सरसई धूप भाग –2

सरसई धूप Rakmish Sultanpuri द्वारा रचित  लघु कविताओं का संकलन है ।
सरसई धूप भाग–2

11.विविध दृश्य में।। 08/03/10

विविध दृश्य में
रंग रूप में
आकर्षित
अवलम्बित सा रहता है
हो जाता है किंतु विस्मृत अवलोकन की अधिकता से
रेखांकित हो
एक तुम्हारा
चित्र टँगा सा रह जाता है ।

और निशा में
धुँधले होकर
सभी झरोंखे
छुप जाते है रजनी पट में,
उष्ण हृदयतल पर शशि रश्मि प्रवाह में अविरल
मद्दिम– मद्दिम
रूप तुम्हारा
खिला हुआ सा रह जाता है ।

प्रातःकाल
स्वप्नों से बोझिल
नयनों को
क्या जग रुचता है ?
फिर –फिर कर फिर वही दृश्य फिरते हृदयपटल पर
स्मृतिओं के
गहन गर्त में
अश्रु छुपा सा रह जाता है ।

               ***


12.उर अवशोषित ।।       11/03/10

उर अवशोषित
अनुरागों का
मूल्य कहा
सम्भव जीवन में
जीवन पर प्रतिबंध उचित, अनुचित है भावों पर
यह जीवन भी
एक सम्पति है
कभी समझ पाया क्या तुमने ?

नयन रश्मि से
स्पर्श रहित
ओझल से 
तुम रहते हो
अंधकार फिर फ़ैल रहा है हृदय क्षेत्र पर।
दीपशिखा वह
मन्द हो रही
कभी जलाया जिसको तुमने ?

निरख– निरख कर
मन्द हँसी से
टाल रहे हो
अनदेखा सा
संकेतों में, अनुरागों की धाराओं के प्रवाह को
स्नेहों में
मूक व्यथा है
कभी न जाना जिसको तुमने ?

                     ***


13.शांत और स्थिर।।।          20/03/10

शांत और स्थिर
भावों को
देकर
ख़ामोशी का रंग
मनसद्वंद्व में पुष्पों से ये झुके दृग है स्नेहों  की
बरसातों तक
बरसातों में
भींग रही हो एक लता सी ।

तुम्हें पता क्या 
उस हृदय की
जिस मंदिर पर
छाया तेरी
बनकर आहट खुले द्वार पर छिपी हुई है
नवनिर्मित है
स्नेहों से
झांक रही है कोमलता सी।

कुटिल वार
उन संकेतों के
भर जाते है
विशद विबसता
एक सुगन्ध सी खिली भावना ठहर गयी है
इस चेहरे पर
उभर –उभर कर
खीँच रही मुझको ममता सी ।

                   ***


14.प्रथम मिलन से।।             24/03/10

प्रथम मिलन से
पूर्ण हमारी
आशाओं पर
ज्योति सजी है
भाव त्वरित परिवर्तित होकर स्नेहों में
खिसक कर रहे हैं
हिमनद जैसे 
मन से उर की राहों पर ।

स्नेहों के
उत्कंठा की
स्मृतियों के अवलम्बन से
तृप्ति हो रही है
वही तुम्हारे संसर्गो के क्षण रुके हुए है,
छाया रहता
विह्वल होकर
अन्तःकरण से आहों पर ।

यही तुम्हारी
मुस्काने है
जिसने मन को
घेर लिया है
हर्ष धमनियों में छिपकर झांक रहा है
अभिलाषा की
पूर्ति हुई जब
कल्पित पुष्पित भावों पर ।

                    ***

15.छाया में ।।                 25/03/10


छाया में
आकर रुक जाओ 
क्यों इतना
तुम भार लिये हो ?
क्या तुमको है ग्लानि नही वत्स तुम्हारे कहा गये ?
स्वास्थ्यहीन हो
वयोवृद्ध
फिर जीर्ण तुम्हारा तन है ।

अहम भूमिका
रखता है
जीवन में
कर्तव्यों का भार
पत्नी है बीमार प्रवासी पुत्र हुये है ।
निज कर्मो का
प्राप्त सुफल ही
अपने सुख– दुःख का साधन है ।

सम्बन्धों का
अस्तित्व खो गया
धीरे –धीरे
स्वार्थ और भौतिकता में,
उद्देश्यों की डोर पकड़कर चला आ रहा हूं
शांति मिलेगी
कभी तो मुझको
क्योंकि आशा ही जीवन है ।

                     ***

16.उपज रहे थे।।           26/03/10

उपज रहे थे
मरुस्थल में
स्नेहों के
अभिनव अंकुर
पछुआ पवन से बढ़ी निराशा दूरी से
स्मृतियों से
साहस पाकर 
दुःख दर्दो को घूँट रहा हूं ।

जीवन की
इस पगडंडी पर
स्नेहों का
अवलम्बन था
स्नेहों की वह लाठी अब तो ऊर्ध्वाधर है ।
गतव्यों के
बिमुख भूलकर
इक अंधे सा छूट गया हूं ।

उन लहरों के
उन भवरों के
प्रभावों से
उठती हलचल
बार –बार स्नेहों का जल भिगो रहा है काया
पड़ी दरारें
टुटे हुये से
तटबन्धों सा टूट गया हूं ।

                ***


                मेघों सा ।।।        28/03/10

मेघों सा
छाया रहता है 
स्नेहों का उमड़ाव
तुम्हारे चेहरे के भावों पर
ना जाने फिर भी क्यों तुम शांत रहा रहते हो
इस जीवन में
तन को मन को
विह्वल किया आकर्षित है ।

वाक्यार्थ के
अनुगमनों से
करते रहते हो कोशिश
मेरे उर तक जाने की
जिसमें तस्वीरें हैं तेरी जान रहे हो समझ रहे हो
नयनों की
संकोची जिज्ञासा
विह्वलता से परिचित है ।

फिर क्यों तुमने
जीत लिया है उर
नयन रश्मि के
द्वन्दों से
अब तो अंतिम पहर शाम का हो चला सक्रिय है
फिर जग के
इस अंधकार में
खो जाना तो निश्चित है।

                   ***
18.समृतियों में ।।।       31/03/10 

स्मृतियों में
भेज रहा हूं
बोझिल मन को
क्षणभर स्थिर हो जाता है
भौतिकता से हटकर के सुख की छाया में फिरता है
पा करके वह
एक ज्योति फिर
हो जाता है बिल्कुल शांत ।

विफल बिवशता
में मुड़ जाता
स्वाभाविक
जन –जीवन की इसी त्रासदी में
किसी विकल्प में एक भाव वह नहीं पा रहा है
कहीं मिटे न
रूप तुम्हारा
इस भय से रहता आक्रांत।

यही चांदनी
घर तेरे है
यही चांद मेरे घर पर भी
धीरे-धीरे उतर रहा है
दृग चिन्ह तुम्हारे इसी चांद में अब देखा करता हूं
कभी-कभी तो
सैनों का मंथन
हो जाता है बहुत नितांत।

                  ***

19.उन अधरों पर ।।।       09/04/10

उन अधरों पर
संकोचों से,
संकेतों से,
बह रही स्नेहों की धारा
उसी झील में खोज रहे है ,है कितनी गहराई
एक दूसरे की
आँखों का
बना लिया है दर्पण ।

परन्तु दूर तुम
दुर्लभ दर्शन
आखिर कब तक
दुःखी रहोगें समाजिकता से,
आकर देखो वातावरण के परिधानो पर,
आज रुकी ये
स्मृतियाँ है
है स्नेहों का वर्षण ।

किन्तु अंततः
सुदृढ़ हो गया
स्नेहों के प्रति
आज मनोबल मेरा
रोक सके न तुम भी अपनी अभिलाषा को
अपने सुख को
और दुःखो को
करके मुझको अर्पण ।

                   ***


20.उन्ही दृगों से ।।।                13/04/10

उन्हीं दृगों से
वही दृश्य फिर
लगने लगता
अवलोकन का सुख सर्बश्रेष्ठ है
विह्वलता में और निकटता संकेतो के परिवर्तन से
बढ़ती जाती
सुख की छाया
स्नेहों में संघर्षो तक ।

आते –आते
पतझङ सावन
व्यग्रता की लता
जीर्ण हो गयी है
अवलोकन से वाक सलिल से वाष्पित होकर,
और अचानक
बह जाता है
छुपा हुआ था जो वर्षो तक ।

और अंत में
भौतिकता में
समाजिकता में
दब जाती है भावुकता वह
रीति –रिवाजों की एक परिधि में लुप्त हो रहा है ।
स्मृतियाँ ही
शेष रह गयी
स्नेहों के निष्कर्षों तक ।

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समस्त रचनाएं  Rakmish Sultanpuri द्वारा रचित  एवं प्रकाशित हैं ।
सरसई धूप भाग–3 भी अवश्य पढ़ें।

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