आज लिखना ही पड़ेगा ।

               आज लिखना ही पड़ेगा ।।
                                    19/01/10

दौड़ती इस जिंदगी मे
वक्त तो बिल्कुल नही है
वास्तविकता के लिये पर
वक्त को झुकना पड़ेगा ।
आज लिखना ही पड़ेगा ।।1।।

अंधानुकरण की पहल यो
तीब्र गति से हो रही है
सामाजिकता बैठी कही
गांवों मे अब रो रही है
सभ्यता की आंधियां
बह चलीं है इस तरह
जो खड़े है पैर से
औंधे मुँह गिरना पड़ेगा ।
आज लिखना ही पड़ेगा ।।2।।

परिधानों के शॉर्टकट भी
चल पड़े कितने अनोखे
एक तो है पारदर्शी
दूसरे उन पर झरोंखे
क्या उरोजों की कहें हम
टापुओं से बन गये है
हाबड़ा के पुल सा उनको
कम्पन करना ही पड़ेगा ।।
आज लिखना ही पड़ेगा ।।3।।

संकीर्ण वर्स्त्रो से जहाँ तक
हो सके मॉडल दिखाती
आज की ये उर्वसी
परम्पराएं है बनाती
पाठशाला थी एक मंदिर
सभ्यता औ संस्कृत की
अंधो की आंधी मे उसको
पार्क सा दिखना पड़ेगा ।।
आज लिखना ही पड़ेगा ।।4।।

कोमल अंगों पर उभर कर
सुंदरता अब है रुआँसी
शालीनता मुँह छिपाकर
कब्र मे आँशू बहाती
सादगी आहत गिरी है
चंचलता की खड्ग से
सौम्यता मरती रहेगी
आवरण जितना घटेगा ।।
आज लिखना ही पड़ेगा ।।5।।

कौन किसके आचरण की
क्या करे अवलेहना अब
है सुनामी पश्चिमी ये
धीरे धीरे ढल रहे सब
भविष्य की आँखों से हमने
क्या कभी देखा है इसको
अपने घरों में भी हमे
छुप छुप के रहना पड़ेगा ।।
आज लिखना ही पड़ेगा ।।6 ।।

और उनके प्रेम की
क्या अजब गाथा बनी है
आज देखा मुस्कराये
कल कमर मे कामिनी है
अब कोई कवि क्या लिखेगा
झुरमुटों वाली कहानी
उक्ति झूठी है नही अब
प्रेम को बिकना पड़ेगा ।।
आज लिखना ही पड़ेगा ।।7।।

उद्यानों मे ले जाकर
क्यों नही उनको दिखाते
पर्ण हीन वे आम के फल
किरण दृगों से सूख जाते
सुंदरता उनकी खो जाती
पड़ जाती है झाइयां
पर अचानक मंदबुद्धि का
ग्रास तो बनना पड़ेगा ।।
आज लिखना ही पड़ेगा ।।8।।

इस प्रदर्शन के लिये यदि
चुप रहें कुछ भी कहे न
आदिमानव बन रहेंगे
एक दिन तुम देख लेना
तब सभ्यता कुछ और होगी
भारतीयों की अलग
मानसिकता की विबसता
तब हमें पड़ना पड़ेगा ।।
आज लिखना ही पड़ेगा ।।9।।

                               राम केश मिश्र

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