सरसई धूप भाग–6

 Rakmish Sultanpuri द्वारा रचित 
सरसई धूप भाग 6 की रचनाएं 
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61.

देख –देखकर
यह रूपांकन
आंखों की
धुँधली तस्वीरों में
अवशोषित करतीं हैं आँखें स्नेहों के अंकुर को
उस तन से
मेरा मन भी
नही हो रहा अपनेबस में ।

कोशिश पर
कोशिश करता हूँ
संकेतों पर
हृदय भाव रखने की
और समाजिकता की व्यंग्य हँसी भी झलक दे रही है
चुप हैं केवल
डूब गयीं हैं
नतमुख होकर नित अपयश में ।

झाँक रहे हैं
छुप– छुपकर हम
प्रेमपथों के
दुःखद मार्ग के सुख को
पगडण्डी पर चलकर धीरे-धीरे पास आ गए हैं
और अचानक
हम दोनों ही
रुके हुये है असमंजस में ।



62.


निर्मिमेश मैं
देख सकूँ न
इस पतझङ में
तेरे तन की हरियाली
कहीं हमारी मानसिकता में घर न कर जाए
कि तुमको भी
इस कलियुग में
इस यौवन का अहंकार है ।

अनमयस्कता से
पर तुमको ही
मनसपटल पर
आभाषित करता हूँ
और किसी कोने में उर के स्थापित कर
बहुत अधिक
प्रयासों से
देख सका न निरंकार है ।

तेरे मन की
उन लहरों पर
स्नेहों की
नीली छाया उभर रही है
फिर भी तुमने कभी कहा न संकेतों से आहत होकर
मेरे मन को
खींच रहा जो
तेरे मन का संस्कार है ।


63.



यें आँखें तो
तपी हुई हैं
देख– देखकर
आकर्षित परछायी को
हर चेहरे पर ढूढ़ रहे हैं वैकल्पिक अनुरागों को
व्यंग्य बोलकर
हँसी ले रहे
प्रेम नही यह छिछलापन है ।

छिछलापन भी
एक रूप है
मन पर आकर्षक फैलाने का
शब्दों की प्रतिध्वनयों से ही हृदय व्यथित होता है
परन्तु क्षुब्ध यह
मन होता है
प्रेम नही यह अन्धापन है ।

अंधापन तो
स्वच्छ प्रमाण है
अनुरागों की
विह्वलता का
मन की आंखों से प्रेमचिन्ह न टटकोर सके तो
वह इक भौतिक
क्षुधा मात्र है
प्रेम नही यह पागलपन है।

64.

सन्देहों में
खोज रहा हूँ
ढूढ़ रहा हूँ
पदचिन्ह तुम्हरा प्रेमपथों पर
हो न हो पर तेरी परछायी या तुम विचरण की हो
जाने या अनजाने में
स्नेहों का प्रथम चरण है ।

क्योंकि आँखों का
प्रत्युत्तर
तेरे मन से
मेरे मन तक पहुंच रहा है
प्रतिक्रियाएँ जटिल परन्तु समाधान तो निश्चित है
पहले मन से
पुनः हृदय पर
द्विघात का समीकरण है ।

इसी तरह तुम
बिना झिझक के
भिगो रहे हो
इस तन मन को
भावों के इस गहन तमों मे स्नेहों का अंधकार है
मेरे प्रति
तेरी यह चितवन
मेरे उर का वशीकरण है ।

65.

बहुत दिनों से
मै ठहरा हूँ
प्रेमपथों पर
आशाओं के एक वृक्ष के नीचे
सूख गया है वृक्ष, पत्तियाँ टूट रही हैं इस पतझड़ में
निरख –निरखकर
सन्नाटे को
व्याकुल आँखे अकुलाती हैं ।

कभी –कभी तो
उसी वृक्ष पर
कल्पनाओं की
कोयल कूजा करती है
दिनभर तो मै ध्वनियों का बस  ताना बाना बुनता हूँ
परन्तु शाम को
दुःखी देखकर
कोयल भी तो सकुचकती है ।

न मिलते तुम
न बसती
इन आँखों में
परछायी तेरे रूपों की
कभी झरोखों मे परछायी कभी स्वंय को निरख निरखकर
स्मृतियों में
भटक –भटककर
अवनत होकर पछताती है ।

66.

आज पुनः
तेरे स्वप्नों के
अवलम्बन से
गूँज रही थी आवाजें
सिहर उठा था वर्षो पहले अवलोकन से
द्रवित हो रहा स्नेहों के प्रलोभन से
इसी हृदय मे
आज तुम्हे भी
डुबो दे रहा हूँ ।

स्नेहों का
बिम्ब तुम्हारे
इस चेहरे पर
रुक हुआ सा है
ये आँखें न जाने कब से उत्प्रेरित थी
अवलोकन के सघन रूप से सम्प्रेषित थी
उसी रश्मि में
अपने तन को
भिगो दें रहा हूँ ।

संकेतों मे भी
तेरे ही
भावों पर प्रहार कर रहा हूँ
संकेतों से प्रेरित होकर आकर्षक से
हर्षित हैं आँखें आँखों के दर्पण से
स्मृतियों की
मालाओं में
पिरो दे रहा हूँ ।


67.


तुमसे ही तो
संकेतों से
कह पाया हूँ
इस हृदय के छिपे भाव को
टाल दिया है जिसको तुमने विहँस –विहँस कर
उसी हँसी मे
एक खुसी की
कुछ पल रौनक सज जाती है ।

धीरे-धीरे
अस्ताचल से
दूर सेवारों मे
निशा उतर कर आ जाती है
संकेतों की उस भाषा के तर्क वितर्कों मे
भूल जा रहा
हूँ मै तुमको
क्योंकि आँखें लग जाती हैं ।

परन्तु नही
स्वच्छंद रूप से
चलता रहता हूँ
स्मृतियों के पदचिन्हों पर
संकेतों मे एक हँसी का अर्थ ढूढता हूँ
किसी रूप मे
किसी भाव मे
आँखें मेरी भर जाती हैं ।


68.


यह प्रलोभन
कि तुमने भी
आशाओं में
उस हृदय को व्यथित कर दिया है
व्यर्थ रहा जब काट रही थी कोई जीवा
किसी वृत्त सा
पूर्ण नही थी
प्रेमपथों की एक परिधि सी ।

त्रिज्याओं सी
स्मृतियाँ ये
खिंच जाती है
हृदय केंद्र से होकर
जीवा के उस पार परन्तु धूमिल हो जाता है
कही तुम्हारे
भी हृदय को
डुबो सके न वह वारिधि सी ।

दूर बहुत हूँ
रेखाखण्डों के
दो छोरों सा
जुड़े हुए है भाव बिंदु से
शायद बने कभी झरोखें त्रिभुज या बहुभुज सा
रूप तुम्हारा
सजा रहेगा
इस हृदय मे एक निधि सा ।


69


रूप तुम्हारे
उभर रहे हैं
सँवर रहे हैं
एक भाव से कल्पनाओं की हद तक
कभी रंग में
कभी बिरंगे
पुष्पों से खिलता रहता है ।

जबकि मैं
परछायी को ही
निरख रहा हूँ
परख रहा हूँ
वर्षों पहले और अभी भी मेरा हृदय
उसी दृश्य को
एक बार फिर
अवलोकन करता रहता है ।

यही क्रम फिर
चलता रहता
दिन भर और
निशा स्वप्नों में
प्रेमपथों से भटक गया पर ढूढ़ रहा हूँ अब भी
यह मेरा मन
और रास्ता
जीवन भर बढ़ता रहता है ।

70.

उन खेतों में
जहाँ जहाँ तक
धीरे-धीरे
किसी बहाने
तुम टहला करती थी इस ठंडक में सिहर- सिहर कर
उन्ही गेहूओं
के खेतों में
पुनः आज मैं गया हुआ था ।

सरसो झूमी
मुस्काई थी
पीलेपन की आभा
पगडण्डी से
इधर उधर तक बिछी हुई थी पंखुड़ियां मुरझाई
और फैलकर
दूर क्षितिज तक
हल्का कुहरा पड़ा हुआ था ।

तसवीरें जो
कभी– कभी
आकर्षित करती थी
मेरे मन को
भृम से ही पर आह्लादित करती थी उर को
परन्तु आज
चितवन न उठती
आँखें नम मै खड़ा हुआ था ।


71.

पहले ही दिन
इस पतझड़ में
भावों की हलचल से
आशाओं सी
प्रबल वेग से वायु बह चली थी
और पत्तियां
इस मन की कुछ
जीर्ण निराशाओं सी
इस धरती पर बिछी हुई थी ।

नये-नये
अंकुर पुष्पों के
न जाने
कब फूटेंगे
पीले-पीले इन पत्तों पर असफलताओं का
कुहरा है
धूमिल-धूमिल पर
धुँधलेपन में
एक सफलता छिपी हुई है ।

नव पुष्पों सा
अपना जीवन
मिट जाता है
पनप-पनपकर
शाखाओं के पथ के काटें जब चुभते है
स्नेहों की
वही सुगंधें
पतझड़ की छाया सी
इस हृदय पर लिखी हुई है ।

72.

आख़िर कैसे
समझायें हम
इस कुहरे के
सधन प्रवाह मे
इस हृदय पर तस्वीरें है, रूप तुम्हारा है
और अधिक कुछ
कह न सकूँ मैं
इस जीवन की सीमाएं है ।

उन आँखों में
बसा बसाया
चित्र हमारे
तन-मन का
चाह रहा है मुझ तक आना स्वच्छंद रूप से
परन्तु तुम्हारे
कोमल जीवन से
जुड़ी हुई कुछ दुविधाएं है ।

इसीलिए तुम
दूर– दूर से
मेरे मन को परख रही हो
और हमे भी ज्ञात हो रहा स्नेहों का संकेतन
कभी बात
हो जाये उर की
बस इतनी सी आशाएँ हैं ।

73.

इस पतझङ में
अंकित होकर
घटनायें कुछ
स्मृतियाँ कुछ
झरती रहतीं है पत्तों सी इन वृक्षों से
इस हृदय पर
गिरती रहती
जर्जर होकर टूट –टूटकर ।

आशाओं पर
घटनाओं पर
आश्वासन
मिलता रहता है
प्रतिबिम्बों से झाँक रहीं है असफलताएं
इक कोने मे
भाग्य बैठकर
रोटा रहता फूट फूटकर ।

फिर भी मैने
अनुमानों से
सन्देहों पर
चित्र बना रखा है
इस हृदय और स्वच्छ रूप से इक दर्पण सा
हृदय भी
पुष्पित कष्टों को
पी जाता है घूँट– घूँटकर ।


74.


आज नदी पर
कुछ ही नावें
तैर रही हैं
स्मृतियों सी
और किनारों पर आकरके नष्ट हो गयीं हैं
कभी उन्ही पर
बैठ– बैठकर
वर्तमान को भूल रहा था ।

ये नावें भी
जर्जर ही है
आते –जाते मनसपटल पर
जीर्ण हो गयीं है
किसी तरह से जोड़– जोड़कर घटनाओं तक पहुंच रहा हूँ
जबकि पहले
बारी –बारी से
शांत परन्तु झूल रहा था ।

आशाओं के
तटबन्धों के
एक किनारे पर
स्मृतियाँ शिथिल पड़ गयी हैं
उस तट पर बस एक तुम्हारी छायाकृति देख रही है
सन्देहों पर
स्नेहों को
धीरे धीरे ढूढ़ रहा हूँ ।

75.


ये आँखें भी
सूर्यमुखी सी
अनुसरण करेंगी
कब तक
न जाने कितने कोणों से एक बिंदु पर पड़ी हुई हैं
स्नेह किरण यह
विह्वल होकर
छाया पाकर रुक जाती है ।

सिर्फ तुम्हारी
परछायी पर
बैठ बैठकर
खग वृन्दो सा
स्नेह बिंदु से चुकने लगती एक घोषला एक आश्रय
हिलती डुलती
परछायी पर
झूम– झूमकर झुक जाती है ।

आवरणों के
पार जहाँ तक
न दिखती है छाया
तस्वीरों की
अंकित करके आभाषी प्रतिबिम्ब दिखाती है
और दृश्य सब
रेखाएं सब
जर्जर होकर चुक जातीं हैं ।


76.


मैने तुमसे
कभी कहा न
संकेतों में कभी किया न
स्नेहों का प्रदर्शन
क्योंकि तुम तो बधे हुए हो बन्धन में
इस जीवन से
और कभी न
सीमाएं मै पार कर सकूं ।

यें आँखे अब
अफ़सोसों में
किसी झील सी
सूख जा रहीं हैं
परन्तु तुम्हें क्या व्याकुलता से वही निखरना
जारी रखकर
इन नयनों को
तेरे प्रति तैयार कर सकूँ ।

यह कोमलता
यह चंचलता
बाँध सकूँ मैं
स्मृतियों के धागों से
उर मे निर्मित प्रेमपथों का वह सागर
संकेतों से
मात्र डूबकर
कभी नही इनकार कर सकूँ ।

77.

सीमाएं हैं
सघन कुंज है
दूर –दूर तक
नदियाँ बहती हैं
किन्तु दूर तक स्पंदित इन वायु झरोखों से
बन जाता है
चित्र तुम्हारा
नयनों के बरसातों से ।

भय किसका है
शत्रु कहाँ के
ये बातें तो
छिप जाती हैं
तस्वीरों की परछाई मे पूर्ण रूप से
मुस्कानों का
एक उजाला
छाया रहता रातों से ।

और स्वप्न में
तुम आती हो
सन्नाटों में
धीरे –धीरे छिप करके
फिर बालों पर हाथ फेरकर पास बुलाती है
रूप बदलकर
संकेतों से
आशाओं मे बातों से ।

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समस्त रचनाएं Rakmish Sultanpuri द्वारा रचित और प्रकाशित हैं । 
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