दोहालय

==============दोहा संकलन0============
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हिंदी   हिंदी  रो   रहे,  हिंदुस्तानी   लोग ।
तन,मन,धन से कर रहे, अंग्रेजी उपयोग ।।1


अंग्रेजीमय  हो  गयी , हिंदी की  आवाज़ ।
जर्जर वीणा सी बजे,,नीरसता बिन साज ।।2


हिंदी  की है फ़िक्र पर ,अंग्रेजी  का  क्रेज़ ।
दिन दिन दूना बढ़ रहा, कौन करे परहेज़ ।।3


हिंदी  की है फ़िक्र पर ,अंग्रेजी  का  क्रेज़ ।
दिन दिन दूना बढ़ रहा, कौन करे परहेज़ ।।4


लँगड़े लँगड़े चल रहा,,नाम रहा  अवशेष ।
ढोंग समेटे मन रहा, हिंदी  दिवस  विशेष ।।5


हिंदी ठिठुरी रह  गई, ज्यो  सर्दी  मे  धूप ।
अंग्रेजी व्यापक हुई, प्रकृति के  अनुरूप ।।6


भाषाओं की  धात्री , समरसता  की खान ।
आओ मिलकर हम करे, हिंदी का सम्मान ।।7


शब्द शब्द की नाप  से, भावों  पर  अनुबंध ।
दिन दिन यों बढ़ता गया, महक रही न गन्ध ।।8


शब्द कुसुम को गूंथता, शब्दो पर नव छन्द ।
भाव ठिठुरने यो लगे ,ज्यो कँकरीली  कन्द ।।9


कुंठित भाव प्रवाह गति, तनिक हो रही मन्द ।
'राम' विकारी ,काम का , छंद नही वह छंद ।।10


राजनीति के पाठ मे,  जाति जाति मे पात ।
पढ़े पहाड़ा पांच का पचपन पे रुकि जात ।।11


राम, सभी समझाइये, घर निज पास पड़ोस ।
अफ़वाहों को त्याग दें, बिना किये अफ़सोस ।।12


रक्षाबंधन  प्रेम  का, जीवन   मे   उपहार ।
भाई बहनों के लिये, खुशियों का त्योहार ।।13


वर्षा आकर रुक गयी , हरियाली  के  द्वार ।
धरती से मिलने लगी, रिमझिम पड़े फुहार ।।14


छाया चुन चुन कर रही, पत्तो  का  श्रृंगार ।
घूप खड़ी हो देखती, रिमझिम पड़े फुहार ।।15


कुंठित भाव प्रवाह गति, तनिक हो रही मन्द ।
'राम' विकारी , काम का , छंद नही वह छंद ।।16


चोटीकटवा भूत से , नारि हुई सब मौन ।
हेल्मेट पहने जागती, सोते पुरुष अलोन ।।17


चोटी की अदभुत कथा, अफ़वाहों की बात ।
चोटी कटवा भूत कम,, शंका अधिक सुझात ।।18


राम, सभी समझाइये, घर निज पास पड़ोस ।
अफ़वाहों को त्याग दें, बिना किये अफ़सोस ।।19


सावन की अठखेलियां, देतीं हैं उपहार ।
छायी है काली घटा,,रिमझिम पड़े फुहार ।।20


वर्षा आकर रुक गयी, हरियाली के द्वार ।
धरती से मिलने लगी, रिमझिम पड़े फुहार ।।21


छाया चुन चुन कर रही, पत्तो का श्रृंगार ।
घूप खड़ी हो देखती, रिमझिम पड़े फुहार ।।22


जितने नीच कुकर्म से, मानव हुआ उघार ।
उतनी ऊँची हो गयी ,,मज़हब की दीवार ।।23


मानवता निज  धर्म है , मानव  का  परिवार ।
खींच लिया है नर अधम, मज़हब की दीवार ।।24


आग लगाते देश मे , रहते निरा अलोन ।
मज़हब की दीवार के, पार खड़े है मौन ।।25


मज़हब की  दीवार  पर, बैठ लिये  बंदूक ।
देख तमाशा वो रहे ,ख़ुद अपना घर फ़ूक ।।26


भाईचारा  अस्त्र  हो, सस्त्र  रहे  बस  प्यार ।
चलो ढ़हायें आज मिल, मज़हब की दीवार ।।27


बादल बरसे झूम के,आकर धरा करीब ।
छप्पर का आंशू गिरा, रोया राम  गरीब ।।28


हरियाली पलने  लगी , पा कुदरत  की  गोद ।
रिमझिम रिमझिम कर रही, वर्षा मनोविनोद ।।29


रतियन अँखियाँ रो रही ,दिनभर करत जुगाड़ ।
राम मिलन प्रिय आस मे ,छन छन लगे पहाड़ ।।30


आतुर हृदय है व्यथित, सुने प्रेम की बोल ।
टूटेगा हरहाल दिल, मत कर टाल  मटोल ।।31


आंखें प्यासी है अभी, दिल रखता उपवास ।
राम नयन भर देख लू, बुझ  जायेंगी  प्यास ।।32

शब्द छोड़कर भाव का, लेना तुम आधार ।
नेह निमन्त्रण राम का, कर लेना  स्वीकार ।।33


दुखी नही मन हे सखे, सुन व्यंग्यों के वाण ।
प्रेम भरे अपमान पर,,न्योछावर  यह  प्राण ।।34


सूरज डूबा था नही, बादल मद मे चूर ।
भिगो रहे थे धूप को, दोनों निष्ठुर क्रूर ।35


बादल  पंछी   बन  चुने, तारे   सारी  रात ।
आसमान की डाल पर,, बैठ करे बरसात ।36


व्यथा धरा की देखकर, घन बरसे  घनघोर ।
बिजली नेह बिछोह से, तड़प रही चहुँओर ।।37


ओढ़ कपासी मेघ नभ, सूरज करे शिकार ।
इंद्रधनुष को देखकर, भावुक हुआ बिमार ।।38


हरियाली हँसने लगी , पुष्पित जीवन जीव ।
तृप्त हुये वन,बाग़ सब, नदियां हुई  सजीव ।।39


अन्न प्रदाता है कृषक, धरा भक्त इंसान ।
धूप छाँव सहता रहे, ,करे अन्न का दान ।।40


कृषी   यंत्र  से   हो  रहा , नये- नये   सन्धान ।
पर किसान बिन सून है,, कृषि का नया विहान ।।41


माता धरती को मिला,,नेक उपज वरदान ।
और कृषक के रूम में ,रक्षा करे भगवान ।।42


मनुज सदा मांगे यहां ,मान और सम्मान ।
खेतों को भी चाहिए, ,प्यारा एक किसान ।।43


यह किसान तो रीढ़ है ,भारत का प्राचीन ।
लोहा इसका मानता , पाक  रहा या चीन ।।44


दुख दुर्दिन को काटता , कल तक रहा किसान ।
अब   भी  हालत  है  बुरी , कर  लेते  विषपान ।45


दो टुकड़ों मे बट गयी,कृषि की एक दुकान ।
एक मांन का  है  धनी, दूजा  बस  अपमान ।46


वही बॉस की झोपडी,वही खेत खलिहान ।
वही रँकिता आज  भी,भरती  है  मुस्कान ।।47


नीलगाय वन सुअर से , खेतों को नुकसान ।
भरता पेट गरीब कस ,जीवन  नही  असान ।।48


वर्षा  धोखा  दे  गयी , नहरों  मे  व्यवधान ।
शहरों मे दिन काटता , भूखा फिरे किसान ।।49


राम योजना देश की ,कागज तक ही मान ।
अधिकारी को बाट कुछ ,लील गये प्रधान ।।50


निज जननी या देश की , माता गाय समान ।
राम रखो नियमित सदा, गो सेवा का ध्यान ।।51


राम प्रार्थना एक है , हे ईश्वर  भगवान ।
गाय राष्ट्रीय पशु बने,बढ़े देश की शान ।।52


पापी नर से त्याग दो ,अब से मेल मिलाप ।
जिस नर के माथे लगा ,गौहत्या  का पाप ।53


तिल तिल गर्मी बढ़ रही , पल पल लगे थकान ।
उमस सताये रात  दिन  ,  आफ़त  मे है  जान ।।54


भौतिकता से है सजी , जीवन एक दुकान ।
लोभ मोह की छूट से , आफ़त  मे है जान ।।55


भौतिकता मे भक्तिमय, भक्तों का नुकसान । /div>
भक्ति करे संग्राम या , आफ़त  मे  है  जान ।।56


दानशीलता से मिले, ,सब लोगों का प्यार ।
राम ख़ुशी मन की बढ़े ,सदा करो उपकार ।।57


सारे बगुले चल रहे , आज हंस की चाल ।
तोते  सभी  निराश  हैं ,उल्लू  मालामाल ।।58


बात कही क्या आपने, सुंदर सरल सटीक ।
अपनी गलती आपसे, कर लेना  ही  ठीक ।।59


शीतलता सहमी बढ़े ,देख सूर्य का ताप ।
धूप और  गर्मी  बढ़ी , देने  को  सन्ताप ।।60


गाँव नगर को छोड़कर ,शीतल मन्द समीर ।
नीरवता   चुगने  लगा , बैठ  नदी  के  तीर ।।61


जलधि मिलन की प्यास मे ,बदल गया वर्ताव ।
नदियां   दुर्बल   हो  गयीं , धीमा  पड़ा  बहाव ।।62


धन कन्या गोदान से, बढ़े मान सम्मान ।
दानो मे सबसे बड़ा , रक्तदान का दान ।।63


सफ़ल सार्थक प्रेम  पर , दोहे  रचे  सुजान ।
और भक्ति पर रच दिये, अतुलनीय श्रीमान ।।64


प्रिय मिलन की बेक़सी , घूँघट पड़ी  निकाल ।
देख नयन की टकटकी,ल , हुई शर्म से लाल ।।65


अर्थहीन कवि कर्म  मे, नीरसता  की  होड़ ।
शब्द शब्द सँग पंक्ति की, करते है गठजोड़ ।।66


भाव  ठिठुरता  जो  रहे, कांप  रहे अशआर ।
छंद बिना तुक ताल बिन , कविता है बेकार ।।67


शुरू दिखाई दिव्यता, अंत कर दिया खोड़ ।
जैसे दूध  गिलास  पर, नींबू  दिया  निचोड़ ।।68


कविता दिल से जो लिखो, नही हो सके व्यर्थ ।
भाव  बरसते  शब्द  हों, लदा  हुआ  हो  अर्थ ।।69


राम'निरर्थक लेखनी , कवि बादल की हार ।
बिन शिक्षा मरुभूमि मे , करता  जो बौछार ।।70


पावनता की नींव है, सज्जनता  का  द्वार ।
निश्छल मन सप्रेम से, करो सत्य स्वीकार ।।71


सत्य एक  परकास  है, सत्य  अनूठी  शक्ति ।
सत्य करो स्वीकार नित, सच मे हो अनुरक्ति ।।72


सच का दीपक न बुझे,बना रहे उजियार ।
जीवन स्वर्ग बनाइये, सत्य करो स्वीकार ।।73


राम कमाई प्रेम  की ,सच्चाई  का  बाट ।
पलड़े एक समान है , बाट सके तो बाट ।।74


भक्ति ,प्रेम ,सच एक वट, शाखाएँ है तीन ।
राम विरत हो एक  से, जीवन जीव विहीन ।।75


राम तराजू  प्रेम का, बाट भक्ति का  आन ।
त्रुटियों का पसगां बना, बाक़ी एक समान ।।76


आँख करकती आपकी, दर्पण का क्या दोष ।
सुनो   बुराई  आपनी , रख  दिल  मे सन्तोष ।।77


त्याग क्रोध  की  भावना , रे मूरख  इंसान ।
क्षमाशील नर जगत मे ,,है सबसे बलवान ।।78


राम छोड़कर स्वार्थ को, करो ईश की भक्ति ।
परमारथ परस्वार्थ से,  मिलती  सच्ची शक्ति ।।79


सज्जनता के तीन बल,वाणी, विनय, विवेक ।
दुर्जनता का  एक  बस, धन धन धन प्रत्येक ।।80


राम राम मुश्लिम कहे ,हिन्दू कह अल्लाह ।
सिक्ख इसाई परस्पर, मिट जाहे सब दाह ।।81


धर्म विषैला बीज है ,कट्टरता है खाद ।
पूरी दुनियां बो  रही , होने को बर्बाद ।।82


मानवता इक धर्म है ,  सब धर्मों  का मूल ।
उलझा क्यो इंसान है, निजता के प्रतिकूल ।।83


सज्जन,सत,सुविचार सँग, शुद्ध सरस व्यवहार ।
सदाचार    को    मान   दो ,  इनसे   है  संसार ।।84


पिता एक जगदीश है , माँ इक देवि समान ।
इनसे   है  संसार   यह , जो  समझे  इंसान ।।85


इस हृदय की है व्यथा, या है मन मे खोट ।
परछायी पर प्रेम की,झलक रही ले ओट ।।86


जीवन साथी मानकर ,हृदय निःसन्देह ।
अनदेखा है रूप  पर ,कर  बैठा  है नेह ।।87


भाई चारा बढ़ रहा,ल,रखकर मन मे वैर ।
काट रहा मानव स्वयं, मानवता  के  पैर ।।88


नारेबाजी से करे , भारत को बदनाम ।
राम' भरे है देश मे , ऐसे नमक हराम ।।89


महँगाई  के  दौर  मे , कैसे  पले  समाज ।
बुद्धिमान करने लगा,बुद्धिहीन  के काज ।।90


भाई चारा बढ़ रहा,, ,,रखकर मन मे वैर ।
काट रहा मानव  स्वयं, मानवता  के  पैर ।।91


नारेबाजी से करे , भारत को बदनाम ।
राम' भरे है देश मे , ऐसे नमक हराम ।।92


महँगाई  के  दौर  मे , कैसे  पले  समाज ।
बुद्धिमान करने लगा,,बुद्धिहीन के काज ।।93


हवा बसन्ती सी सरस, झरने सी आवाज ।
इंद्रधनुष सी है अदा, सन्ध्या जैसी लाज ।।94


मृगनयनी  चलने  लगी, जैसे  बढ़े  उमंग ।
सँगमरमर सी देह पर, खिला गुलाबी रंग ।।95


निर्मल मन का तन धनी, निर्मल मन का ज्ञान ।
निर्मल भक्ति सुजान  की, मिलते  है  भगवान ।।96


बरपा क्या संसार मे,क्यो अकड़े है लोग ।
सुख के साधन ढूढते,क्योंकर नये प्रयोग ।।97


चलत घुटुरुवन डगमगे, बिहँसत करे किलोर ।
माँ  की  ममता  जागती, मन मे  उठे  हिलोर ।।98


नेह  नियंत्रित  घोषले,माँ  ममता  की डोर ।
चोंच चिरंगुन अधखुले ,मन मे उठे हिलोर ।।99


चढ़ी दुपहरी नीम  पर, छूती  रही  अनन्त ।
लगा टकटकी देखते, अम्बर और दिगन्त ।।100


हवा बसन्ती सी सरस, झरने सी आवाज ।
इंद्रधनुष सी है अदा, सन्ध्या जैसी लाज ।।101


मृगनयनी  चलने  लगी, जैसे  बढ़े  उमंग ।
सँगमरमर सी देह पर, खिला गुलाबी रंग ।।102


राम गरीबी  कब  मिटे,  कब तक  हो  उपवास ।
निर्बल दीन मलीन मुख , सुख की करता आस ।।103


सबल राम को जानिये, निर्बल यह  संसार ।
लिये राम का नाम जो ,भवसागर  हो पार ।।104


चढ़ी दुपहरी नीम  पर, छूती  रही  अनन्त ।
लगा टकटकी देखते, अम्बर और दिगन्त ।।105


तपता सूरज देखकर, गर्मी  मांगे बवारि ।
दौड़ धूप करने लगी, धूप सयानी  नारि ।।106


मन को पावन राखिये, दिल में सच्ची प्रीति ।
होगी  अत्याचार  पर , मानवता  की  जीत ।।107


सूखी रोटी रह गयी , बासी पड़ा था  भात ।
भूखा पेट गरीब का, कस अबोध ना खात ।।108


माचिस की तीली गली, पा अंसुवन की झाग ।
आग  गली मे  लग  गयी , देख  गरीबी भाग ।।109


देख वृद्ध की रंकिता , हँसे खेत  के  मेड़ ।
खपटैले चप्पल मलिन,बिन बध्धी के टेढ़ ।।110


लोग  सही   है  या  गलत,या  मैं  झूठा यार ।
उम्र ढल गयी द्वंद्व में ,मिला न सच का द्वार ।।111


प्रेम बढ़े नित गेह में ,सुखी रहे  परिवार ।
राम मुबारक हो तुम्हे ,होली का त्यौहार ।।112


भाईचारे से  मिलो ,बढ़ती  रहे  उमंग ।
सम्बन्धो में नेह का ,मचा रहे हुड़दंग ।।113


भाव गुलाल उड़ाइये , पियो खुसी की भंग ।
जीवन   भर  छूटे  नही , एक  प्रेम  का रंग ।।114


होली के इस पर्व पर,जले हृदय के क्लेश ।
पावनता   के  रंग  में , प्रेम  रहे  उर  शेष ।।115


रंग खिले उल्लास का,मधुरिम हो सम्बन्ध ।
फैले इस  संसार में , मानवता   की  गन्ध ।।116


राम मिले  सुख  सादगी ,और  बढ़ेगा  मान ।
मात पिता गुरु साधु का, सदा करो सम्मान ।।117


फूक फूक चलना  सदा, भूल एक पर्याप्त ।
राम मॄत्यु का कटघरा, चौतरफा है व्याप्त ।।118


विनय नम्रता सादगी ,सत्य सरस व्यवहार ।
सदाचार सदभाव  का, ऋणी  रहा  संसार ।।119


मन की खायीं विषभरी, झांझर झरती बूंद ।
निज तन भींगे दुख सहे, तड़पे आँखे  मूँद ।।120


धन्य वही नर नागरिक, ज्ञानी या मतिमन्द ।
देख पड़ोसी की ख़ुशी , मिले जिसे आनंद ।।121


सुख के दो दिन बाद में, दुख का है परिवेश ।
पुनः सुखों की चाह  में ,देह  रह  गयी  शेष ।।122


एक अवस्था वृद्ध की, माया  बढ़ती जात ।
मायारूपी मृत्यु के , सम्मुख है भय खात ।।123


घाव मिले यदि शत्रु से , छोड़ सभी अपवाद ।
बदला है तो  लीजिये, चाहे दो  दिन के  बाद ।।124


मन की कालिख़ न गयी , तृषा रह गयी शेष ।
वही   दे   रहे   ढूढ़कर , बिन  मांगे   उपदेश ।।125


कोरा कागज़ मन मनुज, शिशु को दो सद्ज्ञान ।
पुण्य मिले  सन्तोष  निज, बालक  बने  महान ।।126


ज्ञान, मान, धन धर्म की ,नही जगत में भीख ।
कर्म किये बिन न मिले ,है जीवन  की  सीख ।।127


नेता   नेता  न  रहे,  रहा  न  वो  जज्बात ।
राजनीति मे ढह गयी, कुर्सी सँग औकात ।।128


नेता के भावुक वचन,  लगे  छुड़ाने दाग़ ।
भरे हौसला व्यर्थ में ,बिन पंखों सा काग ।।129


जनता के  संज्ञान  में ,है  नेतन  की  लोच ।
पेट स्वयँ का भर गया ,मुँह खाये या चोंच ।।130


सरसों उमड़ी खेत में, ,खिले बसन्ती फूल ।
तेरे   मेरे  प्यार  का,  मौसम  है  अनुकूल ।।131


परसो पनपे पात  संग, पावन  पुष्प  प्रसून ।
पुलकित हो प्रभात में , कम हो गया जुनून ।।132


सुख दुख कांटे फूल है ,कभी धूप सा छाव ।
बनी   रहे  समरूपता, मरहम  हो  या  घाव ।।133


मन को पावन राखिये, तन सा निर्मल आप ।
धन    का  सदुपयोग  कर,  दूर  रहे  संताप ।।134


निर्धन धन का लालची, भले कृपण कंजूस ।
धनी न  सोहत  धर्म से , क्यों  लेता है  घूस ।।135


रिस्तों में जब स्वार्थ हो,  तो कैसा अफ़सोस ।
राम मिलेगा प्रेम  से,  ही निज  को  सन्तोष ।।136


रहे सजगता कर्म में , भाव  रहे निष्काम ।
रिस्तो में खुशियाँ रहे, जीवन के आयाम ।।137


लोभ क्षोभ मद मोह को, करने दो बिश्राम ।
मानवता का पाठ पढ़, जीवन  के आयाम ।।138


यश अपयश समरूपता, हार जीत  परिणाम ।
सुख दुख का कर सामना,जीवन के आयाम ।।139


जग   में   सच्चे   मित्र  से , मिलिए  बारम्बार ।
हृदय निहित हर भाव का,,करे सफल उपचार ।।140


सच्चे उर से मित्रता ,  उपजाती  नित  नेह ।
मिटे हृदय के सूल सँग ,मन के सब सन्देह ।।141


जीवन की औषधि सरल, मित्र हास परिहास ।
'राम'  मिले   प्रसन्नता , सदा   करो  परयास ।।142


कोमल  वाणी   नेह   की   उपजाती   नित  हर्ष ।
वाक्य    वाक्य  संजीवनी ,  मानव  के  आदर्श ।।143


नेता निर्छल  कर्मठी, योगी  सरस सुजान ।
देश गांव छवि देखकर,करें सभी मतदान ।।144


लालच धन डर धौस का,दान नही है दान ।
प्रलोभन से हो तटस्थ, करें  सभी मतदान ।।145


छोड़ पुरानी दुश्मनी ,मान और अपमान ।
जाति धर्म से हो परे , करें सभी मतदान ।।146


ईर्ष्या दुख की बावली, जो उर रखो सजोय ।
मान हानि धन धर्म की ,तन की दुर्गति होय ।।147


ईर्ष्या मन का रोग है, करो त्वरित उपचार ।
देख विरोधी का भला, खुद पर करे प्रहार ।।148


ईर्ष्या की औषधि अमिट, मन में रही जो व्याप्त ।
'राम"  तोष   संयोग  से , दैनिक  ध्यान  प्रयाप्त ।149


प्रेम समर्पित व्यक्ति का ,न्योछावर है प्राण ।
भाव हृदय  में  संघनित ,दृग  देता  प्रमाण ।।150


प्रेम समर्पण भाव का , प्रेम एक एहसास ।
प्रेम द्वार है स्वर्ग का, प्रेम पथिक बिस्वास ।।151


प्रेम दया, करुणा नही, क्रोध नही मद ,लोभ ।
राम मिले  बस  प्रेम, से, बढ़े  व्यर्थ  में  क्षोभ ।152


चली योजना सालभर,हुआ अथक प्रयास ।
देख गरीबों की दशा , रोता  रहा  विकास ।।153


आँख मिचौली खेलते , झोंक  रहे  है  धूल ।
हुआ असर हर गाँव में ,उन्नति के प्रतिकूल ।।154


दुर्दिन दुःख दारुण यथा, खास एक मलमास ।
जीवन   ही  उम्मीद   है , होना   नही  उदास ।।155


वाणी में  जिनके  गरल , उर में  पर  सन्ताप ।
क्रोधी, तुनकमिजाज, हम ,दुर्जन अपनेआप ।।156


दम्भ, कुकर्मी , नीचता, , दुर्जन  की  पहचान ।
मुख है विष की पोटली,अरि भुजंग सम जान ।।157


सरसो बिहँसी खेत में, हरियाली के अंत ।
गेहूँ में किलकारियाँ ,,लाया नया बसन्त ।।158


दिन है सच का आवरण , रजनी झूठ प्रतीक ।
सुबह  शाम  है  दोगले , लगते  सबको  नीक ।।159


तिनका तिनका झूठ का, ढेर लगाकर  पाप ।
आग लगा सच से हृदय, तोड़ दिये हो आप ।।160


जीवन नौका जग जलधि, आशा की पतवार ।
भांप भवँर  में  डगमगी,  ,चुप  है  खेवनहार ।।161


प्रेम गगन में  ढूढ़ती, आशाओं  के रंग ।
जीवन डोर समेटती , उड़ती रहे पतंग ।।162


मुँह की खाये या गिरे, राजनीति  हुड़दंग ।
किसको क्या परवाह है,उड़ती रहे पतंग ।।163


हाड़ कपाउँ ठंड  में, जैसे  चली  बयार ।
राम बढ़ी है थरथरी, निर्धन हुआ उघार ।।164


ठंडी मन में रह गयी , गया न  झूठा  ताव ।
रही कपकपी उम्रभर, जलता रहा अलाव ।।165


गोली देती फिर रही , जनता को सरकार ।
जमा निकासी में हुआ, घाटे  का व्यापार ।।166


कोयल कुहके भोर मे, कौवा बोले काँव ।
मिठऊ महुआ याद है,प्यारा अपना गाँव ।।167


दूषित जल बिन व्याकुले ,लगे शहर में घाव ।
शीतल मन्द समीर मय, प्यारा  अपना  गांव ।।168


चिड़ियों की चहकारिया, है  बरगद की छांव ।
आज भी हमको लग रहा,प्यारा अपना गाँव ।।169


चार चरण दो पंक्ति है, चौबिस लघु गुरु आय ।
तेरह  ग्यारह   अर्द्धसम, वह  दोहा  कहलाय ।।170


धुंध बढ़ी है रात से , कुहरा हो गया पागल ।
मित्र किनारा कर रहा, मौज  ले रहे  बादल ।।171


शिक्षक वित्त विहीन के, उठ जागो तैयार ।
राजनीति सरकार  पर, सीधे  कर  प्रहार ।।172


बेटी  इक  वरदान  है  , मानवता  का  मूल ।
कोमल सहज सुभाव है स्थिति के अनुकूल ।।173


प्रकृति इक उपहार है, इस जीवन के संग ।
भावों के विस्तार का,  खिले  अनेको रंग ।।174


नदी झील वन खण्डहर ,झुरमुट तट मैदान ।
महापुरुष पर्वत बने ,  प्रकृति  की  है शान ।।175


सूर्य चन्द्र नभ चांदनी , धरती  सृजनहार ।
निशा रूपसी तारो सँग,आती करे सिंगार ।।176


प्रकृति ही सब देत है ,  सब  कुछ  हर भी लेत ।
व्यथित करे छ्णभर त्वरित, आकर्षण भर देत ।।177


राम करो सम्मान अब, मत कर  वृक्ष प्रहार ।
प्रकृति की उपयोगिता , जीवन के उस पार ।।178


प्रेम पियासा है जगत, पशु पंछी नर देह ।
राम मिले पुनि लौटि के ,नेह देहे से नेह ।।179


निज मन स्थिर प्रेमधन, नयनो से प्रवाह ।
राम नयन में यों बसे, ज्यो सांसो में आह ।।180


निज नेहो के बोध का, चेहरा है  प्रतिरूप ।
राम उतरकर हृदय छवि ,फैली जैसी धूप ।।181


आत्मसमर्पण प्रेम का, विश्वासो के संग ।
राम बढे समरूप में ,ज्यो शरीर  के अंग ।।182


मातृभूम निज देश हित ,भक्ति सखा परिवार ।
राम अतिथि को दीजिये , शुद्ध हृदय से प्यार ।।183

 
राजनीति में  राष्ट्रहित, मिले प्रेम  संवर्ग ।
देश हमारा एक दिन, बन जायेगा स्वर्ग ।।184


राजनीति को धर्म से, जोड़ रहे चहुँओर ।
आपस में अवलेहना ,करते सन्मुख चोर।।185


प्यासी आँखों से मिलो, सुन जनता के मर्म ।
समाधान  प्रधान   है , राजनीति  का  धर्म ।।186


डगमग नैया देश की ,सुन लो खेवनहार । 
आप चढ़े पुष्पक चले, हम डूबे मझधार ।।187


दागी ,लंपट देश को , नही  चाहिये घाघ । 
राम" देश दीवार पर, दीमक जस हैं लाग ।।188


दिनकर से पहले उठत, होय  न देत  अंजोर ।
राम कृषक जन जात है,निज खेतोँ की ओर ।।189


चना चबैना चल दिये,गमछा अउर कुदाल ।
राम लिये गुड़ पोटली,चलते मधुरिम चाल ।।190


आलू  बोये   होत  हैं ,  आलू   के  ही  पेड़ ।
राम कभी निज श्रम बिनु,जामि सके न रेड़ ।।191


पौधों की अति दुर्दशा, मेड़ी दियो बिगाड़ ।
राम सूअर वन रात में, पौधे  दिये उखाड़ ।।192


राम दुःखी अति दीन उर, वाणी गयी सुखाय ।
मेहनत का फल न मिले, मन ही मन पछताय ।।193


निरखि निरखि निज खेत को ,लगी धूप अकुलात ।
राम'  चबेना    मेड़    पर  , पड़ा   रहत  बसियात ।।194


चूंटों की  लश्कर चली, कौआ बोले काँव ।
राम गुड़ै पर माति गै, करते रहत खिंचाव ।।195


कबहू  सूखा  बाढ़  तो, कबहु ओला  वृष्ट ।
राम किसानी भाग्य के, होतै रहत अनिष्ट ।।196


जिह किसान उपजात है, फसल अनेक प्रकार ।
'राम'  वही  भुखमरी   के, होते   यहा  शिकार ।।197


जो किसान सम्मान बन , थे भारत की शान ।
"राम' बने  मजदूर  है,छोड़  खेत  खलिहान ।।198


 रंक   भले  दुर्जन  भले  ,  गुणग्राही   मानिन्द ।
 कीचड़ भरे तलाब से, मे बिकसे ज्यों अरविन्द ।।199


हिंदी   भाषा   की   नदी , गंगा   पावन  नाम । 
आओ मिलकर हम करें ,इसको आज प्रणाम ।।200


जीवन के  तालाब  मे, मानवता  का  फूल  । 
सींचो नित नव प्यार से, अवसादों को भूल ।।201


भौतिकता की भूमि पर,,जीवन का तालाब । 
सूख रहा  सँग , नेह दल, पुष्पों  का  बर्बाद ।।202


माँ का दर्शन मात्र  है , स्वर्णिम दिव्य अनूप । 
देती छाया नित सुखद , ममता की प्रतिरूप ।203


नेह लगाकर कर दिया, सादी से इनकार ।
देता  कैसे रंकिता , का  उसको  उपहार ।।204


लम्पटता को छोड़ दे, योगी बनो सुजान । 
तू ऊर्जा का स्रोत है,,,अपने को पहचान ।205


राम समाई जगत मे, ज्यो वर्षा सँग धूप । 
घनीभूत है प्रेम मे, स्वतः भक्ति का रूप ।।206



                         ✍ रकमिश सुल्तानपुरी

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