क्या कहूँ अफ़सोश होता ।।
06/08/09
रूप धूमिल हो चुका है
दुःख के गलियारों मे तेरा
मिटटी के ढेलों से उठकर
चमकता रजकोष होता ।
क्या कहूँ अफ़सोश होता ?1
भाग्य की इस कामना मे
धीरता को खो न देना
छा रहें पलकों पे आँशू
बादलों सा रो न देना
काट लेंगे मिलकर दोनों
दुःख भरे दुर्दिन दिनों को
अंकुरित इन अंकुरों को
देखकर सन्तोष होता ।
क्या कहूँ अफ़सोश होता ?2
हे प्रिये दुःख है मुझे भी
न हो सका पूरा मनोरथ
छिन्न वस्त्रों के झरोखें
कर रहे अंगों को आहत
परिश्रम की अधिकता से
व्यकुल मुझको देखकर
संकोची ये अधर कुछ
कह सके न होश होता ।
क्या कहूँ अफ़सोश होता ?3
इन किशोरों से छिपा लो
रेट सा आँखों का पानी
रजकणो से लिपटकर
तोड़ दी हमने जवानी
पुष्प से अधरों पे देखो
घाव की है धारियां
जिसमे कभी पुष्पित कली का
झर रहा मधुकोष होता ।
क्या कहूँ अफ़सोश होता ?4
रख दो थाली डाल पर
क्यों किया उपवास तमने
छिप सकेगी यह व्यथा न
पा लिया बिस्वास हमने
प्रकृति की इच्छा यही है
आ मेरे हृदय से लग जा
और यह भी मान ले तू
भाग्य का न दोष होता ।
क्या कहूँ अफ़सोश होता ?5
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