके तराना ।
मुझे मेरे ग़म के अलावा मिला क्या ।
जाते जाते तुमने लिखा था नही ख़त ।
मैंने आँसुओ से लिखा था मुहब्बत ।
पतझड़ मे बेबस गुलशन खिला क्या ।
मुझे मेरे ग़म के अलावा मिला क्या ।
****
गीत–3
हमारे अश्क़ हैं आँसू तुम्हारे अश्क़ है मोती ।
शिक़ायत क्या करूँ तुमसे शिक़ायत अब नही होती ।
तुम्हारे ख़्वाब वो सपने सवारूँ किस तरह चेहरा ।
तुम्हारी बेवफ़ाई से ज़िगर पर घाव है गहरा ।
अपने ग़म की ही मुझसे हिफ़ाजत अब नही होती ।
शिक़ायत क्या करूँ तुमसे शिक़ायत अब नही होती ।
तुम्हारी ही तरह मै भी किसी को ढूढ़ने निकला ।
मिला कोई न तुम जैसा किसे मै ढूढ़ता पगला ।
चाहत मिट गई दिल की मुहब्बत अब नही होती ।
शिक़ायत क्या करूँ तुमसे शिक़ायत अब नही होती ।
बहुत रोका तुम्हें मैने मेरे भी पास यिक दिल है ।
इसे ठुकरा के मत जाओ बड़ी मन्नत से हाशिल है ।
ठोकर क्या लगा दिल पर कि इज़्ज़त अब नही होती ।
शिक़ायत क्या करूँ तुमसे शिक़ायत अब नही होती ।
उन्ही गलियों मे जब निकला जहाँ चुपके से आते थे ।
तुम्हारे सामने आकर ज़रा सा मुस्कराते थे ।
इशारे वो नही होते शरारत अब नही होती ।
शिक़ायत क्या करूँ तुमसे शिक़ायत अब नही होती ।
अग़र फ़ुर्सत मिले 'रकमिश' मेरा वो ख़त उठा लेना ।
उसी मे दिल बनाया था वो मेरा दिल जला देना ।
किसी के दिल जलाने से भी नफ़रत अब नही होती ।
शिक़ायत क्या करूँ तुमसे शिक़ायत अब नही होती ।
✍रकमिश सुल्तानपुरी
गीत–4
रास्ते से चल दिये रास्ता दिखाने वाले ।
मुझको भुला दिये मुझे याद आने वाले ।
उन लम्हों की यादें आती है जब जब ।
आंखों से सावन बरसता है तब तब ।
ख़ुद को छिपा लिये मुझको छिपाने वाले ।
मुझको भुला दिये मुझे याद आने वाले ।
वो फूलों सा चेहरा थी मस्त निगाहें ।
थी उनकी मर्जी वो चाहें न चाहें ।
झूठी थी तेरी चाहत नजरें मिलाने वाले ।
मुझको भुला दिये मुझे याद आने वाले ।
भूल देता मैं भी तुम्हारा वो चेहरा ।
मग़र तेरी चाहत का रिश्ता है गहरा ।
खुलेआम हम है पर्दे मे रहने वाले ।
मुझको भुला दिये मुझे याद आने वाले ।
तुम्हे प्यार करने की आंखों मे प्यास है ।
गम है जुदाई का चेहरा भी उदास है ।
हम अकेले अब प्यार करने वाले ।
मुझको भुला दिये मुझे याद आने वाले ।
पहला पहला प्यार मुझे अभी तक याद है ।
रकमिश तो प्यासा जुदाई के बाद है ।
दिल ही को मिटा बैठे खुशियां लुटाने वाले ।
मुझको भुला दिये मुझे याद आने वाले ।
गीत–5
क्या कहूँ , किससे कहूँ , रंजिश मे आज़कल ।
अलगरज दिल लुट रहा साज़िश मे आजकल ।।
इस क़ज़ा मे , इस फ़ना मे धुँआ उठ रहा ।
कौन ऐसा शक़्स है जो नही लुट रहा ।
हर हसीं के घाव से वाकिब हूँ आजकल ।
क्या कहूँ , किससे कहूँ , रंजिश मे आज़कल ।।
लूट लेते दिल की वो कलियां बिछा करके ।
छोड़ देते गमसुदा गलियां दिख करके ।
खण्डहरों मे जहाँ गर्दिश है आज़कल ।
क्या कहूँ , किससे कहूँ , रंजिश मे आज़कल ।।
दरअसल हर दिल हमे हमदर्द सा लगा ।
बेरहम देता रहा हमराह मे दग़ा ।
खेलते है बेवज़ह आतिश मे आजकल ।
क्या कहूँ , किससे कहूँ , रंजिश मे आज़कल ।।
गुनगुनाकर राह मे जो मुस्कराते थे ।
सुर्खियां मेरे प्यार की मुझको सुनाते थे ।
बात करते बाअदब मजलिश मे आज़कल ।
क्या कहूँ , किससे कहूँ , रंजिश मे आज़कल ।।
साहिलों पर हू मै भटका काटता तन्हाइयाँ ।
मंजिलो पर वे खड़े है ले रहे अंगड़ाइयां ।
चल रहा है हुक़्म उनका नर्गिस मे आजकल ।
क्या कहूँ , किससे कहूँ , रंजिश मे आज़कल ।।
गीत–6
मिटाना है मुझको तमो का ये घेरा ।
बहुत हो चुका अब अँधेरा अँधेरा ।
नही है गमों की अब परवाह मुझको ।
मिलेगी किसी दिन कोई राह मुझको ।
नही है अँधेरा तनिक भी हृदय में ।
मग़र रौशनी के लिये जल रहा हूँ ।
यहाँ झूठ की बस भरपाइया है ।
डरे है दुखो की परछाइयाँ है ।
भरे स्वार्थ में सब रुकी बेबसी है ।
अधूरी है महफ़िल ये झूठी हँसी है ।
मिले थे बहुत बन इंसान मुझको ।
मग़र आदमी के लिए चल रहा हूँ ।।
बसा है हृदय में भय सा अनोखा ।
नही है किसी को किसी पर भरोसा ।
जले प्यार की लौ तरसती हैं आँखे ।
दुखों को छिपाकर बरसती है आँखे ।
यहाँ मौत के है शाये मुक़र्रर ।
मग़र जिंदगी के लिये पल रहा हूँ ।।
गीत–7
दोस्तों से क्या कहूँ मैं रंजिसे बढ़ने लगीं है .
अब वफ़ा के नाम पर जब साजिस होने लगी है .
प्यार की महफ़िल सजी थी रास्ता आसान था .
साथ मेरे जो चला था हर कोई इंसान था ..
जब चले थे कारवां था, हमवफा थे लोग अपने .
थे सजाये चल रहे थे आरजू कुछ ख्वाब सपने .
मिल रही थी मंजिले दिल मेरा नादान था ..
साथ मेरे जो चला था हर कोई इंसान था ..
दर्द से वाक़िब नही थे, न ही गम के ज़लज़ले थे .
प्यार की चाहत मिली बस साथ सबके चल पड़े थे .
महफ़िलो से महफ़िलो तक रास्ता आसान था .
साथ मेरे जो चला था हर कोई इंसान था ..
सब बिछड़ते जा रहे थे पा के महफ़िल प्यार की .
फासले बढ़ते रहे पर थी ख़बर न हार की ..
साहिलों पर अकेला था मगर अनजान था ..
साथ मेरे जो चला था हर कोई इंसान था ..
खो गये है दोस्त सब पाके इक शाया किसी का .
न खबर आयीं किसी का न ही खत आया किसी का .
अश्क़ आँखों से बहे थे दर्द का एलान था ..
साथ मेरे जो चला था हर कोई इंसान था ..
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by ___Rakmish Sultanpuri