सरसई धूप भाग –4

Rakmish Sultanpuri द्वारा रचित एवं प्रकाशित सरसई धूप भाग 4 की रचनाएं 


     31.स्नेहों की इक परछायीं ।
                 28/05/10

इस हृदय पर
अधिकारों से
अमिट छाप
भरते रहते है
प्रियवाक्य से मुस्कानों से भर देते है
तन में
मन में
स्नेहों की इक परछायीं ।1।

वर्षो में
या दो वर्षों में
मुड़ जाते है
पंथ छोड़कर
भौतिकता मे संसर्गो में हो जाते है
बहुत दूर वे
रीति –रिवाजों
से आ जाती धुमिलाई ।2।।

एक स्वप्न की
भाँति तुम्हारी
अनुरागों की
प्रतिक्रिया भी
प्रेमपथों पर कुचल– कुचल कर बढ़ जायेगी
और एक दिन
बज जाएगी
तेरी भी सहनाई ।3।

                   ***

             32. और इसी मे अपना हित है ।।
                            10/06/10

स्वप्नों की
नैसर्गिक'ज्योति'
खींच रही है
मेरे मन को
स्नेहों मे प्रेमपथों की कल्पभूमि वह
नही मिल सकी
और किसी को
और आज तक अपराजित है ।1।

आशायें भी
प्रबल हो रही
जिज्ञाषा तो
अटल ,अडिग है
उसी दृश्य का स्मृतियों तक न आने से
भृमित होकर
आते –जाते
उर मेरा यह सशंकित है ।2।

भौतिकता के
आधारों पर
जीवन का
अस्तित्व है सम्भव
त्याग करूँ मैं किस जीवन का सफल अर्थ में
दो नावों की
सोंच रहा हूं
और इसी में अपना हित है ।3।

          ***


             33.जाने दो फिर और किसी दिन ।
                             15/07/10

आज धरा पर
बहते जल सी
फैल गयी है
मधुमास की यह हरियाली
तन पर तेरे, खींच रही है चंचल मन को।
ठहर– ठहर कर
रुक जाऊँगा
जाने दो फिर और किसी दिन ।1।

अगर हो सके
बौछारों तक
सहते रहना
सघन उमस यह
अभी अभी मन-मोर आस संतृप्त नही है
ह्रदय व्यथा को
कह जाऊँगा
जाने दो फिर और किसी दिन ।।2।।

परिवर्तन की
हवा से तुम पर
प्रतिक्रिया का मनन
उचित हो सकेगा
फिर भी झरती रही प्रेम रश्मि इन आँखों में
अनुरागों को
भर जाऊँगा
जाने दो फिर और किसी दिन ।3।

      ****

                  34. वही पुरानी कविताएँ है ।
                            05/09/10

और अभी भी
पल्लवित होकर
स्मृति पयोधर
तैर रहे है  
भावों के विक्षोभ मण्डल पर द्रवित हो रही
स्मृतियाँ है
अरे नही यह
वही पुरानी घटनाएँ है ।1।

जिसने मन में
अन्तःकरण में
अंकित करके
अविस्मरणीय दृश्य
नवजीवन की आशाओं से, संघर्षो से
दिखा रही है
अरे नही यह
वही पुरानी बाधाएं है ।2।

जो आकर के
सभी पथों पर
सूर्य किरण सी
फैल गयी हैं
गंतव्यों तक धीरे –धीरे बढ़े डगों से बढ़ जाती है
अरे नही यह
किसी और की
वही पुरानी कविताएँ है ।3।

              ****

                    35.दुहराते है अभ्यासों को ।
                            07/10/10

सन्देहों पर
किसने कब तक
ठहराया है
आत्म विजय को
अवलोकन से अनुरागों से सघन रात्रि में
तारों से वे
उभर –उभर कर
ढहते रहते विश्वासों को ।1।

फिर भी मन को
शांति मिली है
बौछारों से
हल्की –हल्की
संकित मन भी भीग –भीग कर ठहर गया है
व्यकुल दृग भी
अवसरगामी
दुहराते है अभ्यासों को ।2।

और हृदय में
रुकती छनकर
आशाओं की
इक दो बूंदे
ढाढ़स बध जाता मन को ,नयनों को, संकेतो को,
तृप्त हो रहे
स्नेहलता के
निरख निरख कर परिहासों को ।3।

                 ***



            36 मुझे पता है तुम्हें पता है।
                          10/10/10

आकर्षण की
सघन वायु में
स्पंदित हो रहे
अधर हैं ।
अरुणोदय की अरुण 'ज्योति के परिवर्तन से
छाया पाकर
उद्दीप्त हो रहे
अधरों पर यह कोमलता है ।1।

उसी नयन की
उसी धार में
जिसमे बहते
अमृत भाव है 
मुझे डुबो दो ,मुझे भिगा दो छणभर भर के 
नयनों को
तुमने देखा है
आख़िर कितनी विह्वलता है ।2।

समृतियों में
बहुत पास है
बड़ी दूर तुम
सन्नाटों में
मै देखू या तुम देखो स्वप्नों का क्या है
मेरी हालत
और तुम्हारी
मुझे पता है तुम्हे पता है ।3।

         ***


              37 रूप तुम्हारा दर्शनीय है ।
                               28/10/10

शायद तुम भी
समझ सके न
संकेतो को
इस हृदय को
आशाओं की छाया मौन खड़ी है रुकी हुई है
कभी न हिलती
कभी न डुलती
चित्रित सी वह चिंतनीय है ।1।

उस गर्मी से
इस सर्दी तक
विचारों की
जो एक परत है
स्नेह दृष्टि से फौव्वारों से धो देता हूं खुद को
निर्मल मन से
आकर्षित तन
छन भर ही पर प्रशंसनीय है ।2।

कैसे कब तक
चला सका हूं 
मन भावों पर
नौकाओं को
लक्ष्यहीन आशायें है इन कुहरों में और धुंध में ,
शशि किरणों के
स्नानों से
रूप तुम्हारा दर्शनीय है ।3।

             *****

               38.और उसी में मुझको सुख था ।
                                 29/10/10

अंधकार में
रुकी हुई थी
अनुरागों की
स्वप्न कथा वो
यही वृक्ष थे, यही फूल थे, यही टहनियाँ
भाव था कोमल
अस्थायी
और उसी में मुझको सुख था  ।1।

दूर –दूर से
कोना –कोना
सजग नयन से
ढूढ रहे थे
इसी धूप में ,इसी छांव की विह्वलता में
मुस्कानों पर
थी परछायीं
और उसी में मुझको सुख था ।2।

कभी कॉपियां
कभी किताबें
आती –जाती
अदल –बदल कर
इन्ही कनेरों की छाया में प्रेमयन्त्र पर
प्रेम चिन्ह का
अवलोकन था
और उसी में मुझको सुख था।3।

        ***


             39.किरण दिख रही है ।
                      19/11/10

उन शब्दों से
दुःखी हो गयी
कोमल मन की
सरस् भावना
सन्देहों के अंधकार मे हल्की– हल्की
तेरे उर में
अनुरागों की
किरण दिख रही है ।1।

आंसू थे
पलको पर फिर भी
अंतर्मन को
व्यथित कर गये
जिस हृदय में अपनेपन से कभी न देखा कभी न झांका
सिर्फ तुम्हारे
चेहरे की
किरण दिख रही है ।2।

संकेतों के
प्रयासों से
उर मे तेरे
विश्रामालय बना लिया है
खोज रहा था वर्षो जिसको दूर –दूर तक
उसी आकृति
उस रेखा की
किरण दिख रही है ।3।।

   ***


                30किसी स्वप्न सा झूठ रहा है ।
                                  29/11/10

और तुम्हें तो
मालुम ही है
सारी भाषा
स्नेहों की
जिससे तुमने इस हृदय पर घाव किया है
भाव भरा है
अनुरागों का
अब अंकुर सा फूट रहा है ।1।

सूनेपन में
कभी स्वप्न में
व्याख्या करके
संकेतो की
विह्वलता की सघन जाल में उलझ गया हूं
सुलझ रहा है
संकेतों बिन
हिमखण्डों सा टूट रहा है ।2।

भय है मुझको
इस हृदय से
क्योकि यह भी
संकेतो से जुड़ा हुआ है
स्पंदन से कही रुध गया ,कही विध गया वह तो
कभी न कहना
कि व्याख्याएँ
किसी स्वप्न सा झूठ रहा है ।3।

                 ****

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