Rakmish Sultanpuri द्वारा रचित सरसई धूप भाग–3
21.तब अतीत में
तब अतीत में
सजते रहते
वर्षों तक
स्नेहों के अभिनव अंकुर
पवनदूत थे ,मेघदूत थे सांसो के स्पंदन तक
और आज
मिस्कालों तक
बढ़ा हुआ संक्षिप्त हो गया ।
स्मृतिओं के
सुखद क्षणों के
आस्वादन का
समय नही रह गया है
निरंकुशता की एक लहर में भावुकता कुढ़ जाती है
पंथ नही हैं
न अधीर डग
दृश्य भी संतृप्त हो गया ।
बदल रही है
चित्तवृत्तियाँ
जर्जरता में
आशाओं के आधारों पर
स्नेहों के संकीर्ण मार्ग से गंतव्यों तक
व्यभिचारों के
सुविचारों में
बिवस हुआ मन लिप्त हो गया ।
***
22.जिन पौधों के। 23/04/10
जिन पौधों के
जिन पुष्पों का
संसर्ग प्राप्त करके दोनों
पुनः मिल सके थे
कल ही अनुपस्थिति में तुम्हारे प्रौढ़ हो गयी थी
आज सेवारें
सूनी है फिर
उन फसलों के कट जाने पर ।
नीलगायें भी
प्रबल वेग से
दौड़ रहीं है
इस घाटी से दूर क्षितिज तक
किसी किसान को अब कोई दुःख नही हो रहा है
शेष निराशा
तृणाग्रो पर
उस सरिता के घट जाने पर।
उस मयूर का
नर्तन अभिनय
और खगों को निरख –निरख कर
ऊब गया सा हूं
स्मृतिओं के सँग अविद्यमान दृश्य को खोज रहा हूं ।
दुःख में दुःख है,
पुनः अचानक
प्रतिबिम्बों के हट जाने पर ।
***
23.।प्रेम नही यह पागलपन है ।
ये आँखे तो
तपी हुईं है
देख –देखकर
आकर्षित परछायीं को
हर चेहरे पर ढूंढ़ रहे है वैकल्पित अनुरागो को
ब्यंग्य बोलकर
हँसी ले रहें
प्रेम नही यह छिछलापन है ।
छिछलापन भी
एक रूप है
मन पर
आकर्षण फ़ैलाने का
शब्दों की प्रतिध्वनियों से ही हृदय व्यथित होता है
परन्तु क्षुब्ध
यह मन होता है
प्रेम नही यह अंधापन है ।
अंधापन तो
स्वच्छ प्रमाण है
अनुरागों की
विह्वलता का
मन की आँखों से प्रेमचिन्ह टटकोर सके तो
वह इक भौतिक
तृषा मात्र है ।
प्रेम नही यह पागलपन है ।
***
24.अब तक अपने मन के ।
और अभी भी
आ जाती हैं तस्वीरे
मेरी यादों में
छण भर ,
रुक जाते हैं
दुख देते हैं
लम्हें इस जीवन के ।
अब तक अपने मन के ।
चुप रहता हूँ
बहुत देर तक
सोच –सोचकर
घटनाओं को,यादों को
तभी अचानक
हो जाता शक
जब आती परछाया बनके ।
अब तक अपने मन के ।
इस कुहरे में
पाकर ठण्डक
सिकुड़ गयी हैं
आशाएं स्नेहो की,
काँप रही हैं
ताप रही हैं
चाहत भी अब डर के ।
अब तक अपने मन के ।
सिर्फ तुम्हारे
चुप रहने से
शेष फाँसले बने रह गये
संदेहों में,
काश! कि आते
हम बरसाते
आँसू अपनेपन के ।
अब तक अपने मन के ।
***
25. अब मेरा मन डरा हुआ है।
पतझड के दिन
और धूप में
इन पत्तों सी
टूट रही हैं उम्मीदें
कुछ दिन तक तो हॄदय न माना
परन्तु आज फिर
तन्हा –तन्हा
और दुखों से भरा हुआ है ।
अब मेरा मन डरा हुआ हैं ।
जब तक था मैं
पास तुम्हारे
तस्वीरें थी छिपी
तुम्हारी आँखों में
आकर्षण था अवलम्बन था मेरे मन में, मेरे दिल में
अब तो केवल
बोझ दुखों का धरा हुआ हैं ।
अब मेरा मन डरा हुआ हैं ।
एक ठूंठ सा
बचा रह गया
सूख रहा दिल
अब आ जाओ
यही फाँसले कम हो जाते तो शायद मैं
पा ही जाता
जीवन अपना
आँखों में तेरी भरा हुआ हैं ।
अब मेरा मन डरा हुआ हैं ।
****
26.शायद तुमको पता नही है
जबकि सबने
चेहरा देखा
दिल की हालत
कभी न पूंछी
बिना कहे अनकही बात वह आँखों से तुमनें कह डाली
तेरे दिल की
यह सुन्दरता
शायद तुमको पता नही है ।
न जाने कितने
लोगों ने
अजमाया हैं
मेरे दिल को
और सभी बस मतलब भर का ठहर –ठहर कर चले गये
पर तेरे मन की
यह कोमलता
शायद तुमको पता नही है ।
कुछ भी हो पर
रूप तुम्हारा
इस दिल में
अब झलक रहा हैं
उन साँसों की खुशबू में, मै अनचाहा पर डूब गया हूँ
तेरे तन की
यह नाजुकता
शायद तुमको पता नही है ।
***
27.स्नेहों में पागलपन को
चलते-चलते
प्रेमपथों पर
रुक जाता हूँ
असमंजस के कारण
क्योंकि तस्वीरें वे आती रहती आहट बनकर यादों की
और निराशा
देकर झांसा
बगदाती हैं मेरे मन को ।
स्नेहो मे पागलपन को ।
उलझ गया हूं
एक पथिक सा
और रास्ते भरे हुये हैं
दुबिधाओ से कठिनाई से
और अकेले तन्हा– तन्हा भीग रहा हूँ मायूसी में,
जब –जब चलता
बहुत अखरता
तकलीफें होती हैं तन को ।
स्नेहो मे पागलपन को ।
बहुत हो चुका
मुझसे धोखा
अब मै तुमसे दूर रहूँगा
दर्द भरा या सुखद रास्ता
चलना तो हैं आज नहीं तो कल पहुचूगा देर –सबेर
मै क्या करता
यदि न सहता
इस अपयश रूपी धन को ।
स्नेहो में पागलपन को ।
***
28.थोड़ी सी आदत हो जाती ।
और
तभी तक
प्यार पनपता रहता है
एक दूसरे के दिल में
जब तक हमनें कहा नही है ,सुना नही है
बनती जाती
है तस्वीरें
चाहत की आदत हो जाती ।
और
जुबां तक
आते– आते
संदेहों के समाधान तक
हद होते ही निश्चितताये रुक जाती है ढह जाती है उत्सुकताये
आती –जाती
थोड़ी सी राहत हो जाती ।
और अन्त में
गहराई तक
निष्कर्षो तक
ब्याकुलता की तह तक
पहुंच– पहुंच कर फिर मडराती रुस्वाई आ ही जाती बिना बताये,
धीरे –धीरे
जीवन की आहट हो जाती ।
****
29. जीवन का वह अमृत रस था ।11/05/10
आज शाम की
अति अधीरता
उर को झांकी
दिखा रही है
प्रतीक्षा की घड़ी मिट गयी सम्पर्को से
स्पर्शो से
उभर रहा जो
स्पंदित वह सरस् सरस था ।
प्रबल हो रही
थी इच्छाएँ
मुखरित स्वर के
दब जाने से
पूर्ण हुई रहने की इच्छा संसर्गो में
संकेतो के
अवलम्बन से
खिसक रहा वह एक बरस था ।
प्रस्फुटित हो रहे
उन अधरों पर
स्नेहों के
दृश्यमान कण
जो छिटक रहे थे नभ उडगन से
वही ,ज्योति ,थी
उल्लासों की
जीवन का वह अमृत रस था ।
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30. विश्वासों की एक कड़ी वह ।
25/05/10
अनुरागों की
जटिल सृंखला
तन जायेगी
कड़ी धूप में
जिसने मन को बांध लिया है
धीरे –धीरे
ढल जायेगी एक कड़ी वह ।
कलियों से वह
सरस पंखुड़ी
उस पतझङ में
वृक्षों के पत्ते
स्मृति मार्ग भी उसी तरह से हो जाएगी जर्जर
न दौड़ सकेंगे
मन के वे पर
जब आ जायेगी एक घड़ी वह ।
मिट जायेंगे
सभी झरोंखे
आंखों से ओझल
हो जाने पर
कभी न कभी आशातीत
में झर जायेगी
संकुचित होकर
शुष्क हृदय से
अनुरागों की एक झड़ी वह ।
समस्त रचनाएं Rakmish Sultanpuri द्वारा रचित और प्रकाशित हैं ।
सरसई धूप भाग 4 की रचनाएं भी अवश्य पढ़े ।