हवा


विधा-गीत

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बुलाये  बिना   ही   मैं   आती  हवा  हूँ ।
वफ़ा  जिंदगी  भर   निभाती  हवा   हूँ ।

समुंदर को छूकर  हिमालय को धोकर 
चली आयी गाँवो  में  शहरों  से  होकर 
लिपट आम पीपल वो नीमों  के तरुवर 
सुहावन सी बहती हूँ निशदिन निरन्तर 
कड़ी  धूप   में   चिलचिलाती  हवा  हूँ ।
वफ़ा  जिंदगी  भर   निभाती  हवा   हूँ ।

सनातन,पुरातन हूँ जीवन  की  वाहक
अबाधित मैं  बहती  धरा से गगन तक
बिना मेरे   जीवन  तो सम्भव  नही है
जहाँ    देखो  मेरी  उपस्थिति  वहीं है
मई  जून   की  तपतपाती    हवा   हूँ ।
वफ़ा  जिंदगी  भर  निभाती  हवा   हूँ ।

सरस हूँ, सहज हूँ, सुलभ हूँ सुकोमल
कभी आँधियाँ  तो  कभी मन्द चंचल 
सयानी  जरा  मस्तमौला  हूँ  नटखट
ठहरती कभी  तो चली  जाती सरपट
मैं  बरसात  की   सनसनाती  हवा  हूँ ।
वफ़ा  जिंदगी  भर   निभाती  हवा  हूँ ।

         -  रकमिश सुल्तानपुरी