अफ़वाहें उड़ती रहती हैं काव्य संग्रह की समस्त कविताएं रकमिश सुल्तानपुरी द्वारा रचित है।
🌷दो शब्द🌷
सीघ्र सोचता हूँ भावों का
शब्दों में विस्तार करूँ ।
हर प्राणी के मनस पटल पर
सतपथ का संचार करूँ ।।
पुनः सोचता हूँ अर्थो से
पूरी निज अभिलाषा को ।
तृप्त करूँ हर उठी भ्रांति को
व्यक्त करूँ परिभाषा को ।।1
विह्वल हॄदय के आहों की
आहट जो सुनता होगा ।
वह हृदय कब मौन रहा नित
अमिय प्रेम बुनता होगा ।।
शब्द -शब्द बस प्रेम यहाँ पर
और अर्थ अवलम्बन है ।
सरस भाव से भरा हुआ यह
कविताओं का आँगन है ।।2
दो शब्दों की इस क्यारी में
जीवन भर के अनुभव को ।
कैसे कह दूँ, कैसे भर दूँ
स्नेह जलधि के उद्भव को ।।
भावों से संतृप्त रहा है
यह तो इसका है शौभाग्य ।
वाणी से अव्यक्त रहा है
मेरे हृदय का अनुराग ।।3
✍ रकमिश सुल्तानपुरी
1- 🌷बस वही बदलाव लाते🌷
जीत पाया है यहाँ बिन कौन हारे
राह चलते है अकेले ही सितारे
जगमगाते है धरा को , पर दुःखो को टिमटिमाते ।
बस वही बदलाव लाते ।।1
धर्म की रस्सी न जिनको बाध पाई
जाति से न मानसिकता डगमगाई ।
है अकेले पर हजारों , मन्ज़िले वो छोड़ जाते ।
बस वही बदलाव लाते ।।2
नेह का दीपक जले पर हाथ कैसे
रूढ़िता पर हो उन्हें विश्वास कैसे
वास्तविकता के लिए जो आह बिन जीवन लुटाते ।
बस वही बदलाव लाते ।।3
कर्म से जो नित नयी आशा दिखाते
है पता उनको हदें वो खुद बढ़ाते
सूरमा है देश के बलिदान की बेदी बनाते ।
बस वही बदलाव लाते ।।4
दाँव पर जिसने लगा दी उम्र सारी
देशप्रेमी सत्य के बनकर पुजारी
एक लकुटी के सहारे दुश्मनों के सर झुकाते ।
बस वही बदलाव लाते ।।
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
🌱🌱🌱
2- 🌷नवभारत के नये विहान🌷
जागो मन के
सजग पथिक ओ !
करता हूँ तेरा आह्वान ।
नव भारत के नए विहान ।।1
धूमिल आशाओं के आगे लक्ष्य मिलेगा निश्चित ।
बढ़ते जाना विश्वासों तक डर मत जाना किंचित ।
नई दिशा में
नव ऊर्जा से
नवता का देना वरदान
नव भारत के नए विहान
देख विरोधी मानवता की लपटें मत रुक जाना ।
भौतिकता की आंच देखकर पीछे मत हट जाना ।
गहन तमों में
निश्चितताओं का
करना है अनुसन्धान ।
नव भारत के नए विहान ।।2
विजय पताका ले आएगी नवयुग की इक भोर ।
तय करना है परिवर्तन की दिशा सृजन की ओर ।
साथ तुम्हारे
दृढ़ सम्बल है
ढह जाएगा हर व्यवधान ।
नव भारत के नए विहान ।।3
रीति रिवाज़ों से अवरोधित कठिन तुम्हारी राहें ।
नाम मात्र सच की पगडण्डी बाकी हैं अफवाहें ।
हे मानस के
हंस विवेकी
भर दो जीवन में उन्वान ।
नव भारत के नए विहान ।।4
लीक से हटकर सच संग डटकर करें नया निर्माण
तन में मन मे नवजीवन में चलो फूँक दें प्राण ।
ये मेरे मन
ले तन को सँग
आ कर दें सच का अवधान ।
नव भारत के नए विहान ।।5 check
-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
3- 🌷खुद ही खुद को समझता हूं🌷
दुनिया वाले स्वार्थपरकता से करते व्यवहार ।
दुःख से हृदय भर जाता है घुटने लगता प्यार ।
धीरज देकर
धीरे -धीरे
फिर भी मन को बहलाता हूँ ।
खुद ही खुद को समझाता हूँ ।।1
विषभावों से तप्त हुए है व्यंग्य वाण के छाले ।
स्नेहों की बौछारों से कोई कैसे धो ले ।
सन्नाटों मे
अश्रु बहाकर
धोते-धोते थक जाता हूँ ।
खुद ही खुद को समझाता हूँ ।।2
लोलुपता ने सम्बन्धों की बढ़ा दिया है दूरी ।
रह जाती है अपनेपन की चाहत सदा अधूरी ।
भौतिकता की
मृगतृष्णा मे
जब तब मै भी फँस जाता हूँ ।
खुद ही खुद को समझाता हूँ ।।3
हार गया हूँ ढूढ़ -ढूढ़कर जीवन की सच्चाई ।
सिर्फ़ मिली है निज कर्मो से सुख दुःख की परछाई ।
स्मृतियों से
जीवन का पथ
आलोकित करता जाता हूं ।
खुद ही खुद को समझाता हूँ ।।4
दोष किसी रिस्ते को आखिर कैसे मै दे देता ।
हार किसे मंजूर चाहते बनना सभी विजेता ।
किस हक से मै
किसे रोक दूँ
यही सोच खुद रुक जाता हूँ ।
खुद ही खुद को समझाता हूँ ।।5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
4- 🌷आखिर मै कैसे समझाता🌷
कुछ तेरी अनदेखी थी कुछ अपने वो जज्बात रहे ।
कुछ मेरी मजबूरी थी कुछ बिगड़े से हालात रहे ।
स्नेहों की
डोर पकड़कर
स्वप्नों मे कैसे बह पाता ।
आखिर कब तक मै समझाता ।।1
सन्देहों की बागों मे नित धूमिल धूमिल आहें थी ।
कुछ तो सच के फूल खिले कुछ झूठी भी अफवाहें थी ।
झूठेपन की
परछायी मे
सच्चाई कैसे दिखलाता ।
आखिर कब तक मै समझाता ।।2
नवयौवन की उन लहरों पर लिए समर्पण भावों से ।
प्रतीक्षा मे विकल हो गया तब ऊब गया ठहरावों से ।
निजता को
तुम छोड़ सके न
मैं आगे कैसे बढ जाता ।
आखिर कब तक मै समझाता ।।3
अंधकारमय इस जीवन मे आतप बनकर आये तुम ।
रूप, रंग ,गुण ,नेह पुंज इस हृदय मे उपजाये तुम ।
साहस मिलता
तनिक मुझे तो
सम्मोहन मे खुद बगदाता ।
आखिर कब तक मै समझाता ।।4
प्रेम समर्पित भावों से सब सजी हुई तशरीफ़ें थी ।
पर खुशियों के बीच हमे भी कुछ न कुछ तकलीफें थी ।
तोड़ गये
निर्दोष हृदय को
कौन किसे दोषी ठहराता ।
आखिर कब तक मै समझाता ।।5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
5- 🌷आज बढ़ता जा रहा हूँ🌷
नेह की झंकार का हो रहा उद्गम ।
तैरता ही जा रहा कुछ दूर पर संगम ।
स्पर्धाओं
के लिए
निर्वाध चलता जा रहा हूँ ।
आज बढ़ता जा रहा हूं ।।1
झूठ का तेरा मुखौटा लूट जाएगा ।
जानता हूँ स्वप्न मेरा टूट जाएगा ।
सम्भावनाओं
के लिए
खुद को छलता जा रहा हूँ ।
आज बढ़ता जा रहा हूं ।।2
फूल यह अनुराग का खिल गया देखो ।
भावनाओं से हृदय मिल गया देखो ।
उत्तेजनाओं
के लिए
उद्वेग भरता जा रहा हूँ ।
आज बढ़ता जा रहा हूं ।।3
दूर हो तुम दूर ठहरी है निगाहें ।
सुखभरी राते खड़ी है खोल बाहें ।
कल्पनाओं
के लिए
ख़्वाब बुनता जा रहा हूं ।
आज बढ़ता जा रहा हूं ।।4
सुख मिले या दुःख मिलेगी हार मुझको ।
दुर्दिनों मे इसलिए हर बार खुद को ।
यातनाओं
के लिए
तैयार करता जा रहा हूं ।
आज बढ़ता जा रहा हूं ।।5
-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
6- 🌷रातों मन के अँधेरों मे🌷
रातों मन के
अंधेरों मे
तस्वीरें चलती रहती है ,,-2
शामों से ख़ामोशी ठहरी रहती है मेरे घर ।
फ़ैली रहती है रातों भर तन्हाई की चादर ।
सुबह सबेरे
मन को घेरे
परछायीं बढ़ती रहती है ।
रातों मन के अंधेरों में,,।।1
सन्देहों की जाल बिछाती जाती याद सलोनी ।
सोने देती मुझको कैसे स्वप्नों की अनहोनी ।
चक्षु झीलों से
निकल निकल
दुःख सरिता बहती रहती है ।
रातों मन के अंधेरों मे ,,,,,,,।।2
धूमिल आहट को धोखे मे रखतीं रातें काली ।
सुबह सजाये सूरज लाता भावुकता की थाली ।
मन के बागों
मे ख़ुशबू भर
पुरवाई बहती रहती है ।
रातों मन के अंधेरों मे ,,।।3
-✍ रकमिश सुल्तानपुरी🌾
7- 🌷यह जीवन तो जिज्ञासा है🌷
यह जीवन तो जिज्ञासा है ।
दुनिया बस एक तमाशा है ।
निज कर्मो की लगा बाजिया ,हम रहते है राम भरोसे ।।1
रिस्तों की सब नाव बनाते ।
कष्टों के तूफ़ान ढहाते ।
जीवन सागर, दुःख की थाली, ले आकर के रोज परोसे ।।2
जल असंख्य तारों से मन मे ।
इस जीवन रूपी उपवन मे ।
पुनः एक दिन बुझ जाते है, आशाओं के दीप झरोखें ।।3
बना स्वार्थी ताना बाना ।
सच्चाई को भूल न जाना ।
सतपथ की सुखमय छाया मे , दर्द नही दे पाते धोखे ।।4
सुख दुःख के वह महल बनाता ।
कोशिश मे जीवन ढह जाता ।
प्रतिफल पाता निज कर्मो का , चाहे जितना विधि को कोसे ।।5
✍ रकमिश सुल्तानपुरी🌾
8- 🌷अफवाहें उड़ती रहती है🌷
इस जीवन में सत्कर्मो का सदा करो निर्माण ।
सतपथ पर चलते रहना है बिना दिये प्रमाण ।।
कठिन राह हो
गहन अँधेरा
सच्चाई जलती रहती है ।
अफवाहें उड़ती रहती है ।।1
हो सकता है मिले न मंजिल चाहत रहे अधूरी ।
राह बनेगी औरों के प्रति मिट जायेगी दूरी ।
नदी तटो पर
लहर निरंन्तर
जीवन भर लड़तीं रहती है ।
अफवाहें उड़ती रहती है ।।2
अफवाहें आती है बनकर सतपथ की कठिनाई
अफवाहों की फ़िक्र न करना झूठी है परछाई
छट जायेंगी
इक बदली सी
माना कि छलती रहती है ।
अफवाहें उड़ती रहतीं है ।।3
सहना होगा व्यंग वाण का तुमको सफल प्रहार
फिर भी विचलित न होना तुम न बदले व्यवहार
इंदु रश्मि भी
निशा दिवस का
साहस तो भरती रहती है ।
अफवाहें उड़ती रहती है ।।4
इक न इक दिन बनोगे निश्चित मंजिल के प्रणेता
युग निर्माणक कहलाओगे सच्चे सफल विजेता
बिना दुःखों के
सुख की आशा
ये दुनिया करती रहती है ।
अफवाहें उड़ती रहती है ।।5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी🌾
9- 🌷इक नयी पहचान दे दो🌷
जल रहा है बिश्व सारा क्रोध में अभिमान में
फर्क घटता जा रहा अब जानवर इंसान में
मानवता के
लिये निज
स्वार्थ का बलिदान दे दो ।
इक नयी पहचान दे दो ।1
उठ रही घातक भयंकर आंधियों का जोर है
चल इन्हें रोकें तूफानी हो रहा अब सोर है
इस कालिमा मे
ज्ञान का
फिर नया विहान से दो ।
इक नयी पहचान दे दो ।।2
लो सपथ घनघोर कुहरों सा भयंकर तम न हो
लोग मुस्काते मिले घर दर -बदर मातम न हो
नेक चेहरों
पर हँसी का
कीमती अनुदान दे दो ।
इक नयी पहचान दे दो ।।3
तुम अपंगों के लिये बैसाखियाँ सुदृड़ बनोंगे
नाथ बनकर के अनाथों का हृदय पावन करोगें
नित गले
उनको लगाकर
बस जरा सम्मान दे दो ।
इक नयी पहचान दे दो ।। 4
रिस्तों में नाहक बढ़ी दूरियाँ दुःख को सजोंती ।
अमृत सी जिंदगी में बेवजह विष घोल जाती ।।
शांति की नदियां
बहाकर
प्रेम का वरदान दे दो ।
इक नयी पहचान दे दो ।।5
-✍ रकमिश सुल्तानपुरी🌾
10- 🌷मानव आदमखोर हो गया🌷
झूठा लम्पट बन रहा, लूटे देश समाज
स्वार्थ सँजोता दूर से ,बन बैठा है बाज
सत्यवादिता थी
घूँघट सी
जरा हटी क्या चोर हो गया ।
मानव आदमखोर हो गया ।।1
चुन चुन कर खाता रहा,चिड़ियों सा वह घूस
अवसर देखा रच प्रपंच,लिया सभी को मूस
चुहचुहिया से
बना छछुंदर
लगा नाचने मोर हो गया ।
मानव आदम खोर हो गया ।।2
लेकर विष बोता रहे , जाति धर्म का नाम
मन उपजी है नीचता ,करता काम तमाम
जैसे देखी
सुन्दर काया
हवसी भावविभोर हो गया ।
मानव आदमखोर हो गया ।।3
करता फिरे ढ़कोसला, करे कुटिल अपमान
लगा मुखौटा दोगला, छुपा हुआ हैवान
चाटुकारिता
करते करते
मुँह काला पर गोर हो गया ।
मानव आदमखोर हो गया ।।4
पिछलग्गू ,चुप्पा बने ,लूट रहे है देश ।
तोड़ मरोड़ के नीचता, कर देते है पेश ।
उठ जागो सब
करो सामना
आखिर कब का भोर हो गया ।
मानव आदमखोर हो गया ।।5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी