Rakmish Sultanpuri द्वारा सरसई धूप भाग 5 की रचनाएं ।
41. तू मेरा हृदय है ।
20।11।10
रूप तुम्हारा स्मृतियों में
उभर –उभर कर
आता –जाता
क्या सच है क्या झूठ तुम्हें कैसे बतलाऊँ ?
पूर्णरूप से
सच है क्योंकि
वह मेरा स्वप्नालय है ।।
न जाने
कितने पुष्पों से
रँग जाती है
नयनों की परछायी
और तुम्हारे अधराधर के अनुरागों पर
रुकी हुई है
हटकर क्योंकि
तू कलियों की किशलय है ।।
सन्नाटा है
अखिल विश्व में
और तुम्हारी
रेखाकृति है
दूर सही पर रुकी हुई है साँसे प्रतीक्षा में
मन्द सही पर
है स्पंदन
क्योंकि तू मेरा हृदय है ।।
*"*
42.अनुरागों के प्रलोभन में ।
24/11/10
अरे –अरे यह
चित्र तुम्हारा
इस हृदय में
अंकित है
और तुम्हारे नयनों को कुछ भ्रंम हो गया है
किसे ढूढते
मुझे भूलकर
अनुरागों के प्रलोभन में ।।
कितने मौसम
कितने दिन से
स्नेहांकुर
सींच रहा हूं ।
अपलक नयनों की ज्योति से दुःखी हो रहा है
यह हृदय भी
व्यस्त हो गया
संकेतों के संसोधन में ।।
देख रहा हूं
सोच रहा हूं
प्रतिबिम्बों को
स्नेहों के दर्पण में
उसी हृदय में किसी और की स्नेहलता सधन हो गयी है
आश्वासन के
शब्द बचे न
इस हृदय के सम्बोधन में ।।
***
43.दिवा स्वयं को निरख निरख कर ।
25/01/11
और आज भी
वह हिमनद
खिसक रहा है
धीरे –धीरे
वर्षो पहले जिसको तुमने सँचित कर रखा था
इस हृदय में
इन आँखों तक
आते रहते पिघल– पिघल कर ।।
जब ये आंखें
भर जाती है
ढर जाते है
दो एक बूँद
क्षणभर में ही
जाती है इस चेहरे पर
स्मृतियों के
इस आतप में
छिप जाते है सूख सूख कर ।।
और अचानक
आहट पाकर
वतमान में
लौट रहा हूं
कोस रहा हूं चंचल मन की चंचलता को
दुःख मे भी
सुख पा जाता
दिवा स्वप्न को निरख निरखकर ।।
***
44.इस हृदय के आँगन में ।
रिपब्लिक डे 2011
यही तुम्हारा
रूप एक दिन
आया था
मेरे स्वप्नों में
ढूढ़ रहा था तब से तुमको स्वप्नों के कानन में
आज मिले तुम
फूल खिले है
इस हृदय के आँगन में ।।
निरख रहा था
चित्र तुम्हारा
टकटकी लगाकर
बहुत चाव से
सुख था हृदय भींग रहा था स्नेहों के सावन में ।
झलक रहा था
अंग –अंग तक
चमक रहा था पावन में ।।
तृप्त हो गया
है यह हृदय
आँखे प्यासी
प्यासी हैं
स्वप्नों मे ही पर मिलना तुम मेरे सुख के पालन में
सकुचाना तुम
मुस्काना तुम
तुमको है हर बार नमे ।।
***
45.और नही है परिभाषा कुछ ।।
27/04 /11
यह स्वप्नों की
नही सत्यता
हृदय के इन
अनुरागों की
यही दुःखद है, नही मिल सका संसर्ग तुम्हारा
इस जीवन में
परन्तु मनो को
और नही है निराशा कुछ ।।
प्रेम वही है
जो अधरों से
और तुम्हारी
इन आँखों से
झरकर झरनों सा समा रहा है इन आंखों में
इस हृदय तक
सन्तुष्टि की
और नही है परिभाषा कुछ ।।
न बह जाये
इन आँखों से
जब तक आँसू
की दो बूँद
रहू निरखता तब तक तुमको ,इन आँखों में
बिम्ब स्वयं का
देख सकू मैं
और नही है अभिलाषा कुछ ।।
***
46.करता रहता हूं प्रबन्ध ।। 05/02/11
इस कुहरे में
मुस्काते है
सरसो के कुछ फूल
तुम्हारे रूपों सा
भींग रही हैं स्मृतियों से आंखों मे तस्वीरे
तुम्हें देखकर
मुस्कानों पर
बढ़ता जाता है प्रतिबन्ध ।।
इधर उधर से
कनखियों से
निरख –निरख कर
बचकानी आहट को
प्रेरित करके स्नेहों की परछायी को
तुम्हें दिखाने
तुम्हें बताने का
करता रहता हूं प्रबन्ध ।।
आख़िर तुम भी
और हृदय यह
सुन सकता है
कोलाहल वह
चींख –चींख कर स्मृतियां भी सुबक रहीं हैं
अब तो तुम्हारी
आहट से ही
आती कोमल सरस सुगन्ध ।।
***
47.प्रथम मिलन से प्रस्तावित है ।। 18/02/11
आशाओं मे ही
बीत गया वह
प्रेम दिवस भी
प्रेम पथों पर आकरके
जबकि तुमने कभी न सोचा कभी न झांका हृदय में
जो बस दर्शन
भर से तेरे
निशास्वप्न तक प्रभावित है ।।
परन्तु तुम्हारी
क्या है कैसे
गतिविधियां
जीवन जीने की
मेघाच्छन्न बादलों सा स्नेह भरे हृदय से
आज नही पर
कल परसों तो
वर्षा निश्चित सम्भावित है ।।
फिर क्यो आँखे
प्यासी प्यासी
हर दिन
रह जाने देते हो
ये आंखे तो बौछारों से ही शायद खिल जयेंगी
स्नेहों का
अनुमोदन तो
प्रथम मिलन से प्रस्तावित है ।।
**
48.इस हृदय को उलझन मे ।। 15/02/11
सिर्फ तुम्हारी
इन आँखों में
छण भर ही तो
झाँक रहा था
जैसे राकापति झाँक रहा था किसी झील में
न जाने क्या
खींच रहा है
इस हृदय को उलझन में ।।
और तुम्हारी
भी आंखे
उस चेहरे पर
स्थिर हो जाती हैं
जैसे वर्षा मे भींग रही पुष्पित कोई इंद्रधनुष हो ।
छिप जाती फिर
तितली सी तुम
अरहर सरसो के उपवन में ।।
इन आँखों की
अवलोकन की
त्रिशा कभी क्या
हो पायेगी तृप्त
ज्ञात नही हो सकेगी तुमको हृदय व्यथा मेरी
अभिनव अंकुर
मुरझाने तक
परजीवी इस तनमन में ।।
***
48.याद कहा आती होगी ।। 16/02/11
देख नही सकता
तुमको मैं
टकटकी लगाकर
इन आँखों से
ये आंखे भी तरस गयी है सिर्फ तुम्हारे अवलोकन को
उस हृदय में
स्वप्निल मन में
भी हलचल होती होगी ।।
किसी तरह से
साम्य नही है
इस कंकण से उस हीरे का
जिसने भावों के आयुध से उर को आहत कर डाला है
जिसे चाँदनी
स्नेह रश्मि से
मुखमण्डल धोती होगी ।।
पर भावुक इस
हृदय को
छणभर भी
सन्तोष नही होता है
परन्तु तुम्हारे जीवन पथ की होंगी कुछ सीमाएं
अभिलाषा भी
और व्यस्तता
याद कहां आती होंगी ।।
***
50.मेरे मन की गहराई तक ।। 16/02/11
मुस्काते इन
अधरों से फैली
मत डूबो
स्नेह रश्मियों में
नयनों के इस गहन गर्त मे छिपे हुये है
निरख सको तो
कोशिश कर लो
तस्वीरों को परछाई तक ।।
बहते रहते
चित्र उभरने
मिटने का क्रम
घाव कर गया है
पिघल सकेगा न यह हृदय छणभर स्नेहों से
पड़ सकता है
थोड़ा सा दुःख
स्नेहों की भरपाई तक ।।
मैं जो तुमको
निरख रहा था।
खोज रहा था
स्नेह औषधि भावों में
यह मत समझो अवलोकन मे आँखे प्रेमातुर हैं
आते– आते तक जाओगे
मेरे मन की गहराई तक ।।
***
51.तुम बिन बहुत करकती हैं । 17/02/11
आज सुबह से
तेरा चेहरा
फिर देख रहा हूं
हाथों की रेखाएं
किसी तरह से नही मिल रही दूर दूर तक अभाएँ
न ही तेरी
आशाओं की
वह इक डोर झलकती है ।।
जिसे पकड़कर
धीरे– धीरे
पहुंच सकूँ मै
कभी तुम्हारे स्वप्नों तक
व्यथित कर सकूं तन को मन को स्पंदित हृदय से
और हमारी
आंखे भी तो
स्वप्नों मे दुखी तरसती है ।।
जिसमे मैंने
बना लिया है
स्नेहों का एक घरौंदा
बूँद– बूंद तिनको से
तुम रह जाओ एक रात ही फिर उषाकाल मे चल देना
पर आ जाओ
किसी रात को
तुम बिन बहुत करकती है ।।
***
52. प्रथम मिलन से प्रस्तावित है
52 18/02/11
आशाओं में ही
बीत गया वह
प्रेम दिवस भी
प्रेम पथों पर आकर के
जबकि तुमने कभी न सोचा कभी न झांका हृदय में
जो बस दर्शन
भर से मन में तेरे
निशा स्वप्न तक प्रभावित है ।
परंतु तुम्हारी
क्या है कैसे
गतिविधियां
जीवन जीने की
मेघाछन्न बादलों सा स्नेह भरे हृदय से
आज नहीं पर
कल परसो तो
वर्षा निश्चित संभावित है ।
फिर क्यों आंखें
प्यासी प्यासी
हर दिन
रह जाने देते हो
यें आंखें तो बौछारों से ही शायद खिल जाएंगी
स्नेहों का अनुमोदन तो
प्रथम मिलन से प्रस्तावित है ।
53. परिधानों से ढाक रहे थे
18/02/11
भूल गया हूं
इस बसंत को
आते-आते
खेतों की पगडंडी से
सरसों के पुष्पों से पल्लवित जिनकी स्मृतियों में
पास पहुंच कर के
देखा तो हरियाली को ताक रहे थे ।
फिर मेरे
आने की आहट से
बाधित हो गई
तारतम्यता अवलोकन की
मैं तो उनके ही दर्शन का अनुरागी था अभिलाषी था
जो तन की
कुछ पारदर्शिता
परिधानों से ढाक रहे थे ।
यह हृदय भी
शिहर गया था
आभाषित
प्रतिबिंब देख कर के
चंचलता यह माने कैसे भावावेषित हो करके
जब उनको
कनखियों से देखा
आखिर वह भी झांक रहे थे ।
54.
तुम तो शायद
सीख रहे हो
कोमल पंखों से
इस आसमान में उड़ना
लेकिन मैं तो दर्शन भर से व्यतीत हो गया हूं
शायद तुम को
पता नहीं है
तेरा यह तरसाना ।
अभी अभी तो
प्रखर हो रहा
भाव का संचार
तुम्हारी आंखों में की गहराई में
जिन पर यह कलुषित कठोर मन मुग्ध हो रहा है
पाकर आहट
स्नेहों की
रोक रहे हो सकुचाना ।
उस
पतझड़ के
आते आते
भूल न जाना
इस बसन्त के आकर्षण को
बस ऐसे ही रो निरखते मन के संकेतों को
धीरे धीरे
सिख जावोगे
कलियों सा मुस्काना ।
55
अब उनके भी
अन्तःकरण मे
झलक रही है
स्नेहों की परछायी
परख रहा हूं भावावेश को संकेतों के आस्वादन से
कुछ दिन तक तो
मैने भी
अवलोकन का दुःख पाया था ।
निरलम्ब ने
अवलम्बन का
सामंजस्य
प्राप्त कर लिया है
फिर उनको अनुभूति नही तो व्यर्थ हो रहा है
क्योंकि उसने
बस भावों तक
स्नेहों का सुख पाया था ।
अब नयनों से
आभाषित कर
स्मृतियों का
महल खड़ा कर रहा हूँ
कहीं हमारे प्रति तो कोई कमी नही रह गयी है
क्योंकि उसने
मेरे दिल को
आकर्षक मे उकसाया था ।
56
स्नेहों की
पराकाष्ठा
सुलझ गई हैं
एक फसल सी तन मे
परन्तु अंकुरित हृदय कणों को सींच रहा हूँ प्रतीक्षा मे
ये आशाएं
ही तो मेरे
पल्लवित दुःख का कारण है ।
सन्नाटों मे
पुनः हो रहा
गुंजन
उदासीनता का
परन्तु चित्र भी बदल रहा है दृष्टिपात पुष्पों से
और क्रमशः
हर पुष्पों तक
बस एक चित्र का निर्धारण है ।
छिपा हुआ है
यह भृम मेरा
फैल गया है
इन पुष्पों के आकर्षण मे
मिला नही अवशर तक अब तक अवलोकन का
आशाएं है
चित्र तुम्हारा
स्नेहों का पारण है ।
57.
इन पलकों पर
ये आशाएं
सोच-सोच कर
कि कब आओगे
धीरे धीरे स्मृतियों मे दिवास्वप्न के सन्नाटों में
साहस पाकर
चंद्रकला सी
दो इक दिन में बढ़ जाएगी
किंतु दुखी है
यें आंखें
पूर्णमासी के
इस शशांक में
देख देख कर तेरा चेहरा दिनकर के धूमिल प्रकाश में
हास्य किरण पर
निशा निराशा
दो इक दिन में चढ़ जाएगी
फिर कुछ दिन तक
तांक झाँक मे
रहकर तेरी
स्मृतियों तक
विस्तृत करके सरस् कल्पना पर तैर रहा हूँगा
फिर नयन धूप
इस चेहरे पर
दो इक दिन मे पड़ जाएगी ।
58
और तुम्हारी
इन आंखों में
मछली बनकर
तैर रहा हूं
उभर सके न शब्द तुम्हारे इन होठों पर इन आंखों में
और मुझे
अन्यत्र कहीं पर
अपने से झोंक सके न
निरख निरख कर
इन आँखों को
जला रहा था
एहसासों का दीपक
जिसकी छाया मे बैठा आनन्दित रहता हँ
आते जाते
आस पास पर
ख़ुसी बहाने टोक सके न
आखिर कब तक
और छिपाता
स्नेह अश्रु
इन आँखों मे
छिप न पाता बहुत दिनों से प्रबल हो रहा था
औऱ आज तो
स्मृतियों मे
बह जाने से रोक सके न
59.
इस चेहरे के
क्षणिक भाव मे
खुशियों की छाया
ढूंढ रहे हैं
अभी अंकुरित इस तन मन मे स्वप्नों को प्रसार रहे हो
इस जीवन की
विरह व्यथा का
शायद तुमको पता नही है ।
ठहर गया हूँ
आशाएँ भी
टूट रहीं है
और मनोबल
धीरे धीरे बिफल हो रहा स्मृतियों के अवकुंठन से
प्रेम पथों के
सधन धुंध मे
किसने मन को हता नही है ।
स्वाभाविक है
यह निगरानी
नयनों की नयनों के तह तक
आकर्षण, अनुरागों मे सच क्या कोई परख सका है
निष्फल होना
एक सफलता
यह जीवन की व्यथा नही है ।
60.
नही कह सका
इन अधरों से
स्नेहों के शब्द
तुम्हारी इन आँखों पर
जिनकी परछायी भर ही उर को शीतल कर देती है
तुम भी तो
इक तितली सी
आते जाते इठला जाती ।
अनुभव के
प्रत्येक क्षणों मे
रूप तुम्हारा
इस हृदय मे उभर रहा है
मन के दर्पण मे देख सकूँ ऊँन संकोची नयनों को
संकेतों के
रेखाचित्र को
इन आँखों मे बिठला जाती ।
चुप हूँ क्योंकि
कल्पनाओं मे
होता रहता
भावों का आदान प्रदान
और सुखी हूँ अपने पन मे भावों को ही छेङ छेड़कर
इस मन को
सन्तोष न होता
कहीं अगर तुम झुठला जाती ।
*****
समस्त रचनाएं Rakmish Sultanpuri द्वारा रचित और प्रकाशित हैं ।
सरसई धूप भाग 6 की रचनाएं भी अवश्य पढ़े ।
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