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परहेज़ भाग -4

 ग़ज़ल –41


ताज़ा -तरीन  होगा  कुछ  प्यार छुवन  से ।
आख़िर  में तुम्हें क्यों है इनकार छुवन से ?

ख़ामोश लवो का  क्या आँखे  तो हसीं हैं ,
ज़ुल्फों  की  घटा  होगी तैयार  छुवन  से ।

हर   बार   वही  कस्मे  हर  बार  बहाना ,
कब होगा ख़्वाब मेरा  साकार  छुवन  से ।

चल छोड़ यार  करना बातें वो  रूह  की ,
आ  हुश्न  तपा  कर  लें  अंगार  छुवन से ।

वो सलवटों  की रातें वो  सर्द  कश्मकश ,
हो जाय  रफ़ूचक्कर  दिलदार  छुवन  से ।

यूँ   उम्र   गवाँ   बैठोगे   यार  अग़र  तुम ,
इल्ज़ाम  किसे   दोगे   बेकार  छुवन  से ?

ज़िद छोड़ आ तू रकमिश गाते है  तरन्नुम ,
निखरेगा  हुस्न ,तेरा   क़िरदार  छुवन  से ।

                   –रकमिश सुल्तानपुरी

ग़ज़ल –42



गमख़्वार  रही क़िस्मत  इल्ज़ाम तुम्हें  क्या दूँ ।
सुन  यार   मुहब्बत  का  पैग़ाम तुम्हें  क्या दूँ ।

टूटा  है   तेरा  दिल  तो   दिल  टूट गया  मेरा ,
बेकार  रहा   ख़ुद  का  अंजाम  तुम्हें  क्या दूँ ।

जा पूछ  किसी से ले  तू  हाल  ग़मे दिल का ,
क़िरदार   रहा  मेरा   बदनाम   तुम्हें  क्या  दूँ ।

बस  याद  मुअन्सर है  रातों में  चुभन  रहती ,
दर्दों में  सिमटती है  हर  शाम  तुम्हें  क्या  दूँ ।

गिरने दे  ज़रा ऑंसू ढहने  दे  ज़रा  ख़्वाहिश ,
जलने  दे  ज़र्रा ज़र्रा  गुलफ़ाम  तुम्हें  क्या दूँ ।

ऐ दोस्त ! मुहब्बत में  हर   बार जफ़ा  पाया ,
ईनाम  मिला  ग़म  का  ईनाम  तुम्हें  क्या दूँ ।

मत देख मेरे रकमिश' होठों की  हँसी  झूठी ,
मिलता न मुझे ग़म से आराम  तुम्हें  क्या  दूँ । 

                        –रकमिश सुल्तानपुरी 

ग़ज़ल –43.


दिल तोड़  दिया  मेरा दिल  यार  नही  देखा ।
जज़्बात  नही   समझे  क़िरदार  नही  देखा ।

सुन तेरी  मुहब्बत की  थी यार  ख़बर  झूठी ,
लगता है  अभी तुमने  अख़बार  नही  देखा ।

है यार  ख़बर उनको क्या पाक मुहब्बत की ,
जिसने भी  मुहब्बत में  गमख़्वार नही देखा ।

डूबा था  सफ़ीना  तो  डूबेगा  सफ़ीना  फ़िर ,
किस्मत  के भरम जिसने पतवार नही देखा ।

दिल हार  यहाँ  बैठा लहरों से  डरा  जो भी ,
साहिल से चला आया   मझधार नही  देखा ।

ले डूब गया फिरसे  ख्वाबों की बसी दुनियाँ ,
तन्हा   सा  कभी  मेंने  हक़दार  नही  देखा ।

गलियों में जहाँ तेरा दिल यार बिका रकमिश, 
कल यार  वहीं  दिल  का बाज़ार नही देखा ।


                         –रकमिश सुल्तानपुरी 


ग़ज़ल –44

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मालुम  नही  दिल की  क़दर , तुन्हें  क्या ।
जलने  दे  ख्वाबों  का  शहर  ,तुम्हें  क्या ।

तुम  ज़रा  सा   मुस्कुराए  और  चले  गये,
अब  ढूढती  है  तुमको  नजऱ ,तुम्हें क्या ।

कल  से  ठहरी  है  यहां  रूह में  उलझन ,
है  दिल   पर  पुरजोर  असर  ,तुम्हें क्या ।

तेरे   चेहरे  पे  तस्वीर  अभी  थी  उलझी ,
तेरे नफ़रत से  जला है शज़र, तुन्हें  क्या ।

रुस्वा  ख़ुद  को मत कर भुला दे मुझको ,
ये  ऑंसू   हैं   बहेंगे   मग़र , तुम्हें   क्या । 

आज तन्हा है  दिल ख़ैर,कोई  बात नही ,
ये वक्त  भी   जाएगा  गुज़र,  तुम्हें  क्या ।

टूट   कर   राहों   पे   चला  हूँ  रकमिश ,
तन्हा   कट  जाएगा  सफ़र , तुम्हें  क्या ।

                – रकमिश सुल्तानपुरी


ग़ज़ल –45.


वक़्त  की    उड़ान   है ।
इश्क़      बेजुबान    है ।

ख़्वाब  का  मकान  है ।
उम्र   का    रुझान   है ।

ज़ख्म  इश्क़  में  मिले ,
आज  भी   निसान  है ।

इश्क़ जिस्म से  अलग ,
हुस्न   की   दुकान   है ।

इश्क़  में   टिका   नही ,
वो    जिसे  गुमान   है ।

इश्क़ पाक तब  तलक ,
जब  तलक  ईमान  है ।

सोचिएगा   आप   पर ,
कौन     मेहरबान    है । 


   –Rakmish Sultanpuri 


ग़ज़ल–46.


धूप  से  ख़ुद  को  सम्हाले  धूप में ।
चल   रहे   हैं  हुस्नवाले   धूप   में ।

सुर्ख़  मौसम है भला तो क्या हुआ ,
आ  ज़रा  नजरें  मिला  ले धूप  में ।

आपकी  चर्चा  भला हम क्या करें ,
आपके   किस्से   निराले  धूप   में ।

आप  जैसी है  मेरी क़िस्मत  कहाँ ,
आप   करते   है   उजाले  धूप  में ।

कीमतें  जिसने न समझी वक्त की ,
छिन  गए  उनके  निवाले  धूप  में ।

है ज़रूरत  आपको अब  छाँव की ,
हो   गए   हैं  आप  काले  धूप  में ।

वक़्त से'रकमिश' उन्हें रौंदा  बहुत ,
जो थे किस्मत  के  हवाले  धूप में ।

            –रकमिश सुल्तानपुरी


ग़ज़ल –47


प्यार की  बतकही  रही अब  तक ।
दोस्ती अपनी निभी रही अब तक ।

मिट   गया    वो  ग़ुरूर   तेरा  भी ,
जिसके दम तू चली रही अब तक ।

कौन   कहता  है   मौत ने  बख्शा ,
जेब  जिसकी  भरी रही अब तक ।

जिंदगी    दर्द   में    रही   उलझी ,
साहिलों पर रुकी  रही अब  तक ।

वक़्त का क्या हिसाब  दूँ  तुमको ,
वक़्त से  ही  ठनी  रही  अब तक ।

ज़ोर    मैंने    बहुत   लगाया  पर ,
क़िस्मतों  की चली रही अब तक । 

ख़ैर तुमसे खुशी  मिली ' रकमिश ,
रूह  तुमसे  जुड़ी  रही  अब तक ।

        –   Rakmish Sultanpuri

        
ग़ज़ल –48.


सच   का  साथ  निभाना होगा ।
हर   मुश्किल  अजमाना  होगा ।

राह  कठिन  होगी  पर सुन लो ,
तुमको   मंज़िल    पाना  होगा ।

सुख दुख  रुक रुक  बारी बारी ,
आयेंगे        टकराना      होगा ।

आँसू   भर   आँखों  में  तुमको ,
दुख  में  भी   मुस्काना    होगा ।

दर्द    उठेगा    जितना    गहरा ,
उतना    घाव     पुराना   होगा ।

झूठ  लड़े  तो   लड़  जाना पर ,
ख़ुद   को  यार   बचाना  होगा ।

आग़ लगी नफ़रत की रकमिश ,
देकर    प्यार    बुझाना   होगा ।

      –Rakmish Sultanpuri


ग़ज़ल –49.


ज़िन्दगी   पथ  एक  मन्दिर ।
अड़चनों के  नभ  रहे   घिर ।

चार    दिन  का  साथ  तेरा ,
मुस्कुराकर  चल   मुसाफ़िर ।

रास्ते    होंगे  कठिन  कुछ  ,
मंज़िलें   पाना  है   आख़िर ।

दुर्दिनों    को   काट  ले  तू ,
सुख भी हो जाएगा हाज़िर ।

हार  से  डरना  भला  क्या ,
जीत   जाएगा  कभी  फ़िर ।

था  कभी  शायद  बुरा  पर ,
कर भलाई अब तू   ज़ाहिर ।

कारवां  के  साथ  'रकमिश' ,
हो न जाना  तू  भी  शातिर ।

–Rakmish Sultanpuri 

ग़ज़ल –50.


देशवासियों   चलो    एक   पंथ  प्यार  से ।
एकरूपता    रहे    नेक    हों   विचार  से ।

रंग रूप जाति  पाति भेद  भाव से ग्रसित ,
भिन्नता  रहे  न ऊँच  नीच  की  दीवार से ।

शांति सभ्यता सदा  समान  भाव से  पले ,
मुक्त  हो समाज  एकजुट  रहे   सुधार  से ।

प्रमाण न बने कभी प्रलोभ की  प्रगाढ़ता ,
लोग हों सुदूर  रोग  भोग  के   विकार से ।

खान पान नृत्य  गान कृत्य भिन्न हो मग़र ,
भाव  देशप्रेम   का  समान  हो विचार से ।

शाम दाम दण्ड भेद का उचित  प्रयोग हो ,
देशहित में  राजनीति हो  सभी  प्रकार से ।

जीत न  सके  कभी  वो झूठ पैतरे  बदल ,
सच भरे उड़ान  मान शान  की फुहार  से । 

     –Rakmish Sultanpuri 


ग़ज़ल –51.


झूठा  हर  फ़लसफ़ा  यहाँ  निकला ।
झूठ  सच  में   सना  यहाँ   निकला ।

लोग     उनसे    बना   लिए    दूरी ,
वक़्त  जिनका  बुरा  यहाँ  निकला ।

ज़िन्दगी   दर्द    में    रही    उलझी ,
सिर्फ़  ग़म  का  पता  यहाँ निकला ।

देख   मौक़ा   बदल   गयी   दुनिया ,
कौन  किसका  सगा  यहाँ निकला ?

यार  जिसको  यक़ीन  था   उसका ,
पत्थरों   में    ख़ुदा   यहाँ   निकला ।

जिनकी  क़िस्मत  ख़राब  थी यारों ,
उनके  हक़  में  दग़ा  यहाँ  निकला ।

ख़ैर !  तिल भर  गुरेज़ न 'रकमिश ,
जो भी निकला भला यहाँ निकला ।

         –Rakmish Sultanpuri 


ग़ज़ल –52.


आशिक़ी  के  खेल  में कच्चा हूँ मैं ।
उम्रभर   शायद  तभी  रोया  हूँ  मैं ।

था  बड़ा  मासूम  दिल  मेरा  सुनो ,
पत्थरों को  भी  ख़ुदा  माना  हूँ मैं ।

दाँव  अपना  आजमाया  वक़्त  ने ,
वक़्त  की  हर  मार से गुजरा हूँ मैं ।

सच,  भरोसा है  नही क़िरदार का ,
ख़ैर ,अब  तक आदमी सीधा हूँ मैं ।

चुप हूँ पर गमख़्वार न समझे मुझे ,
बुत नही बस मोम का टुकड़ा हूँ मैं ।

दोस्त अपने मंजिले  सब  पा  गए ,
साहिलों तक ही अभी पहुँचा हूँ मैं ।

वक़्त थोड़ा है बुरा 'रकमिश मग़र ,
झूठ है  ये  बात  की  झूठा  हूँ  मैं ।

          –Rakmish Sultanpuri


ग़ज़ल –53.


चाहतों  के  फूल  सब  मुरझा  गए ।
ख़ार हिस्से   में  मेरे  सब  आ  गए ।

ज़िन्दगी ख़ुद की  पराई  सी  लगी ,
और   ग़म   सारे  किनारे  पा  गए ।

ख़ैर, ज़ख़्मो से  निपटना  था  मुझे ,
पत्थरों   से    इसलिए  टकरा  गए ।

इश्क़ पर मुझको भरोसा था  मग़र ,
इश्क़ से भी  यार  धोखा  खा  गए ।

वक़्त भी करने लगा  था  साज़िशें ,
गर्दिशों   की  मार  से  चकरा  गए ।

क़िस्मतों ने ख़ूब अजमाया  ज़िगर ,
घाव दिल के  और भी  गहरा  गए ।

रह गयी रकमिश  महज़ तन्हाइयाँ ,
दर्द   के  बादल  नुमाया  छा  गए ।

        –Rakmish Sultanpuri


ग़ज़ल –54.


उम्र  की  पगडंडियों  पर  फ़र्ज़ का  कुहरा घना है ।
वक़्त  कम  है  ज़िन्दगी  में और  लम्बा  रास्ता है ।

स्वार्थ में रिश्ते  सने सब  कौन  किसको दे सहारा ,
प्रेम  का  अवलम्ब  ओछी   वंचनाओं  से घिरा है ।

गिन रहा जो साँझ से  ही भोर तक तारे  गगन के ,
अनुभवों की  धूप  में  वो वृद्ध भी काफ़ी  तपा है ।

सिर्फ़  अंधेरों  के  डर से  रात भर  सोयी  ग़रीबी ,
पर अमीरी  के  लिए तो रात भर  दीपक बुझा है ।

रोटियों की डांट से है मौन नतमस्तक श्रमिक वो ,
भाग्य ने रौंदा है उसको इसलिए वो चुप खड़ा है ।

शर्म   से   मर  जा  कही  पैदाइशी  पापी  दरिंदे ,
रौंद क्यों मासूमियत तू अब तलक जिंदा बचा है ।

हो गया है क्या ज़माने को निकम्मे यार रकमिश ,
हुस्न  का भूखा दरिंदा जिस्म का  हवसी बना है ।

            –Rakmish Sultanpuri


ग़ज़ल –55.

मिली  रूसवाई   हिमाक़त  कहाँ   फ़िर?
असल  में  हुई  वो  मुहब्बत  कहाँ फ़िर ?

ख़ुदी       राजनेता       करायेंगे     दंगे ।
गुनाहों  से  होगी  हिफाज़त कहाँ फ़िर ?

बढ़ी  देश  में  बेसबब   खौफ़   दहशत ।
बची  रह  गयी वो सियासत कहाँ फ़िर ?

करेगा    कोई    रहनुमा   बदमिजाजी ।
सियासत में उसके शराफ़त कहाँ फ़िर ?

चुभो  नश्तरों   को  लगाये जो  मरहम ।
वो  है  सरपरस्ती  शरारत  कहाँ  फिर ?

अग़र  दोस्त  जैसा  मिले भाई  तुमको ।
तुम्हे  दोस्ती  की  ज़रूरत  कहाँ  फ़िर ?

सज़ा ईल्म को जब मिली यार रकमिश ।
तुम्हारे   शहर  में   मुरौव्वत  कहाँ फ़िर ?

        –Rakmish Sultanpuri


ग़ज़ल –56.


संबिधान   में  है  निहित , लोकतंत्र  की  जीत ।
सदा   सर्बदा   से   हुई ,,  लोकतंत्र   की  जीत ।

हुई   पराजय   झूठ  की , हार   गया  पाखण्ड ,
एक  बार   फिर  हो  गयी , लोकतंत्र की जीत ।

नित सच के अवधान से,  प्रेरित  पुष्पित प्रीति ,
जनता के प्रति खिल गयी, लोकतंत्र  की जीत ।

करे  समर्थन   सत्य  का, जनता  का  है  धर्म ,
संचित   हो    समभावना , लोकतंत्र की जीत ।

राष्ट्रप्रेम    की   धारणा,  प्रगतिशील   उद्देश्य ,
दोनों   का   सहयोग  है , लोकतंत्र  की जीत । 

निश्चित  ही  इस  बार  सच ,,रहा चुनौतीपूर्ण ,
कठिन मार्ग था पर हुई,, लोकतंत्र  की  जीत ।

शाम दाम के  भेद  से,, दण्ड   उत्तण्ड  प्रचंड ,
पाकर   मुस्काई   पुनः ,लोकतंत्र  की   जीत ।

                        _रकमिश सुल्तानपुरी

ग़ज़ल–57.


वफ़ा  की  यहां  यार  किसको  ख़बर है ।
कि  चेहरे  पे  चेहरा  नजऱ  पे  नजर  है ।

निभेगी   भला   उनसे   कैसे   मुहब्बत ?
कि कमज़ोर बाहें  औ कमसिन उमर है ।

चली   गर्दिशों  में  ग़मों  की जो  आँधी ,
तमन्ना   वफ़ा  की  गई  सब   बिखर है ।

यहाँ फ़िक्र  किसको रही अब शज़र की ,
निकल  जो गया  काम  उनका अग़र है ।

नशा इश्क़ का जिसने पाला है मसलन ,
घरौंदा    उसी   का    हुआ  खंडहर  है ।

मैं  कल  जा   रहा  हूँ  तुम्हारे  शहर  से ,
बड़ा   बेरहम    ये   तुम्हारा    शहर   है ।

बचाती   रही   बद्दुआओं   से  रकमिश ,
दुआ   वो    तुम्हारी   बड़ी   कारगर  है ।

                    –रकमिश सुल्तानपुरी


ग़ज़ल–58.


मुहब्बत की ख़ातिर  छुपा मुश्किलों को ।
यूँ  ज़ाया  न करना  कभी आंसुओं  को ।

सज़ा    कैसे   देगे  भला  मुल्जिमों  को ,
जो   अंज़ाम    देते   रहे    हादसों   को ।

मेरे क़िरदार की यार  कमजोरियाँ  कुछ ,
पता   चल  गयी  हैं  मेरे  मुखबिरों  को ।

बुझेगी  नही   ये   चराग-  ए - मुहब्बत ,
ख़बर  जाके कर  दो  ग़मे  आंधियों को ।

यहाँ     राजनेता     बनाते     है    मुद्दे ,
कभी  मंदिरों को   कभी   मस्जिदों को ।

सुनो तुम  ख़ुदा  ख़ाक  उनको  मिलेगा ,
जो  पूजे   उमर  भर  महज़ पत्थरों को ।

उजाला जरू  एक  दिन होगा रकमिश ,
भरोसा   रहा  रात   भर  जुगनुओं  को ।

                     –रकमिश सुल्तानपुरी


ग़ज़ल–59.


किस्मत  में  कस्तूरी  भी  हो  सकती  है ।
चाहत दिल  की  पूरी भी हो  सकती  है ,

इस दिल की चाहत का और भरोसा क्या ,
ये   चाहत  बेनूरी   भी   हो   सकती  है । 

ख़ंजर करता सिर्फ़  नही दिल  के टुकड़े ,
ख़ंजर  जैसी   छूरी  भी   हो  सकती  है ।

यार   मुहब्बत  अब  तक  नामंजूर  रही ,
वो  कल को   मंजूरी भी  हो  सकती है ।

बात   रूहानी  छोड़ो  आओ  प्यार  करें ,
हम तुम में  कल  दूरी भी हो  सकती है ।

आज गरीबी है तो क्या कल  मेहनत से , 
थाली   में   तंदूरी  भी    हो  सकती  है ।

खामोसी तो  शौक़  नही  मेरी  रकमिश,
चुप   रहना  मजबूरी  भी हो  सकती है । 


                -  रकमिश सुल्तानपुरी


ग़ज़ल–60.
आमजनता  घर  की  टूटी  आलमारी   हो   गयी ।
जब जहां  चाहे  रखो  जो  भी  बेचारी  हो  गयी ।

राजनेता ही  करें क्या  फ़ेल  सिस्टम  हो  न क्यों , 
देश  में   जब   अनपढ़ों  की  दावेदारी  हो  गयी ।

हमको  उम्दा  लग   रहे  थे  झूठ  के  तेवर  मगर ,
जब मिला सच से तो सच की जानकारी हो गयी ।

आशिक़ी में जान की बाज़ी  लगाते  आप  ख़ूब ?
आपको कब से ये अपनी  जान प्यारी  हो  गयी ।

ले गयी बचपन  जवानी वक़्त बदला  यार फिर , 
रोटी कपड़ा और मकाँ की  जिम्मेदारी  हो गयी ।

चार  पैसे  की  ललक  ले गाँव से आया  शहर  , 
याद रिश्तों  की  सताती  रात  भारी   हो  गयी । 

इश्क़ जैसा पाक रिस्ता था नही 'रकमिश" मगर ,
इश्क़  की भी  तो  यहाँ कालाबाज़ारी  हो  गयी । 


                        - रकमिश सुल्तानपुरी


परहेज़ भाग -2

 ग़ज़ल –21.


दर्द अच्छा रोज  की ये  मयकशी अच्छी  नही । 
जानता हूँ आज़कल की आशिक़ी अच्छी नही । 

जानने वाले बहुत हो पर न  ख़िदमत हो जहां , 
बेवज़ह उन महफ़िलों में  हाज़िरी  अच्छी नही । 

आपके जज़्बात की जो कद्र कुछ करता न हो ,
सच कहूँ उस  आदमी  से  दोस्ती  अच्छी नही । 

लफ़्ज़ टूटे दिल से  उभरे तो  मुकम्मल  शेर हो ,
बेवज़ह  बिन  बात के  यूँ शाइरी  अच्छी  नही । 

राजनेता  आमजनता  के  लिए  कुछ  तो  करें ,
सिर्फ़ कोरी  काग़जी ये  बतकही  अच्छी  नही । 

हाँ चलो हम भी निभा लें एक दिन की बात हो ,
रोज की ये यार बोझिल मुफ़लिसी अच्छी नही । 

छोड़ दे रकमिश शिक़ायत ग़ैर की करना  यहाँ ,
इश्क़ हो या जंग मसलन मुखबिरी अच्छी नही । 



ग़ज़ल –22


जनम -जनम सनम  तेरी ये  बन्दग़ी  क़ुबूल है । 
मिले जो प्यार आपका  तो मयकशी क़ुबूल है । 

वफ़ा खफ़ा -खफ़ा रही मग़र  वफ़ा- वफ़ा रही ,
जो आदतों सी बन गयी वो आशिक़ी क़ुबूल है । 

है प्यार का  मुआमला  कुबूल  तो  जरा  मुझे ,
मिलो कहीं  मग़र  मिलो ये  हाज़िरी  क़ुबूल है । 

ठहर - ठहर , रुकी- रुकी निहारती  रही नजऱ ,
ग़मों  की  बेबसी  रही  कि  बेरुख़ी  क़ुबूल  है । 

वो आदतन ज़ुबान  इश्क़ की  लगा है  बोलने ,
मग़र ज़नाब  की  हमें  वो  शातिरी  क़ुबूल  है । 

न देख वज़्न क़ाफ़िया बह्र -वह्र ग़लत -सलत ,
दिलों के लफ्ज़ बोलती वो  शाइरी  क़ुबूल  है । 

कि झूठ क वो  दोस्ती  क़ुबूल  है  नही  मग़र ,
चुनौतियों  भरी  वो  यार  दुश्मनी  क़ुबूल   है । 

ग़ज़ल –23


आपकी चाहत में जिस दिन मैं फ़ना हो जाऊँगा ।
आपके जख़्मों की बेशक़  इक दवा  हो जाऊँगा ।

याद   आएगी   मुहब्बत   की   मेरी   नादानियाँ ,
तेरी  दुनियां  से  कभी जब  लापता हो जाऊँगा ।

आदमी  हूँ  आदमी   से  प्यार    करता  हूँ  मग़र ,
कौन कहता है  मुहब्बत का  ख़ुदा  हो  जाऊँगा ।

मैं अकेले ही चला  हूँ  आज  सच  की  राह  पर ,
है मुझे मालूम  कल  तक काफ़िला हो  जाऊँगा ।

ख़ैर मुझको दिल्लगी से है गिला  कुछ  भी  नही ,
मिट गया तो भी मुकम्मल फ़लसफ़ा हो जाऊँगा ।

निभ सको गर तुम रदीफ़ों सी  बह्र  में  यार  तो ,
प्यार में  मैं भी ग़ज़ल का  क़ाफ़िया हो जाऊँगा ।

इश्क़ में 'रकमिश' फ़ना होकर किसी दरग़ाह पर ,
आख़िरी   मंजिल  का  तेरे  रास्ता  हो  जाऊँगा ।

ग़ज़ल –24

मुझे सितमगर  मत कह देना ।
दिल को पत्थर मत कह देना ।

जाते  हो तो  प्यार  से जाओ ,
चुभते  आख़र  मत कह देना ।

आँखें  -नदियाँ  पानी - आँसू ,
इन्हें   समंदर  मत  कह  देना ।

अपनो  ने  भी  दी  है  गश्ती ,
सिर्फ़  मुक़द्दर  मत कह देना ।

सच्चाई   भी    यार   बताना ,
झूठा  अक़्सर  मत कह देना ।

दर्द  , जुदाई   , तन्हाई   ,ग़म ,
को तुम खंज़र  मत कह देना ।

जख़्म हुआ है गहरा रकमिश ,
मसलन ठोकर  मत कह देना ।

ग़ज़ल –25      


जज़्बातों की क़द्र किये बिन तिल-तिल मिटना पड़ता है ।
सच्चाई को  रोज   छुपाकर   झूठ  उगलना  पड़ता   है ।

गिरगिट वाले तंग  मुखौटे  मुझको  ख़लते हैं  फिर  भी ,
दुनियादारी   के   नाते   क़िरदार   बदलना   पड़ता   है ।

शौक़  नही  है  मुझको  तेरी   सूरत  का  दीदार   करूँ ,
लेकिन  दिल की  मजबूरी को यार  समझना  पड़ता है ।

कौन    चाहता  है   रिश्वत  की  पाई-पाई   अदा   करे ,
पर सिस्टम वाली  चक्की में  धुन सा  पिसना पड़ता है ।

सच की पगड़ी फेंक- फाँक कर सुनो  यार  मजबूरी में ,
झूठों की  चौखट  पर  झुककर नाक रगड़ना पड़ता है ।

देता हूँ   धर्मो  की  मिलकर  सबके  साथ   दुहाई  पर ,
मानवता  को  ख़ुद  पैरों से  रोज   कुचलना  पड़ता है ।

जान रहा  हूँ  रकमिश  काफ़ी  दूर उजाला है फिर भी ,
अंधेरों  में जुगनू  सा बुझ -बुझ  कर जलना पड़ता  है ।


ग़ज़ल –26
                          

आज़तक  वो  क़िताब  रख्खा हूँ ।
जिसमें  सूखा   गुलाब  रख्खा हूँ ।

ख़ुद मिटाकर  वजूद  अपना सुन ,
तेरे  ग़म  का   हिसाब  रख्खा  हूँ ।

आज कर लो सवाल मुझसे खूब ,
आपका  हर   ज़बाब   रख्खा हूँ ।

रात    आधी,   वीरान   मयख़ाने ,
ख़ैर ! कल की  शराब  रक्खा  हूँ ।

सच से लगने लगा है डर सा अब ,
झूठ  का  इक   नक़ाब  रख्खा हूँ ।

इश्क़  में    सिर्फ़  तेरे   चेहरे  का ,
आईना    बेहिसाब     रख्खा   हूँ ।

आदमी   शानदार   हूँ   "रकमिश",
थोड़ी  आदत  ख़राब   रख्खा  हूँ ।


ग़ज़ल –27


दर्द    देकर    सवाल   करते    हो ।
आप  भी क्या  कमाल  करते  हो ।

शाम ढलते  ही  ख़्वाब में  आकर ,
आप    जीना   मुहाल   करते  हो ।

मैं   भुला  दूँ   भला   तुम्हें   कैसे  ?
तुम जो इतना  ख़याल  करते  हो ।

दे   वफ़ा  की  दलील  झूठी  क्यों ?
नफरतों  की  दिवाल   करते   हो ।

आज़माते  हो  जख़्म   देकर   पर ,
प्यार   देकर    निहाल   करते  हो ।

इश्क़  पर  तो  फ़ना  रही  दुनिया ,
इश्क़  से  क्यों  मलाल  करते  हो ?

आग़ दिल की जला यार रकमिश ,
ख़्वामख्वाह क्यों बवाल करते हो ?

           ✍रकमिश सुल्तानपुरी


ग़ज़ल –28


जज्बातों  पर  हम  ग़र  पर्दा  कर  लेते  तो  अच्छा  था ।
हालातों  से  कुछ  समझौता  कर  लेते  तो  अच्छा  था ।

दोस्त   मिले   थे   बहुतेरे  सब  मंजिल  पाते   चले  गए ,
फिर से  मिलने का  इक  वादा कर लेते  तो  अच्छा था ।

ख़ामोशी  बिल्कुल न  होती  हम  भी  हँसकर  जी  लेते ,
तन्हा दिल को  और  निकम्मा  कर  लेते  तो अच्छा था ।

अच्छे  दिन की  आस  लगाए अच्छे  दिन सब गवां दिए ,
बुरे  दिनों  में  ही  कुछ  अच्छा कर  लेते  तो अच्छा था ।

सच्चाई का वज़्न  घटा  तब  भारी -भरकम  झूठ  लिए ,
हम  भी  अपनाब उल्लू  सीधा  कर  लेते तो अच्छा था । 

तुम थे ,हम थे  संकोचों में  ख़ुशियों  के  पल  गवां दिए , 
पूरा  मन  का  हर   मनसौदा  कर  लेते  तो  अच्छा था ।

तस्वीरों को देख के रकमिश दिल की बातें क्या समझो ,
मिलकर  किरदारों  की  चर्चा  कर  लेते  तो अच्छा था ।


ग़ज़ल –29


जीवन का  आधार छिपा है  अपनी  भाषा  हिंदी में ।
खट्टा - मीठा  प्यार  छिपा है  अपनी भाषा  हिंदी में ।

देवनागरी सरल सुलेखित सहज बोधिनी लिपि सुंदर ,
भावों  का   संसार  छिपा है  अपनी  भाषा हिंदी  में ।

रस ,छंदों   की  सरिता  बहती  अलंकार  मुस्काते हैं ,
शब्दों  का  भंडार  छिपा  है  अपनी भाषा  हिंदी  में ।

एक  शब्द  के कई  अर्थ है  अर्थो  में  भी  अर्थ  गुँथे ,
पर  गुंथन में  सार  छिपा  है अपनी  भाषा  हिंदी  में ।

देवों की  वाणी  से निकली  पावन  और  मनोरम  है ,
वेदों  का   संचार  छिपा है  अपनी  भाषा   हिंदी  में ।

आओ बोले  पढ़े लिखें  हम सोचें  समझे   मान  करें ,
उद्भव का  आगार   छिपा  है अपनी  भाषा  हिंदी में ।

इसे न त्यगो  अपनाओ  सब  निःसंकोच प्रयोग करो ,
प्रीति ,रीति  त्योहार  छिपा है  अपनी भाषा हिंदी में ।


ग़ज़ल –30
                 

गजीदे दिल का  सूफ़ियाना  इन्तिजाम  करो ।
ज़र्ब गहरा ,दिल  अफ़सुर्दा है इब्तिसाम करो ।

नाफ़हम  समझ  बैठे है  वो गम़गुस्सार  मुझे ,
दिले आशुफ़्ता के लिए मौज़ ऐहतमाम करो ।

इक़्तिज़ा  इश्क़  की  होठों पे इख्लास दिखे ,
आईना देखा  है  बहुत सच  न गुमनाम करो ।

हिसाबे- गरज़ को छोड़ देख रूह  की गश्ती ,
नादान्स्तिा सही ज़ुल्फ़ों को साज़ शाम करो ।

क़ुबूल ये हुस्न नुक्ताचीं इस ज़माने से अलग़ ,
इज़्तिरार मिटा  मस्तियाँ  को न तमाम करो ।

सुन ये बेनजीर सुख़न का  हसीन फ़तवा  है ,
वक़्त  नौजवानी का वादों में न ग़ुलाम करो ।

नफ़्स पे  ज़ुल्म  जहन्नुम  सी लगे "रकमिश",
पेशगी  इश्क़  की   क़ुबूला  शरेआम   करो ।


ग़ज़ल –31


वो    गीतों    में  रवानी   ढूँढता   है ।
मेरी  ग़ज़लों   में  सानी    ढूँढता  है ।

मुहब्बत   की   निशानी   ढूँढता  है ,
हरिक  दरिया   में  पानी   ढूँढता है ।

मुकम्मल  इश्क़  करने  के  लिए वो ,
बुढ़ापे    में    जवानी     ढूँढता   है ।

किताबों   में   छुपाई  चिठ्ठियों   से ,
हक़ीक़त वो   पुरानी     ढूँढता   है ।

मिटाकर जिस्म  की  वो भूख सारी ,
बची    यादें     रूहानी     ढूँढता है ।

बनाकर   ख़्वाब  में  चेहरा  अकेले ,
मुहब्बत     आसमानी      ढूँढता है ।

यक़ीनन छोड़ रकमिश बचपना वो ।
दिनों     में    रातरानी     ढूँढता  है ।


ग़ज़ल –32


ज़िन्दगी ख़ाकसार   कौन  करे ?
दिल को यूँ  बेकरार  कौन करे ?

इश्क़ में  न  मिले  मुक़ाम  सही ,
इश्क़  को दाग़दार   कौन   करे ?

इश्क़ खुशबू तमाम  वक़्त  रहा ,
इश्क़  दो वक़्त ख़ार कौन  करे ?

शाम की बेक़सी  मुहाल  बहुत ,
शाम  का  इंतज़ार   कौन  करे ?

हूबहू  आईने   में   शक़्ल   तेरी ,
ख़ैर , झूठा   करार   कौन  करे ?

सिर्फ़ इक शौक़ पालने के लिए ,
हर  खुशी  तार-तार  कौन  करे ?

दोस्त रकमिश जरूर  याद  रहा ,
दुश्मनों  पर  ग़ुबार  कौन   करे ?

                 
ग़ज़ल –33


आदमी वही मिटा जो आन  बान  शान  पर ।
लड़खड़ा  गिरा  उठा  प्रत्येक  पायदान  पर ।

हारता   तमाम  उम्र   क्षुब्ध  न  हुआ  कभी ,
हौसलों से बढ़ गया वो जीत के  निशान पर ।

शान्त चित्त है  मग़र  वो  सिंह  सा दहाड़ता ,
आ गयी ख़रोंच  यदि  वजूद स्वाभिमान पर ।

फ़िक्र  न  रही  उसे  कभी भविष्य  भूत की ,
दाँव   सारे   खेलता  रहा  वो   वर्तमान  पर ।

दूर  हो  प्रपन्च   से  निशुल्क   नेह   बाँटता ,
सत्य बोलता रहा वो  झूठ  की  दुकान  पर ।

हाँ,  उसे  लताड़ने  की साजिशें  हुई  मग़र ,
गिर सकी न  गॉज  झूठ-मूठ की ईमान पर ।

नीतियाँ चली ग़लत  यदा  कदा   समाज में ,
वो डटा  विरोध में  अड़ा  रहा  ज़ुबान  पर ।


 ग़ज़ल –34


हौशलों के  पंख  की  उड़ान   जिंदगी  रही ।
सच कहूँ  तो  झूठ  की  दुकान जिंदगी रही ।

बाँह   को   पसार   दौड़ती   रही   गरीबता ,
लड़ रहा था जब तलक जवान जिंदगी रही । 

रौंदते निकल गयीं वो दर्दोगम की आँधियाँ ,
जूझता मैं कब तलक तूफ़ान  जिंदगी  रही । 

देखती   रही  मुरीद , वक़्त  की  वो  क्रूरता ,
हाल   पे   ख़ामोश  बेजुबान  जिंदगी   रही । 

बार - बार   हार   यार   ठोंकरें  लगी  मग़र ,
ख़ाकसार पाक ज्यों  क़ुरान  ज़िन्दगी  रही ।

हाँ मिली जो हार देख दोस्त सब बदल गए ,
उम्रभर शिकायतों  की  खान  जिंदगी  रही ।

ख़ैर इश्क़ ने दिया  खुशी, खुमार ,ख़्वाहिशें ,
और तो  वजूद  भर  निशान  ज़िन्दगी  रही ।


ग़ज़ल –35


जब से यारी   ख़त्म  हो  गयी ।
पहरेदारी    ख़त्म    हो   गयी ।

लिया  उधारी जिसने उसकी  ,
रिश्तेदारी    ख़त्म    हो  गयी ।

जज़्बातों को  ठेस लगी  जब ,
जब  क़िरदारी  ख़त्म हो गयी ।

आख़िर   दिल  कैसे  दे  देता ?
पर  इकरारी  ख़त्म  हो  गयी ।

हार गया जो  ख़ुद से ,उसकी ,
ज़िम्मेदारी   ख़त्म   हो   गयी ।

सच था इसीलिए मंजिल की ,
दावेदारी    ख़त्म    ही   गयी ।

सच  के  दस्तक़ से  झूठों की ,
सब हुशियारी  ख़त्म हो गयी ।

टूट   गयीं   उम्मीदें  रकमिश",
दुनियादारी  ख़त्म   हो  गयी ।

             रकमिश सुल्तानपुरी

ग़ज़ल –36


वक़्त  की  उड़ान  है ख़ैर  कोई   बात नही ।
ये  तो  हिंदुस्तान  है  ख़ैर  कोई  बात नही ।

आपसे  बुझी  नही  आग़  जली  रात  भर ,
आपका  मकान  है  ख़ैर  कोई  बात  नही ।

फूंक  से   उड़ा  रहे  आप भी   पहाड़  को ,
आप  बुद्धिमान  है  ख़ैर  कोई  बात  नही ।

शौक़  बस  आपने  दिल  मेरा तोड़  दिया ,
अब  तो इत्मिनान  है ख़ैर  कोई बात नही ।

वक़्त पे तो साथ दिया तोड़ सब वसूल वो ,
झूठ  की  दुकान  है ख़ैर  कोई  बात  नही ।

जिंदगी को नाप  लो  हौसलों  के  पंख से ,
दूर   आसमान  है  ख़ैर  कोई   बात  नही ।

कर  रहें हैं लोग  अभी माफ़ तेरी गल्तियां ,
तू  अभी  जवान  है  ख़ैर  कोई  बात नही ।


ग़ज़ल –37

 
नफ़रते   अंदाज़  अब   बेकार  है  समझा  करो ।
आज़कल तो सिर्फ़ तुमसे  प्यार है  समझा करो ।

ख़ैर  ! बातों  के   लिए  पूरा  सितम्बर   है  पड़ा ,
बेक़सी  में   रूह  तक   बीमार  हैं  समझा करो ।

हैं   नही   यूपी    कि   एंटी  रोमियों  होंगे   यहाँ , 
ये है  दिल्ली चुप यहाँ  सरकार  है  समझा करो ।

आ चलें  फुटपाथ पर  खायें कहीं पिज़्ज़ा सुंनो ।
गर्म  है  मौसम  मग़र  इतवार  है   समझा  करो ।

पार्क  के  कोने  में  चलकर गुफ्तगूं कर लें ज़रा ।
भीड़  से  हटकर, यहाँ  बाज़ार  है  समझा करो ।

आ चलें  नाज़ुक लवों  को सौंप  दें मदहोशियाँ ।
क्यों खड़ी अब रूह की दीवार  है समझा  करो ?

फ़िक्र करना छोड़ रकमिश दे तवज़्ज़ो वक्त को ।
वक़्त  गुजरा तो  मिलन  दुस्वार है समझा करो । 

                         ✍ रकमिश सुल्तानपुरी

                    
ग़ज़ल –38


नफ़रत की आग़में तपा दिया ख़ंजर ।
वक़्त  देखा और  चुभा दिया खंज़र ।

जबकि देना था  इक ग़ुलाब  उनको ,
मग़र दिल पर आजमा दिया  खंज़र ।

ख़ैर नासूर ज़ख़्मो  को  कुरेदा  ख़ूब ,
रंग  अपना  भी दिखा  दिया  खंज़र ।

सुकून देता नही तेरे हाथ का मरहम ,
दोस्त तुमने क्यों  छिपा दिया खंज़र ।

असर हुआ मग़र सिर्फ  बेवफाई का ,
याद तुमको  रख भुला  दिया खंज़र । 

सिर्फ़  दिखता है  रातभर तेरा चेहरा ,
नींद  आँखों  की  उड़ा  दिया खंज़र । 

तोड़  ही दिया  दिल  तुमने रकमिश",
साथ   जबकि   निभा  दिया  खंज़र ।

               ✍रकमिश सुल्तानपुरी


ग़ज़ल –39

ख़ुदा  मुझको मिलेगा न तो पत्थर  ही  सही  लेक़िन ।
इबादत  दिल से करता हूँ मैं अक़्सर ही सही लेक़िन ।

तेरे  हाथों में  देखा  कल  ख़ुदी  के  नाम का  ख़ंजर ,
मिले न  प्यार तो दिल पर वो ख़ंजर ही सही लेक़िन ।

तेरी यादों से ऐ हमदम ? महज़  इतनी  शिफारिश है ,
रहे बनकर मेरे दिल  में  सितमगर  ही  सही  लेक़िन ।

किसी भी शर्त पर तुमको कभी मैं खो  नही  सकता ,
तेरे बदले  मिले  ग़म  का  समन्दर  ही  सही  लेक़िन ।

कभीआकर मिलो मुझसे किसी महफूज़ साहिल पर ,
मुकम्मल देख लूँ चेहरा  नजऱ भर  ही  सही  लेक़िन ।

यकीं  कर  ले  मुहब्बत  में  बसा  दूँगा  तेरी  दुनियां ,
ख़ुदी के दिल की बस्ती को लुटाकर ही सही लेक़िन ।

लबो पर रोक बैठे हो असिलियत क्यों मेरे  रकमिश ",
इशारों  में  कहो  कुछ  तो छिपाकर ही सही लेक़िन ।
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                           ✍ रकमिश सुल्तानपुरी

ग़ज़ल –40


   ग़म का  दरिया हूँ  कोई  साहिल  नही हूँ मैं ।
   ऐ दोस्त !तेरे  ख्बाब की मन्ज़िल  नही हूँ मैं ।

   दर्द   न    ले  दोस्त  मुझसे  रख  ज़रा  दूरी ,
   खण्डहर हूँ   ख़ुशनुमा  महफ़िल  नही हूँ मैं ।

   दोस्ती  में   प्यार का रख्खा  भरम  जब तो ,
   आप  समझो  आपकी  मुश्किल  नही हूँ मैं ।

   सच  कहूँ  तो  आप  मेरे  दोस्त  हो  अच्छे ,
   वक़्त   का  पाबन्द  हूँ  क़ातिल नही  हूँ  मैं ।

   हो सके  तो कर  ले  तू जज़्बात  पर  काबू ,
   प्यार  की   तरफ़ा  ज़रा माहिल  नही हूँ  मैं ।

   इश्क़   में    टूटा    मग़र    ख़ैरात  न  लूँगा ,
   प्यार के   ग़म  से  अभी  बोझिल नही हूँ मैं ।

   सिर्फ़ मिलना हो सकेगा ख़्वाब में "रकमिश ।
   पर  हक़ीक़त में   कभी हासिल  नही  हूँ मैं ।


                      ✍ रकमिश सुल्तानपुरी