मानसिकता सड़ गयी है ।
27/09/09
मानवता का बिखण्डन
देखकरके यह निराशा
कद्दुओ की वेल सी
छप्परों पर चढ़ गयी है ।1
व्यंगों के परिताप से
जीवन बोझिल हो चुका है
आचरण भी लड़खड़ाकर
अस्तित्व अपना खो चुका है
धर्म के अंधियारों मे देखो
बुझता दीपक सा पड़ा है
वट से लंबे हाथ सी
दुष्टता भी बढ़ गयी है ।2
नैतिकता की जड़ो मे
दीमकों का है बसेरा
उत्कोची हाथों से हमने
खुद सजा रखा अंधेरा
भीड़ मे सच्चाई की
छाया मे छिपता रहा
प्रलोभनों की जटिलता
व्यक्तित्व पर अड़ गयी है । 3
न किसी से पूछना तुम
प्रलोभनों के कहकहे
हर किसी की आँख से
दुःख भरे आँशू बहे
तृप्ति हृदय को मिली न
खोजने से उम्र भर
सूक्ष्म धागों मे दरारें
गांठ सी पड़ गयीं है ।4
असहायों का भरोसा
सामाजिकता से उठ चला है
बलसाली हाथो की कृपा
का वहाँ पर सिलसिला है
स्वर्ग है जिनके लिये
कागजों की छांव मे
भौतिकता मे लिपटकर
मानसिकता सड़ गयी है । 5
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