मुक्तांकुर भाग–5

मुक्तांकुर भाग 5 के मुक्तक by Rakmish Sultanpuri

81

घूँट अपमानों की पीता जी रहा इंसान है ।
दम्भ, घृणा, ईर्ष्या है, खोखला अभिमान है ।
देखकर गहरी परत ये मान पर अपमान की ,
बैठ कोने में कहीँ अब रो रहा सम्मान है ।।

82

मंजिले नज़दीक हैं पर रास्ता सुनसान है ।
चल पड़ो फिर न रुको कह जिंदगी कुर्बान है ,,
सोच ले तू एक दीपक है तुम्हे करना उजाला ।
अंधकारों में बिलखता रो रहा इंसान है ।

82

न जाने किस तरह का लोभ है, अभिमान है ।
अब खुदी की आँख से छिप रहा इंसान है ।
क्या करोगे जब अँधेरा दिल में कायम ही रहा ,,
तब या तो कोई इंसान है या कोई हैवान है ।

83

मंजिले नज़दीक हैं पर रास्ता सुनसान है ।
चल पड़ो फिर न रुको कह जिंदगी कुर्बान है ,,
सोच ले तू एक दीपक है तुम्हे करना उजाला ।
अंधकारों में बिलखता रो रहा इंसान है ।

84

न जाने किस तरह का लोभ है, अभिमान है ।
अब खुदी की आँख से छिप रहा इंसान है ।
क्या करोगे जब अँधेरा दिल में कायम ही रहा ,,
तब या तो कोई इंसान है या कोई हैवान है ।

85

छोड़ दुनिया की नफासत सत्य से तक़रार कर ले ।।
नफ़रतों को मिटाकर  जिंदगी में प्यार कर ले ।।
वक्त की परवाह मत कर वक्त जायेगा चला ।
पर जला इक दीप दिल के रौशने संसार कर ले ।। 

86

क्यों नही मालुम तुम्हे कि लोग बसने अब लगे है ।
चन्द्र ,मंगल के ग्रहो पर जोर कसने अब लगे है ।
है भले हमने है खोयी आज अपनी सभ्यता ।
पर नये युग की झलक में लोग हँसने अब लगे है ।

87

है भटकते राह में जो आदमी लाना पड़ेगा ।
हर बुझी उम्मीद में अब जिंदगी लाना पड़ेगा ।
इन उजालो में जलाना दीप काफ़ी है नही ।
अंधकारों में तुम्हे ही रोशनी लाना पड़ेगा ।

88

झूठ बोले, झूठ पर एतराज होना चाहिए .
सत्य की हर इक जुबाँ पर नाज़ होना चाहिए .
वक्त तेरा भी नही है ,वक्त मेरा भी नही ,
पर वक्त पर ही सत्य का आगाज होना चाहिए ..

89

सम्बन्धो में,वफ़ा में आप होना चाहिए .
पर नही झूठा कभी प्रलाप होना चाहिए .
फर्क होता है बहुत दोस्ती और प्यार में,
दोस्ती और प्यार का परिमाप होना चाहिए ..

90

रिश्वतों का सहारा भी कहाँ का न्याय है .
भ्रष्टाचारी पुस्तकों का ये प्रथम अध्याय है .
है लिखी पर फिर जगा दूँ सो रही इंसानियत .,
घूस लेना घूस देना दोनों सदा अन्याय है ..

91

न हुये अब तक सफल सब कार्य जो विज्ञान से .
जो सुलझ पायी नही हैं गुथ्थिया सन्धान से .
साहित्यकारों ने उन्हें बस कल्पना में खोज डाला ..,
वे कार्य सम्भव हो रहे साहित्य के अवधान से ..

92

यह समाज का दर्पण है सत्य झलक दिखलाता है .
जड़,जीवन, जंगम तक ही सिमट नही यह जाता है .
यह आलोकित करता जीवन सीमित इसका क्षेत्र नही .,
जहा हमारी सोच नही साहित्य वहा तक जाता है .. 

   
  93

चाहतो में दिल की आजमाइसे बहुत होती है ।।
रूप हो तो अदाओ की नुमाइसे बहुत होती है ।।
वक्त अपना है तो लोग भी अपना कहते है
वरना सच्चे प्यार में शिकायते बहुत होती है ।।

94

उन्हें खोजा कही पाया तालाश ही जरिया था ।
दूरियों में खो गये जबकि पास ही जरिया था ।।
न वो मिले न ही उनकी मुहब्बत दोस्त ।
उनके प्यार का बस एहसास ही जरिया था ।। 

95

हर दिन दिल ऐ गम की हालत नही होती ।।
इंतजारो से प्यार में बरकत नही होती ।।
छोड़ ही जाते है चाँद और सूरज मुझे ।।
शाम ढली की दोस्तों को भी  मोहलत नही होती ।।

96

वफ़ा से बेवफ़ा ये बनाती है दूरी ।
यादो की दुनिया सजाती है दूरी ।
ये दोस्त ये इश्क़ भी अजीब होता है
इस इश्क़ में दिल को रुलाती है दूरी ।।


97

कर जघन्य अपराध जो दस्युओं में मस्त निकला ।
पाप के कर्मो में खोया हृदय जिसका शख्त निकला ।
काँपते थे भक्त, जन भी रत्नाकर के नाम से ,
था कभी वह क्रूर डाकू राम का ही भक्त निकला ।

98

जब शिकारी ने धनुष से क्रौंच को सन्धान मारा ।
तब प्रथम श्लोक बोला भक्ति में वह ध्यान धारा ।
क्रूर हृदय भक्ति का वह बन गया फिर एक मन्दिर ,
राम की गाथा लिखी रच दिया व्याख्यान प्यारा ।

99


लगे है लोग दुनिया को नयी जन्नत बनाने में । 
भरे हुंकार जज्बाती खरे वादा निभाने में ।
मग़र अब तक न खिल पायी झलक ए प्यार की ख़ुशबू,
कोई मन्थन नही करता कमी क्या है जमाने में ।।

100

चलो आज फिर मन्थन कर लो जो समाज की काया है ।
जन जन में आक्रोश व्याप्त है धन की काली माया है ।
चलो बताते है उनको कि दूर करो ये खुदगर्जी ,
जहर उगलते की बाते ,जो हृदय में तम छाया है ।

              Rakmish Sultanpuri


                         **समाप्त**

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें