डाल का ले लो सहारा ।
01/09/09
उद्यानों मे है छायी
शाम की परछाईया है
अनवरत बरसात मे
आशाओं का सबेरा
डाल का ले लो सहारा ।1
तेज है वर्षा की बूदें
बहती पवन भी है शयानी
बौछारों से तुम्हारे
रूप पर टिकता न पानी
झाड़ियों की पत्तियां भी
आकर्षण मे तुम्हारे
संसर्ग पाने के लिये
त्यागती जीवन हैं सारा ।
डाल का ले लो सहारा ।2।।
नम करती नम हवाएँ
उष्णता को धूप को
रसभरे आमों को देखू
या तुम्हारे रूप को
अधखिली मुस्कान पर
तैरती है इंद्रधनु
पारदर्शी वस्त्रों पर
है छिटकती तीब्र धारा ।
डाल का ले लो सहारा ।3
आ चले आओ यहाँ पर
छांव है आगोश है ।
सन्निकट होकर परस्पर
मेघ दो शीतोष्ण हैं
पक्षी भी अब छिप गये है
अपने ही पँखो मे मिलकर
आम के फल कर रहे है
शांत शब्दो मे इशारा ।
डाल का ले लो सहारा ।4
पास आ जाने से तेरे
सान्त्वना मुझको मिलेगी
संकेतों के संकुचन से
बात उर की हो सकेगी
झांककर आँखों मे तेरे
देख लें कितना मनोरथ
स्नेह भरने के लिये
बादलों ने है उकेरा ।
डाल का ले लो सहारा ।5
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