धुँआ बनकर रह गयी है ।

                धुँआ बनकर रह गयी है ।।
                               26/01/10

उम्र भर जलती रही जो
दीमकों की ज्योति सी
विचारों की वह सृंखला
धुँआ बनकर रह गयी है ।।1।।

असहायों पर दया की
प्रेरणा से आँखे गड़े न
देखकर दुःखियों के दुःख को
अब रोंगटें होते खड़े न
स्वार्थी के रंग के हर
फूल कुछ ऐसे खिले है
टहनियां ही शेष है
पंखुड़ी सब ढह गयी है ।2।।

उन्नति की इन आंधियो मे
आचरण गिरने लगा है
परोपकार की जड़ो पर ।
घुनो का पहरा लगा है
अंधो की लाठियां भी
ढूढ़कर हम थक गये है
व्यवहारों के वनों मे
अधिक जर्जर हो गयी है ।।3।।

फर्क दिखता है कहाँ अब
न्याय व अन्याय मे
न्याय का है उद्वरण न
अब किसी अध्याय मे
सत्य रूपी पंक्तिया है
धूमिल धूमिल अक्षरों मे
पर बहुत गहराइयों मे
जीवाश्म सी दब गयीं है ।।4।।

प्रगल्भ के आगे यह पर
सत्य की चलती कहाँ है
अब किसी की बात पर
किसको भरोसा हो रहा है
अविश्वास रूपी भित्तिका 
बढ़ रही सन्देह जल से
ईर्ष्या भी मस्तिष्क रूपी
खाइयों मे जम गयी है ।।5।।

                     

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