मै जहाँ तक जानता हूं ।।
18/09/09
भौतिकता के बंधनों से
सूनेपन मे निकलकर
प्रकृति की उस मुस्कराहट
से स्वयं को बांधता हूं ।
मै जहाँ तक जानता हूं ।।1
बंजरों के किनारे
ऊँची ऊँची खाइयां है
घास के पत्तो की जिनपर
चढ़ चुकी अंगड़ाइयां है
बस उन्ही खेतों मे क्षणभर
घूमता हूं शाम को
और हलकी सी हवा मे
दृश्य को निहारता हूं ।
मै जहाँ तक जानता हूं ।।2
हरियाली से लद चुके है
खेतों की पगडंडियों पर
फेरता हूं कर सघन
उन आसमानी झंडियों पर
कोमलता में कोमलता के
आश्वासन के लिये
अंतर्मन मे सजोकर
हृदय से पहचानता हूं ।
मै जहाँ तक जानता हूं ।।3।।
लघुसरिता की लहर पर
नृत्य करती चांदनी है
जैसे कीड़ी नवयौवना की
कान्ति की वह रागिनी है
जिसपर सन्ध्या की सजगता ।
लेटकर विश्राम करती
के दृश्यों के दृगों को
कल्पना से तारता हूं ।4
मै जहाँ तक जानता हूं ।।
ये नयन अलि चूसते है
अरहरों के फूल के रस
अधरों से फिर गुनगुनाहट
मे झूमते है भावबस
जीर्ण पत्तों के स्खलन से
पंक्ति अगली है सुशोभित
सत्यता जीवन की जिसमे
मै सही अनुमानता हूं ।
मै जहाँ तक जानता हूं ।।5।।
🌷🌷🌷
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