सरसई धूप

सरसई धूप Rakmish Sultanpuri द्वारा रचित  लघु कविताओं का संकलन है ।
सरसई धूप भाग–1

1.पुनर्मिलन

पुनर्मिलन
इन आँखों का
तस्वीरों का तस्वीरों से
तृप्त हुयीं
आँखें मुस्काई
शांति मिली है मन में ।

नवाकलन
स्नेहों का
भावों से ,रेखाओं से
चेहरे पर ठहरे दृगपर
संतुष्ठि मिली है तन में ।

हृदयाभरण
स्नेहो में
क्यों छोड़ गये, क्यों दूर रहे ?
मूक हँसी से
रुके अधर ये
पूछ रहें है स्पंदन में ।

×××


2-इस सन्ध्या में ।।   14/02/10

इस सन्ध्या में
प्रबल हो रहे
स्नेहों पर
अवरोध बनी सरसों की लतायें
झलक रहा है
चित्र तुम्हारा
फिर भी धुंधलेपन में ।

सूनेपन में
आहट पाकर
उर गुंजन की
स्नेहभरी साँसों से पुष्पित
अरहर, सरसों
बरसाते पर
झूम –झूमकर अभिनन्दन में।

कभी फूल तो
कभी टहनियां
आ जाती है
मध्य –मध्य में खो जाती हैं
तस्वीरों पर
उलझ रहे दृग
हल्के– हल्के अभिनन्दन में ।

***

3-फिर खेतों में ।।।  14/02/10


फिर खेतों में
प्रकृति आकर
रुकी रह गयी है,
खोल रही है घूँघट को ज्यों
हरियाली पर
फ़ैल गयी है
एक परत यह पीलेपन की ।

यह सन्ध्या जो
रुकी हुई सी
घनी हो रही है
इस विश्राम सैय्या पर रुककर
इंदु किरण संग,
खो जायेगी 
गहराई में धुंधलेपन की ।

स्नेहमयी
आँखों की ‘ज्योति’
दुःखी हो रही है
प्रतीक्षा में खुले रहे दृग
सन्नाटों में
महक आ रही
स्नेहों में अंधेपन की ।

***


4-उस विधवा के ।। 15/02/10

उस विधवा के
कर्णपटल पर
गूँज रही है
पतझङ की आवाज
छूट गयी है, टूट गये मकरन्द पंखुड़ी
बड़ा किया था
जिसको दुःख में
पास –पोषकर स्नेहों से ।

एक अकेली
रोपी थी मैं
एक अकेली
आज शेष हूं
माँ-माँ कहकर छुप जाते तब आँचल में ।
अब तो आते -जाते
देख सदन में
निरख रहें है सदेहों से ।

उजड़ गया
वह एक घोषला
जिसके तृण से
बने महल ये
उस तिनके की छाया में धूप कभी न लग पायी
उम्र ढली
पतझङ क्या आया
अलग हो गये निज गेहो से ।

***


5-अंकित होकर।।  22/07/10

अंकित होकर
सुलभ दृश्य पर
छा जाती है
इस होली में
जीवन के परिपथ पर मौसम के फौव्वारों से
आज तुम्हारे
उसी चित्र पर
सुख– दुःख के दो अंग बने है ।

विकृत हो रही
गीतों की ध्वनि
प्रयासों में
रूखा –रुखा उभरा है स्वर,
शेष नही हैं हृदय स्पर्शी स्नेहीजन
पतझङ में
जीवन के काटें
किन्तु आज भी संग बने है ।

ओशों सी
कण –कण बनकर
गहन नीरसता
छा जाती है
भूतकाल में स्नेहों की स्मृतियों से,
सुख की छाया
छूट गयी है
दुःख परिपथ के अंग बने है ।

***


6.शांत दृगों से ।। 25/02/10

शांत दृगों से
करते रहते
दो क्षण तक
भावों का आदान –प्रदान
वायुमण्डल पर अवलोकन की किरणों से
बन जाता पुल
संकेतों के यान दौड़ते
उर स्पंदन की गति से ।

आ जाते है
चलचित्रों सा
उभर– उभर कर
दृश्य तुम्हारे चहरे के
उत्सुकता में झलक रही है प्रकृति भी आँखों में
उसी कान्ति का
उसी ‘ज्योति का
अनुरागी हूं संगति से ।

परिवर्तित
हो गये झरोखे
बिवसता में
दूर हो गये तुम भी,
दिकसूचक की तरह परन्तु सम्मुख ही रहते हो
स्नेहों की नदियों में
विस्वासों की नाँव
चलाते है कितनी दुर्गति से ।

****


7.संचित मन की ।।  28/02/10

संचित मन की
आशाओं पर
कुहरों की
इक परत जम गयी है
बिछड़ रहे मिलने से पहले अंधेरों में
‘ज्योति" मिली जो
झिलमिल होकर
इक न इक दिन बुझ जायेगी ।

पतझङ में भी
सूखे तरु ये
आँखों के परावर्तन से
रमणीय हो गये है
हर दृश्यों पर रंग तुम्हारी मुस्कानों का,
स्मृति वटों से
समय की बारिस से
इक न इक दिन धुल जायेगी ।

शेष बचेगी
कुछ घटनायें
और तुम्हारी चितवन
जो हृदय में रम गयी है
पास नही क्यों दूर रहे तुम पूछ रही होगी
हृदय से निकल– निकल कर
इन्ही नसों में
इक न इक दिन घुल जायेगी ।

***

8.नयनों की ‘ज्योति ।।27/02/10

नयनों की ज्योति
टहल रही है
अजनबियों सी
झील तटों पर
स्नेह लहर में उलझ गयीं है भींग गयी हैं
आशाओं की
अधिकता में
अभिलाषा की प्रबलता है ।

कभी भवँर में,
कभी कुञ्ज में,
छण दो छण
करती है स्नान ।
बोझिल होकर तस्वीरों से ठहर गयी है
मधुकर को भी
कान्तिमयी
कलियों पर रुकना पड़ता है ।

बड़ी शांति है
सुख की छाया
पलकों पर
सुंदरता भी है
रमणीय हो गयी है प्रकृति भी अवलोकन से
जग दर्पण से
इस गहन कुञ्ज में
स्नेहों की सघनता है ।

***



9.यह लघु सरिता ।।05/03/10

यह लघु सरिता
और खाइयाँ
प्रसुप्त झरोखें
अब प्रफुल्लित नही दिख रहे
वही फसल है , उन फूल पर कीट –पतंगे,
सन्ध्या के
मद्दिम प्रवाह में
आज भी ठहरा है निर्जन ।

प्रज्वलित करके
स्नेह –अग्नि
अन्तःकरण में
आँखों में
दूर –दूर मेघों सा छाकर ढह जाते है
स्मरण तुमको
नही रह गया
वर्षो पहले का गुंजन ।

क्षुब्ध हृदय से
लौट रहा हूं
प्रकृति भी यह
सन्नाटों में हँसी ले रही है
सन्ध्या से अंधकार में खो जाते है शुष्क झरोखे
सम्भव कैसे
हो पाया है
तुममे इतना परिवर्तन ।

***

10.नियंत्रित करता है।। 09/03/10

नियंत्रित करता है
संचार रगों का
स्नेह
तुम्हारी आँखों का,
दुर्लभ शनिध्यों में स्पर्श कर रहा हूं ।
संकेतो से
मधुरिम मन को
जिसका कोई अंत नही है ।

रहता है बस
एक परिधि में
चंचल मन
चक्रवात की वातों सा
नियत वेग से धीरे –धीरे तीव्र हो रहा है
स्थिरता भी
उदासीनता
अब जीवन पर्यंत नही है ।

बढ़ता है
झरता रहता है
स्नेह
कोमल मुखमण्डल से
असंतृप्ति ,संतुष्टि तृप्ति भर रहा है
अब प्रणय निवेदन
हुआ नही तो
मत कहना बसन्त नही है ।

***

सरसई धूप की अन्य रचनाएं "सरसई धूप भाग –2" में पढ़े
नोट– समस्त रचनाएं रकमिश सुल्तानपुरी द्वारा रचित एवं प्रकाशित है ।

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