बात उर की कह न जाते ।।
13/08/09
आशाओं की सतह पर
धुंध औ कुहरा रुका है
संकेतों के स्पंदन से
दूर रहकर झिलमिलाते ।
बात उर की कह न जाते ।।1
संकेतों से भला क्या
शांति मुझको मिल सकेगी
बादलों की ओट से क्या
चाँदनी वो खिल सकेगी
क्या समर्पित कर दू तुमको
स्नेहगृह की रिक्तता को
पास आने के लिये है
पैर मेरे डगमगाते ।
बात उर की कह न जाते ।।2
और इक रंगीन तितली
की तरह तुम आ ही जाती
फिर मेरे स्नेह रस को
इस हृदय से चूस जाती
ढूढ़ता हूं फिर तुम्हे मै
सरसों के हर फूल पर
झिलमिलाती कान्ति की
ओझलता को सह न पाते ।
बात उर की कह न जाते ।।3
हो रहा विस्वास यह कि ।
शांति तुमसे ही मिलेगी
पर हमारी भावना ये
वेदना तो न बनेगी
चल रहा हूं बन्द आँखों
मे लिये तस्वीर तेरी
और छाया फूल कलियों
की जरा सी टिक न पाते।
बात उर की कह न जाते ।।4
प्रेमरूपी ज्योति का ।
वाग्मय सुरुआत होता
निशापूर्ण इस हृदय मे
इक नया प्रभात होता
भावना बढ़ती ही जाती
कल्पनाओं से परे
हृदयतंत्र बनकर खगों सा
गूँजते है गुनगुनाते ।
बात उर की कह न जाते ।।5
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