61- 🌷रोको मत,बह जाने दो🌷
स्नेहों की
लहरों पर
उर विह्वल हो जाने दो ।
रोको मत, बह जाने दो ।।
फ़ैल रही है कुहरों सी नीरसता और निराशा
लहरों सी उठकर तैर रही है नयनों में जिज्ञाषा
कितना सुख है
दुःख मे मेरे
नयनों को कह जाने दो ।
रोको मत, बह जाने दो ।।2
क्या सम्भव है विस्वासों पर आशाओं का बांध बनाना
क्या सम्भव है मुरझायी कलियों पर कान्ति उगाना
आहों की हर
अभिलाषा को
बूदों में कह जाने दो ।
रोको मत, बह जाने दो ।। 3
अंतःस्रावी अन्तःकरण पर धारा बनकर आती है
अवशोषित हृदय से रिसकर परिवर्तित हो जाती है
धाराओं से
फिर बूदों में
आकर्षण बरसाने दो ।।
रोको मत, बह जाने दो ।।4
विगत प्रेम का पुनर्स्मरण झंझावात सा आता
अनायास हि दुःख का बादल नयनों में छा जाता
अनियंत्रित
प्रबल वेग से
सहन शक्ति भर जाने दो ।
रोको मत, बह जाने दो ।।5।।
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
62- 🌷.मै चाहता हूं शांति🌷
मैं हूँ
अपना देश
मुझमे फैलती अशांति ।
मैं चाहता हूं शांति ।।1
मैं लोकतंत्र आवरण पर उपचार हो रहा
नसों में आतंकवाद का संचार हो रहा
धूप में
छाँव सा
बिखेरता हूँ कान्ति ।
मैं चाहता हूं शांति ।।2।।
विदेसी आतंकवाद का संचार कर रहे
राजनीतिक व्यंग्य से उपचार कर रहे
जनमत की
खिंचाखिची में
भर रहे है भ्रान्ति ।
मैं चाहता हूं शांति ।।3
संज्ञान है अज्ञान बन इंद्रिय शिथिल हुई
कर्मवीरों की हकीकत लहू से लिखी गयी
धुँआ उठा
अमर हुई
साँसे सम्मान की ।
मैं चाहता हूं शांति ।।4
ताज का विध्वंसकारी दृश्य सी अवलेहना
द्रष्टा मै चुप रहा पर चीख़ती है वेदना
स्वाभिमानी
प्रत्येक कण
कर रहे है क्रांति ।
मैं चाहता हूं शांति ।।5
" by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
63- 🌷हे सुमन तुम क्रोध मतकर🌷
कर्णकटु इन
वाग्बाणो
का दृढ़ विरोध मत कर ।
हे सुमन ! तुम क्रोध मत कर ।।1
पछुआ पवन मे कोमलता तो भंग होगी
खिल उठोगे तो कणों का अंग होगी
बह रही है
शुष्क होकर
क्रुद्ध हो अवरोध मतकर ।
हे सुमन ! तुम क्रोध मत कर ।।2
लक्ष्य है सुरभित करो तुम कंटकों को
ढांक लेना पंखुड़ी से वंचको को
उस बसन्त मे
धैर्य खोकर
अप्रिय उद्गघोष मत कर ।
हे सुमन ! तुम क्रोध मत कर । 3
कीट पतंगों के गर्वकर ऐंठने से
इन तितलियों के जरा सा बैठने से
फैली लतायें
पंख लगाकर
कुसमय में प्रतिशोध मत कर ।
हे सुमन ! तुम क्रोध मत कर ।।4
यदि हृदय मे गुण, गन्ध ,सम ओज होंगे
बुद्धिजीवी वे भ्रमर गण खोज लेगें
प्रेरित हो
प्रतिशोध से
कुमार्ग का तुम शोध मत कर ।
हे सुमन ! तुम क्रोध मत कर ।।5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
64- 🌷स्वप्न क्यूँ आते मुझे🌷
छोड़कर मुझको निशा मे मन चला
पर अकेला ही नही उर ले चला
काश !कि हम
रोक लेते
फिर बता देते उसे ।
स्वप्न क्यूँ आते मुझे ।।1।
रोक लूँ तो नींद न नींद की छाया
बस अखरती आँख में तस्वीर वो पाया
बन्द करके
छिपा लेते
फिर भुलाते है उसे ।
स्वप्न क्यूँ आते मुझे ।।2
मुस्कराहट से खिली थी चाँदनी
फिर सिमट जाती सुमन पर रोशनी
मन दृगों को
साथ लेते
फिर दिखाते है उसे ।
स्वप्न क्यूँ आते मुझे ।।3
बिध गया उर बध गया स्नेह का बंधन
देखता मै रह गया अविराम स्पंदन
कह हृदय की
बात देते
उर में छिपाते है उसे ।
स्वप्न क्यूँ आते मुझे ।।4
सच नही शायद कभी हो वे अधीर
झिलमिलाकर शेष है जिनकी तस्वीर
प्रेम मेरा
आंक लेते
हर पल छिपाते तब उसे ।
स्वप्न क्यूँ आते मुझे ।।5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
65- 🌷स्वप्न क्यूँ आते मुझे🌷
दूर हूँ जिनके दृगों से हर पहर
हो रहा ओझल अब जिनका शहर
पास आते
दूर जाते
क्यू सताते है मुझे ।
स्वप्न क्यूँ आते मुझे ।।1
शायद कभी सोचा नही जिनके लिये
फिर हो रहा उद्विग्न क्यों उनके लिये
मिल रहे है
मुस्कराते
क्यों लुभाते है मुझे ।
स्वप्न क्यूँ आते मुझे ।।2
है निखरती इक शुशोभित वह कली
इस हृदय के भाव मे रहकर पली
खुद खुसी से
है लुटाते
लूट जाते है मुझे ।
स्वप्न क्यूँ आते मुझे ।।3
मुस्कराहट की महक से हूँ परिचित
नयनों के संकुचन से भी हूँ परिचित
सब दुःखों की
झेल जाते
उर में छिपाते है मुझे ।
स्वप्न क्यूँ आते मुझे ।।4
काश !ख्यालो में मैंने कह दिया होता
हर निशा का सबेरा सच नही होता
जान लेते
मान लेते
फिर बुलाते न मुझे ।
स्वप्न क्यूँ आते मुझे ।।5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
66- 🌷 सुबह होती है नही 🌷
इस किरण की
रोशनी
वह सजाती है नही ।
सुबह होती है नही ।।1
चल रहा निश्छल, ढूढता निर्भय
हो रहा उद्विग्न हो रही असमय
पर समय की
हार से
आस खोती है नही ।
सुबह होती है नही ।।2
है कठिनता की परख में सफलता
घिर रही है विरह मे विकलता
अब निरंन्तर
बहती सरिता
छणभर सोती है नही ।
सुबह होती है नही ।।3
झर रही हर बूँद , नमी ओस बन
सूखती नदिया अचल ख़ामोश बन
धीरे धीरे
रिस गयी
निर्मूल मोती हैं नही ।
सुबह होती है नही ।।4
बिन धरा सूरज किसे दे रोशनी
ढूढ़ती किरणे कि मंजिल न बनी
दूर की
बिकराल लहरें
तट को भिगोती है नही ।
सुबह होती है नही ।।5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
67 🌷सुबह होती है नही🌷
इस किरण की
रोशनी
वह सजाती है नही ।
सुबह होती है नही ।।1
दूर है वह अजनबी खुशियाँ लिये
दूर हम भी है विशद व्याकुल हुये
धुँधली छाया
सी दृगों मे
क्यों छिपाती है नही ।
सुबह होती है नही ।।2
मुस्कराहट की किरण की आश मे
मुरझा रही आभा कान्ति आभास मे
भावना दुःखमय
ख़ुसी के
बीज बोती है नही ।
सुबह होती है नही ।।3
हृदय के उद्गार उठे इस ज्वार से
मिट रही अपनी पहुँच अधिकार से
आस उर
विश्वास की
माला पिरोती हसि नही ।
सुबह होती है नही ।।4
शाम से पलते सिमटते अश्रुकण
बेधते ,पर ले चला हूँ एक प्रण
चल रहे इस
मनसद्वंद्व मे
रात बीती है नही ।
सुबह होती है नही ।।5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
68- 🌷मेरे दिल का यह पागलपन🌷
न जाने क्यों कल परसों से अपने दिल से है अनबन ।
सिर्फ तुम्हारे ही खातिर है मेरे दिल का यह पागलपन ।।1
यकीं न आये तो इस दिल पर करके देखो तुम प्रहार
अपनी सूरत देख सकोगे पाओगे तुम अपना प्यार
मेरा क्या मै
खोज रहा हूँ
तेरे दिल मे अपनापन ।
सिर्फ तुम्हारे ही खातिर है
मेरे दिल का यह पागलपन ।।2।।
जब से आया तेरा चेहरा और तुम्हारी यादें
तब से भूल रहा मेरा मन किये गए सब वादे
मन मे मेरे
बस जाता हैं
चाहत का इक अन्धापन ।
सिर्फ तुम्हारे ही खातिर है
मेरे दिल का यह पागलपन ।।3।।
नहीं कह सका और अभी तक अपने दिल की बात
डरता हूँ कि बदल न जायें मुलाकात के भी हालात
फिर मै किससे
कह पाऊंगा
एहसासो का वह झूठापन ।
सिर्फ तुम्हारे ही खातिर है
मेरे दिल का यह पागलपन ।।4।।
संकेतों से मैंने तुमसे दिया प्यार का था संदेश
पर तुमनें तो अनदेखा कर छोड सके न कुछ भी शेष
तुम सुन्दर हो
और तभी तो
दिखलाते हो रूठापन ।
सिर्फ तुम्हारे ही खातिर है
मेरे दिल का यह पागलपन ।।5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
69- 🌷उतना मै कहता जाऊँगा🌷
आँखों मे भरते आँसू बिना रुके बहता जाऊंगा ।
जितना ही तुम सब्र करोगे उतना मै कहता जाऊंगा ।।1
कभी झाँक कर इन आँखों मे क्या देखी अपनी तस्वीरें
जो यादों मे उतर -उतर कर आती रहती धीरे-धीरे
इसी तरह से
अगर रहोगे
बेशक़ मै डरता जाऊंगा ।
जितना ही तुम सब्र करोगे
उतना मै कहता जाऊंगा ।।2
जान रहा हूँ आहट बनकर आते हो तुम पास
परन्तु तुम्हें ही पता नहीं हैं तेरा यह प्रयास
तेरी आँखों
की तस्वीरें
तब तक मै पढता जाऊंगा ।
जितना ही तुम सब्र करोगे
उतना मै कहता जाऊंगा ।।3
संकेतो से कई बार मै करता हू प्रयास
ताकि तुमको भी हो जायें इस दिल का एहसास
जब तक तुम न
मना करोगे
प्रेम तुम्हें करता जाऊंगा ।
जितना ही तुम सब्र करोगे
उतना मै कहता जाऊंगा ।।4
एक स्वप्न तुम मेरे मन का, एक अलौकिक छाया
फिर भी मैंने नासमझी से दिल मे तुम्हें बसाया
जब होगी
मुझको तखलीफें
खुशी खुशी सहता जाऊंगा ।
जितना ही तुम सब्र करोगे
उतना मै कहता जाऊंगा ।।5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
70- 🌷क्यों सुन्दर होते है फूल🌷
और आज तक समझ सका न क्यों अच्छी लगती थी धूल।
सोच रहा था मै बचपन मेे क्यों सुंदर होते हैं फूल ।।1
कहां से आते चाँद सितारे रात कहां से आयी
सतरंगी ये इन्द्रधनुष हैं रंग कहां से पायी
क्यों उडती है
चंचल होकर
यह तितली मन के अनुकूल ।
सोच रह था मै बचपन मेे
क्यों सुंदर होते है फ़ूल ।।2
क्यों उडते रहते हैं पंछी क्यों आते पेड़ों मे फल
कहां से जाकर नदी शयानी भर आँचल लाती है जल
कैसे बहती
हवा निरन्तर
जबकि रहती हैं निर्मूल।
सोच रह था मै बचपन मेे
क्यों सुन्दर होते है फूल ।।3
बड़ा हुआ तो बड़ी हो गयी जीने की जिज्ञाशा
परन्तु आज तक समझ न पाया जीवन की परिभाषा
जितनी कोशिश
थी जीने की
थी सारी जीवन की भूल ।
सोच रह था मै बचपन मेे
क्यों सुन्दर होते हैं फूल ।।4
वही दृश्य अब वही नजारे पहुँचाते है मन मे ठेस
सिर्फ दुःखों के और नहीं कुछ बचा हुआ है अब अवशेष
देख देखकर
दुनिया के दुःख
हॄदय मे चुभते है शूल ।
सोच रह था मै बचपन मेे
क्यों सुन्दर होते है फूल ।।5
by-✍ रकमिश सुल्तानपुरी
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