अब मुझे विश्वास है ।।
17/09/12
कौन किसकी फ़िक्र मे
स्वार्थ अपना छोड़ता है
रिस्वतों का बढ़ गया अब
लालची मलमास है ।।
अब मुझे विश्वास है ।।1।।
यह तुम्हारे साथ जो
उठ रही आवाज है
मूक थी या फुसफुसाहट
मधुरिम वाणी आज है
अब उन्हें चिन्ता न होगी
न्याय या अन्याय की
जी हुजूरी का जिन्हें
हो गया अभ्यास है ।।
अब मुझे विश्वास है ।।2।।
बात उनकी क्या करूँ मै
जो बने अंजान है
अब नाज़ायज कोशिशों से
बन रहे इंसान है
कर नही सकते किसी का
हित किसी भी रूप मे
जबकि अपने कर्मफल का
हो रहा एहसास है ।।
अब मुझे विश्वास है ।।3।।
आश्वासन की सृंखला का
जाल बुनते जा रहे जो
शोषितों की आह का
विस्तार करते जा रहे जो
भयभीत हैं अपने ही पन से
दूसरों की बात ही क्या
निज दुःखो की औषधि
तो उन्ही के पास है ।।
अब मुझे विश्वास है ।।4।।
वह समर्पण कर्म का
हृदय मे जिसके बस गया था
आ ख़ुसी का एक मौका
जिंदगी मे हँस गया था
आश्रम मे पल्लवित
अंकुरित होते रहे वो
आज सब झूठा हुआ
बन गया इतिहास है ।।
अब मुझे विश्वास है ।।5।।
क्या वही नाजुक सुमन
उर प्रहारक बन सकेगा
कंटकों सा चुभ हृदय मे
नाश का कारण बनेगा
है या किसको कहाँ
कब कौन धोखा दे रहा
हर किसी के दुःख का साधन
तो उसी के पास है ।।
अब मुझे विश्वास है ।।6।।
राम केश मिश्र
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