नवगीत भाग–1

नवगीत के बारे में–
 नवगीत– नए विचार, कथ्य, बिंब, प्रतीक, परंतु सरल शब्दों की मेटाफिजिकल कविता है ।

नवगीत–1

एक महीना
बारिस खा गई 
आज धूप का चौथा दिन है ।


रिमझिम -रिमझिम
टपटप- टपटप 
वर्षा के पदचाप निरन्तर
दिनकर सुनता
चुपके-चुपके 
सोया रहता है अपने घर 
नाले ,नदियाँ, 
झील,सरोवर 
तृप्त हुए ,धरती मुस्काई 
पुरवाई 
लगती है जैसे
पछुआ पवनों की समधिन है ।1


झाँक रही है
युवा पृथ्वी
हरियाली की चादर ओढ़े 
दादुर ,मोर 
पपीहा, चातक, 
कौआ कोयल सा स्वर छोड़े 
मेघ मंडली 
की प्रतिध्वनि सुन 
आह्लादित है, आवेष्ठित हो
ज्यों हाथों में
लिए झुनझुना
नाच रहा नवजात विपिन है ।2

बौछारों की 
तारतम्यता 
हरियाली को लगते चरने
दुलराते हैं
जल की परतें
नदियां, झील, झरोखे, झरने ,
ढूंढ़ रहें खग
अपनी की छाया
इंद्रधनुष के रंगों में,
सुख है, दुख है 
और दुखों में 
घटाटोप सा दुर्दिन है ।

–रकमिश सुलतानपुरी

  ***


नवगीत–2


आज के रिश्ते 
हुए हैं रोड लाइट ।

व्यस्त  निजता  में यहाँ  इंसान साये के 
स्वार्थ उपजा जल गए रिस्ते किराये के 
हो गए हैं पास 
तारों से पहुँच से दूर सब
खा गई अपनत्व 
वैरी बेबसाइट ।1


भाव के प्रहार से दिल टूट जाता जब 
हाशिये पर दर्द से  रोता मनुज है तब 
सुप्त चिंताएं 
हुई है नीम की पत्ती
लोग अच्छे हैं
मगर है स्वाद टाइट ।2


आदतें हावी हुई  हैं हाथ  मलने की 
चेंज होती जा रही प्रवृत्ति छलने की 
लोग जैसे हो गए हैं
खेत के ढेले 
गर्दिशों में गल गए
ले पौष्टिक डाइट ।

–रकमिश सुलतानपुरी

     ***


नवगीत–3

जिन लोगों ने
दर्द छुआ है ,
उनमें तुम हो, उनमें मैं हूँ ।1

हरे घाव को 
तृप्त कर गई
ये सन्ध्या की धूप बुढ़ापी 
नमी दे गई 
नम आँखों को 
जीवन की ये आपाधापी 
एकाकीपन 
दो गज ठहरा 
भीड़ लिए,निर्जन में मैं हूँ ।2

थपकी देकर 
सुला रही है
निशि को वर्षा आताताई
टपटप सुनकर 
भोर आ गयी 
रात उठी सोकर अलसाई  
मुझमें मैं हूँ 
या प्रकृति है
ख़ैर इसी उलझन में मैं हूँ ।3


चिंताओं की
बदली मन में 
घिर आयी 
काफ़ी नज़दीके 
प्रेम न माने 
खुद के आगे
नपने सारे झूठ सही के 
फिर तुमको 
क्या आश्वाशन दूँ,
दर्दो के आँगन में मैं हूँ ।4


       –रकमिश सुलतानपुरी


नवगीत–4


आदमी की
क्रूरता में 
कौन सा रस है ?
देख जग की 
रीति इन 
आँखों में पावस है ।1


रुग्णता से हार  जाती  तीक्ष्ण छमताएँ, 
आदमी  को  तोड़  देती   क्षुद्र  बाधाएं 
हो  बुरा  जो वक्त मोमी भी लगे पत्थर,
वक्त अच्छा हो तो
पाषाण पारस है ।2


शर्म  को  झकझोर  देती  तुच्छ घटनाएं ,
हो गयी दूषित मनुज की मानसिकताएं ,
न्याय का अस्त्तित्व जैसे है बुझा दीपक ,
सत्य के अभिमान में
उत्साह नीरस है ।3


प्रेम का अवलम्ब निशदिन हो रहा जर्जर,
भाव खाती  भावना  में  आ  रहा  अंतर ,
हो   रहा  विस्तार  जीवन  में  बुराई  का ,
आत्मादुत्कारती 
खामोश मानस है । 4


मात्र सतकर्मों  से मिलता पुण्य जीवन में,
धर्म भरता है  अक्षुण्ण  उद्वेग तन-मन में ,
ऊर्जा   मिलती   यहाँ   उपमेय  के  द्वारा ,
संसार में
काव्य का
उद्गम भी सारस है ।5

     –रकमिश सुलतानपुरी


नवगीत–5


आश दे तो आशना दे ।
देव ! ऐसा  ताप  न दे ।1


सभ्यताओं को  निगलने आज विपदाएं 
चल पड़ीं हैं व्योम  तक ले दुष्ट छमताएँ
धर्म चुप है 
कर्म का फल 
देव को दानव बना दे ।2


है  डरी  सहमी  मनुजता  प्रार्थना करती ,
सत्य कहती ,झूठ की वो भर्त्सना करती ,
कौन दोषी 
है पता क्या
कौन किसको सान्त्वना दे ?3


चीख, दहशत, मौनता है और अफ़वाहें ,
ज्ञान , स्वाभिमान  ओछे  भर  रहें आहें ,
मन व्यथित है
देह को हम
और कितनी ताड़ना दे ?4


जंग भी   हम  धैर्यता  से  जीत   जायेगे,
शान्ति की फिर से नयी इक भोर लायेंगे
एकजुट
होकर लड़े हम 
दर्द को हम भाव न दें ।5


    –रकमिश सुलतानपुरी


नवगीत–6


लक्ष्य निरन्तर 
धूमिल करती
फैल निराशाएँ मटमैली।
कब तक चलती 
रहे अकेले
अनुमानों पर जीवन शैली ।।1


कर्मो के 
अवलम्ब ढहे है
निश्चित्ताएँ दूर खड़ी हैं 
पगुराते 
अवसर से लड़कर 
मानवताऐं चित्त पड़ी हैं 
अफवाहों पर टिकी
सभ्यता
अनुभव के सागर तक फैली ।2


सम्बन्धों में 
कड़वाहट से
पलता है अब प्रेम सशंकित 
अपना ही 
अस्तित्व बचाने
में सज्जनता हुई कलंकित 
दुख का 
वातावरण बनाकर
जोड़ रहे हम सुख की थैली ।3


कुहरों सी 
अफवाहों से नित
सच का भानु तिरोहित होता 
अनुभव बूढ़ा 
मन में उपजी
शंकाओं को कब तक धोता 
ढाढ़स 
कर लेता है ख़ुद ही 
अवसरवादी मन से टैली ।4


     –रकमिश सुलतानपुरी



नवगीत–7


निर्भय सोती 
रही जिंदगी 
मौत यहाँ सिरहाने बैठी । 1


जागरूकता
खाली पन में
पीट रही है रोज ढ़िढोरा 
आलस की 
चादर में लिपटा 
छिछलेपन ने खींस निपोरा 
पुनः व्यस्तताएं
रचने को 
आतुर हैं इक नई सभ्यता 
लेकिन कुसमय 
के सँग विपदा
गीत नये कुछ गाने बैठी ।2


काँप रही है
नव पल्लव सी 
महँगाई से क्षुब्ध गरीबी 
और अमीरी 
नाप रही है 
लाचारी को लिए  जरीबी । 
निष्क्रियता 
भरसक दौड़ी है 
मानव का अस्तित्व बचाने
नियति नियत 
होकर नीयति पर
व्याधि छोड़ मुस्काने बैठी । 3


दुबिधाओं में
अवसर पाकर
अफवाहों ने पंख पसारा 
परिवर्तन की 
उड़ी धज्जियां 
स्थिरता का है अंधियारा 
हालातों से
ठोकर खाकर
बदल गयी है जीवनशैली 
शिक्षा की सब 
नई नीतियां
जाकर के खलिहाने बैठी । 4


      –रकमिश सुलतानपुरी



नवगीत–8

  

आज गरीबी
के चौखट पर
चित्त पड़ी है क्यों महँगाई ।1


जीवन जीने 
की प्रत्याशा 
क्षुब्ध कहीं  आँखें  मलती है  
छोड़ शहर के
संसाधन सब
मजबूरी पैदल चलती है 
फूट रहे हैं 
तप्त फफोले
आज वतन के पैरों में फिर । 
दुनिया डरकर
कैद घरों में 
साथ निभाती है अलसाई ।2


मास्क लगाकर
भय दौड़ा है 
जीवन का अस्तित्व बचाने 
सुन्न पड़ी है 
जीवन शैली
मौत यहाँ बैठी सिरहाने 
महँगाई की 
बाढ़ देखकर
सुस्त पड़े है रिश्ते-नाते 
अवसर पाकर
कोरे मन को 
नाप रही है नित लघुताई । 3


वक़्त रुका है 
चौराहों राहों पर 
प्रगतिशीलता मुँह की खाती 
राजनीति भी 
जोड़ रही है
अँधियारे जनमत की बाती
त्राहि मची है
जनमानस में 
मात्र हिदायत जारी होती 
चातक-जनता
आश लगाए 
देख रही बादल -पुरवाई । 4


            -रकमिश सुल्तानपुरी

 

नवगीत–9


एक  अँधेरा  
सा  छा जाता है
परिवर्तित  व्यवहारों  में । 

द्वंद्व  अनेकों   
पलते   देखे, 
संवेदनहीन  विचारों  में ।1


स्वार्थ लिए 
निजता बढ़ती है
लघुता विस्तृत हो जाती 
सम्बन्धों  की  
डोर  सुकोमल 
टूट  कहीं  पर मुरझाती  
अनबन  चुप्पी  
साधे  बैठी  
नित खुश रहते  परिवारों   में । 2


आच्छादित  
सच्चाई की 
अनुभूति  नही कर  पाता है
अहसास प्रकृति के 
मिट जाते 
उर पत्थर  बन जाता है
लोलुपता घुल 
जाती है हठकर
मानव  के  संस्कारों  में । 3


मन  के चौखट  
पर  विस्तारित 
दुर्गुण  पहरा देता है
निर्णय की  
सामर्थ्य तिरोहित  
कर दुख गहरा देता है
मनुज  सदा   
उलझा  रहता है  
निजहित के ही  त्योहारों  में । 4


पशु से भी बदतर
वह मानव
जड़ चेतन का भान नही 
भाव-विहीन
समाज-विनाशक 
है जिसको अनुमान नही 
क्या अच्छा है
और बुरा क्या ?
फ़र्क नही कुछ अधिकारों में । 5

              --रकमिश सुल्तानपुरी 



 
नवगीत–10


बादलों की 
ओढ़ चादर
सो गए नभ के सितारे ।1


अनवरत बूंदों 
की रिमझिम 
वृक्ष -सम्पुट -शोर को सुन
घोसलों से 
चोंच भरकर
अम्बु छकते हैं चिरंगुन 
घन लिए 
घनघोर बारिस
आर्द्र करते हैं धरा को ,
हो रही जलमग्न 
नदियां 
शोर करते हैं किनारे । 2


गर्जना की 
दुंदुभी जब 
मेघ न खुलकर बजाया 
छिप गया 
आकाश में था 
सूर्य अब तक तमतमाया
हाँकता ही 
जा रहा रथ 
आँधियों का वो गगन तक,
स्वागतम 
करते उमड़कर 
नृत्य करते वृक्ष सारे ।3


आज सन्ध्या 
फिर खड़ी है
भोर में व्यवधान करती 
जो लिपट 
वर्षा से दिन में
रात्रि का अवधान करती 
सुप्त सरवर,
बाग, कानन 
खिलखिलाकर हँस रहे है ,
घूँघटों की 
ओट से
इंद्रधनु बदली निहारे । 4


           -- रकमिश सुल्तानपुरी

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