हे प्रिये ! यह वेदना क्यों ?
28/01/09
स्वर्ग से जीवन मे जब हम
डूबे थे सुख के जलद मे
आज दुर्दिन मे दुखों के
रूप से अवलेहना क्यों ?
हे प्रिये ! यह वेदना क्यों ?1
आज अपने ही घरों मे
बाढ़ का पानी नही है
गाँव घर हर झोपडी में
विवस सरिता वह चली है
सूख जाते है क्षणों मे
बूद के दो चार कण
धारा के बहते जलो मे
असफलता से रोकना क्यों ?
हे प्रिये ! यह वेदना क्यों ?2
हो रहे बेघर यहाँ
लाखो हज़ारों लोग है
क्षुधातृप्ति के लिये बस
दैव हैं संयोग है
शान्त हैं ख़ामोश राहें
कोलाहल से भरी
दूर स्थित स्वजनों की
याद मे संवेदना क्यों ?
हे प्रिये ! यह वेदना क्यों ?3
स्नेह का सूरज तुम्हारी
आँखों मे जब आ टिका था
आभास था कल्पित परन्तु
भावना पर मर मिटा था
अब भी है सम्पति हमारी
वह रूपता यह शीलता
अब सुखद स्वप्नों मे तुमको
सोचता हूं भेजना क्यों ?
हे प्रिये ! यह वेदना क्यों ? 4
मानवता का सुआशय
हो गया संकीर्ण देखो
प्रकृति की इस गोद मे
बह रहे कुछ नीड़ देखो
जो कि चिंता बन चुकी है
आज पूरे विश्व की
केवल अपने स्वार्थ के हित
भाग्य को ही कोसना क्यों ?
हे प्रिये ! यह वेदना क्यों ?5
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