रूप तेरा ढल सकेगा ।।
23/09/09
खिल उठे थे मौसमो मे
ये गुलाबी रंग पाकर
क्या कभी सोचा था तुमने
रूप तेरा ढल सकेगा ?1
कलियों की उन पंखुड़ी से
अधरों की तुलना न होती
चन्द्रमा की चांदनी भी
रूप को तेरे थी धोती
हास्य अंकुर उग चुके थे
सुन्दर सुशोभित पंखुड़ी पर
लालिमामय उन कपोंलो
पर संकुचन मे पल सकेगा ?2
थी कली तूम एक सुंदर
प्रकृति के उद्यान मे
सरपतोँ सी लचकती
चाल मे अभिमान मे
और स्नेहीजन के लिये
दर्द का कारण बनी थी
क्या धूमिलता मे तुम्हारे
सैनो का बस चल सकेगा ?3
पारदर्शी वस्त्रों पर
ललचायी आंखे तरसती
हर दिशाओं से हृदय पर
नेह की बूदें बरसती
तृप्ति तुमको न मिली जब
उपेक्षा की अवलेहना की
क्या वही स्नेह वाणी
सम्भवतः अब पल सकेगी ?4
रूपता की हदों पर
कर लिया तुमने भरोसा
वास्तविक जीवन में आकर
निज हृदय को आज कोसा
जब कभी तुम देखते हो
अपने पथों का अनुकरण
क्या कभी रोक है तुमने
दर्द उनका बन सकेगा ?5
चाहते तुम रोकना पर
हारते अधिकार से
सान्त्वना उनको मिलेगी
पंथ के व्यवहार से
बहती सरिता कब रुकी है
सागर का संसर्ग पाकर
हर कोई अपने लिये
खुद दुःखों को गढ़ सकेगा? 6
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