21- 🌷दो दिन पहले और किसी से🌷
जबसे देखी सूरत तेरी जब से मिली निगाहें
तब से सिर्फ तुम्हारा चेहरा और हॄदय मे आहे
वह सुन्दरता
मै क्या करता
क्यों हटता मै पीछे ।
दो दिन पहले और किसी से ।।1
छुपकर के मै किसी तरह से जब टकटकी लगाता
कोई न कोई आकर के तब रोड़ा बन जाता
वही बहाना
फिर बहकाना
दाँत रहा हूँ पीसे ।
दो दिन पहले और किसी से ।।2
कई दिनो से सोच रहा था कर लूँ तुमसे बात
थोड़ा सा संदेह मुझे हैं ब्यस्त बहुत हालात
डरते डरते
आहे भरते
जब आते तुम नजदीके ।
दो दिन पहले और किसी से ।।3
क्योंकि तुमने संकेतों से दिया मुझे आश्वासन
और तभी से इस हॄदय पर छाया हैं पागलपन
न हैं नीदे
न उम्मीदे
जब से मिले तभी से ।
दो दिन पहले और किसी से ।।4
और आज से नहीं करूँगा तुमसे कभी शिकायत
जान रहा हू नहीं मिलेगी कभी भी मुझको राहत
बिना तुम्हारे
खुद से हारे
स्नेहो के पीछे ।
दो दिन पहले और किसी से ।।5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
22- 🌷बस धडकेगा अपना दिल🌷
जब निकलेगा सुबह एक दिन कर्मो का विज्ञापन
तब आयेगा याद तुम्हें भी अपनो का अपनापन
तब पछताने
बिना बहाने
नही मिलेगी मंजिल ।
बस धडकेगा अपना दिल ।।1
लम्हा लम्हा इस जीवन का हैं तुमनें अजमाया
दुःख के एक पलो का फिर भी मजा नही हैं पाया
जब से आये
समय गवाये
टूट पडी हैं मुश्किल ।
बस धड़केगा अपना दिल ।। 2
न जाने कितने अवसर थे ,थी कितनी अजमाइश
पर सबको अनदेखा करके की पूरी अपनी ख्वाहिश
गम की चाहत
मिली न राहत
नही बन सका काबिल ।
बस धडकेगा अपना दिल ।। 3
चूँकि तुमने सुरू किया था सबका दिल बहलाना
हुआ नसीब नहीं पर तुमकों प्यार किसी का पाना
हँसी हँसाकर
गम अपनाकर
काट रहे हो दुर्दिन ।
बस धडकेगा अपना दिल ।।4
इसीलिये अपनी यादों मे अपनों की पहचान
कभी न भूलो करते रहना पग पग पर एहसान
ताकि दूरी
रहे अधूरी
कहे न कोई कातिल ।।
बस धडकेगा अपना दिल ।। 5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
23- 🌷डाल रहा हूँ दानें🌷
अपने जीवन की राहों पर थका हुआ जो हारा
मिली सफलता न उसको फिर फिरा हैं मारा -मारा
अपने बस
असमंजस में
कौन किसे पहचाने ?
डाल रहा हूँ दानें ।। 1
ताकि संका न हो मन में बनी रहे कुछ आशा
और उजाले के चक्कर मे अंधकार हैं खासा
अपने जीते
जो भयभीते
बने रहे अंजाने ।
डाल रहा हूँ दानें ।। 2
मैं ही बना शिकारी खुद का मैं ही बना शिकार
और हॄदय को दे प्रलोभन किया मधुर ब्यवहार
जीवन शैली
झूठी थैली
पग-पग पर खिसियाने ।
डाल रहा हूँ दानें ।।3
न जाने क्या अन्तिम मंजिल कैसा हैं इतिहास ?
सच्चाई को ढूंढ न पाया किया बिफल प्रयास ;
लौट न पाया
बस पछताया
चला जो पता लगाने ।
डाल रहा हूँ दानें ।।4
भाग्य भरोसे रहा न,ढूंढा मन्दिर मस्जिद सब में
अंतर्मन मे कपट पालता शांति कहाँ तब मन में
प्रेम पतंगा
मन का चंगा ,
अधरों पर मुस्कानें ।
डाल रहा हूँ दानें ।।5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
24- 🌷प्रेम मे अन्याय क्या है🌷
हो रहीं खोजें नयी नित प्रेम की अवधारणा से
बन गये गौरव ग्रन्थ सब प्रेम की बस प्रेरणा से
फिर भी बन्धन
क्यों लगा ये
प्रेम का अघ्याय क्या है ।
प्रेम मे अन्याय क्या है ।।1
अन्तःकरण के तुष्टि हेतु इन इंद्रियों के संकेत
संकेतों मे हुये समाहित सारा सुख भर देत
क्या पता
पाया किसी ने
सांकेतिक अभिप्राय क्या है ।
प्रेम मे अन्याय क्या है ।।2
बड़े -बड़े दुःख स्नेहों से पड़ जाते हैं फीके
क्या जाता है किसी और का होती क्यों तख़लीफे
प्रतिबंधित यदि
प्रेम रहेगा
सत्य कहा फिर न्याय क्या है ।
प्रेम मे अन्याय क्या है ।।3
चेहरे पर भावों का आना भावों से सम्मोहन
क्रियाओं की प्रतिक्रिया से कल्पनात्मक दोहन
बिना किसी को
दुःख पहुचाये
इस सुख का पर्याय क्या है ।
प्रेम मे अन्याय क्या है ।।4
न भौतिकता की आहट है न है स्वार्थ परकता
एक भाव बस आत्म समर्पण सरस हृदय मे भरता
एक दूसरे
की चाहत मे
मिटने सा व्यवसाय क्या है ।
प्रेम मे अन्याय क्या है ।।5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
25- 🌷आख़िर मैं कैसे रह पाता🌷
न्योछावर क्यों न हो जाये यह जीवन सम्पूर्ण
सुंदरता रूपों पर लगती जैसे बल आघूर्ण
स्वयं उभर कर
इस हृद का
नेह मुझे बगदाता ।
आख़िर मैं कैसे रह पाता ।।1
पलक झपकते इन पलकों पर छा जाती तस्वीरें
डरती रहती रूप सँजोती खुलती धीरे -धीरे
और सामने
पाकर तुमको
हृदय आहत सा हो जाता ।
आख़िर मैं कैसे रह पाता ।।2
चाहे हों वे व्रृक्ष झरोखें या हो कोई मोड़
सदा बना रहता आँखों से आँखों का ऋजुकोण
संकेतों के
स्पर्शो से
भावों पर भरमाता ।
आख़िर मैं कैसे रह पाता ।।3
तेरा चेहरा इस हृदय को प्रकृति का उपहार
अथवा कैसे पनपाता मैं अपने दिल में प्यार
अर्धखिली
मुस्कानों के प्रति
तन मन को अर्पित कर जाता ।
आख़िर मैं कैसे रह पाता ।।4
आँखों मे आँखों का दर्पण दर्पण मे प्रतिरूप
प्रतिबिम्बों की प्रतिछाया है हृदय के अनुरूप
लगातार इस
अवलोकन की
तख़लीफे कैसे सह पाता ।
आख़िर मैं कैसे रह पाता ।।5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
26- 🌷कौन करेगा अब विश्वास🌷
मंजिल तो सब ढूढ़ रहे है प्रकृति के अनुसार
परन्तु स्वार्थी अपने मन को दे देते अधिकार
अवसर वादी
नही मानता
करता जाता है प्रयास ।
कौन करेगा अब विश्वास ।।1
किये कराये सत्कर्मो की हुई कड़ी निगरानी
त्रुटियों से बोझिल होता मन करता आनाकानी
अतिसीघ्र ही
अवलम्बन पर
बना रहा है एक निवास ।
कौन करेगा अब विश्वास ।।2
पगड़न्ड़ी से कम्पित डग से कितना करे सुधार
पंथ अपरिचित और पथिक भी पाने को आधार
मन की माने
या हृदय पर
आकर करे प्रयास ।
कौन करेगा अब विश्वास ।।3
जीवन का पथ और सफलता आ जाती नजदीक
क्षणभर मे ओझल हो जाते रहा न कुछ भी ठीक
होता रहता
यदा कदा बस
मंजिल पाने का एहसास ।
कौन करेगा अब विश्वास ।।4
बेसक जीत उसी की सम्भव होती जिसकी हार
परन्तु जीत से जिसने सीखा श्रेष्ठ रहा अधिकार
मिल जाती है
मंजिल उनको
करनी पड़ता नही तालाश ।
कौन करेगा अब विश्वास ।।5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
27- 🌷अपनेपन को दिखलाती हो🌷
आलेखित इन आँखों मे धूमिल सी तस्वीरें
दो इक दिन से उभर रही है शायद धीरे-धीरे
स्नेहों का
रंग भरा है
इंद्रधनुष सा खिल जाती हो ।
अपनेपन को दिखलाती हो ।।1
कभी दूर तो कभी पास पर रहती हो सम्भावित
हर प्रकार से इस हृदय को करती हो प्रभावित
भावों का
प्रत्यारोपण कर
इक तितली सा इठलातीं हो ।
अपनेपन को दिखलाती हो ।।2
प्रदर्शित इन भावों से हो जाता दिल आहत
फिर तो मुश्किल हो जाती है पानी थोड़ी राहत
विह्वल करके
इस हृदय को
पुनः कही तुम छिप जाती हो ।
अपनेपन को दिखलाती हो ।।3
फिर मेरी आँखों मे बनता प्रिज़्म और इक छाया
बहुरूपी भावों वाली सुंदरतम वह काया
सम्मोहन सब
मिट जाता है
जैसे ही तुम मिल जाती हो ।
अपनेपन को दिखलाती हो ।।4
सच तो यह है कि हृदय मे तेरे प्रति है प्यार
वही उभर कर बन जाता है रूपों का संसार
तुम भी तो अब
संकेतों से
तन को ,मन को अजमाती हो ।
अपनेपन को दिखलाती हो ।।5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
28- 🌷पुनः दुःखो को भर जाओगे🌷
समझ रहा हूं संकेतों के सभी सफल प्रहार
पर कैसे भर दू आँखों में इन आँखों का प्यार
भावों का
इक बाँध बनाकर
चलने से तुम डर जाओगे ।
पुनः दुःखो को भर जाओगे ।।1
तुम्हे पता क्या इन आँखों मे आँसू की गहराई
बूँद-बूँद कर ढर जाती है यादों की परछायीं
सर्दीले मौसम
मे आकर
भींग भींग कर ठर जाओगे ।
पुनः दुःखों को भर जाओगे ।।2
न जाने किन आयामों से माप रहे हो मुझको
आखिर क्यों तुम चाह रहे हो तड़पाना ही खुद को
थोड़ा सा
आघात मिलेगा
वादों से तुम टर जाओगे ।
पुनः दुःखो को भर जाओगे ।।3
उचित नही है यह नयनों का नयनों से संयोग
रहने दो इस आहत दिल पर करने का प्रयोग
प्रतिबिम्बो की
आहट बनकर
हृदय में घर कर जाओगे ।
पुनः दुःखो को भर जाओगे ।।4
और न झाँको इन आँखों मे बन जायेगी रेखा
नही कर सकूँगा मै तुमको भी शायद अनदेखा
कभी बिछड़कर
इन पलकों से
एक बूंद सा झर जाओगे ।
पुनः दुःखो को भर जाओगे ।।5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
29- 🌷कैसे पनप सके अनुराग🌷
बरसातों में बह जाते है जैसे खरपतवार
बह जाती वैसी आशायें खो जाता अधिकार
प्रगतिशीलता
की आंधी में
दीनों का दुर्दिन दुर्भाग्य ।।
कैसे पनप सके अनुराग ।।1।।
आरक्षण से बुद्धि कुशलता की होगी जब माप
किसी वर्ग सा फिर कैसे निकलेगा परिमाप
रेखाएँ जब
नही समान्तर
हैं नही बराबर भाग ।।
कैसे पनप सके अनुराग ।।2।।
सिर्फ स्वयं की अर्थसिद्धि में खड़े है आँख गड़ाये
औरों की भी लपक रहे है पायें या न पायें
डाल डाल पर
बैठे है अब
कोयल बनकर काग ।।
कैसे पनप सके अनुराग ।।3।।
न जाने किस मनोवृत्ति से तृप्ति मिलेगी मन को
आत्मसात करते हृदय में विफलित धोखेपन को
फिर भी सब कुछ
पच जाता है
न जाने है कैसे घाघ ।।
कैसे पनप सके अनुराग ।4।।
कर्मो की ही बात नही अब निश्चित कर उद्देश्य
ततपरता से मानवता से प्राप्त करो अनिमेष
फिर देखेंगे
किस आँचल में
छिप पायेगा दाग़ ।।
कैसे पनप सके अनुराग ।।5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
30- 🌷इक न इक दिन पछताना है🌷
जीवन सारा ढह जाता है अनुरागों के नाते
पर सच्चे उद्देश्यों का हम पता नही है पाते
कृत्रिमता की
डोर पकड़कर
व्यर्थ हुआ खुद को अजमाना ।
इक न इक दिन है पछताना ।।1
न जाने क्यों अपनेपन की मची हुई है होड़
जीवन भर उसको पाने की करते है गठजोड़
अभ्यासों से
प्रयासों से
सोंच रहे बिल्कुल नियराना ।
इक न इक दिन है पछताना ।।2
एक परिधि से परे हो गयी जब मानव की आशा
अरे! तभी तो बदल गयी है जीवन की परिभाषा
अंधकार में
चाह रहें है
अंधो को दिखलाना ।।
इक न इक दिन है पछताना ।।3
बहुरूपी ,बड़बोलेपन की फ़ैल रही है काया
और कुटिलता की परतों की पड़ी हुयी है छाया
धोते धोते
कालिख़ मन की
कभी न दिल को है पहचाना ।
इक न इक दिन है पछताना ।।4
और कभी जब लगे सताने इस जीवन की पीड़ा
हो जाता है धूमिल धूमिल वही सुखों का बीड़ा
जिसको हमने
तय कर डाला
परन्तु कभी न जाना ।।
इक न इक दिन है पछताना ।।5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
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